Original
Article
The Interrelationship of Painting and Society - Yesterday and Today
चित्रकला
और समाज का
अंतरसम्बन्ध -
कल और आज
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1 Assistant Professor,
Department of Painting Shaasan Shiksha Sansthan,
Nagpur Women’s Government College, Narsinghpur,
India |
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ABSTRACT |
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English: Art has been a powerful medium of expression since the dawn of human civilization and has maintained a deep and inseparable relationship with society. The topic “The Interrelationship Between Art and Society – Then and Now” clearly establishes that art is not merely an expression of beauty, but a vivid reflection of society’s culture, traditions, beliefs, ideologies, and social transformations. From prehistoric cave paintings to modern and contemporary digital art, the art of every era has continuously reflected the social realities of its time. In ancient times, the primary purpose of art was the depiction of religious faith, social morality, and collective life. Cave paintings of Bhimbetka, Ajanta–Bagh murals, and temple art traditions portray the lifestyle, spiritual consciousness, and cultural values of contemporary society. During the medieval period, Mughal, Rajput, and folk painting styles depicted themes of royalty, love, war, daily life, and religious sentiments, providing a clear understanding of the social structure and prevailing ideologies of that era. In the modern period, the nature of art changed alongside social, political, and economic transformations. Colonial influence, education, and globalization provided new perspectives to art. In modern and contemporary art, artists have focused on issues such as social inequality, women empowerment, environmental crises, identity, and human emotions. Digital media and new technologies have further connected art with a broader segment of society. This research abstract clearly establishes that while art is influenced by society, it also influences society in return. The art of the past served as a carrier of tradition and collective consciousness, whereas contemporary art has become an expression of social issues, struggles, and change. Thus, the interrelationship between art and society remains continuous, dynamic, and ever-evolving, playing a significant role in the development of human civilization. Hindi: इंसानी
सभ्यता की
शुरुआत से ही
कला अपनी बात
कहने का एक
ताकतवर
ज़रिया रही
है और इसने
समाज के साथ
एक गहरा और
अटूट रिश्ता
बनाए रखा है।
“कला और समाज
के बीच आपसी
रिश्ता – तब और
अब” टॉपिक यह
साफ़ तौर पर
बताता है कि
कला सिर्फ़
सुंदरता की
एक झलक नहीं
है, बल्कि
समाज की
संस्कृति,
परंपराओं,
विश्वासों,
विचारधाराओं
और सामाजिक
बदलावों की
एक साफ़ झलक
है। पुराने
ज़माने की
गुफाओं की
पेंटिंग से
लेकर मॉडर्न
और आज के
ज़माने की
डिजिटल कला
तक, हर
ज़माने की
