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Article
ANALYTICAL STUDY OF MOONLI NIGHT PAINTIN IN KANGRA STYLE
कांगड़ा
शैली में
चांदनी रात का चित्रों
का
विश्लेषणात्मक
अध्ययन
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Kiran Sharma 1* 1 Research Scholar,
Department of Visual and Performing Art, Magalayatan
University, Beswan, Alligarh, Uttar Pradesh, India |
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ABSTRACT |
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English: Among the various styles of indian miniature painting, the Kangra style holds a significant place. The Kangra style is considered to be the most sensitive and aesthectic style in indian miniature painting. This style exhibits a synthesis of nature, human emotion, and devotion that makes it distinct from other styles. Especially in depicting moonlit night, Kangra artists have demonstrated their imagination and emotional depth to the extreme. The artists have not merely depicted the moonlit night as a natural background element, but have depicted it as a key component influencing the emotional atmosphere of the paintings. The Kangra School artists have imbued Radha Krishna’s love life, flute playing, and other romantic scenes against the backdrop of a moonlit night, giving them a transcendental beauty. The combination of white and blue colors in these paintings, along with the shadows of trees, the waves of the Yamuna River, and the moonlight spread across the sky, creates an atmosphere in which various emotions such as love, separation, and devotion emerge effortlessly, and the mere sight or experience of them evokes a sense of supreme beauty .The purpose of this research is to analyse the artistic, emotional, and symbolic meanings of the Kangra style depicton of moonlit nights. The primary objective of this research is to explain how Kangra artists have transformed the moonlit night from a mere symbolic of natural beauty to a vehicle of emotions and spiritual experience. This research will thus seek to deeply understand the emotional sensitivity and spiritual aesthectic perspective of indian painting. Hindi: भारतीय
लघु
चित्रकला की
विभिन्न
शैलियों में
कांगड़ा शैली
का
महत्वपूर्ण
स्थान रहा
है। कांगड़ा
शैली भारतीय
लघु
चित्रकला
में सबसे संवेदनशील
और
सौंदर्यपूर्ण
शैली मानी
जाती है। इस
शैली में
प्रकृति,
मानवीय
भावनाओं और
भक्ति का ऐसा
समन्वय मिलता
है जो इसे
अन्य
शैलियों से
विशेष बनाता
है विशेष रूप
से चांदनी
रात का
चित्रण में
कांगड़ा कलाकारों
ने अपनी
कल्पनाशीलता
और भावनात्मक
गहराई को चरम
पर
पहुँचाया।
कलाकारों ने
चांदनी रात
को केवल
पृष्ठभूमि
का एक
प्राकृतिक
तत्व मानकर
चित्रण नहीं
किया है
बल्कि
कलाकारों ने
चित्रों के
भावनात्मक
वातावरण को
प्रभावित
करने वाला
मुख्य घटक के
रूप
में चांदनी
रात का
चित्रण किया
है। कांगड़ा
शैली के कलाकारों
ने राधा
कृष्ण की
प्रेमलीला,
बंसी
वादन और राधा
कृष्ण के प्रेम
प्रसंगों को
चांदनी रात
की
पृष्ठभूमि में
चित्रित करके
उन्हें
अलौकिक
सौन्दर्य
प्रदान किया
है। इस प्रकार
के चित्रों
में सफद और
नीले रंगों
का संयोजन
पेड़ो की छाया,
यमुना
नदी की लहरों
और आकाश में
फैली
चंद्र-प्रभा
एक ऐसा
वातावरण
रचते है,
जिसमें
श्रृंगार ,
विरह
और भक्ति
जैसे विविध
भाव सहजता से
उभर आते है
जिसे देख या
अनुभव करने
मात्र से ही
परम
सौन्दर्य की
अनुभूति
होने लगती
है। इस शोध का
उद्देश्य
कांगड़ा शैली
में चांदनी
रात के चित्रण
की कलात्मक,
भावनात्मक
और
प्रतीकात्मक
अर्थो का
विश्लेषण
करना है। इस
शोध का मुख्य
उद्देश्य यह
बताना है कि
कैसे कांगड़ा
कलाकारों ने
चांदनी रात
को केवल
प्राकृतिक
सौन्दर्य का
प्रतीक न
मानकर ,
उसे
भावनाओं और
आध्यात्मिक
अनुभूति का
वाहक बना
दिया है। इस
प्रकार यह
शोध भारतीय
चित्रकला की
भावनात्मक
संवेदनशीलता
और
आध्यात्मिक
सौन्दर्य
दृष्टि को
गहराई से
समझने का
प्रयत्न करेगा। Keywords: Kangrastyle, Moolit Night, Krishna
Leela, Shringar Rasa, कांगड़ा
शैली, चांदनी
रात, कृष्णलीला,
श्रृंगार
रस |
||
प्रस्तावना
बीसवीं
शताब्दी के आरम्भ में
पंजाब और
हिमालय की
सुरम्य
