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ART BEAUTY OF TRIBALS

Original Article

Art beauty of tribals

आदिवासियों का कला सौन्दर्य

 

Sunita Jain 1*Icon

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1 Assistant Professor, History, Government Maharani Laxmi Bai Girls PG College, Kila Bhawan, Indore, India

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ABSTRACT

English: Art and its various forms are an essential element of Indian civilization and culture. India has been a highly artistic nation for centuries. Not only is its tradition of various art forms extremely ancient, but it is also extremely rich and aesthetically pleasing. Whether it is painting, architecture, music, or dance, these have been expressed in their finest forms in our country since ancient times. Humans have possessed a penchant for painting since the days of forest dwellers. Their contemporary cultural development began with painting. Primitive paintings in India have not been fully explored, but it must be acknowledged that the earliest paintings discovered in India trace their origins to the Neolithic era. The cultural richness of Indian art has been divine and subjective. Art has not been merely a means of entertainment for the tribal people; it creates beauty, a divine beauty that transcends the mind, contemplates the soul, and unites it with the divine. The entire life of the tribal people is based on the mercy of nature. Being inherently grateful, these forest dwellers express their gratitude to every element of nature in many forms. Green trees provide them with the greenery of life. Dark clouds quench the thirst of these forest dwellers by providing water. The sun, shining in the sky, ends their dark slumber in the morning. The moon soothes the heat of the forest dwellers with its cool rays. Rivers and streams provide vitality and inspire tribal people to move forward. The lush green earth preserves the moisture of the earth. Mother Earth satisfies their hunger by providing food, fruits, flowers, and other crops. Thus, all the tools and materials of nature benefit the forest tribes in some way or another. Consequently, these sons of nature have realized their eternal gratitude by establishing various gods and goddesses in the natural world. Art and beauty are eternal allies of each other. If art is away from beauty then it is dull, similarly if beauty is not artistic then it will not be called beautiful, in fact art and beauty are integral parts of the natural environment.

 

Hindi: कला और उसके अलग-अलग रूप भारतीय सभ्यता और संस्कृति का एक ज़रूरी हिस्सा हैं। भारत सदियों से बहुत कलात्मक देश रहा है। अलग-अलग कलाओं की इसकी परंपरा न सिर्फ़ बहुत पुरानी है, बल्कि यह बहुत समृद्ध और सुंदर भी है। चाहे वह पेंटिंग हो, आर्किटेक्चर हो, संगीत हो, या डांस हो, ये हमारे देश में पुराने समय से ही अपने सबसे अच्छे रूपों में दिखाई देते रहे हैं। इंसानों में पेंटिंग का शौक जंगल में रहने वालों के ज़माने से ही रहा है। उनका आज का सांस्कृतिक विकास पेंटिंग से ही शुरू हुआ। भारत में पुरानी पेंटिंग्स को पूरी तरह से खोजा नहीं गया है, लेकिन यह मानना ​​होगा कि भारत में मिली सबसे पुरानी पेंटिंग्स की शुरुआत नियोलिथिक युग से हुई है। भारतीय कला की सांस्कृतिक समृद्धि दिव्य और सब्जेक्टिव रही है। कला आदिवासी लोगों के लिए सिर्फ़ मनोरंजन का ज़रिया नहीं रही है, यह सुंदरता पैदा करती है, एक दिव्य सुंदरता जो मन से परे है, आत्मा पर विचार करती है, और उसे दिव्यता से मिलाती है। आदिवासी लोगों का पूरा जीवन प्रकृति की दया पर आधारित है। स्वाभाविक रूप से आभारी होने के कारण, ये जंगल में रहने वाले लोग प्रकृति के हर तत्व के प्रति कई रूपों में अपना आभार व्यक्त करते हैं। हरे-भरे पेड़ उन्हें जीवन की हरियाली देते हैं। काले बादल इन वनवासियों को पानी देकर उनकी प्यास बुझाते हैं। सुबह आसमान में चमकता सूरज उनकी गहरी नींद तोड़ता है। चाँद अपनी ठंडी किरणों से वनवासियों की गर्मी को शांत करता है। नदियाँ और नाले जीवन शक्ति देते हैं और आदिवासी लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। हरी-भरी धरती धरती की नमी को बचाकर रखती है। धरती माँ भोजन, फल, फूल और दूसरी फसलें देकर उनकी भूख मिटाती है। इस तरह, प्रकृति के सभी औजार और सामग्री किसी न किसी तरह से वनवासियों को फायदा पहुँचाते हैं। नतीजतन, प्रकृति के इन बेटों ने प्राकृतिक दुनिया में विभिन्न देवी-देवताओं की स्थापना करके अपनी शाश्वत कृतज्ञता को महसूस किया है। कला और सुंदरता एक दूसरे के शाश्वत साथी हैं। अगर कला सुंदरता से दूर है तो वह नीरस है, इसी तरह अगर सुंदरता कलात्मक नहीं है तो उसे सुंदर नहीं कहा जाएगा, वास्तव में कला और सुंदरता प्राकृतिक वातावरण के अभिन्न अंग हैं।