कला ने अपने
समय की
सामाजिक
सच्चाइयों
को लगातार
दिखाया है। पुराने
ज़माने में,
कला
का मुख्य
मकसद
धार्मिक
आस्था, सामाजिक
नैतिकता और
सामूहिक
जीवन को
दिखाना था।
भीमबेटका की
गुफाओं की
पेंटिंग,
अजंता-बाग
की दीवारों
पर बनी
पेंटिंग और
मंदिर की कला
की परंपराएं
आज के समाज की
जीवनशैली,
आध्यात्मिक
सोच और
सांस्कृतिक
मूल्यों को दिखाती
हैं।
मध्यकालीन
समय में,
मुगल,
राजपूत
और लोक
पेंटिंग
स्टाइल ने
राजघराने,
प्यार,
युद्ध,
रोज़मर्रा
की ज़िंदगी
और धार्मिक
भावनाओं के
विषयों को
दिखाया,
जिससे
उस ज़माने के
सामाजिक
ढांचे और
मौजूदा विचारधाराओं
की साफ़ समझ
मिलती है। आज के
ज़माने में,
सामाजिक,
राजनीतिक
और आर्थिक
बदलावों के
साथ-साथ कला का
स्वरूप भी
बदला।
कॉलोनियल
असर, एजुकेशन
और
ग्लोबलाइज़ेशन
ने आर्ट को
नया नज़रिया
दिया।
मॉडर्न और
कंटेंपररी
आर्ट में,
आर्टिस्ट
ने सोशल
इनइक्वालिटी,
विमेन
एम्पावरमेंट,
एनवायरनमेंटल
क्राइसिस,
आइडेंटिटी
और इंसानी
इमोशंस जैसे
मुद्दों पर
फोकस किया
है। डिजिटल
मीडिया और नई
टेक्नोलॉजी
ने आर्ट को
समाज के एक
बड़े हिस्से
से और जोड़ा
है। यह
रिसर्च
एब्स्ट्रैक्ट
साफ तौर पर
बताता है कि
आर्ट पर समाज
का असर तो
होता ही है,
बदले
में यह समाज
पर भी असर
डालती है।
पुराने ज़माने
की आर्ट ने
ट्रेडिशन और
कलेक्टिव
कॉन्शसनेस
को आगे
बढ़ाने का
काम किया,
जबकि
कंटेंपररी
आर्ट सोशल
मुद्दों,
संघर्षों
और बदलाव को
दिखाने का
ज़रिया बन गई है।
इस तरह,
आर्ट
और समाज के
बीच का
रिश्ता
लगातार,
डायनैमिक
और हमेशा
बदलता रहता
है, जो
इंसानी
सभ्यता के
विकास में
अहम भूमिका
निभाता है। Keywords: Painting, Society, Culture, Tradition,
Modern Art, Folk Art, Contemporary Painting, चित्रकला, समाज, संस्कृति, परंपरा, आधुनिक
कला,
लोककला, समकालीन
चित्रकला |
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प्रस्तावना
चित्रकला
मानव की
प्रारंभिक
अभिव्यक्ति
का प्रमुख
माध्यम रही
है। जब भाषा
का विकास नहीं
हुआ था, तब मानव
ने चित्रों के
माध्यम से
अपने अनुभवों,
भावनाओं
और सामाजिक
जीवन को
अभिव्यक्त
किया। समाज और
चित्रकला का
संबंध अत्यंत
गहरा है, क्योंकि
चित्रकला
समाज में घटित
घटनाओं, मान्यताओं,
संघर्षों
और
परिवर्तनों
को दृश्य रूप
प्रदान करती
है। विचारों
की
अभिव्यक्ति
ही कला है और
कलाओं को रचने
वाला कलाकार
ईष्वर के
समतुल्य है।
चूंकि ईष्वर
सृष्टि का
रचियता है और
कहीं न कहीं
कलाकार भी
अपनी
पृष्ठभूमि पर
अपने विचारों
एवं
संवेदनाओं को
रचता या गढ़ता
है। लेकिन
सर्वप्रथम
मनुष्य एक सामाजिक
प्राणी है,
और इस
सामाजिक
परिवेष में
रहते हुये
चिंतन एवं मनन
कर ही वह अपने
आप को समाज के
सम्मुख सिद्ध
कर पाता है।
चूंकि कला एक
मानवीय
सृष्टि है,
फलस्वरूप
कलाकार कला के
माध्यम से ही
अपनी भावनाओं
एवं विचारों
को समाज के
सामने मंथन
हेतु
प्रस्तुत
करता है।
जहाँ
तक मेरा मानना
है कि ‘कला
अतीत का
जीता-जागता
उदाहरण
प्रस्तुत
करती है।’ यदि
हम प्राचीन
भारतीय कलाओं
की ओर विहंगम
दृष्टि डालें
तो पायेंगे कि
समय एवं
तात्कालीन
समाज के साथ
इनका कितना
गहरा संबंध
था। वह कला
अपनी गाथा स्वयं
कहती प्रतीत
होती है, जिसमें हम
समाज का चेहरा
बड़ी सहजता के
साथ देखते
हैं।
“कल” की
चित्रकला
जहाँ धार्मिक,
सामाजिक
और
सांस्कृतिक
मूल्यों से
जुड़ी थी, वहीं “आज”
की चित्रकला
सामाजिक
यथार्थ, व्यक्तिगत
अनुभूति, तकनीक और
वैश्वीकरण से
प्रभावित है।
इस शोध पत्र
का उद्देश्य