घाटियों से एक
परम्परागत और
उन्नतशील
भारतीय कला शैली
के चित्र
उदाहरण
प्राप्त हुए , जिससे कला
जगत की
विचारधारा और
आलंकारिक रूचि
पर एक
परिवर्तनकारी
प्रभाव पड़ा।
इन चित्रों के प्राप्त
होने से
भारतीय कला के प्रति
विचारधारा ही
बदल गई। इन
चित्रों की कला-शैली
मुगल शैली से
भिन्न और
भावनापूर्ण
थी और इन
कृतियों में
पहाड़ी आत्मा
का सौन्दर्य, सौकुमार्य, वैभव और
यौवन मुखरित हो उठा।
यह पहाड़ी
चित्र
शैलियों
पहाड़ी क्षेत्रों
के ठाकुर
राजाओं की
ठाकुराइयों
में विकसित
हुई। इन शैली
में कांगड़ा
शैली विशेष
रूप से उल्लेखनीय है।
अठारहवी शताब्दी
के अन्तिम
चरण में पंजाब
की पहाडिायों
में स्थित
कांगड़ा
क्षेत्र
भारतीय
चित्रकला का
एक महान केन्द्र
बन गया। गढ़वाल
और कांगड़ा के शासकों के संरक्षण
में विकसित
हुई इस शैली
ने प्रकृति और
मानवीय
भावनाओं को
अद्वितीय
काव्यात्मक रूप
प्रदान किया।
यहाँ
चित्रकारों
की लगभग एक सौ
पाचस वर्ष की
साधना के परिणामस्वरूप
इस शैली में
सर्वोपरि
भावना और कौशल
का लालित्य एक
बार दीप का उस
अन्तिम लौ के समान जगमग
उठा जिसकी लौ
अत्यधिक
प्रकाशित हो फिर
अंधकार में
सदैव के लिए विलीन
हो जाती है।
इस शैली में
मुगल और परम्परागत
प्राचीन
भारतीय कला
एवं
राजस्थानी हिन्दू
कला और भावना
का अपूर्व
सम्मिश्रण है।
कांगड़ा शैली
की सबसे बड़ी
विशेषता उसकी
सूक्ष्म रेएँ, कोमल रंग
योजना और
भावपूर्ण
चेहरे है।
इसमें कलाकारों
ने प्रकृति के सुंदर
दृश्यों , पहाड़ों के दृश्य, फूलों, लताओं और
पेड़-पौधों के साथ-साथ
लोगों के हदृय
की भावनाओं को
अत्यंत सजीव
रूप में प्रस्तुत
किया है,
इसी
कारण कांगड़ा
शैली को
भारतीय
चित्रकला की सबसे
’’ काव्यात्मक
शैली ’’ भी कहा
जाता है।
कलाकारों ने
विशेष रूप से
राधा कृष्ण की
प्रेम लीला को
अपने चित्रण
का विषय
बनाया। कृष्ण
भारतीय
संस्कृति में
न केवल दिव्य
अवतार के रूप में
पूजे जाते है।
बल्कि प्रेम , आनंद और
रास के
प्रतीक
भी माने जाते
हैं। गीत
गाोविंद,
भगवतपुराण
और ब्रज
साहित्य से
प्रेरणा लेकर कांगड़ा
शैली में
राधा-कृष्ण के
प्रेम प्रसंगों, रासलीला, बंसी वादन
और गाोपियों के
साथ
रात्रि संगीत
और नृत्य जैसे
दृश्य में चांदनी
रात का चित्रण
एक विशेष आयाम
जोंडता है।
भारतीय
काव्य परंपरा
में चांदनी
रात को प्यार, सुन्दरता
और शांति का
प्रतीक माना
जाता है। चंद
की रोशनी से
वातावरण और भी
सुन्दर हो
जाता है। और
भावनाएं गहरी
हो जाती हैं।
कांगड़ा चित्रकारों
ने इस भावन को
बहुत ही खूबसूरती
से चित्रित
किया है।
उन्होनें
आकाश में चमकते
हुए चंद,
उसकी
रोशनी, शांत
यमुना नदी के तट पर
पेड़ों की छाया
और प्रकृति की
शांति के बीच
राधा-कृष्ण के
मिलन
बंसुरी बजाने
और रासलीला
जैसे दृश्यों को
बहुत ही
प्रभावशाली
तरीके से
चित्रित किए
गए है। चांदनी
रात की
पृष्ठभूमि
में राधा का
विरह, कृष्ण
की मधुरता, गोपियों
की तन्मयता और
भक्तों की
आध्यात्मिक अनुभूति बहुत ही
स्वाभाविक
रूप से दिखाई गई है।
यहाँ चांदनी
रात के वल एक
सुन्दर दृश्य
नहीं, बल्कि
यह भावनाओं का
एक
महत्वपूर्ण
हिस्सा है।
कांगड़ा शैली के
कलाकारों
ने चांदनी रात
के चित्रण के माध्यम से
दर्शकों को एक
आध्यात्मिक
और भावनात्मक
अनुभव करने का
प्रयास किया
है। उनकी तूलिका
का उद्देश्य
दर्शकों को
कृष्णलीला की
उस स्थिति में
पहुँचा देना
था जहाँ वह
स्वयं रसास्वादन
कर सके। इस
शोध पत्र में, हम कांगड़ा
शैली में
चांदनी रात के चित्रों
का
विश्लेषणात्मक
अध्ययन
करेगें। हम देखेंगे
कि किस प्रकार
कलाकारों ने
चांदनी रात का
प्रयोग करके चित्रों
की
भावनात्मकता
को कैसे गहन
बनाया। साथ ही, हम यह भी
समझेंगे कि
चंद्रमा,
आकाश, यमुना, और पेड़ों
की
प्रतीकात्मकता
कैसे कृष्ण
लीला को
आध्यात्मिक
ऊँचाई प्रदान
करती है।
यह अध्ययन न केवल
कला विश्लेषण
तक सीमित है,
बल्कि
यह भारतीय
संस्कृति और
साहित्य में
चांदनी रात के महत्व और
उसके कलात्मक
रूपांतरण को
भी समझने का
एक प्रयास है।
अनुसंधान
पृष्ठभूमि
पहाड़ी
चित्रकला की
परंपरा और
कांगड़ा शैली
का विकास
पंजाब ,
गढ़वाल
और जम्मू की
पहाड़ी
रियासतों में
पनपी चित्रकला
परम्परा ’’
पहाड़ी कलम’’
अथवा पहाड़ी
चित्र शैली के
नाम
से प्रसिध्द
है। सत्रहवीं
से उन्नीसवीं
शताब्दी के मध्य
बसोहली,
गुलेर, काँगड़ा, कुल्लू, चंबा, मनकोट, नूरपुर, मंड़ी, बिलासपुर, जम्मू और
पश्चिमी
हिमालय के अन्य
पहाड़ी शहर
चित्रकला केन्द्र
के रूप
में उभरे। ये
सभी क्षेत्र
पहाड़ी शैली के अंतर्गत
आते हैं।
पहाड़ी लघु
चित्रों को
सर्वप्रथम 1916 ई० में
आनन्द कुमार
स्वामी ने दो भागों
में वर्गीकरण
