Granthaalayah
INDIAN FOLK AND TRIBAL ART: A STUDY

Original Article

INDIAN FOLK AND TRIBAL ART: A STUDY  

भारतीय लोक एवं जनजातीय कला: एक अध्ययन

 

Dr. Varsha Patel 1*  

1 Assistant Professor (Sociology) Prime Minister College of Excellence, Shri Atal Bihari Vajpayee Government Arts and Commerce College, Indore, India  

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ABSTRACT

English: Tribal and folk arts of India represent the ancient, rich, and vibrant traditions of Indian cultural heritage. These arts are not merely aesthetic expressions; they are deeply connected to nature worship, religious beliefs, social structures, community life, and oral traditions. Evolving from prehistoric times, tribal and folk art has provided a visual form to the cultural consciousness of Indian society.

This research paper examines the major tribal and folk art styles of India—such as Warli, Gond, Pithora, Saura, Adivasi, Santhal, Chitradaan, Pattachitra, Thangka, Madhubani, Mandana, Phad, Kalighat, Patua, Kalamkari, and Cheriyal—through sociological, cultural, and religious perspectives. Through these arts, the study explores the religious beliefs, rituals, collective memory, women-centered expressions, and environmental awareness of tribal and folk communities.

In conclusion, tribal and folk arts are not only the cultural memory of India’s past but also a source of social unity, cultural identity, and creative consciousness for contemporary society. Their preservation, promotion, and academic study have become increasingly relevant in the present context.

 

Hindi: भारत की जनजातीय एवं लोक कलाएँ भारतीय सांस्कृतिक विरासत की प्राचीन, समृद्ध और जीवंत परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये कलाएँ केवल सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि प्रकृति-पूजा, धार्मिक आस्था, सामाजिक संरचना, सामुदायिक जीवन और मौखिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। प्रागैतिहासिक काल से विकसित होती हुई जनजातीय और लोक कला ने भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना को दृश्य रूप प्रदान किया है।

प्रस्तुत शोध-पत्र में भारत की प्रमुख जनजातीय एवं लोक कला शैलियोंकृजैसे वारली, गोंड, पिठौरा, सौरा एड़ीतल, संथाल चक्षुदान, पटचित्र, थंका, मधुबनी, माण्डना, फड़, कालीघाट, पटुआ, कलमकारी एवं चेरियाल चित्रकलाकृका समाजशास्त्रीय, सांस्कृतिक और धार्मिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया गया है। इन कलाओं के माध्यम से आदिवासी एवं लोक समाज की धार्मिक मान्यताओं, अनुष्ठानों, सामूहिक स्मृति, स्त्री-केंद्रित अभिव्यक्तियों तथा पर्यावरणीय चेतना को समझने का प्रयास किया गया है।

निष्कर्षतः, जनजातीय एवं लोक कला न केवल भारतीय अतीत की सांस्कृतिक स्मृति हैं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए भी सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और रचनात्मक चेतना का स्रोत हैं। इनके संरक्षण, संवर्धन और शैक्षणिक अध्ययन की आवश्यकता वर्तमान समय में और अधिक प्रासंगिक हो गई है।

 

Keywords: Tribal Art, Folk Art, Cultural Heritage, Warli, Gond, Madhubani, जनजातीय कला, लोक कला, सांस्कृतिक विरासत, वारली, गोंड, मधुबनी  

 


प्रस्तावना

भारत को सांस्कृतिक विविधताओं का देश कहा जाता है। यहाँ की कला परंपरा प्रागैतिहासिक काल से ही विकसित होती रही है। जनजातीय एवं लोक कला भारतीय समाज की जड़ों से जुड़ी हुई है, जिसमें प्रकृति, धर्म, सामाजिक संरचना एवं सामुदायिक जीवन का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है। ये कलाएँ प्रायः मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं।

