Original Article
Folk arts of Malwa region
मालवांचल
की लोक कलाएं
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1 Associate Professor,
History, Government Maharani Laxmi Bai Girls Postgraduate College, Kila
Bhawan Indore, India |
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ABSTRACT |
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English: The history of the folk art of the Malwa region is ancient and rich. This area has been famous since ancient times as culture Centrals like Avanti, Ujjaini and Dhaar a beautiful blend of Aryan, trible and folk traditions can be seen here, the effect of which is visible on folk dance, music folk Drama and handicraft. From time to time, under the patronage of rulers like the Mauryas, Guptas, and Parmars, the folk art of Malwa developed. Through festivals like Holi, religious rituals, Chaturmas and social celebrations, these arts became an integral part of public life. Arts such as Maach Natya, Gair dance, and Malvi folk songs emerged as expressions of the folk mind. Malwa, a rich cultural region of Madhya Pradesh, where the folk arts reflect the life, festivals, and social consciousness of the people. Prominent folk arts of Malwa include folk dance, folk music, painting, crafts, and folk theatre. The people of Malwa are very lively and fond of festivals. Gair dance, Matki dance, and Bhunvari dance are famous dance styles here, especially presented during festivals and fairs. Folk music like Malvi songs, Faag, Aalha, and Garba express public sentiments in simple language. Folk painting and handicrafts are also the identity of Malwa. Clay and mud toys, bamboo and wood items, and colorful embroidery on clothes are the traditional arts here. Folk theatre (Swang) is especially famous, which is based on social, historical, and humorous themes. Hindi: मालवा
क्षेत्र की
लोक कला का
इतिहास
प्राचीन और
समृद्ध है।
यह क्षेत्र
प्राचीन काल
से ही अवंती,
उज्जैनी
और धार जैसे
सांस्कृतिक
केंद्रों के
रूप में
प्रसिद्ध
रहा है। यहाँ
आर्य, आदिवासी
और लोक
परंपराओं का
एक सुंदर
मिश्रण देखने
को मिलता है,
जिसका
प्रभाव लोक
नृत्य, संगीत,
लोक
नाटक और
हस्तशिल्प
में स्पष्ट
रूप से दिखाई
देता है।
समय-समय पर
मौर्य, गुप्त
और परमार
जैसे शासकों
के संरक्षण
में मालवा की
लोक कला का
विकास हुआ।
होली, धार्मिक
अनुष्ठानों,
चतुर्मास
और सामाजिक
समारोहों
जैसे त्योहारों
के माध्यम से
ये कलाएँ
जनजीवन का
अभिन्न अंग
बन गईं। माछ
नाट्य, गैर
नृत्य और
मालवी
लोकगीत जैसी
कलाएँ लोक भावों
की
अभिव्यक्ति
के रूप में
उभरीं।
मालवा, मध्य
प्रदेश का एक
समृद्ध
सांस्कृतिक
क्षेत्र है,
जहाँ
लोक कलाएँ
लोगों के
जीवन, त्योहारों
और सामाजिक
चेतना को
प्रतिबिंबित
करती हैं।
मालवा की
प्रमुख लोक
कलाओं में
लोक नृत्य,
लोक
संगीत, चित्रकला,
शिल्प
और लोक नाट्य
शामिल हैं।
मालवा के लोग
बहुत जीवंत
और
त्योहारों
के शौकीन
होते हैं। गैर
नृत्य, मटकी
नृत्य और
