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INCLUSION OF MODERN TECHNIQUES AND SUBJECTS IN MITHILA FOLK ART

Original Article

INCLUSION OF MODERN TECHNIQUES AND SUBJECTS IN MITHILA FOLK ART

मिथिला लोक कला में आधुनिक तकनीक एवं विषयों का समावेश

 

Jyoti Kumari 1*Icon

Description automatically generated, Dr. Lucky Tonk 2

1 Research Scholar, Department of Drawing and Painting, Dayalbagh Educational Institute (Deemed to be University), Dayalbagh, Agra (282005), India

2 Assistant Professor, Department of Drawing and Painting, Dayalbagh Educational Institute, (Deemed to be University), Dayalbagh, Agra (282005), India

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ABSTRACT

English: Mithila folk art is considered a unique confluence of tradition, spirituality and nature. It is historically a traditional folk art of Mithila region of Bihar, also known as Madhubani Art. Initially this art was created on mud walls, along with the use of natural mediums like Bamboo (Brush), natural colours like Yellow (turmeric), Blue (Indigo), Red (Safflower) White (rice) etc. In which religious, cultural and symbolic themes were included. But with the change of time, new experiments can now be seen in subject, medium and techniques. Through the use of various digital tools and the influence of social media are opening new avenues for creative entrepreneurship and cultural expression in Mithila today. It serves as a bridge between traditional values and modern techniques. So that Mithila art remains relevant in the modern context while staying connected to its roots. This research paper focuses on the inclusion of modern techniques and themes in Mithila folk Art.

 

Hindi: मिथिला लोक कला को परंपरा, आध्यात्मिकता और प्रकृति का अनूठा संगम माना जाता है। ऐतिहासिक रूप से यह बिहार के मिथिला क्षेत्र की एक पारंपरिक लोक कला है, जिसे मधुबनी कला के नाम से भी जाना जाता है। आरंभ में यह कला मिट्टी की दीवारों पर बांस (ब्रश) और पीले (हल्दी), नीले (नील), लाल (केसर), सफेद (चावल) आदि प्राकृतिक रंगों के प्रयोग से बनाई जाती थी। इसमें धार्मिक, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक विषय शामिल थे। समय के साथ, विषय, माध्यम और तकनीकों में नए प्रयोग देखने को मिलते हैं। विभिन्न डिजिटल उपकरणों के उपयोग और सोशल मीडिया के प्रभाव से आज मिथिला में रचनात्मक उद्यमशीलता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के नए द्वार खुल रहे हैं। यह पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक तकनीकों के बीच एक सेतु का काम करती है, जिससे मिथिला कला अपनी जड़ों से जुड़ी रहते हुए आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिक बनी रहती है। यह शोध पत्र मिथिला लोक कला में आधुनिक तकनीकों और विषयों के समावेश पर केंद्रित है।

 

Keywords: Mithila Folk Art, Tradition, Techniques, Mediums, Themes, मिथिला की लोक कला, परंपरा, तकनीकें, माध्यम, विषय

 


प्रस्तावना

विभिन्न लोक कलाओं में उनकी ऐतिहासिक परम्पराएं विद्यमान होती हैं। जो वहां की सांस्कृतिक छवि को दर्शाती है। मिथिला कला इसका अनुपम उदाहरण है, किन्तु समय के साथ परिवर्तन प्रकृति का नियम होता है व कलाएं भी इस नियम से अछूती नहीं रह सकती हैं। भित्ति से शुरू हुयी और माटी की गंध से रची बसी कला आज विषयों एवं माध्यमों में नये प्रयोगों और तकनीकी आगमनो के प्रभावों से निरन्तर पुष्पित एवं पल्लवित होती जा रही है। पारम्परिक रूप से मिथिला चित्रकारी महिलाओं द्वारा विशेष अवसरों जैसे मांगलिक कार्यक्रमों, उत्सवों, अनुष्ठानों इत्यादि पर बनाई जाती थी। जिनके विषय प्रायः धार्मिक और पौराणिक कथाओं जैसे रामायण महाकाव्य के दृश्य, हिन्दू देवी-देवताओं व प्रकृति के तत्वों, शुभ प्रतीक चिह्न इत्यादि होते थे, वहीं समकालीन मिथिला कलाकार पारम्परिक विषयों के साथ-साथ ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर चित्रकारी कर रहे हैं। यह परिवर्तन ना केवल विषय वस्तु अपितु माध्यम और तकनीक में भी देखने को मिलता है। आज का युवा कलाकार प्रयोगवादी है। वह किसी भी कला को पारम्परिक बनाते हुऐ भी उसमें आधुनिक व रचनात्मक अभिव्यक्ति का विस्तार करता है जो विश्व भर के कला प्रेमियों की स्वाभाविक जिज्ञासा को बढ़ाकर उन्हें नई दिशा प्रदान कर रहा है। इन्ही प्रयोगों व परिवर्तनों के समावेश को स्पष्ट करने के स्रोत इस प्रकार हैं।