आधुनिक काल में जहाँ एक ओर औद्योगीकरण एवं वैश्वीकरण ने जीवन शैली को प्रभावित किया है, वहीं दूसरी ओर जनजातीय एवं लोक कलाओं को नए माध्यम और पहचान भी प्राप्त हुई है। यह शोध-पत्र इन्हीं परिवर्तनों के संदर्भ में चयनित कला शैलियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भारत के आदिवासियों का इतिहास आर्यों के आगमन से पूर्व का है। कई युगों तक  इस उपमहाद्वीप के पहाड़ी भूभागों में उनका आधिपत्‍य था। परन्तु समय के साथ पढ़े लिखे लोगों ने (अन्‍य चीजों के अतिरिक्‍त) उन लोगों पर प्रभुत्‍व स्थापित कर लिया जिनकी परंपराएं मौखिक संस्‍कृति पर आधारित थी। औपनिवेशिक  अवधि के दौरान, आदिवासियों को जनजातियों का नया नाम दिया गया और स्‍वाधीनता पश्‍चात भारत में उन्‍हें अनुसूचित जनजातियों के रूप में जाना गया। जनजाति के सत्‍व की व्‍याख्‍या ‘उद्भव के चरण’ के रूप में की गई जो समाज के एक रूप के विपरीत था। जब शिक्षा के केंद्रों की स्‍थापना हुई, तो यह व्‍याख्‍यान चुनिंदा समुदायों के सामाजिक-सांस्‍कृतिक मूल आधारों पर संकेंद्रित हो गया जिससे गैर-आदिवासी बच्‍चे आदिवासियों की  संस्कृति की जानकारी से वंचित रह गए और आदिवासी बच्‍चे अपनी विरासत पर गौरव करने से वंचित रह गए।

 

साहित्य समीक्षा

भारतीय जनजातीय एवं लोक कला पर विद्वानों द्वारा किए गए अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि ये कलाएँ केवल सौंदर्यात्मक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संरचना, धार्मिक आस्था, आर्थिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी हुई हैं। विभिन्न अनुशासनो मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, कला इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययनकृमें इन कलाओं का विश्लेषण किया गया है।

Bhatt (2014) ने भारतीय जनजातीय चित्रकलाओं के रूप, रंग-योजना और प्रतीकवाद का विश्लेषण करते हुए यह बताया है कि जनजातीय कला प्रकृति और समुदाय-केंद्रित जीवन- दृष्टि का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब है। उनके अनुसार बिंदु, रेखा और ज्यामितीय आकृतियाँ केवल सजावटी तत्व नहीं, बल्कि सामाजिक अर्थों से युक्त प्रतीक हैं।

Chaudhary (2015) ने जनजातीय संस्कृति और कला रूपों का अध्ययन सामाजिक संगठन, अनुष्ठानों और धार्मिक विश्वासों के संदर्भ में किया है। उनका मत है कि जनजातीय कला सामूहिक स्मृति और परंपरा के संरक्षण का माध्यम है, जो लिखित इतिहास के अभाव में सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखती है।

Dey (2017) ने लोक एवं जनजातीय कला को मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करते हुए इसे “सांस्कृतिक पाठ” के रूप में परिभाषित किया है। वे मानते हैं कि इन कलाओं के माध्यम से जनजातीय समाज अपनी पहचान, सत्ता-संबंधों और सामाजिक मूल्यों को दृश्य रूप में अभिव्यक्त करता है।

Nath (2015) ने भारत की जनजातीय कलाओं को क्षेत्रीय विविधताओं के संदर्भ में प्रस्तुत किया है और यह रेखांकित किया है कि प्रत्येक कला शैली अपने भौगोलिक पर्यावरण, आर्थिक गतिविधियों और धार्मिक संरचना से प्रभावित होती है। उनका अध्ययन जनजातीय कला और पर्यावरणीय चेतना के संबंध को समझने में सहायक है।

Mishra (2019) ने वारली चित्रकला के सामाजिक प्रतीकवाद का विश्लेषण करते हुए बताया है कि वृत्त, त्रिकोण और रेखाएँ जीवन-चक्र, स्त्री-पुरुष संतुलन और सामुदायिक समानता का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे वारली कला को एक “दृश्य समाजशास्त्र” के रूप में देखते हैं।

Jha (2018) ने मधुबनी कला में परंपरा और परिवर्तन के अंतर्संबंध का अध्ययन किया है। उनका शोध यह दर्शाता है कि किस प्रकार यह कला दीवारों से कैनवास तक पहुँचकर बाज़ार का हिस्सा बनी, फिर भी अपने धार्मिक और स्त्री-केंद्रित मूल्यों को बनाए रखने में सफल रही।

Goswami (2016) ने बंगाल की कालीघाट और पटुआ चित्रकला को शहरीकरण और सामाजिक आलोचना के संदर्भ में विश्लेषित किया है। वे बताते हैं कि इन चित्रों में तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों, धार्मिक पाखंड और औपनिवेशिक प्रभावों की तीखी अभिव्यक्ति मिलती है।

Panda (2018) ने सौरा आदिवासियों की एड़ीतल चित्रकला को अनुष्ठानिक और धार्मिक दृष्टि से विश्लेषित किया है। उनके अनुसार यह कला रोग-निवारण, संकट-निरोध और देव-पूजा से जुड़ी हुई है तथा सामूहिक विश्वासों को दृश्य रूप देती है।