भुनवारी
नृत्य यहाँ
की प्रसिद्ध
नृत्य
शैलियाँ हैं,
जो
विशेष रूप से
त्योहारों
और मेलों के
दौरान प्रस्तुत
की जाती हैं।
मालवी गीत,
फाग,
आल्हा
और गरबा जैसे
लोक संगीत
सरल भाषा में
जनभावनाओं
को व्यक्त
करते हैं।
लोक
चित्रकला और
हस्तशिल्प
भी मालवा की
पहचान हैं।
मिट्टी और
कीचड़ के
खिलौने, बांस
और लकड़ी की
वस्तुएँ और
कपड़ों पर
रंगीन कढ़ाई
यहाँ की
पारंपरिक
कलाएँ हैं।
लोक रंगमंच
(स्वांग)
विशेष रूप से
प्रसिद्ध है,
जो
सामाजिक, ऐतिहासिक
और
हास्यपूर्ण
विषयों पर
आधारित है। Keywords: Folk Art, Maach Natya, Mandna, Faag, Handicraft and Dance, लोक कला, माच
नाट्य, मांडना, फाग, हस्तशिल्प
एवं नृत्य |
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प्रस्तावना
मालवा
क्षेत्र
मध्यप्रदेष
के पष्चिमी
भाग में स्थित
है। इसका नाम
मालवा पठार से
लिया गया है।
जो इस क्षेत्र
में स्थित है
जो विषाल
भू-भाग को कवर
करता है। इस क्षेत्र
के लोगों की
भौगोलिक
स्थितियों, जलवायु और
सामाजिक जीवन
पर सीधा
प्रभाव पडता है।
स्थानीय
लोगों ने
स्थानीय
परिस्थितियों
के अनुसार
समायोजन किया
और अपनी
संस्कृति, रीति -
रिवाज
और जीवन शैली
को विकसित किया।
इस क्षेत्र
में
ज्वालामुखी
विस्फोट और पठार
निर्माण के
कारण यहाँ हमें
काली मिट्टी
मिलती है
जिससे पानी को
लंबे समय तक
धारण करने की
अच्छी
गुणवत्ता
होती है और इस
प्रकार यह
सोयाबीन, गेहूं, अफीम और कृषि
उत्पादन में
सहायक होती है
मालवा एक संगम
बिंदु भी है।
जहां गुजरात, राजस्थान ,महाराष्ट्र
की संस्कृतियाँ
मिलती है।
ऐसा
माना जाता है
कि मालवा शब्द
प्राचीन आर्य जनजाति
मालवों से
लिया गया है।
अपने आदिवासी स्वभाव
के कारण वे
अपने घरेलू
सामान के साथ
एक स्थान से
दूसरे स्थान
पर आते- जाते
रहते थे। संस्कृत
भाषा में
मालवा का अर्थ
है ’’ देवी लक्ष्मी
का निवास ’’ जो
समृद्धि और
वैभव का
प्रतीक है। यह
क्षेत्र
सामाजिक
समृद्धि वाला
एक समृद्ध
क्षेत्र माना
जाता है।
व्यापारियों
ने यहां
व्यापारिक
केंद्र
स्थापित
कियें।
ऐतिहासिक
दृष्टि से
मालवा
क्षेत्र
प्राचीन अवंती
महाजनपद में
शामिल था। जिस
पर मौर्यवंश, परमार शासको दिल्ली
सल्तनत और
मालवा सल्तनत
आदि का शासन था।
मराठा होलकर
शासको ने इस
क्षेत्र को
नियंत्रित
किया। मालवा
मध्य प्रदेश
का हृदय स्थल
है।
सांस्कृतिक
साहित्यिक
सामाजिक तथा
प्राकृतिक
अनुकूल
वातावरण के
साथ ही लोक
संगीत और लोक
कलाएं भी
समृद्ध और
संपन्न रही।
चित्रकला हो
या वास्तुकला, संगीत, मालवी
-लोकगीत या
नृत्य आदि
आदिकाल से
हमारे देश में
यह श्रेष्ठतम
रूपों में
व्यक्त होते रहे
है।
वेदों
के स्वर पाठ
की परंपरा
उतनी ही
पुरानी है
जितना मानव
सभ्यता का
इतिहास, आदि देव शिव
स्वयं नृत्य
शिरोमणि रहे
और नटराज
कहलाएं।
सरस्वती तो
संगीत की देवी
के रूप में
पूज्या रही।
मनुष्य की
भावनाओं की
अभिव्यक्ति
का नाम कला
है। मालवांचल
की सभी कलाएं
जीव को बंधन
से मुक्त कर
परम शक्ति का
दर्शन कराती
है। मालवा की
लोक कलाएं
अत्यंत जीवंत
है।
मध्य
प्रदेश का
मालवांचल भी
ऐसा एक
क्षेत्र है, जहां की
लोक कलाएं
वहां के
सामाजिक, धार्मिक और
सांस्कृतिक
जीवन का संजीव
प्रतिबिंब
प्रस्तुत
करती है।
मालवांचल की
कलाओं में लोक
नृत्य, लोकगीत, लोकनाट्य, लोक
चित्रण, शिल्प कला और
हस्तकला का
विशेष स्थान