किया और
उन्होने
प्रथम वर्ग के
चित्रों
को उत्तरी
चित्रमाला
तथा द्वितीय वर्ग
के चित्रों
को दक्षिणी
चित्रमाला के नाम से
पुकारा ।
उत्तरी
चित्रमाला से
उनका अभिप्राय
कांगड़ा शैली के चित्रों
से था। वही
दक्षिणी
चित्रमाला से
उनका अर्थ
जम्मू शैली के
चित्रों
से था। इसलिए
इस शैली को
प्रारम्भ में
जम्मू शैली के नाम से
जाना जाता था।
क्योंकि इस
शैली के आरम्भीक
चित्र इसी
क्षेत्र में
मिले है। पहाड़ी
लघु चित्र
शैली को ’’
कांगड़ा शैली ’’ के नाम से भी
जाना जाता है।
क्योंकि
पहाड़ी लघु चित्र
शैली का
परिष्कृत और
व्यापक रूप
कांगड़ा शैली
को माना जाता
हैं। कांगड़ा
शैली के चित्रों
में कला की
बारीकियों का
वर्णन मिलता
है, हालांकि
इस शैली के चित्रों
को हर काल में
अलग-अलग नामों
से जाना जाता
रहा है,
लेकिन
विद्वानों ने
इसे कांगड़ा
शैली का ही नाम
दिया। Verma et al. (2022)
पहाड़ी
राज्यों की
स्थापना
सातवीं और
आठवीं शताब्दी
में राजपुत
राजों ने की
थी। मुसलमानों
के आने
से पहले ही
राजाओं ने
यहाँ पर
छोटे-छोटे राज्य
स्थापित
किये। मैदानी
क्षेत्रों
में अफगानों
तथा मुगलों का
मुसलमान
साम्राज्य स्थापित
हो गया था।
अतः सत्रहवीं
शताब्दी में वैष्णव
धर्म का विकास
हुआ और
चित्रकला को
बढ़ावा मिला।
इस समय तक ये
राज्य हिन्दू
धर्म की सुरक्षा
के लिए
महत्वपूर्ण
हो गए। वैष्णव
सम्प्रदाय ने बसोहली
को
भावात्मकता
प्रदान की।
राजा संग्रामपाल
के छोटे
से बसोहली
राज्य में
चम्बा के समान
सर्वप्रथम
बाहर से आये
कलाकरों को
आश्रय मिला।
दिल्ली के सुलतानों
से नराज
कलाकारों का
पहला दल जम्मू
और पंजाब के पहाड़ी
राज्यों में
जाकर बसा।
अनुमानतः इन
कलाकारों ने
चम्बा तथा
बसोहली शैली
को जन्म दिया
और वैष्णव
सम्प्रदाय की
अभिव्यक्ति
चित्रों के रूप में
होने लगी। इस
शैली के चित्र
पहले बसोहली
में और फिर
अन्य राज्यों
में बनाये गए।
1745ई० के पश्चात्
बसोहली शैली
का स्थान
स्थानीय राज्यों
की निजी
शैलियाँ
ग्रहण करने
लगीं। 1739ई०
में नादिरशाह के आक्रमण
तथा 1747ई०
में अहमदशाह
दुर्रानी के आक्रमण के पश्चात् सिक्खो
और
मराठों के आक्रमणों
से दिल्ली
राज्य का जब
विध्वंस हो गया, तो हिन्दू
एवं मुसलमान
चित्रकार
दिल्ली छोड़कर
पुनः पहाड़ी राज्यों
की ओर गये।
चित्रकारों
की यह दूसरी
धारा कांगड़ा
में पहुँची
जिससे कांगड़ा
शैली का विकास
हुआ। Verma et al. (2022)
पहाड़ी
चित्रकला की
पृष्ठभूमि
में जो साहित्यिक
अथवा धार्मिक
गंथ चिीत्रत
हुए हैं,
उनमें
विशेष रूप से
गण्य हैं-
जयदेव लिखित ’’गीत
गोविन्द’’
बिहारी सतसई, भागवत
पुराण, महाभारत
, रामयाण, बारहमासा
और रागमाला ।
कृष्ण-लीला और
नायक-नायिका
सम्बन्धी
कचत्र विशेष
रूप् से अपना
महत्व रखते है। लेकिन
उनके
अतिरिक्त
नल-दमयन्ती और
सत्यवान-सवित्री
जैसी कथाओं को
भी पहाड़ी
कलाकारों ने
चित्रित किया
है। साधारण
कवियों से लेकर
जीवन की दैनिक
चर्या और शबीह
तक, इसके
अतिरिक्त जो
प्राकृति
सौनदर्य यहाँ बिखरा पड़ा है वह
तो स्पष्ट ही
कला को निखारने में
बहुत बड़ा
योगदान देता
रहा हैं। ऐसा
एक भी विषय
नहीं है जो
चित्रकारों
ने छोड़ा हो।
पहाड़ी कला एक
समन्वयात्मक
सांस्कृतिक
पृष्णभूमि पर खड़ी है।
उसी के निरूपण से
यह भी स्पष्ट
होता है कि
काँगड़ा कला का
विकास एक ऐसी
सामंजस्यातमक
स्थिति से हुआ
जिसमें मुगल
शैली की छाप
है जो वैष्णव
धर्म से
अनुप्रेरित
है, संस्कृत-काव्य
से
अनुप्राणित
हैं, जिसमें
हिमालय की
गरिमा है । Kishorilal
Vaidya (1969)
कागड़ा शैली
की कृतियों के
सृजन
का समय लगभग 1780ई० से
आरम्भ होता
प्रतीत होता
है। 1751ई० से 1774ई० तक
कागड़ा में
कटोचवंशी
राजपूत राजा
घमंडचंद का
राज्य था।
राजा घमंडचंद
को अत्यधिक
सामन्तीय
ख्याति
प्राप्त हुई
परन्तु वह
चित्रकला के प्रति
उदासीन ही रहा
और उसके चार
व्यक्ति
चित्र ही केवल
प्राप्त हैं
जो सिक्श शैली
के हैं
और भद्दे हैं।
लगभग 1775ई०
में कागड़ा के राजा
संसारदंच ने
चित्रकला के प्रति
अत्यधिक
प्रेम
प्रदर्शित
किया। वह स्वयं
एक
चित्रप्रेमी, साहित्यप्रेमी, और संगीत
मर्मज्ञ शासक
था। उसे लगभग
बारह या तेरह
वर्ष की आयु
पर ही चित्र
संग्रह में
बहुत रूचि थी।
इसी समय
सन्निकट
सम्बन्धी
रियासत गुलेर
में अच्छे
चित्रकार काम
कर रहे थे और
इस समय तक
गुलेर शैली
सुनिश्चित
रूप धारण कर
चुकी थी। राजा
संसार चंद
जैसे कला
संरक्षक के कला-प्रेम
के कारण और
पड़ोसी
गुलेर-राज्य
में उच्च कला-विकास
हो जाने के कारण
कांगड़ा में भी
चित्रकला का
उदय आरम्भ हुआ।(
भारतीय
चित्रकला का
इतिहास , Verma et al. (2022)
चांदनी
रात के चित्रण
का विषयगत
आधार