Reddy (2017) ने कलमकारी और चेरियाल पटचित्र का अध्ययन करते हुए इन्हें लोककथाओं और धार्मिक आख्यानों का दृश्य माध्यम बताया है। उनका शोध यह स्पष्ट करता है कि इन कलाओं में कथा-वाचन, चित्र और प्रदर्शन एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

Varma (2018) और Singh (2016) जैसे विद्वानों ने भारतीय लोक कला परंपराओं को सांस्कृतिक विरासत के रूप में रेखांकित करते हुए संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया है। उनके अनुसार वैश्वीकरण के दौर में लोक कला की पहचान को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।

 

अनुसंधान पद्धति

अध्ययन का उद्देश्य चयनित जनजातीय एवं लोक कला शैलियों का तुलनात्मक अध्ययन करना है। प्रस्तुत अध्ययन में वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अनुसंधान पद्धति अपनाई गई है। तथ्य संकलन मे द्वितीयक स्रोत के अंतर्गत पुस्तकें, शोध-पत्र, पत्रिकाएँ, सरकारी रिपोर्टें और कला-संबंधी दस्तावेज आदि का उपयोग किया गया है।

 

भारत की प्रमुख लोक एवं आदिवासी कलाएँ

कुछ प्रमुख लोक कलाएँ तथा आदिवासी कलाएँ इस प्रकार हैं:

·        महाराष्ट्र की वार्ली चित्रकारी एवं आदिवासियों द्वारा दीवार पर बनाए जाने वाले कोंकण चित्र।

·        मध्य प्रदेश के गोंड आदिवासियों द्वारा चित्रित किए जाने वाले गोंड चित्र।

·        गुजरात एवं मध्य प्रदेश के राठवा एवं भील आदिवासियों द्वारा दीवारों पर अंकित किए जाने वाले ’पिठौरा भित्ति चित्र’।

·        उड़ीसा के सौरा आदिवासियों द्वारा दीवारों पर बनाए जाने वाली ’एड़ीतल’ / ’इड़ीतल’ चित्रकला।

·        पश्चिम बंगाल एवं झारखंड के संथाल आदिवासियों में प्रचलित कागज़ पर बने ’चक्षुदान’ चित्र।

·        उड़ीसा में कपड़े के पट एवं ताड़पत्र पर बनाए जाने वाले ’पटचित्र’ एवं दीवार पर बनाए जाने वाले ’झूटी चित्र’।

·        हिमालय एवं लद्दाख में कपड़े पर चित्रित किए जाने वाले ’थंका चित्र’।

·        बिहार के मिथिला क्षेत्र में प्रचलित दीवार पर बनाए जाने वाले ’मधुबनी लोक चित्र’।

·        राजस्थान में दीवार एवं भूमि पर बनाए जाने वाले ’माण्डना’ चित्र तथा कपड़े पर बनाए जाने वाले ’फड़ चित्र’।

·        मध्य प्रदेश में दीवार पर बनाए जाने वाले ’चित्रावण’, ’सांझी’, ’माण्डना’, ’जिरौति’, ’करवाचैथ’ चित्र।

·        पश्चिम बंगाल के ’कालीघाट’ एवं ’पटुआ’ पटचित्र।

·        आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में कपड़े पर बनाए जाने वाले ’कलमकारी’ एवं ’चेरियाल पटचित्र’।

उपरोक्त चित्र शैलियों के अतिरिक्त राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में भूमि पर बनाए जाने वाले माण्डना, महाराष्ट्र एवं गुजरात के रंगोली, बिहार के अरिपन, बंगाल के अल्पना, तमिलनाडु के कलम तथा केरल में प्रचलित कोलम (भूमिचित्र) प्रमुख हैं।

1)     महाराष्ट्र की वार्ली चित्रकारी एवं आदिवासियों द्वारा दीवार पर बनाए जाने वाले कोंकण चित्र-

वारली चित्रकला महाराष्ट्र एवं गुजरात की वारली जनजाति से संबंधित है। यह कला अपनी सरलता, प्रतीकात्मकता एवं ज्यामितीय आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है। वारली चित्रों में वृत्त, त्रिकोण और रेखाओं के माध्यम से मानव, पशु एवं प्रकृति को दर्शाया जाता है।

इन चित्रों में कृषि, शिकार, नृत्य, उत्सव एवं सामुदायिक जीवन प्रमुख विषय होते हैं। मातृ देवी की आराधना तथा तारपा नृत्य का चित्रण वारली कला की विशिष्ट पहचान है। पारंपरिक रूप से यह कला चावल के घोल से बनी सफेद रंगत को लाल गेरू या गोबर की पृष्ठभूमि पर उकेरी जाती है।