 

Keywords: Tribal, Art, Beauty, Cultural Development, आदिवासी, कला, सौंदर्य, सांस्कृतिक विकास

 


प्रस्तावना

भारतीय सभ्यता एंव संस्कृति का एक आवश्यक तत्व है, कला एवं इसके विभिन्न रूप। कला की दृष्टि से भारत सदियों से अत्यधिक सम्पन्न देश रहा है। न केवल कला के विभिन्न रूपों में यहाँ की परम्परा अत्यन्त प्राचीन रही है। वरन् यह अत्यधिक समृद्ध एवं सौन्दर्यप्रिय भी रही है। चित्रकला हो या वास्तुकला , संगीत हो अथवा नृत्य आदि काल से हमारे देश में यह श्रेष्ठतम रूपों में व्यक्त होते रहे है। वेदों के सस्वर पाठ की परम्परा उतनी ही पुरानी है जितना मानव सभ्यता का इतिहास। आदि देव शिव स्वयं नृत्य शिरोमणि रहे और नटराज कहलायें सरस्वती तो संगीत की देवी के रूप में पूज्या रही और वीणा उनका मुख्य वादन,भगवान कृष्ण स्वयं रास लीला करते रहे और बंसी की धुन पर सारे भारत को मदमस्त करते रहें। मानव में चित्रण की प्रवृत्ति उस समय से है, जब वह वनवासी था। उसके तत्कालीन सांस्कृतिक विकास का प्रारम्भ चित्रकला से ही हुआ। भारत में आदिम चि़त्रों की पूर्ण तौर पर खोज नही हुई। पर मानना इतना पडेगा कि भारत में प्राप्त आदिम चित्रकारियों का उद्गम नवपाषाण युग की चित्रकारियों से है। भारत में कला की पृष्ठ भूमि में सदैव एक दर्षन विद्यमान रहा है। कला मनुष्य को प्रकृति एवं ईष्वर से जोडने का एक माध्यम रही है। भारतीय कला का सांस्कृतिक वैभव दिव्य और आत्मपरक रहा है कला केवल आदिवासियों की मनोरंजन की वस्तु नही रही , वह सौन्दर्य की सृष्टि करती है, ऐसा सौन्दर्य जो दिव्य है, ऐसा सौन्दर्य जो मन से ऊपर उठकर आत्मतत्व का चिन्तन कर उसे परमात्म तत्व से एकाकर कराता है।