चित्रकला और
समाज के इस
बदलते संबंध
को ऐतिहासिक
और आधुनिक
परिप्रेक्ष्य
में समझना है।
चित्रकला
की अवधारणा और
सामाजिक
महत्व
चित्रकला
रंग, रेखा,
आकार और
संरचना के
माध्यम से
भावों एवं
विचारों की
अभिव्यक्ति
है। यह समाज
की सामूहिक
चेतना को
प्रतिबिंबित
करती है। समाज
की संस्कृति,
आर्थिक
स्थिति, राजनीतिक
परिस्थितियाँ
और धार्मिक
विश्वास
चित्रकला में
स्पष्ट रूप से
दिखाई देते
हैं।
चित्रकला
समाज को न
केवल दर्शाती
है,
बल्कि उसे
जागरूक भी
करती है।
सामाजिक
कुरीतियों,
अन्याय और
संघर्षों के
विरुद्ध
चित्रकला ने समय-समय
पर सशक्त
भूमिका निभाई
है।
प्राचीन
काल में चित्रकला
और समाज (कल)
आदिम
एवं गुफा
चित्रकला
भीमबेटका,
अल्तामिरा
और लास्को की
गुफाओं में
प्राप्त चित्र
आदिम समाज के
जीवन का सजीव
प्रमाण हैं। शिकार,
नृत्य,
पशु और
सामूहिक जीवन
इन चित्रों के
प्रमुख विषय
थे। ये चित्र
उस समय के
समाज की
जीवन-शैली और
सामूहिकता को
दर्शाते हैं।
प्राचीन
भारतीय
चित्रकला
अजंता,
एलोरा और
बाघ की गुफाओं
की चित्रकला
बौद्ध, जैन और
हिंदू समाज की
धार्मिक और
नैतिक चेतना को
अभिव्यक्त
करती है। इन
चित्रों में
करुणा, त्याग और
सामाजिक
समरसता का भाव
स्पष्ट दिखाई
देता है।
मध्यकालीन
चित्रकला और
समाज
मध्यकाल
में समाज
राजशाही और
धर्म से
अत्यधिक
प्रभावित था।
मुगल, राजपूत और
पहाड़ी
चित्रकला
शैलियाँ
तत्कालीन
समाज की
जीवन-शैली,
शासकीय
वैभव, प्रेम,
युद्ध और
भक्ति को
दर्शाती हैं।
मुगल
चित्रकला में
दरबारी जीवन
और ऐतिहासिक घटनाओं
का चित्रण
मिलता है,
जबकि
राजपूत
चित्रकला में
लोकजीवन, नारी
सौंदर्य और
प्रकृति का
सुंदर संयोजन
दिखाई देता
है।
लोकचित्रकला
और समाज
लोकचित्रकला
समाज के
सामान्य
जनजीवन से गहराई
से जुड़ी होती
है। मधुबनी,
गोंड,
वारली,
पिथोरा और
फड़ चित्रकला
समाज की
परंपराओं,
त्योहारों,
कृषि और
धार्मिक
विश्वासों को
दर्शाती हैं।
लोकचित्रकला
समाज की
सामूहिक
पहचान और सांस्कृतिक
निरंतरता को
बनाए रखने में
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाती है। यह
कला पीढ़ी दर
पीढ़ी सामाजिक
मूल्यों का
संचार करती
है।
आधुनिक
काल में चित्रकला
और समाज (आज)
औपनिवेशिक
काल और
सामाजिक
परिवर्तन
औपनिवेशिक
काल में
भारतीय समाज
में शिक्षा,
राजनीति
और
विचारधाराओं
में परिवर्तन
आया। राजा रवि
वर्मा जैसे
कलाकारों ने
भारतीय सामाजिक
और पौराणिक
विषयों को
आधुनिक शैली
में प्रस्तुत
किया।
आधुनिक
चित्रकला
आधुनिक
चित्रकला में
समाज की
जटिलताओं,
व्यक्तिगत
अनुभवों और
सामाजिक
समस्याओं का चित्रण
होने लगा।
अमृता शेरगिल,
एम.एफ.
हुसैन, एस.एच. रजा
जैसे
कलाकारों की
कृतियाँ समाज
के बदलते
स्वरूप को
दर्शाती हैं।
समकालीन
चित्रकला और
समाज
आज
की चित्रकला
वैश्वीकरण,
तकनीक,
सामाजिक
मीडिया और
राजनीतिक
चेतना से
प्रभावित है।
समकालीन
कलाकार
पर्यावरण,
नारी
सशक्तिकरण,
सामाजिक
असमानता और
पहचान जैसे
विषयों को चित्रों
के माध्यम से
प्रस्तुत कर
रहे हैं।
डिजिटल
आर्ट, इंस्टॉलेशन
और मिश्रित
माध्यमों ने
चित्रकला को
समाज से जोड़ने
के नए रास्ते
खोले हैं।
चित्रकला
का समाज पर
प्रभाव
चित्रकला
समाज की सोच
को प्रभावित
करती है। यह
सामाजिक
चेतना जगाने,
संवाद
स्थापित करने
और परिवर्तन
की प्रेरणा देने
का कार्य करती
है। पोस्टर
कला, सामाजिक
अभियानों की
चित्रकला और
जन-आंदोलनों
में कला का
प्रयोग इसका
उदाहरण है।
कल और आज
का तुलनात्मक
अध्ययन
कल
की चित्रकला
सामूहिक जीवन,