वारली चित्रकला महाराष्ट्र की 10वीं दीकीसदी की आदिवासी लोक कला मिट्टी की दीवारों से निकलकर आधुनिक बैठक कक्षों तक पहुंच गई है।

वारली चित्रकला महाराष्ट्र की एक जनजातीय लोक कला है, जो सरल डिजाइन और वारली आदिवासी समुदाय के दैनिक जीवन के चित्रण के लिए जानी जाती है। माना जाता है कि यह चित्रकला एक हजार साल से भी अधिक पुरानी है और परंपरागत रूप से मुंबई के बाहरी इलाके में स्थित उत्तरी सह्याद्री पर्वतमाला में रहने वाली वारली जनजाति की महिलाओं द्वारा ही बनाई जाती थी।

ये चित्र पहले मिट्टी की सतह पर केवल चावल के आटे से बने सफेद रंग का उपयोग करके बनाए जाते थे। दीवारों को गोबर और मिट्टी से चिकना किया गया था, और चावल के आटे को पानी में मिलाकर बांस की छड़ियों से रंग किया गया था।

कभी-कभी चित्रों में लाल और पीले रंग के बिंदु भी जोड़े जाते थे। समय के साथ, अन्य रंगों का भी प्रयोग शुरू हो गया और कैनवास मिट्टी की दीवारों से आगे बढ़‌कर लकड़ी, धातु, सिरेमिक, टेराकोटा, कागज और कपड़ों तक फैल गया। कपड़े को गोबर या लाल मिट्टी से हल्का धोकर तैयार किया जाता है और फिर उस पर चित्रकारी की जाती है।

वारली चित्रकला और इस कला से सजी कलाकृतियों भारत और विदेशों दोनों में लोकप्रिय हो गई हैं। इसकी बढ़ती लोकप्रियता और मांग के कारण अब वारली समुदाय के बाहर के भी कई लोग इस कला को सीख रहे हैं।

2)     मध्य प्रदेश के गोंड आदिवासियों द्वारा चित्रित किए जाने वाले गोंड चित्र-

गोंड जनजाति की कला उनकेउनकी प्रकृति-पूजा, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विश्वासोंपरंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। गोंड चित्रकला में रेखाओं और बिंदुओं और रेखाओं के माध्यमसंयोजन से जीवंत एवं कल्पनाशील बनाई गई आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जो न केवल कलात्मक सौंदर्य प्रस्तुत करतीदेखने में आकर्षक होती हैं, बल्कि शुभता, सुरक्षा और सौभाग्य से जुड़े सांस्कृतिक विश्वासों को भी अभिव्यक्त करती हैं। आधुनिक युग में गोंड कला ने राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है।

यह चित्रकला परंपरागत रूप गांवोंसे गाँवों की मिट्टी की दीवारों पर बनता हैबनाई जाती थी, जिसमें कोयला, रंगीन मिट्टी, पौधों का रस, पत्तियाँ और गोबर जैसे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त रंगों का उपयोग किया जाता है। इन चित्रों की विशिष्टता उनके सरल और स्पष्ट विचारों तथा गोंडों के दैनिक जीवन के सूक्ष्म चित्रण में निहित है। इस कला शैली में प्रकृति का चित्रण जीवंत और अत्यधिक जटिल होता है, जिसमें जीव-जंतु, पौधे और देवी-देवताओं की आकृतियाँ आपस में सूक्ष्म और जटिल रूप से गुंथे होते हैं। गोंड चित्रकला के सामान्य विषयों में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की कथाएँ, वन, कृषि क्षेत्र, पालतू और जंगली जानवर, तथा जीवन के महत्वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक आयोजन जैसे विवाह, त्यौहार और मृत्यु शामिल हैं।

3)     पिठौरा भित्ति चित्र: राठवा एवं भील आदिवासियों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति-

गुजरात एवं मध्य प्रदेश के राठवा तथा भील आदिवासी समुदायों द्वारा घरों की दीवारों पर बनाए जाने वाले पिठौरा भित्ति चित्र जनजातीय लोक कला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण रूप हैं। यह चित्र केवल सजावटी नहीं होते, बल्कि इनका गहरा धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व होता है। पिठौरा चित्र सामान्यतः किसी मन्नत के पूर्ण होने, रोग से मुक्ति, अच्छी फसल या पारिवारिक कल्याण की कामना के अवसर पर बनवाए जाते हैं।