’’कला ही जीवन है और जीवन ही कला’’ कलाकार अपने जीवन में संसार से जो कछ भी प्राप्त करता अथवा सीखता है इसको साकार रूप देकर संसार के समक्ष रखता है। आदिवासियों का सारा जीवन प्रकृति की अनुकम्पा पर ही आधारित है। स्वभाव से कृतज्ञ होने के कारण ये वनवासी प्रकृति के प्रत्येक उपादान के प्रति अपनी कृतज्ञता अनेक रूपों में प्रकट रहते है। हरे वृक्ष इन्हें जीवन की हरीतिमा प्रदान करते है। कालें-कालें मेघ जल देकर इन अरण्यवासियों की प्यास बुझाते है, सूर्य आकाश में चमकदार इनकी अंधकारमयी नींद को प्रातः समाप्त करता है चन्द्रमा अपनी शितल किरणों से वनपुत्रों की उष्णता को षांत करता है।। सर-सरिताएॅ जीवन शक्ति देकर आदिवासियों को आगे बढने के लिए प्रेरित करती है, शस्य - ष्यामलाा धरती की आर्द्रता को सुरक्षित रखती है धरती मैया , अन्न-फल ,फूल आदि देकर इनकी भूख षांत कर अपने आस्तित्व को सफल बनाती है। पशु - पक्षी नृत्य - गान कला की षिक्षा देते है। ऊॅचे-ऊॅचे पर्वत इन गिरी -जनों के थके पैरों में नवोल्लास भरते है, ऊॅचाई से थिरक -थिरककर धरातल पर गिरने वालें झरने लोकजीवन- विशयक नयीं उमंगो को जन्म देते है एवं आंधी और तूफान वनवासियों कें नैराष्य को उत्थान में परिणत करते रहते है। इस प्रकार प्रकृति के समस्त उपकरण या उपादान किसी न किसी रूप में वन्य -जातियों को उपकृत करतें है। फलतः इन प्रकृति - पुत्रों ने प्राकृतिक संसार में विविध देवी - देवताओं की स्थापना कर अपने चिरन्तन आभार को साकार बनाया है। कला एवं सौन्दर्य एक - दूसरे के चिरन्तन सहयोगी है। कला यदि सौन्दर्य से दूर है तो वह नीरस है, इसी प्रकार सौन्दर्य कलात्मक न होने से मनोरम नही कहलायेगा वस्तुतः कला तथा सौन्दर्य प्राकृतिक परिवेश के अभिन्न उपकरण है। आदिवासी - जीवन की सुन्दरता प्रकृति की मनोहारिणी गोद में फलती-फूलती है। बस इसलिए जो मनोहारिणी छटा तथा अनुपम अंलकृति इस आदिवासी संस्कृति-सभ्यता में चिरपोषित और परिष्कृत हो रही है। वह अन्यत्र अनुपलब्ध है, प्राकृतिक सौरभ से सुरक्षित आदिवासी-व्यवहारिक सुशमा इतनी आकर्षक स्वाभाविक उदीप्त एवं सशक्त है कि अनायास लोक की सत्य गरिमा इसकी ओर उन्मुख हो जाती है। सत्यं -षिवम-सुन्दरम् की त्रिवेणी जब कला से सहज स्पर्ष प्राप्त करती है, तब इसकी (त्रिवेणी) अभिराम, अभिव्यक्ति बडी मार्मिक होती है। यह मार्मिकता आदिवासी कलात्मक सुन्दरता के उपयोगिता के गठबंधन से मानव कीं रागात्मक प्रवृृत्ति को अधिकाधिक जीवंत  बनाती है। कला के लिए यह सिद्धांत आदिवासी याचना से बाहर है। उपयोगिता एवं प्रयोगात्मकता वनवासी कला- सौन्दर्य की जीवित सांसे है। कला जब स्वयं आनंदप्रद है तो सौन्दर्य की सुखद अनुभूति कैसे भुलायी जा सकती है। दोनों का व्युत्पत्तिपरक अर्थ आंनद ही है।

’’कला की उत्पत्ति के विशय में चर्चा करते हुए कहा गया है की जब मानव अपनी आवष्यकता से आगे बढकर अंलकरण की प्रवृत्ति अपनाता है तभी कला का जन्म होता है इससे हमारी ज्ञानेन्द्रियों को तृप्ति तो मिलती ही हैं, साथ ही कर्मेन्द्रियों का कौशलपूर्ण नियोजन होता है प्रारम्भिक युग में अज्ञात शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए नाच- गाने की प्रतिष्ठा बढी उसमें भी हमें ललित कलाओं के उदगम के बीज मिलते है। इन कलाओं के उन्मेश के तीन विषेश कारण है-

1)     आदिम निवासियों की अदृष्य शक्ति कों प्रसन्न करने की भावना एंव बालकों को खेलने की स्वाभाविक प्रेरणा।

2)     लोकमंगल की प्रवृत्ति।

3)     आत्म दर्षन की इच्छा।

क्रोंचे के मतानुसार कला एक अखण्ड आत्मा अभिव्यक्ति है जिसे विभाजित नही किया जा सकता फिर भी व्यवहारिक दृष्टि से इसे तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