है। प्रमुख
लोक नृत्य में
गैर नृत्य
होली के अवसर
ढोल और मांदल
भी थाप पर गैर
नृत्य किया
जाता है। यह
नृत्य वीरता, उत्साह और
सामूहिकता का
प्रतीक है।
भवई
नृत्य: यह
संतुलन और
कौशल का
अद्भुत
उदाहरण है।
महिलाएं सिर
पर कई मटके
रखकर नृत्य
करती है।
मटकी
नृत्य: विवाह और
मांगलिक
अवसरों पर
महिलाओं
द्वारा किए
जाने वाला यह
नृत्य अत्यंत
आकर्षक होता है।
भील
जनजाति के
नृत्य: झाबुआ और
अलीराजपूर
क्षेत्र में
रहने वाली जनजाति
के नृत्य
भगोरिया, गवरी, तेरह
ताली नृत्य
अत्यन्त
लोकप्रिय है, जो
सामाजिक, एकता, प्रेम, उत्सव और
धार्मिक
आस्था को
अभिव्यक्त
करते हैं।
जीवंत
और प्रकृति से
उनके संबंध को
दर्शाती है।
लोकनाट्य और
लोकनाटिका की
परंपरा भी
अत्यंत
समृद्ध है। इन
नाटकों में
सामाजिक ,धार्मिक
और नैतिक
विषयों को सरल
भाषा में प्रस्तुत
किया जाता है
माच लोकनाट्य
में गीत, संवाद और
नृत्य का
सुंदर समन्वय
होता है। माच के
माध्यम से
सामाजिक
कुरीतियों, प्रेम
कथाओं और
ऐतिहासिक
घटनाओं को
प्रस्तुत
किया जाता है।
इस नाटक का
उद्देश्य
केवल मनोरंजन
ही नहीं, बल्कि समाज
को जागरूक
करना भी है।
यह प्रसिद्ध
नोट नाट्य है
जिसमें संगीत, संवाद और
अभिनय का
अद्भुत
समन्वय देखने
को मिलता है।
लोक चित्रण, कला, मांडना, गोदना, संजा (गोबर की
कला) मिट्टी
की कला, काष्ट कला, धातु की
कला, छापा
कला आदि है।
मांडना कला
अपने आप में
ही एक
प्रसिद्ध और
सुविख्यात
है। जिसे
कारीगर लाल
मिट्टी और
गोबर से बनाते
हैं।
स्वास्तिक और चैक
जैसे शुभ
ज्यामितिय
चिन्हों को
दर्शाते हुए
मांडना बनाते
हैं, जिन्हें
सफेद रंग से
बनाया और
सजाया जाता
है। यह
पारंपरिक तकनीकै
गोंड कला के
गहन सांस्कृतिक
और
आध्यात्मिक
महत्व को
उजागर करती
है।
लावणी
दक्षिणी
मालवा में लोक
संगीत का एक
व्यापक रूप से
प्रचलित रूप
है जिसे
मराठों द्वारा
इस क्षेत्र
में लाया गया
था। मालवांचल
के लोकगीत, ऋतु ,कृषि, विवाह, जन्म ,देवी
देवताओं और वीर
गाथाओं से
जुड़े होते हैं
जिनमें सरल
शब्दों के
माध्यम से
गहरी भावनाएं
व्यक्ति की
जाती है।
निमाड़ी और
मालवी लोकगीत
किसानों के
श्रम, स्त्रियों
की भावनाओं और
ग्रामीण जीवन
की सच्चाईयो
को उजागर करते
हैं। अलग अलग
अवसरों के
अनुसार
विभिन्न
प्रकार के
लोकगीत गाए
जाते है जैसे
विवाह और जन्म
संस्कारों में
मंगल गीत, त्योहारों
पर फाग तथा
गरबा गीत, वर्षा ऋतु
में कजरी और
सावन गीत तथा
धार्मिक अवसरों
पर भजन और
आरती। होली के
समय गाए जाने
वाले फाग
गीतों में
हास्य , व्यंग्य और
सामाजिक
चेतना का
समावेष होता
है। जबकि
विवाह गीतों में
पारिवारिक
प्रेम, लोकाचार
और सामाजिक
परम्पराओं की
झलक मिलती है।
इन लोक गीतों
की भाषा
स्थानीय बोली
से युक्त सरल
और भावप्रधान
होती है, जिससे ये गीत
सीधे
श्रोताओं के
हृदय को छुते
है।
आधुनिकता
और बदलती जीवन
षैली के
बावजूद मालवांचल
के लोकगीत आज
भी ग्रामीण
जीवन में
जीवित हैं।
सांस्कृतिक
आयोजनों लोक
उत्सवों तथा मंचीय
प्रस्तुतियों
के माध्यम से
नई पीढी तक पहुंच
रहे है। अतः
ये केवल लोक
गीत न होकर
अंचल की पहचान
है और भारतीय
लोक साहित्य
और संस्कृति
की अमूल्य
धरोकर भी है।
ये लोक गीत, संगीत
जनजीवन और
परम्पराओं का
सजीव दस्तावेज
है।
यहा
के हस्तषिप
जैसे मिट्टी
के खिलौने, लकडी की
नक्काषी, धातु षिल्प
और वस्त्र कला
ग्रामीण