 

विषयगत परिवर्तन

मिथिला चित्र सृजन की परम्परा का शुभारम्भ महिलाओं द्वारा हुआ। जिनके चित्रण का विषय प्रसिद्ध महाकाव्यों तथा पौराणिक कथा रूपों पर आधारित होता था। रामायण, महाभारत, कृष्ण-लीला, शिव पुराण, दुर्गा सप्तशती, शंकर-पार्वती, श्री गणेश, राम-सीता आदि के विभिन्न जीवन प्रसंगों को अपनी लोक कला के जरिये प्रस्तुत करते थे। इसी के साथ मिथिला कलाकार प्रकृति के तत्वों जैसे वृक्ष, लताएं, पुष्प, तुलसी का पौधा और विभिन्न पशु, पक्षी व जानवरों का चित्रांकन विशेष रूप से किया करते थे। धीरे-धीरे कलाकारों ने दैनिक जनजीवन, समसामयिक घटनाओं व सामाजिक मुद्दों इत्यादि से सम्बन्धित चित्रण कार्य करना प्रारम्भ किया। यह परिवर्तन मिथिला की प्रथम पीढ़ी कलाकारों द्वारा ही प्रारम्भ हो चुका था। जिसका एक अच्छा उदाहरण हमें गंगा देवी की विदेशयात्रा (अमेरिका) पर आधारित चित्र, जिसे उन्होंने ‘रोलर कोस्टर‘ का नाम दिया, में देखने को मिलता है। चित्र 1 दुलारी देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी व बौआ देवी आदि कलाकारों ने पारम्परिक विषयों की नवीन विषयवस्तु को अपनाकर रचनात्मक दृष्टिकोण को मौलिकता प्रदान की। कलाकृति का विषय कलाकार की अभिव्यक्ति के दर्शन कराता है, वर्तमान परिवेश में चल रही सामाजिक घटनाओं व ज्वलंत मुद्दे, जात-पात की धारणा युवा कलाकारों के हृदय में घात कर क्रान्तिकारी सृजन का निर्माण करती है। कुछ ऐसे ही क्रान्तिकारी विचारधाराओं की कलाकार मालविका राज, जो मिथिला शैली में नवाचार करते हुए कला के माध्यम से सामाजिक मुक्ति और जाति आधारित बहिष्कारों को चुनौती देने के विषयों का अन्वेषण करती है, जो उनकी कलाकृतियों में दृष्टिगोचर होता है। चित्र 2 कहने का अर्थ यह है कि जो कलाएं सांस्कृतिक विषयों तक ही सीमित थी, अब उनमें कलाकार की व्यक्तिगत सोच व अनुभवों ने समाज के प्रति दृष्टि और आलोचनात्मक विचार भी शामिल होने लगे हैं, जिससे कलाएं और अधिक अर्थपूर्ण बन रही हैं।

चित्र 1

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चित्र 2

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माध्यम व तकनीकी परिवर्तन

प्रारम्भ में मिथिला कला पूर्णतः प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग से बनायी जाती थी, जहाँ धरातल के रूप में सर्वप्रथम भित्ति व भूमि पर चित्रण किया गया, फिर हस्तनिर्मित कागज पर चित्रण और शनैः शनैः कपड़ा, सजावटी वस्तु जैसे पर्स, बोतल, मिट्टी के बर्तन, फर्नीचर, ज्वैलरी बॉक्स इत्यादि। वर्तमान में कैनवास सबसे अधिक प्रचलित माध्यम है। आरम्भिक चित्रों के निर्माण कार्य में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता था जैसे पीठा (चावल का आटा) एंव सिंदूर के घोल से अरिपन बनाया जाता था। महिलाएं स्वयं रंगों की प्राकृतिक माध्यम से तैयार करती थी, जो अत्यन्त श्रमसाध्य कार्य होता था। ब्रश के रूप में बाँस की टहनियों को कूटकर उस पर सूती कपड़ा, रूई लपेटकर तूलिका का निर्माण किया जाता था। इस प्रकार सभी सामग्रियों के लिए प्रकृति-प्रदत्त वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता था। समय के साथ माध्यम व तकनीकों में भी बदलाव होता जा रहा है। आजकल कलाएं न केवल अभिव्यक्ति का साधन अपितु मनोरंजन, व्यवसायिकता व जागरूकता का माध्यम भी बन रही हैं। भित्ति, कागज व कलम से बनने वाली कला को डिजिटल स्क्रीन पर प्रदर्शित करना एक चर्चित माध्यम बन गया है। जिसमें कैनवास की जगह स्क्रीन, प्राकृतिक रंगों की जगह डिजिटल टूल्स व तूलिका की जगह डिजिटल ब्रश (Procreate, Photoshop) इत्यादि का इस्तेमाल किया जाने लगा है। चित्र 3 इसी पद्धति में योग करती बालिका को कलाकार उर्वशी निराला ने डिजिटल किन्तु मिथिला शैली में बनाया है। जिसमें रेखा, रूप व रंगों का अनुसरण मिथिला शैली में ही किया गया है, किन्तु माध्यम के रूप में डिजिटल चित्रकारी को अपनाया गया है।