श्रृंगार
रस और भक्ति
भावना: राधा
-कृष्ण का शाश्वत
प्रेम
विष्णु के कई
अवतारों में
से कृष्ण का
चरित्र समाज
में बहुत ही
महत्वपूर्ण
और लोकप्रिय
रहा है। महाभारत
में कृष्ण को
एक शक्तिशाली
और कर्मयोगी के रूप में
दिखाया
गया हैं। जो
लोक-रक्षा और
लोकमंगल के लिए
काम करते हैं।
भागवदगीता
में कृष्ण को
एक वीर और
वेदान्ती के रूप में
प्रस्तुत
किया गया है, जिसने उनके
व्यक्तित्व
को और भी
प्रसारित
किया। समय के साथ ,कृष्ण
का स्वरूप
बदलने लगाा और
उनका माधुर्यपूर्ण
प्रेममय
चरित्र समाज
में अधिक
लोकप्रिय
होने लगाा।
भगवत पुराण ने
कृष्ण के माधुर्यपक्ष
को और भी
उभारा।
राधा-कृष्ण की
प्रेममयी
लीलाओं का
चित्रण कर
जयदेव और
विद्यापति ने
कृष्ण का जो
श्रृंगारी
स्वरूप
प्रस्तुत
किया, वह
मध्यकालीन
कवियों और
चित्रकारों के लिए
प्रेरणा का
स्त्रोत बन
गया। विभिन्न
संत कवियों ने
कृष्ण की
भक्ति और
प्रेम के बारे में
लिखा है।
संत कवियों के
पदों
में कृष्ण की
दिव्य
शाक्तियों और
उनके प्रेम का
वर्णन है। Neeraj (2009)
संस्कृत
साहित्य के कवि
विद्यापति को
राधा-कृष्ण
विषयक
श्रृंगारी
काव्य के जन्म दाता
के रूप
में जाना जाता
है।
विद्यापति के श्रृंगारी
कवि होने का
कारण बिल्कुल
स्पष्ट है। वे
दरबारी कवि थे
और उनके प्रत्येक
पद पर दरबारी
वातावरण की
छाप दिखाई
देती है।
जिसमें
राधा-कृष्ण को
नायक- नायिका के
रूप्
में चित्र
किया है।
राधा-कृष्ण
साधारण स्त्रीपुरूष
की ही तरह
परस्पर प्रेम
करते प्रतीत
होते हैं तथा
भक्ति की
मात्रा न के बराबर है।
इस तरह कहा जा
सकता है कि
विद्यापति
श्रृंगारी
कवि हैं उनके पदों
में माधुर्य
पग पग पर देखा जा सकता
हैं। Dr. Shivdutt Sharma (2015)
श्रृंगार रस , प्रेममयी
वासना के गहरे कुंड
से आता है और अक्सर
दो प्रेमियों के बीच के प्रेम से
जुड़ा होता है।
श्रृंगार
प्रेम के साधारण
विचार से कहीं
आगे जाता हैं।
यह शिव और
शक्ति के शाश्वत
मिलन, राधा
और कृष्ण के दिव्य
प्रेम और राम
और सीता की
भक्ति का
प्रतीक है। यह
आत्मा और
परमात्मा के बीच
एक गहन,
आध्यात्मिक
संबंध है- एक
ऐसा प्रेम जो
असीम और
शाश्वत है।
भक्ति प्रेम
की
अभिव्यक्ति
है- ईश्वर के प्रति
शुद्ध और
निश्चल
प्रेम। प्रेम
का सर्वोच्च
रूप सच्ची
भक्ति है, जहाँ
व्यक्ति का
हृदय ईश्वर से
जुड़ जाता है।
श्रृंगार रस
और भक्ति रस
का यह
अंतर्संबंध
अनेक
भक्तिकाव्य
रचनाओं व
चित्रकलों
में खूबसूरती से
दर्शाया गया
है। उदाहरण के
लिए , आदि
शंकराचार्य
की सौन्दर्य
लहरी देवी के सौन्दर्य
और कृपा का
गुणगान करती
है, जो एक
भक्ति और
प्रेम की
अभिव्यक्ति
दोनों प्रस्तुत
करती है।
भक्ति और
प्रणय प्रेम
का यह मिश्रण
जयदेव द्वारा
रचित
गीतगोविंद
में भी समाहित
है।
गीतगोविंद
कृष्ण और राधा
के बीच के संबधों
को चित्रित
करता है,
और
प्रेम, लालसा
और विरह के विषयों
के लिए जीवंत
वसंत ऋतु को
पृष्ठभूमि के रूप
में प्रस्तुत
करता है।
लेकिन इसे
अपनी भक्ति के
लिए प्रसिद्ध
सबसे
प्रभावशाली भक्ति
ग्रंथो में से
एक माना है। (https://www.sursangatacademy.com)
राधा-कृष्ण
का प्रेम
श्रृंगार रस
और भक्ति भावना
का एक अनुठा
संगम है,
जहाँ
प्रेम का
भौतिक और
आध्यात्मिक
दोनों स्वरूप
प्रकट होता
है। यह प्रेम
शरीर और वासना
से ऊपर उठकर
आत्मा का मिलन
सिखाता हैं, जो
निस्वार्थता, समर्पण और
दिव्यता का
प्रतीक है।
राधा-कृष्ण का
यह शाश्वत
प्रेम के वल
मिलन को ही
नहीं
दर्शाता अपितु
वियोग में भी
गहराई को
दर्शाता है, और यह
प्रेम और
भक्ति के उच्चतम
आदर्शों को
दर्शाता है।
प्रेमियों
की विभिन्न
स्थितियों के अनुसार
प्रेम के दो
पक्ष हैं
जिनमें प्रथम
पक्ष वियोग और
द्वितीय पक्ष
संयोग है।
वियोग पक्ष के
तीन
प्रकार माने
गए हैं-प्रथम
पूर्वराग
अर्थात्
प्रेम का
आरम्भ, द्वितीय
मान अर्थात्
प्रेमियों के मिथ्या
अभिमान से
उत्पन्न
वियोग, तृतीय
प्रवास
अर्थात्
प्रेमी के विदेश
गमन से
उत्पन्न विरह
या वियोग।
कांगड़ा शैली के
चित्रों
में विरह की
ये तीनों
दशाएँ
चित्रकार का
मार्मिक विषय
बन गई है।
जिसमें
राधा-कृष्ण के
चित्र
उदाहरण सहित
प्राप्त
है।(भारतीय
चित्रकला का
इतिहास , Verma et al. (2022)
राधा-कृष्ण के
बारे
में जयदेव ने
गीतगोविंद लिखा जिसमें
भक्ति और
प्रेम का
सुन्दर
मिश्रण है इसके
बाद
विद्यापति और
सूरदास ने भी
राधा कृष्ण की
प्रेमय
लीलाओं के बारे
में कविताएँ लिखी
।
सूरदास की
कविता में
प्रेम, वात्सल्य
और माधुर्य की
बहुत ही
सुन्दर अभिव्यक्ति
हैं। सूरदास
ने ब्रज भाषा
में प्रचलित
लोक गीतों और
कथाओं की
परंपरा को
सहजता से संजोया
हैं। ब्रज
क्षेत्र की