कारीगरों की
रचनात्मकता
और कौषल को
दर्षाते है।
मालांचल के
पारम्परिक
आभूषण भी
हस्तषिल्प
कला का एक
महत्वपूर्ण
अंग है। हॅसली, कडे, पायजेब, नथ और कमरबंद
जैसे आभूषण न
केवल
सौन्दर्य की दृष्टि
से
महत्वपूर्ण
है,
बल्कि
सामाजिक
पहचान और
सांस्कृतिक
परम्पराओं से
भी जुडे हुए
है। मालवा का
हस्तषिल्प अतीत
की विरासत ही
नही है बल्कि
वर्तमान और
भविष्य के लिए
भी
आत्मनिर्भरता
और रचनात्मक
अभिव्यक्ति
का सषक्त
माध्यम भी है।
मिट्टी
षिल्प के
द्वारा भी
मिट्टी के बर्तन, खिलौने, सजावटी
वस्तुएं, दीये ,घडे, सुराही ,कुल्हड
एवं देवी
देवताओं की
मूर्तियां
आदि। ये
वस्तुएं न
केवल उपयोगी
होती है, बल्कि उनमें
लोक संस्कृति
की झलक भी
मिलती है।
धातु षिल्प और
लकडी पर
नक्काशी भी
मालवांचल की
हस्तशिल्प
परंपराओं को
विशेष पहचान
प्रदान करती
है। पीतल
कांसा और लोहे
से बने बर्तन, पूजा
सामग्री, दीपक
घंटियां
पारंपरिक रूप
से तैयार की
जाती है।
लकड़ी
पर की जाने
वाली नक्काशी
में दरवाजे, खिड़कियां, सजावटी
वस्तुओं
शामिल है।
ज्यामितिय, आकृतियां, पुष्प
रूपांकन और
लोक -प्रतीकों
का सुंदर
संयोजन दिखाई
देता है।
वस्त्र
शिल्प में
महेश्वर, उज्जैन, इंदौर ,धार जैसे
पारंपरिक
करघों पर बुने
जाने वाले वस्त्र
अपनी विशिष्ट
शैली के लिए
जाना जाते हैं।
इसके साथ ही
बंधेज, वाटिका
और हाथ से की
जाने वाली
कढ़ाई
मालवांचल के
वस्त्र कला को
जीवतं बनाती
है। वस्त्रों
की रंगाई में
प्राकृतिक
रंगों का
प्रयोग किए जाते
हैं जो
पर्यावरण के
प्रति लोक
जीवन की सजगता
को दर्शाते
हैं।
उपरोक्त
विवरण से
स्पष्ट है कि
मालवा की लोक
कलाओं का
इतिहास
अत्यंत
प्राचीन और
समृद्ध है।
समय-समय पर
मौर्य, गुप्त, परमार
शासको का
संरक्षण
मिलने से इन
कलाओं का सतत
विकास होता
रहा। धार्मिक
अनुष्ठानों, ऋतु
पर्वों और
सामाजिक
उत्सव के
माध्यम से कलाएं
जनजीवन का
अभिन्न अंग बन
गई। मालवांचल
समृद्ध,सांस्कृतिक
क्षेत्र होने
से लोक कलाएं
यहां के
जनजीवन
परंपराओं और
सामाजिक
चेतना हो दर्शाती
हैं।
वेदों
के सरस्वरपाठ
की परंपरा भी
उतनी पुरानी
है जितना मानव
सभ्यता का
इतिहास। भाषाई
एवं
सामुदायिक
सीमाओं से ऊपर
उठकर भारतीय
संस्कृति की
कलात्मक धारे
समस्त भारत को
एकता के सूत्र
में जोडती
रही।
मनुष्य
की भावनाओं की
अभिव्यक्ति
का नाम कला है।
कला का
संस्कृतिक
वैभव दिव्य और
आत्मापरक रहा
है। सभी कलाएं
जीव को बंधन
से मुक्त कर परमशांति
एवं परमानंद
का
विग्ददर्शन
कराती है।
इस
प्रकार
मालवांचल की
लोक कलाएं ऐतिहासिक
परंपराओं और
लोक जीवन से
जुड़कर विकसित हुई
और आज भी
क्षेत्र की
सांस्कृतिक
पहचान को जीवित
रखे हुए हैं।
कुल मिलाकर
मालवांचल की लोक
कलाएं केवल
मनोरंजन का
साधन ही नहीं
हैं, बल्कि
वे इस अंचल के
इतिहास, सामाजिक
संरचना और
सांस्कृतिक
विरासत को सहजने
का सशक्त
माध्यम है, जो
आधुनिकता के
प्रभाव के
बावजूद आज भी
अपनी मौलिक
पहचान बनाए
हुए है और लोक
संस्कृति को
समृद्ध करती
है।
REFERENCES
Bare S. L. (2024).
History of Malvanchal (मालवांचल
का इतिहास). M.P. Hindi Granth
Academic.
Dinkar, R. S.
(2016). Sanskriti ke Chaar Adhyay (संस्कृति
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Dubey, S. (2022).
Bhartiya Samaj (भारतीय
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