पिठौरा चित्रों का केंद्रीय विषय पिठौरा देव होते हैं, जिन्हें घोड़े पर सवार रूप में दर्शाया जाता है। इनके साथ सूर्य, चंद्रमा, देवी-देवता, पशु-पक्षी, वृक्ष तथा मानव आकृतियाँ भी अंकित की जाती हैं। चित्रण की प्रक्रिया एक सामूहिक अनुष्ठान के रूप में होती है, जिसमें पुजारी (बड़वा) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह प्रक्रिया समुदाय की सामूहिक चेतना और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करती है।

इस प्रकार, पिठौरा भित्ति चित्र न केवल आदिवासी जीवन की आस्था और संस्कृति का प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय जनजातीय समाज की सामाजिक संरचना को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं।

4)     एड़ीतल / इड़ीतल चित्रकला: उड़ीसा के सौरा आदिवासियों की धार्मिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति-

उड़ीसा के सौरा आदिवासी समुदाय द्वारा घरों की दीवारों पर बनाई जाने वाली ‘एड़ीतल’ अथवा ‘इड़ीतल’ चित्रकला जनजातीय भित्ति कला का एक महत्वपूर्ण रूप है। यह चित्रकला केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सौरा समाज की धार्मिक आस्था, सामाजिक संरचना और प्रकृति-केंद्रित जीवन दृष्टि का सजीव प्रतिबिंब है। एड़ीतल चित्र सामान्यतः किसी रोग, संकट, प्राकृतिक आपदा या पारिवारिक समस्या के निवारण हेतु, देवता को प्रसन्न करने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं।

एड़ीतल चित्रों का मुख्य उद्देश्य सौरा देवता इडिटल (प्कपजंस) तथा अन्य ग्राम-देवताओं को समर्पण करना होता है। इन चित्रों में मानव आकृतियाँ, पशु-पक्षी, सूर्य-चंद्रमा, वृक्ष, जीवन-वृक्ष तथा ज्यामितीय रेखाएँ प्रमुखता से अंकित की जाती हैं। चित्रण की प्रक्रिया एक अनुष्ठानात्मक क्रिया होती है, जिसे पारंपरिक पुजारी द्वारा सम्पन्न कराया जाता है, जिससे यह कला सामुदायिक सहभागिता का रूप ले लेती है।

इस प्रकार, एड़ीतल / इड़ीतल चित्रकला सौरा आदिवासियों के सामाजिक जीवन, धार्मिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता को समझने का एक महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय स्रोत है।

5)     चक्षुदान चित्र: पश्चिम बंगाल एवं झारखंड के संथाल आदिवासियों की अनुष्ठानिक कला-

पश्चिम बंगाल एवं झारखंड के संथाल आदिवासी समुदाय में प्रचलित ‘चक्षुदान’ चित्र जनजातीय कला की एक विशिष्ट अनुष्ठानिक परंपरा हैं। ये चित्र सामान्यतः कागज़ पर बनाए जाते हैं और इनका सीधा संबंध धार्मिक विश्वासों, आत्मा-पूजा तथा पूर्वज-संस्कारों से होता है। ‘चक्षुदान’ का शाब्दिक अर्थ हैकृ नेत्र प्रदान करनाकृअर्थात् किसी देवता, आत्मा या प्रतीकात्मक आकृति में चेतना का संचार करना।

संथाल समाज में चक्षुदान चित्रों का निर्माण विशेष धार्मिक अवसरों, बीमारियों, संकटों या मृत आत्मा की शांति के लिए किया जाता है। इन चित्रों में मानव मुखाकृति, आँखें, रेखात्मक चेहरे, सूर्य-चंद्रमा तथा प्रतीकात्मक चिह्नों को प्रमुखता से दर्शाया जाता है। आँखों का अंकन चित्र निर्माण की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है, क्योंकि इसी क्षण चित्र को जीवंत एवं पवित्र माना जाता है।

इस प्रकार, संथाल आदिवासियों के चक्षुदान चित्र केवल कला नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक निरंतरता का सशक्त माध्यम हैं, जो जनजातीय समाज की आंतरिक संरचना को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं।

6)     पटचित्र एवं झूटी चित्र: उड़ीसा की लोक, धार्मिक चित्रकला परंपरा-

उड़ीसा में प्रचलित ‘पटचित्र’ तथा ‘झूटी चित्र’ राज्य की समृद्ध लोक-धार्मिक कला परंपरा के महत्वपूर्ण रूप हैं। ये चित्र न केवल सौंदर्यपरक अभिव्यक्ति हैं, बल्कि उड़ीसा समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन को भी प्रतिबिंबित करते हैं। जहाँ पटचित्र कपड़े के पट (कैनवास) एवं ताड़पत्र पर बनाए जाते हैं, वहीं झूटी चित्र घरों की दीवारों और आँगनों में बनाए जाते हैं।