चित्र 3

चित्र 3

 

शैलीगत परिवर्तन

मिथिला कला की परंपरागत शैली में लयात्मक रेखाएं, बारीक ज्यामितिय पैटर्न, मानवाकृति व छोटे-छोटे बिन्दुओं द्वारा अत्यन्त महीन कार्य किया जाता है। जिसकी संरचना में कोई विशेष खाली स्थान नहीं, अपितु हर क्षेत्र रूपांकनों व अलंकरणों से भरा हुआ होता है। मिथिला कला की पाँच प्रमुख शैलियाँ हैंः कचनी (काली स्याही द्वारा), भरनी (विभिन्न रंगों द्वारा), गोदना (ज्यामितिय पैटर्न द्वारा), कोहबर (वैवाहिक) व तांत्रिक। आधुनिक तकनीक के समावेश के पश्चात कलाकारों ने नई शैलियों में भी रचनात्मक कार्य किया, जो कि रोमांचित व चुनौतीपूर्ण दोनों ही है। समकालीन युवा कलाकार प्राचीनता व आधुनिकता के मिश्रण में कार्य करते हैं। मिथिला के समकालीन कलाकार अविनाश कर्ण की कलाकृतियों में भी इस मिश्रण की छवि देखने को मिलती है। आपके चित्र ‘नटराज‘ चित्र 4 में नटराज की छवि का अंकन आधुनिक रूप में किया गया है, जिसमें लयात्मक रेखाओं व रंगों का प्रयोग पारम्परिक ही है, किन्तु आकृति की संरचना ज्यामितिय व आधुनिक है। प्रथम पीढ़ी कलाकार महासुन्दरी जी की पोती पुष्पा कुमारी, जो मिथिला शैली में कार्यरत है, उन्होंने पारम्परिक शैलियों और रूपांकनों को अपनी नानी से सीखा लेकिन उसमें उन्होंने अपने स्वयं के वैचारिक दृष्टिकोण को शामिल कर नया रूप दिया तथा नवीन सौंदर्यात्मक रचनाओं का सृजन किया। इन्होंने चित्रों का निर्माण प्रतीकात्मक शैली में किया है। चित्र 5बालिका संरक्षण‘, जिसका विषय एवं तकनीक दोनों ही आधुनिक हैं, जो नारी की ऊर्जा व शक्ति को दर्शाते हैं।

चित्र 4

चित्र 4

 

चित्र 5

चित्र 5

 

शोध पद्धति

प्रस्तुत शोध पत्र में मिश्रित शोध कार्यप्रणालियों को शामिल किया गया है। जिसमें प्राथमिक स्रोत के अन्तर्गत समकालीन मिथिला कलाकारों से संवाद कर उनके माध्यम और तकनीकों को गहराई से समझने का प्रयास किया गया है। इसी के साथ द्वितीयक स्रोतों के अन्तर्गत विभिन्न पुस्तकों व इन्टरनेट वेबसाइट्स को शामिल कर वर्णनात्मक अध्ययन किया गया है।

 

निष्कर्ष

21वीं सदी में जब तकनीक आगमन ने समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, तो मिथिला कलाओं पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। आज मिथिला कलाकार न केवल पारम्परिक अपितु आधुनिक तकनीक का उपयोग कर, मिथिला लोक कला को वैश्विक शिखर पर पहचान दे रहे हैं। डिजिटल तकनीक एंव सोशल मीडिया के प्रभाव ने कलाओं को अन्तरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया। हालाँकि यह चुनौतीपूर्ण रहा है किन्तु इसके सकारात्मक प्रभाव ने मिथिला कलाकारों को नई पहचान और व्यवसायीकरण के नए साधन भी प्रदान किये हैं।

 

REFERENCES

Goswami, P. (1997). Various Forms of Indian Art (भारतीय कला के विविध स्वरूप). Panchsheel Prakashan, 1(1).

Avadhesh, A. (2019). Mithila Folk Painting: Successes and Failures (मिथिला की लोक चित्रकला सफलताएँ-असफलताएँ). Lalit Kala Akademi, 2(1).

Chaturvedi, M. (2009). Concepts of Indian Folk Art (भारतीय लोककला के अभिप्राय). Kala Prakashan, 1(1).

Ganga Devi (1928–91)

मालविका राज

उवर्शी निराला

अविनाश कर्ण

पुष्पा कुमारी

https://eshe.in

https://mapacademy.io/articale/pushpa-kumari/  

 

 

 

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