लोक-परंपराएँ
में कृष्ण की
लीलाओं को
बहुत ही महत्व
दिया जाता है
और यहाँ की
लोक परंपराओं
में कृष्ण की
भक्ति और
प्रेम का गहरा
प्रभाव है।
ब्रज क्षेत्र में
कृष्ण की बाल
लीलाओं और उनके
प्रेम
का वर्णन हैं।
भक्तिकाल से
भी अधिक
कृष्णपरक
रचनाएँ रीतिकाल
में लिखी गयी।
के शव की ’’
रसिकप्रिय’’
इस दृष्टि से
प्रथम महत्वपूर्ण
ग्रन्थ है, जिसने
संस्कृत की
नायक-नायिका
भेद परंपरा को
हिन्दी
साहित्य में
पुनर्जीवित
किया। मुक्तक-परम्परा
में बिहारी ने
’’ बिहारी-सतसई’’
लिखकर
कृष्णकाव्य
की कड़ी को
जोड़ा। दोनों
महान कवियों
की काव्य
रचनाओं का
रीतिकाल में
अधिक प्रचार-प्रसार
हुआ। Neeraj (2009)
इस प्रकार
कलिदास,
जयदेव, सूरदास, बिहारी, के शव, आदि
कवियों ने
अपने काव्य
चित्रण में
चाँदनी रात का
मनोहारी व
सौन्दर्यात्मक
वर्णन किया है।
जैसे- कलिदास
ने मेघदूत में
चंद्रमा को शीतलता
और प्रिय मिलन
का माध्यम
बताया। तो वही
गीतगोविंद
में चांदनी
रात
राधा-कृष्ण की
प्रेमललीओं
की पृष्ठभूमि
बनती है। , सूरदास व
रसखान के पदों
में चांदनी
रात का उपयोग
कृष्ण की
लीलाओं और उनके
सौन्दर्य
वर्णन में हुआ
है। गोकुल और
वृन्दावन की
रासलीलाओं की
रात्रि अक्सर
चंद्रप्रकाश
में रची जाती
है। अथवा
बिहारी ,
के शव
ने चांदनी रात
का चित्रण
श्रृंगार रस
की अभिव्यक्ति
हेतु किया गया
है।
चांदनी
रात का भारतीय
संस्कृति में
महतव
चाँदनी रात
का भारतीय सांस्कृति
में विशेष
महत्व रहा है।
चांदनी रात को
अक्सर
भावनात्मक, धार्मिक, काव्यात्मक, कलात्मक
और दार्शनिक
दृष्टियों से
गहन प्रतीकात्मकता
के रूप में
देखा जाता
है। हिन्दू
धर्मग्रंथों
में चंद्रमा को
सौम्यता , शीतलता और
कल्याण का
प्रतीक माना
है जैसे शरद पूर्णिमा
का पर्व,
जब
चाँद अनपी सभी
कलाओं में
होता है। और
विभिन्न
देवी-देवताओं
की पूजा की
जाती है।
हिन्दू धर्म
में शरद
पूर्णिमा का
विशेष महत्व
है। और इस दिन
चंद्रमा अपनी 16 कलाओं के साथ
प्रथ्वी पर
अमृत वर्षा
करता है।
चंद्रमा की ये
16 कलाएँ उसके
पूर्ण
रूप को
दर्शाते है।
और यह कलाएँ
चंद्रमा की
शक्तियाँ और
सौन्दर्य का
प्रतीक भी है।
चंद्रमा की 16 कलाओं को
भगवान
श्रीकृष्ण ने
भी धारण किया
था, इसलिए
उनको 16
कलाओं का
स्वामी भी कहा
जाता है। और
भगवान राम को 12 कलाओं का
स्वामी कहा
जाता है। इसकी
अलग-अलग व्याख्या
हर जगह देखने को मिलती
है, कुछ की
राय यह है कि
भगवान राम
सूर्यवंशी थे
तो इसलिए उनको
12 कलाओं का
स्वामी कहा
गया है श्री
कृष्ण चंद्रवंशी
थे तो उनको
सोलह कलाओं का
स्वामी कहा
गया है
क्योंकि पौराणिक
कथाओं के अनुसार, इस रात को
कृष्ण का जन्म
हुआ था। यह
रात अत्यंत
पवित्र मानी
जाती है और
भक्त इस रात
में जागकर
कृष्ण की
आराधना करते
है भगवान
कृष्ण ने इसी
चाँदनी रात
में गोपियों के
साथ
रास लीला की
थी, जिसके कारण
यह रात
आध्यात्मिक
और
प्रेमपूर्ण
अनुष्ठानों के
लिए
भी
महत्वपूर्ण
मानी जाती है।
Sharad Purnima (2019),
विनोद
शुक्ला
विभिन्न
कवियों और लेखकों ने
चाँदनी रात का
अपने साहित्य
में वर्णन किया
है।
मैथिलीशरण
गुप्त की
कविता
’’चाँदनी रात’’
इसका एक प्रमुख उदाहरण
है। गुप्त जी
चाँदनी रात का
वर्णन करते
हुए कहते है।
कि सुंदर
चंद्रमा की
किरणें जल और
थल में फैली
हुई हैं।
संपूर्ण
प्रथ्वी तथा
आकाश में
स्वच्छ
चाँदनी बिछी
हुई हैं।
प्रथ्वी
हरी-हरी घास
की नोंको के माध्यम
से अपनी ख़ुशी प्रकट कर
रही हैं। (
मैथिलीशरण
गुप्त ,
चाँदनी
रात )
भारतीय कला, नृत्य, संगीत और
काव्य कला में
चांदनी रात का
चित्रण प्रकृति
की सुन्दरता
और मानवीय
भावनाओं के आंनदमयी
प्रकटीकरण के लिए
दर्शाया गया
है, कला
इतिहास में
भागवत पुराण के
दशम
स्कन्ध में
शरद ऋतु की
चांदनी रात का
एक सजीव
चित्रण है
जहाँ कृष्ण-
वेणु की मधुर
ध्वनि से
गोंपियों का
रास होता है।
इस प्रसंग में
पूर्णिमा-चन्द्रमा
और
मल्लिका-सुगन्ध
का वर्णन किया
गया है जो
रास-लीला की
रंगपरंपरा को
और भी आकर्षक
बनाता है।
उत्तर भारत की
लोकनृत्य
परम्परा में
रास लीला एक
अत्यन्त लोक
प्रिय विषय
रहा है। जो
राधा-कृष्ण के
दिव्य
प्रेम को
दर्शाता है
मणिपुरी
नृत्य में भी
रास लीला एक
महत्वपूर्ण
हिस्सा है।
जहाँ नर्तकों
की गतियों और
श्वेत-श्रृंगार
से चाँदनी रात
की आभा को रचा
जाता है। वही
बिहार के मिथिला
क्षेत्र में
महिलाओं
द्वारा
मानसून के दौरान
ढ़ोल की थाप पर
किया जाने
वाला जट-जटिन
नृत्य जो
आधीरात से
सुबह तक
चांदनी रातों
में आयोजित
किया जाता है।
इसके अतिरिक्त
कई क्षेत्रों
में चाँदनी
रात में राग
गाए जाते है।
राग यमन,
मालकौंस
और बागेश्री
जैसे राग रात के
विभिन्न