पटचित्र मुख्यतः जगन्नाथ संप्रदाय से जुड़े होते हैं। इनमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, कृष्ण-लीला, रामायण तथा महाभारत से संबंधित कथाओं का चित्रण किया जाता है। पारंपरिक रूप से प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है और रेखाओं की सुस्पष्टता एवं रंगों की संतुलित योजना इसकी प्रमुख विशेषता है। ताड़पत्र पर बने पटचित्र विशेष रूप से सूक्ष्म रेखांकन और धार्मिक प्रतीकों के लिए प्रसिद्ध हैं।

झूटी चित्र लोकजीवन से अधिक निकटता रखते हैं। ये चित्र विशेष रूप से त्योहारों, व्रतों, विवाह एवं शुभ अवसरों पर महिलाओं द्वारा बनाए जाते हैं। झूटी चित्रों में ज्यामितीय आकृतियाँ, फूल-पत्तियाँ, देवी-देवता तथा प्रतीकात्मक चिह्न अंकित किए जाते हैं। यह कला सामुदायिक सहभागिता और स्त्री-केंद्रित सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करती है।

इस प्रकार, पटचित्र एवं झूटी चित्र उड़ीसा की लोक-संस्कृति, धार्मिक चेतना और सामाजिक संरचना को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय स्रोत हैं।

7)     थंका चित्र: हिमालय एवं लद्दाख क्षेत्र की बौद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक चित्रकला-

हिमालयी क्षेत्र एवं लद्दाख में कपड़े पर चित्रित किए जाने वाले ‘थंका (ज्ींदहां) चित्र’ बौद्ध धर्म से संबंधित एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक कला परंपरा हैं। ‘थंका’ तिब्बती शब्द है, जिसका अर्थ हैकृ लटकाने योग्य चित्र। ये चित्र सामान्यतः कपड़े या रेशम पर बनाए जाते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों, ध्यान-साधना तथा बौद्ध शिक्षाओं के प्रसार के लिए प्रयुक्त होते हैं।

थंका चित्रों में बुद्ध, बोधिसत्व, तारा, अवलोकितेश्वर, पद्मसंभव, मंडल, जीवन-चक्र (ॅीममस व िस्पमि) तथा बौद्ध देवमंडल का चित्रण किया जाता है। इन चित्रों का निर्माण अत्यंत नियमबद्ध होता है, जिसमें माप, रंग योजना, प्रतीक और मुद्रा निश्चित शास्त्रीय मानकों के अनुसार तय होते हैं। पारंपरिक रूप से प्राकृतिक खनिज और वनस्पति रंगों का उपयोग किया जाता है।

इस प्रकार, थंका चित्र केवल धार्मिक कला नहीं हैं, बल्कि हिमालयी एवं लद्दाखी समाज की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संरचना को समझने का एक महत्वपूर्ण

8)     मधुबनी लोक चित्र: बिहार के मिथिला क्षेत्र की स्त्री-केंद्रित सांस्कृतिक अभिव्यक्ति-

बिहार के मिथिला क्षेत्र में प्रचलित ‘मधुबनी लोक चित्र’ भारतीय लोक कला की एक अत्यंत समृद्ध एवं विशिष्ट परंपरा है। यह चित्रकला पारंपरिक रूप से घरों की दीवारों, आँगनों और कोहबर गृह में बनाई जाती रही है तथा इसका सीधा संबंध विवाह, व्रत, त्योहार एवं धार्मिक अनुष्ठानों से रहा है। मधुबनी चित्र मुख्यतः महिलाओं द्वारा बनाए जाते हैं, जिससे यह कला स्त्री-अनुभव और घरेलू सांस्कृतिक परंपरा की सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती है।

मधुबनी चित्रों में राम-सीता, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सूर्य-चंद्रमा, तुलसी, मछली, मोर एवं कमल जैसे प्रतीकों का व्यापक प्रयोग होता है। इन चित्रों की प्रमुख विशेषता यह है कि कलाकार कैनवास का कोई भी भाग रिक्त नहीं छोड़ते, बल्कि संपूर्ण सतह को सजावटी आकृतियों, पुष्प-लताओं और ज्यामितीय डिज़ाइनों से भर देते हैं। पारंपरिक रूप से हल्दी, चावल का घोल, नील, कालिख, गोबर और वनस्पति रंगों का उपयोग किया जाता है।