धर्म और
परंपरा पर
केंद्रित थी,
जबकि आज
की चित्रकला
व्यक्तिगत
अनुभव, सामाजिक
यथार्थ और
वैश्विक
मुद्दों को
अभिव्यक्त
करती है। फिर
भी दोनों
कालों में
समाज चित्रकला
का केंद्रीय
तत्व बना हुआ
है।
निष्कर्ष
चित्रकला
और समाज का
संबंध
कालातीत और
निरंतर
परिवर्तनशील
है। समाज
चित्रकला को
विषय, दृष्टि और
प्रेरणा देता
है,
जबकि
चित्रकला
समाज को उसकी
पहचान, चेतना और
दिशा प्रदान
करती है। आज
सबसे बड़ा गंभीर
विषय यह है कि
हम जन सामान्य
को कला से कैसे
जोड़े। हम
चित्रों में
क्या और कैसे
दिखायें कि
कला और समाज
में
अंर्तसंबंध
स्थापित हो सके।
‘‘यथार्थ तो
हमारे चारों
ओर कबाड़ी की
दुकान की तरह
बिखरा पड़ा है।
समय के साथ
बदला भी है,
पर क्या
हमारे
चित्रकारों
ने हमारी कला
चेतना को इतना
विकसित किया
है कि चित्रों
और यथार्थों
की दुनिया के बीच
आ-जा सके, और इस
प्रक्रिया
में ऐसा कोई
बिंदु ढूँढ
सके कि बिखराव
में कोई
व्यवस्था कोई
बानगी, कोई ढांचा
उभरे। तब हम
कला चेतना के
भागीदार होंगे।’’
और यह आज
समसामयिक
परिवेष में
‘समय और समाज
के लिये कारगर
सिद्ध होगी
वहीं दूसरी ओर
षिक्षा
पद्धति में
महत्वपूर्ण
बदलाव अतिआवष्यक
है। मैं यह
मानता हूँ कि
आज के
समसामयिक परिवेष
में यदि कला
को जन-साधारण
से जोड़ना है तो
शासन को सभी
क्षेत्रों की
षिक्षा-पद्धति
में कड़े
परिवर्तन
करने होंगे।
मेरी दृष्टि
में स्कूल
षिक्षा
पद्धति का दोष
सबसे अधिक है,
जिसने कला
को आम आदमी से
इतना दूर रखा
है कि उन्हे
इसका सही आनंद
प्राप्त ही
नहीं हो रहा।
आज
सरकार ने देष
के हर
कोने-कोने में
षिक्षा का लाभ
लेने हेतु
स्कूलों का
निर्माण तो
करवाया है
लेकिन
पाठ्यक्रम
में ‘कला’ को
कोई स्थान नहीं
दिया है। जिस
प्रकार अन्य
विषय एक छात्र
के लिये
आवष्यक है,
वही संगीत
और चित्रकला
जैसे कलात्मक
विषयों को हीन
भावना से देखा
जा रहा है। आज
ये सबसे बड़ा
दोष है कि
भारत सरकार ही
ऐसे विषयों को
लेकर गहन
चिंतन नहीं कर
रही है।
“कल” की
चित्रकला
समाज की
परंपराओं और
विश्वासों की
संरक्षक थी,
और “आज” की
चित्रकला
समाज के
प्रश्नों और
संघर्षों की
सशक्त आवाज
है। अतः
चित्रकला
समाज का दर्पण
ही नहीं, बल्कि
उसका सक्रिय
निर्माता भी
है।
मेरा
यह मानना है
कि एक अच्छी
कलाकृति वह
नहीं है जो
बाजार की माँग
को देखते हुये
अल्प-समयावधि
के लिये
चित्रित की
जाय। बल्कि
मेरी दृष्टि
में एक
अर्थपूर्ण व
सुंदर
कलाकृति वह है
जो
सौंदर्य-बोध
को ध्यान में
रखते हुये,
प्रयोगात्मक
होने के साथ
ही,
समय-समाज
के लिये
प्रेरणादायक
एवं प्रेरणापरक
भी हो। एक आम
दर्षक जो कला
के आधारभूत
नियमों से
अपरिचित है वह
भी कलाकृति से
सौ प्रतिषत्
तो नहीं लेकिन
कम से कम तीस
प्रतिषत आनंद
उससे प्राप्त
कर सके। इस
सामाजिक
परिवेष में हम
समाज को नकार
नहीं सकते।
यदि कोई दर्षक
कलाकृति से
तीस प्रतिषत्
आनंद भी
प्राप्त कर ले
तो,
कलाकार के
चित्र
निर्माण का
उद्देष्य
पूरा हो जाता
है।
REFERENCES
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Perspectives of Art (कला
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अंतर्दर्शन). Rajasthan
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Sharma, R. A. (1992). Indian Painting and
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Shukla, P. (1979). Art, Time and Society (कला समय
समाज). Lalit Kala Akademi.
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