समयों और
भावों को
दर्शाते है।
ठुमरी और दादर
जैसे संगीत
रूपों में भी
चाँदनी रात का
महत्व है, जहाँ
श्रृंगार
प्रधान गीतों
में चाँद और
चाँदनी का
उपयोग किया
जाता है वही
लोक संगीत में
भी चाँदनी रात
का अपना एक
महत्व रहा है, जैसे कि
कजरी में सावन
की रात और
चाँद-बादल के भावों
को व्यक्त
किया जाता है।
इस प्रकार, चाँदनी
रात भारतीय
कला और
संस्कृति में
एक विशेष
स्थान रखता है। जो
श्रृंगार रस के
विभिन्न
पहलुओं को
दर्शाता है और
संगीत नृत्य
चित्रकला और
काव्य में
अपनी
अभिव्यक्ति
पाता है।
कांगड़ा
शैली में
चांदनी रात का
चित्रण
प्राकृतिक
पृष्ठभूमि और
वातावरण
कांगड़ा के चित्रों
में प्रकृति के
प्रति
एक गहन प्रेम
प्रदर्शित
किया गया है।प्रयाः
चित्रों की
पृष्ठभूमि को
मनोरम प्राकृतिक
दृश्यों से
संजोया गया
है। इसमें
पुष्पित
वृक्ष, घास
से आच्छादित
मैदान, छोटी-बड़ी
पहाड़ियां, झाड़िायाँ, प्रायः
आम्र, वट, पीपल, कचनार, जामुन, शीशम, के ला, अमलतास, गुलमोहर, ढाक तथा
पलाश के वृक्षों
का चित्रण है।
प्रेमी-प्रेमिका
के चित्रों
में वृक्ष पर
लिपटी
पुष्पित
लतिकाओं को
संयोग के प्रतीक
स्वरूप अंकित
किया है।
तालाबों को कमल-पुष्पों, बतख तथा मछली
से युक्त
बनाया गया है।
प्राकृतिक दृश्य
में
पशु-पक्षियों
को कांगडा के चित्रकारों
ने मानव-भावना
के अनुकूल
अंकित किया
है। वर्षा ऋतु
में बगुला, विरह में
सारस या मोर, विरह-रागिनी
में मृग,
नायिका
को नायक के आगमन
का संदेश
सुनाते कौवे
बत्तकों के जोंडे
व कृष्ण के साथ
गायों का अंकन
किया है,
जिन्हें
दौड़ते, मुरली
की तरफ गरदन
उठाये या
विश्राम करते
अनेक
अवस्थाओं में
चित्रित किया
गया है।
रात्रि में
बरसात के बादल
व आकाश में
पूर्ण
चांद्रमा और
उसकी परछाई जल
में
प्रतिबिंबित
होकर दृश्य को
और अधिक काव्यमय
बनाती है
चांदनी रात
तथा अंधेरी
रात्रि के दृश्यों
का भी सुन्दर
प्रभाव
उत्पन्न किया
गया है।
प्रकृति के ये
सभी तत्व
चित्र विषय के
भावों
को प्रकट करने
में सहायक
होते है। प्रकृति
का चित्रण
अक्सर
पृष्ठभूमि
में किया जाता
है, जो चित्र के
मुख्य
विषय को और भी
आकर्षक व
भावनात्मक
बनाता है।
चांदनी की आहट
पाते ही
प्रकृति का
सौन्दर्य और
भी अधिेक
आकर्षक व
शांतिपूर्ण हो
जाता है।
इसमें मुख्य
रूप से गहरे
नीले और हरे
रंगों का
उपयोग किया
जाता है,
ये
ठंडे और ताजे
रंग रात के शांत
और रहस्यमय
वातावरण को
दर्शाते है।
इन चित्रों
में अक्सर
कृष्ण और राधा
के प्रेम
दृश्यों को
दर्शाया जाता
है, जिसमें
प्रकृति एक
महत्वपूर्ण
भूमिका निभाती
है, पृष्ठभूमि
में हरी-भरी
वनस्पति,
नीदयाँ
और पहाड़ दिखाई देते
हैं, जो
चांदनी की
रोशनी में
नहाए हुए होते
हैं। जिससे एक
स्वन्पिल और
रोमांटिक
माहौल बनता
है।
उदाहरण-
लिली पूल के किनारे
राधा और कृष्ण
का मिलन
यह राधा के हेला-हवा
को दर्शाता एक
मनमोहक चित्र
है। शरद ऋतु
की चाँदनी रात
है, और प्रेमी
युगल कमल के कुंड के
पास
मिल रहे हैं। कुंड
में चंद्रमा के
गोले
का प्रतिबिंब
और पुष्पित
लताओं से आच्छादित
वृक्ष एक
मनमोहक दृश्य
प्रस्तुत
करते है,
जो
राधा और कृष्ण
के प्रेम-प्रसंग
को उपयुक्त
पृष्ठभूमि
प्रदान करता
है। राधा
चाँदनी रात
में एकांत में
कृष्ण से मिली,उनके चेहरे
पर मुस्कान थी
और चारों ओर
सुगंध थी। फिर
उन्होनें
कृष्ण को अपने
होठों की
मदिरा पिलाकर
उन्हें वश में
कर लिया।
निरंतर वर्णन
की पद्धति का
पालन किया गया
है, और चित्र
को दो भाग में
बांटा गया है।
अग्रभूमि में
एक प्रेम
दृश्य दिखाया गया है, और
पृष्ठभूमि
में प्रेमी
एक-दूसरे के कंधे
पर हाथ रखे
चले जा रहे हैं।
कृष्ण अपनी
प्रिय गोपी
राधा के साथ
हैं। अपने
सुंदर
चंद्रमा जैसे
चेहरे वाली
राधा अपने नए
यौवन की
मनोहरता में
मोहक लगती
हैं। गहरे
आलिंगन में
सांवले कृष्ण
और गोरी राधा, बिजली की
चमक के साथ काले
बादल की तरह
प्रतीत होते
है। पृष्ठभूमि
में चित्र
विशेष रूप से
मोहक है,
एक के कंधे
पर हाथ रखे
प्रेमी जोड़े
साहचर्य और
गहरी
आत्मीयता का
प्रतीक हैं।
वे एक-दूसरे
को मोहित होकर
देख रहे हैं
और हमें
विद्यापति की
ये पंक्तियाँ
याद दिलाते
है।
हर तीतर की आँखे
कृष्ण के चंद्र-सुंदर
मुख को देख रही
थी और ओस की
बूंदें पी रही
थी।
एक-दूसरे को
देखकर वे
विलास का
स्वाद फैला
रहे थे। Randhawa (1962)
|
चित्र 1
|
|
चित्र
1 Kangra, C. 1820, Municipal
Museum, Allahabad |
चांदनी
में प्यार
शरद ऋतु का
चंद्रमा
असाधारण चमक के
साथ
चमकता है और
प्रेमियों की
आत्माएँ उसकी
आभा से भर
जाती हैं वे
प्रेमीजन
धन्य है जो
कार्तिक
पूर्णिमा की
रात्रि में एक
साथ हैं। प्रेमीजन