इस प्रकार, मधुबनी लोक चित्र केवल लोक कला नहीं हैं, बल्कि मिथिला समाज की सामाजिक संरचना, लैंगिक भूमिकाओं, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान को समझने का एक महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय स्रोत हैं।

9)     माण्डना एवं फड़ चित्र: राजस्थान की लोक-धार्मिक एवं कथात्मक चित्र परंपरा-

राजस्थान में प्रचलित ‘माण्डना चित्र’ तथा ‘फड़ चित्र’ राज्य की लोक-संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के महत्वपूर्ण कलात्मक रूप हैं। जहाँ माण्डना चित्र घरों की दीवारों एवं भूमि (आँगन) पर बनाए जाते हैं, वहीं फड़ चित्र कपड़े पर अंकित चलित (च्वतजंइसम) चित्रकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। दोनों ही कलाएँ राजस्थान के सामाजिक जीवन, धार्मिक विश्वासों और सामुदायिक परंपराओं को अभिव्यक्त करती हैं।

माण्डना चित्र मुख्यतः स्त्रियों द्वारा विशेष अवसरों जैसे विवाह, पर्व-त्योहार, गृह-प्रवेश एवं व्रतों के समय बनाए जाते हैं। ये चित्र चावल के घोल, खड़िया (चूना), गेरू और प्राकृतिक रंगों से भूमि या दीवार पर अंकित किए जाते हैं। माण्डना चित्रों में ज्यामितीय आकृतियाँ, सूर्य, चंद्रमा, तुलसी, स्वस्तिक, पशु-पक्षी तथा देवी-देवताओं के प्रतीक दर्शाए जाते हैं। यह कला गृह-पवित्रता, शुभता एवं समृद्धि की कामना से जुड़ी हुई है।

फड़ चित्र राजस्थान की एक विशिष्ट कथात्मक चित्रकला है, जो विशेष रूप से देवनारायण, पाबूजी, गोगाजी एवं रामदेवजी जैसे लोक-देवताओं की वीरगाथाओं पर आधारित होती है। ये चित्र कपड़े पर बनाए जाते हैं और भोपाओं द्वारा कथा-गायन के समय प्रदर्शित किए जाते हैं। फड़ चित्र सामूहिक स्मृति, लोक इतिहास और वीर परंपरा के संरक्षण का माध्यम हैं।

इस प्रकार, माण्डना एवं फड़ चित्र राजस्थान की लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय स्रोत हैं।

10)  मध्य प्रदेश की भित्ति चित्र परंपराएँ: चित्रावण, सांझी, माण्डना, जिरौति एवं करवाचैथ चित्र-

मध्य प्रदेश में प्रचलित चित्रावण, सांझी, माण्डना, जिरौति तथा करवाचैथ चित्र राज्य की लोक-संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण भित्ति चित्र परंपराएँ हैं। ये चित्र मुख्यतः घरों की दीवारों एवं आँगनों पर विशेष धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक अवसरों पर बनाए जाते हैं। इन चित्रों का निर्माण प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है, जिससे यह कला स्त्री-केंद्रित सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सशक्त उदाहरण बन जाती है।

चित्रावण चित्र- चित्रावण चित्र प्रायः विवाह, गृह-प्रवेश तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर घर की दीवारों पर बनाए जाते हैं। सबसे पहले दीवार को गोबर और मिट्टी से लीपकर शुद्ध किया जाता है। इसके बाद गेरू से पृष्ठभूमि तैयार की जाती है। चित्र उँगलियों या लकड़ी की पतली तीलियों से बनाए जाते हैं। इनमें वर-वधू, कलश, सूर्य-चंद्रमा और शुभ प्रतीकों का अंकन किया जाता है। अंत में चावल के घोल या चूने से आकृतियों को उभारा जाता है।

सांझी चित्र- सांझी चित्र भाद्रपद-आश्विन माह में कृष्ण-भक्ति से जुड़े व्रतों के दौरान बनाए जाते हैं। सबसे पहले दीवार पर गोबर या मिट्टी का लेप लगाया जाता है। इसके बाद चूने या सफेद मिट्टी से आकृतियाँ बनाई जाती हैं। सांझी चित्रों में कृष्ण-लीला, फूल-पत्तियाँ और ज्यामितीय रूपांकन होते हैं। चित्र बनाते समय भक्ति गीत और व्रत-अनुष्ठान भी साथ चलते हैं।