आंनद से
मदमस्त हैं, उनकी
लाल-लाल आँखे
काम-भावना से
भरी हुई हैं। सखिया बगीचे के
एक
कोने से उनकी
क्रीड़ाएँ देख रही
हैं। रस के सागर
में डूबी हुई, वे
एक-दूसरे को
उत्कण्ठित
दृष्टि से देखती हैं,
और
बगीचे के मंडप
में एक-दूसरे के
गले
में बाहे डाले
बैठी हैं, और अपनी
आकृतियों की
चमक से उसे
चमकदार भूरा रंग
दे रही हैं, जो आंनद
में विलीन
होकर उनके हार,
अंगूठियों
और चंदन का
भार बड़ी
कठिनाई से सहन
कर पाती हैं।
प्रेम से
टपकती राधा की
आँखे, जब वे
भगवान को देखती हैं,
तो
शीतल हो जाती
हैं, और
फिर वे जल की
सतह के नीचे हलकी
आभा से चमकती
हुई स्वर्णिम
कमल-कलियों के
जोड़े के
समान
प्रतीत होने
लगती हैं।
कृष्ण और व्रज
के चंद्रमा
को देखते ही
वे अपनी पँखुड़िया
अवर्णनीय
महिमा में
प्रकट कर देते
हैं।
यह एक ऐसा
चित्र है
जिसमें प्रेम के
मिलन
को
वास्तुशिल्पीय
वैभव की
पृष्ठभूमि में
दर्शाया गया
है। संगमरमर
का मंडप,
प्रेमी
का घोंसला, बहुमूल्य
रत्नों से जड़ा
है। आकाश
चंद्रमा से सुंदर
रूप में
अलंकृत है और
उसके नीचे सखिया राधा और
कृष्ण के प्रेम-प्रसगं
के बारे में
बातें कर रही
हैं। राधा
स्त्री सौन्दर्य
का स्वप्न हैं, उनकी गहरी, भावपूर्ण आँखे, लज्जापूर्ण
भाव, और
चोले से बाहर
निकले हुए
उभरे हुए स्तन, जिनकी
सुन्दरता
मोतियों और
हीरों के हार
से और भी बढ़
जाती हैं। यह
शाश्वत
सौन्दर्य का
एक चित्र है
जो प्रेम के मिलन के
आनंद
को भावपूर्ण
ढंग से
चित्रित करता
है। Randhawa (1962)
|
चित्र 2
|
|
चित्र
2 Kangra, c.1820 Bharat Kala Bhavan, Varanasi |
प्रेम और
विरह की
भावनाएँ
कांगड़ा शैली
की सबसे बड़ी
विशेषता श्रृंगार
रस है। जिसमें
चांदनी रातें
कांगड़ा शैली
में प्रेम और
भावनाओं को
दर्शाने का एक
शक्तिशाली
साधन हैं।
जहाँ यह प्रेम
की भावनाओं को
व्यक्त करने, प्रकृति के
दृश्यों
को चित्रित
करने और
पौराणिक
कथाओं के विवरणों
को सूक्ष्मता
से दर्शाने के
लिए
एक दृश्य
माध्यम के रूप
में कार्य
करती है।
इसमें
चित्रित
गीत-गोविंद, रसिकप्रिय, बारहमासह, बिहारीसतसाई
के चित्रो
में चादंनी
रात में
चुपचाप
नायिका का प्रेमी
की तालाश में
घर से निकलना, गोपियों के
साथ
रास लीला व
चांदनी रात
में राधा का
कृष्ण की
प्रतीक्षा
करना प्रेमी
युगल आलिंगन
करते हुए
चंद्रमा को देखना जैसे
दृर्शायों को
चित्रित किया
गया है।
उदाहरण-
अनुभवी
नायिका
यह चित्र
परिपक्व और
अनुभवी
नायिका,
प्रौढ़
नायिका को
दर्शाता है, जो सुखी और
सांमजस्यपूर्ण
वैवाहिक जीवन
की प्रतीक है।
प्रेमी युगल
एक-दूसरे के आलिंगन
में लेटे हुए, तनावमुक्त
संतुष्ट और
प्रसन्न हैं।
नायिका के चेहरे
पर
संतुष्टिपूर्ण
आंनद के भाव, उसकी
सुस्ती और
प्रेम के आवेग के
प्रति
उसकी
निश्चिंतता
उसकी
परिपक्वता का
प्रतीक है। वह
प्रौधा है, एक अनुभवी
नायिका,
जो
प्रेम के अपने
अनुभव में
परिपक्व है। Randhawa (1962)
|
चित्र 3
|
|
चित्र
3 Kangra, Centure. 1852, Collection of Raja
Dhruv Dev Chand of Lambagraon |
प्रेमी
की प्रतीक्षा
में
इस चित्र में
चित्रित
गर्भवती
नायिका,
लिटका
नाविका है, जो अपने
प्रेमी
द्वारा तय समय
पर उससे मिलने
न आ पाने के कारण
अत्यधिक
चिंतित है। वह
मिलन स्थल पर
प्रतीक्षा
करती है,
और
अपनी चिंता
दूर करने के लिए
अपेक्षित
मिलन स्थल के पास के
पेड़ों
को चमेली की
मालाओं से
सजाने में
व्यस्त हो
जाती है। इस
चित्र में
अत्यंत सुंदर
ढंग से दर्शाई
गई अँधेरी रात
के सन्नाटे
में, असके उत्तेजित
हृदय की धड़कन
लगभग सुनी जा
सकती है। गहरा
नीला आकाश
बैंगनी रंग के
कोलीरियम
के समूह जैसा
है। ऊपर
संकीर्ण
क्षितिज में
तारों से
जगमगाता आकाश
है जो चाँद के हल्क़े
गोले
से सुशोभित
है। Randhawa (1962)
|
चित्र 4
|
|
चित्र 4 Kangra, c. 1785, Kasturbhai Lalbhai Collection,
Ahmedabad |
|
|
चांदनी
रात में महीला
इस
चित्र में
चित्रित
महिला
शुक्लभिसारिका
हैं, जो
चांदनी रात
में अपने
प्रेमी से
मिलने जाती हैं।
महिला के चेहरे
की मनोहर चमक
देखकर
चंद्रमा शर्म
से पीला पड़
गया है। चकोर
चंद्रमा को
भूलकर नायिका के
मनोहर
मुख को निहार
रहे हैं और
मोहित हो रहे
हैं। दशम ग्रंथ
में गुरू
गोंविद सिंह
ने
शुक्लभिसारिका
के रूप में
राधा का वर्णन
इस प्रकार
किया है,’’
राधिका
अपने प्रभु से
मिलने के लिए
श्वेत वस्त्र
धारण किए, श्वेत
कोमल चंद्रमा के
प्रकाश
में, सर्वत्र
श्वेत बाहर
निकलीं। इस
प्रकार उन्होंने
स्वयं को
श्वेत में छिप
लिया और स्वयं
प्रकाश के रूप
में उनकी खोज में
विचरण करने
लगीं।’’ Randhawa (1962)
|
चित्र 5
|
|
चित्र 5 Kangra, c. 1820, Jagmohandas K.
Modi Collection, Bombay |
|
|
अभिसारिका
नायिका
वह नायिका है
जो अपने
प्रेमी से
मिलने के लिए
रात्रि में
बाहर जाती है।
यह नायिका
कांगड़ा के चित्रकार
का प्रिय विषय
रही है। कृष्ण
अभिसारिका और
शुक्ल
अभिसारिका
कांगड़ा शैली के
चित्रों
में क्रमशः
अंधेरी
रात्रि और
चाँदनी
रात्रि में
प्रेमी से
मिलने के लिए
जाती अंकित की
गई है। कांगड़ा
शैली के चित्रों
में कृष्ण
अभिसारिका
नीला-आँचल डाले
अपने प्रेमी
को ढूँढने जा
रही है,
अंधेरी
रात्रि में
काले बादलों
में दामिनी चमक
रही है। जंगल
में सर्प और
चुड़ैल है
परन्तु ऐसे
भयानक
वातावरण में
भी निर्भीक
नायिका,
अपने
प्रेम को
तृप्ति के लिए
प्रेमी को खोजने निकलती
है।( भारतीय
चित्रकला का
इतिहास,
Verma et al. (2022)
|
चित्र 6
|
|
चित्र 6 Kangra, c. 1830 Shrimati Sumati
Morarjee Collection, Bombay |
|
|
तकनीक
और सामग्री
सामग्री
कांगड़ा शैली
में इस प्रकार
के चित्र
बनाने में
पूरी तरह से
प्राकृतिक
कच्चे माल और
औजारों का
इस्तेमाल
किया जाता
हैं। रंग, कागज और
तुलिका से
लेकर हर चीज
कलाकारों
द्वारा स्वयं
प्राकृतिक
रूप से
प्राप्त की
जाती है।
तुलिका के लिए के
वल गिलहरी के बालों
का उपयोग किया
जाता है- इस से
चित्र में अति-सूक्ष्म
रेखाएँ से
चेहरे, आँखों
, पोशका की
बारिक सजावट, फूल-पत्तियाँ, रात की
छटा में जहाँ
चाँदनी
प्रतिबिंब और
परछाई होती है, वहाँ
तुलिका की
बारीकी बहुत
महत्वपूर्ण
होती है। इस
में उपयुक्त
रंग प्रकृति
से प्राप्त किये
जाते है। ये
सभी रंग
प्रकृति के खजाने जैसे
चट्टानों, पत्थरों, पत्तों और
फूलों से
प्राप्त होते
हैं, और
यहाँ तक कि
घाटी में पाए
जाने वाले
कीड़ों - से भी
हस्तनिर्मित
कागज या कपड़े
की सतह को
रंगने के लिए
रंगद्रव्य
कठोर रगड़, तड़के और
पीसने के बाद
अपने
प्राकृतिक
चट्टानी रूप
से निकाले जाते
हैं, जबकि
अन्य फूलों और
पत्तियों को
उबालकर और अवशेषों
को छानकर
निकाले जाते
हैं। नील से
सुंदर लहराते
बादल और साथ
ही कपड़ों के गहरे
रंग बनते हैं।
हंसराज का एक
प्राकृतिक
तत्व भूरे रंग
के रंग बनाने
के लिए
इस्तेमाल
किया जाता है, जबकि के डिया
सफ़ेद रंग
बनाने और कपड़े
की सतह को
चमकाने और
तैयर करने में
मदद करता है।
इन प्राकृतिक
रंगों के अलावा, कांगड़ा
चित्रकला में
थोंड़ी चमक
लाने के लिए
चाँदी व सोने के
रंगों
का भी प्रयोग
किया जाता है।
चाँदनी रात के
चित्रों
में विशेष रूप
से अन रंगों
का प्रयोग चाँद
की किरणों, व आकाश
में बिजली की
चमक, पूजा-दीपों, आभूषणों
पर प्रतिबिंब
आदि दर्शाने के
लिए
यह अतिरिक्त
चमक देने के लिए
किया जाता है।
चित्र के लिए
हस्तनिर्मित
कागज का
प्रयोग किया
जाता है,
चीड़ के
पेड़ों
के जैविक
अपशिष्ट से
बने इस कागज
को रंगने से
पहले कई दिनों
तक दबाया और
प्राइम किया
जाता है। कागज
पर रंगों को
चिपकाने के लिए
प्रयोग किया
जाने वाला
गोंद भी जैविक
होता है,
जिसे
बाइन्डर कहते
हैं। चित्र
में बाइन्ड की
मात्रा बहुत
सूक्ष्म होती
है ताकि रंग
पतले हों, पारदर्शी
हो और रंगों
की कोशिकाएँ
बन सकें जो चाँदनी
की
पारदर्शिता
दिखाएँ।
चित्रों को
सड़ने से बचाने
के लिए एक
प्राकृतिक
जहर का भी
इस्तेमाल
किया जाता है।
यह आमतौर पर
धार्मिक
स्थलों की
छातों पर
इकट्ठा होने
वाले धुएँ से
तैयार किया
जाता है,
जहाँ
पवित्र अग्नि
निरंतर जलती
रहती है। https://indianartideas.in
तकनीक
कांगड़ा शैली
में अँधेरी
रात या चाँदनी
रात के चित्र
बनाने के लिए
कुछ विशेष
तकनीक का
प्रयोग किया
जाता है। जो
चित्रों को
सफल बनाते है।
रंग योजना में
शीतल-तापमान
रंगों का
उपयोग किया
जाता है,
जैसे
कि नीला-हरा
और हल्का
सिल्वर-ग्रे।
चाँदनी की
रोशनी में सफ¢दी और
हल्कापन
विशेष प्रभाव
डालते हैं।
चाँदी और उसकी
किरणों की
तुलना में
अन्य प्रकाश
स्त्रोतों को
हल्का रखा जाता है, जैसे कि
दीप या
ममक-दीपिका।
चाँद से आने
वाले प्रकाश
की दिशा से
पेड़ों की
परछाइयों की
दिश का ध्यान
रखा जाता
है।
प्रतिबिंब और
ग्लोरी
प्रभाव के लिए
पानी या
आभूषणों पर
पतली सफ़ेद रंग
की परत लगाई
जाती है। आकाश
में
गे्रडिएंट के लिए
चाँद से दूर
होते हुए
धीरे-धीरे
गहरा रंग किया
जाता है,
और
आकाश में हल्क़े
बादल
और तारे बिखरे जाते हैं।
सतह की बनावट के
लिए
पत्तियों, कपड़ों और
जल सतहों पर
बहुत हल्की
ब्रशिंग की जाती
हैं, ताकि
प्रकाश
परावर्तित हो
सके । इन
तकनीकों का
उपयोग करके , चाँदनी
रात का सुन्दर
व आकर्षक
चित्रण किया जाता
है। (पहाड़ी
लघु
चित्रकलाएँ-उत्पत्ति
और महान
कलाकार,
Sanjay Sharma (2019), https://discover.hubpages.com/
निष्कर्ष
कांगड़ा शैली
में
प्राकृतिक
वातावरण में
चांदनी रात के
दृश्य एक
विशेष भूमिका
निभाते है।
इसमें चाँद, तारे, झरने, नदियाँ, पेड़-पौधे
और पर्वत की
परतें शामिल
होती हैं, जो विशेष
प्रतिबिंब और
सौम्यता
प्रदान करती हैं।
इस शैली में
प्राकृतिवादिता
बहुत ही प्रमुख होती
है।
चाँदनी रात
का प्रकाश
अक्सर प्रेम, विरह, भक्ति या
रोमांटिक
मिलन जैसे
भावों को
चित्रित करने
का माध्यम
बनता है।
राधा-कृष्ण
लीला जैसे
विषयों में
चंद्रप्रकाश
का उपयोग
संवेदनशीलता
और सौन्दर्य
को बढ़ाने के लिए
किया जाता है।
रोशनी और छाया
का सौम्य संतुलन
कांगड़ा
चित्रों की
विशेषता रही
है। जिसमें
रंगों की
कोमलता और
प्रकाश-छाया
का सुन्दर संतुलित
उपयोग दिखाई देता
है।
चाँदनी रात के
चित्रों
में मानव
आकृति और
भावविधान भी
महत्वपूर्ण
होते हैं, जिसमें
नायिका या
नायक की
उपस्थिति
अधिक प्रभावी
होती है। आँखों, चेहरे के भावों, हाथ-पैर
की मुद्राओं
आदि में
सौम्यता और
अलंकृतिक
सजावट महत्व रखती है। रंग
योजना में
ठंडें और हल्क़े
टोन
जैसे नीला, हरा,
सियाह-नीला
मिश्रण और
हल्की चांदी
चमक का उपयोग
किया जाता हैं, जो चांदनी
की शीतलता और
रात की शांति
को व्यक्त
करते हैं।
इस प्रकार, कांगड़ा
शैली में
चांदनी रात के
दृश्य
एक सुंदर और
शांत अनुभव
प्रदान करते
हैं, जो
प्रेम, विरह, भक्ति, और
रोमांटिक
भावों को
व्यक्त करने
का एक महत्वपूर्ण
माध्यम है।
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