माण्डना चित्र- माण्डना चित्र मुख्यतः आँगन या दीवारों पर बनाए जाते हैं। पहले भूमि या दीवार पर गेरू का लेप लगाया जाता है। इसके बाद चूने या खड़िया से सफेद रंग द्वारा डिज़ाइन बनाई जाती है। माण्डना चित्रों में ज्यामितीय आकृतियाँ, कमल, मोर और स्वस्तिक जैसे शुभ चिह्न होते हैं। ये चित्र दीपावली, विवाह और त्योहारों पर बनाए जाते हैं।

जिरौति चित्र- जिरौति चित्र लोक-देवियों और ग्राम-देवताओं की पूजा से जुड़े होते हैं। इन्हें विशेष मनोकामना या रोग-निवारण के लिए बनाया जाता है। दीवार को मिट्टी या गोबर से लीपने के बाद प्राकृतिक रंगों से देवी-देवताओं के प्रतीकात्मक रूप बनाए जाते हैं। चित्र साधारण रेखाओं और प्रतीकों के माध्यम से बनाए जाते हैं, जिनमें धार्मिक आस्था प्रमुख होती है।

करवाचैथ चित्र- करवाचैथ चित्र व्रत के दिन घर की दीवारों पर बनाए जाते हैं। पहले दीवार को साफ कर उस पर गेरू या मिट्टी का लेप किया जाता है। फिर चावल के घोल, चूने या काजल से चंद्रमा, करवा, दीपक और दांपत्य जीवन के प्रतीकों का अंकन किया जाता है। चित्र बनाते समय व्रत-कथा और पूजा-विधि भी संपन्न होती है।

11)  पश्चिम बंगाल के ’कालीघाट’ ’पटुआ’ पटचित्र -

पश्चिम बंगाल में प्रचलित कालीघाट और पटुआ पटचित्र पारंपरिक रूप से कपड़े या कागज़ पर बनाए जाते हैं। कालीघाट चित्रों की शुरुआत कोलकाता स्थित काली मंदिर के आसपास हुई, जहाँ कलाकार साधारण कागज़ या कपड़े को पहले सफेद मिट्टी या चाक से तैयार करते थे। इसके बाद प्राकृतिक रंगोंकृजैसे हल्दी, नील, काजल और गेरूकृसे मोटी, स्पष्ट रेखाओं में देवी काली, धार्मिक कथाएँ तथा सामाजिक जीवन के दृश्य अंकित किए जाते थे। इन चित्रों में पृष्ठभूमि साधारण रखी जाती है ताकि विषय स्पष्ट रूप से उभर सके।

पटुआ पटचित्र लंबी कपड़े की पट्टियों पर बनाए जाते हैं, जिन्हें कलाकार कथा-क्रम में चित्रित करते हैं। सबसे पहले कपड़े को इमली के बीजों की गोंद और चाक-मिट्टी से चिकना किया जाता है। फिर प्राकृतिक रंगों से क्रमवार चित्र बनाए जाते हैं। पटुआ कलाकार चित्र दिखाते हुए गीत या कथा का गायन करते हैं, जिससे यह कला दृश्य और मौखिक परंपरा का संयुक्त रूप बन जाती है।

12)  कलमकारी एवं चेरियाल पटचित्र: आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना की पारंपरिक कथा चित्रकला

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रचलित कलमकारी और चेरियाल पटचित्र पारंपरिक लोककथा और धार्मिक कथाओं को चित्रित करने वाली कला परंपराएँ हैं। कलमकारी चित्र आमतौर पर कपड़े पर पतले तूलिकाओं और प्राकृतिक रंगों से बनाए जाते हैं। इसमें खाकी, नीला, लाल और हरा जैसे रंग प्रयोग होते हैं। कलमकारी में धार्मिक कथाएँ, विशेषकर रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला चित्रित की जाती हैं, और प्रत्येक आकृति को सजाने के लिए सूक्ष्म रेखाएँ और प्रतीकात्मक डिज़ाइन का उपयोग किया जाता है।

चेरियाल पटचित्र लंबी कपड़े की पट्टियों पर बनाई जाती हैं, जो कथात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। चित्र बनाने से पहले कपड़े को इमली के बीजों की गोंद और प्राकृतिक रंगों से तैयार किया जाता है। कलाकार क्रमवार कथा चित्रित करते हैं और इसे दर्शकों को कहानी सुनाते हुए प्रदर्शित करते हैं। इस कला में मोटे रंग, स्पष्ट रूपांकन और परंपरागत प्रतीक प्रमुख होते हैं।

 

निष्कर्ष

जनजातीय एवं लोक कला भारतीय सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। ये न केवल अतीत की स्मृति हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं। आवश्यक है कि इन कलाओं के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रोत्साहन हेतु शैक्षणिक, सामाजिक एवं सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास किए जाएँ।

 

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