1)     उदार कलाएं: (उपयोगी कला) इनका उददेश्य मनुष्य की आवष्यकताओं की पूर्ति करना और उसके उपयोग के साधन बनाना है ये हमारे दैनिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है। यथा-बढई, लुहार, सुनार आदि के कार्य।

2)     आचार कलाएं: षिष्टाचार से सम्बंधित भावनाओं की अभिव्यक्ति करने वाली कलाएं इसके अन्तर्गत आती है।

3)     ललित कलाएं: उन मानवीय क्रियाओं को कहते है जो हमें सौन्दर्य भावना की ओर प्रेरित करती हुई कलात्मक सृजन का कारण बनती है पाष्चात्य दार्षनिक हींगेल ने ललित कला के पांच भेद मानें हैं- वास्तु, मूर्ति ,चित्र, संगीत और काव्य ’’

चित्रकला - आदिवासियों की चित्रकला में बाहृय आडम्वरों की पूर्ण उपेक्षा कीं गई है सुलभ साधनों से हीं यह चित्रकला आज तक जीवित है। परामुखापेक्षी न आदिवासी है और न ही इनकी विविध कलाएं। धार्मिक भावना की प्रमुखता सें समन्वित चित्रकला में भूत - प्रेतों की रक्षा अभिषापों से विमुक्ति पारिवारिक समृद्धि आदि का विषेश ध्यान रखा जाता है। वैवाहिक संस्कारों कें सम्पादन में जो चैक आदि पूरे जाते है उनमें भी देवी- देवताओं से यह प्रार्थना की जाती है कि वें दम्पति के जीवन कों सन्तानाभाव से कलुषित या अभिशप्त न करें। चुडेलों से ये वनवासी अधिक भयभीत रहते हैं। फलतः ये ऐंसे चित्र यथावसर अंकित करते है जो चुडेलों से रक्षा करते हैं। भित्ति चित्रों में मांगलिक अवसरों कों अधिक मधुर व आनंदमय बनाने के लिए गाय, बैल, मोर, सर्प  आम्रवृक्ष षेर आदि के चित्र चित्रित किए जाते है। इन चित्रों से अंलकृत दीवारें बडी मनोरम लगती है यह उल्लेख है की कृतज्ञता इस कला में सर्वोपरि हैं। गाय, बैल, मोर आदि वनवासियों कों विविध रूपों में उपकृत करते रहते है। अतः इन सबका ष्षुभ अवसरों पर स्मरण परमावष्यक माना जाता है।’’ आदिवासियों की कला कों धर्म ने एक अन्य अत्यंत मनोरंजक ढंग से प्रभावित किया है, जिसकें उदाहरण स्पष्ट हमें कोटापुर और गंजम के सावरा लोंगों द्वारा बनाए गए सुन्दर भित्ति- चित्रों में मिलते है। कल्पित लोक की  शक्ति और वास्तविकता के सम्बन्ध में इनकी कल्पना अत्यंत प्रबल है जहाँ पर इनका विचार है कीं इनके देवता भूत-प्रेत और इनके पूर्वजों की आत्माएं निवास करती है। ये अदृष्य आत्माएं मानव जीवन में निरन्तर व्याघात उपस्थित करती रहती है इसलिये नाना प्रकार की बलि देकर और इनकी अहं भावना को संतुष्ट करके इन्हें प्रसन्न करना अत्यन्त आवष्यक है। घर की दीवारों पर चित्र बनाना इनका इसी प्रकार का एक प्रयास है। ये चित्र मृतात्मा कें सम्मान में रोगों को दूर करने तथा खेतों में पैदावार बढाने की भावना सें और कुछ विषेश उत्सवों के अवसरों पर बनाये जाते है। इनका विचार है कि रोग और उर्वरता दोनों पर इन ष्षक्तियों का नियंत्रण होता है।’’

आभूशणों पर निर्मित चित्र, गुदना खातों की बुनाई, लकडी के उपकरणों पर षानदार नक्काषी मिट्टी के बर्तनों पर विविध रंगों की चित्रकारी वस्त्र आदि पर अंकित मनोरम चित्रकारी चित्रकला के विभिन्न रूप है । ये सब आदिवासी चित्रकला के बाहृय स्वरूप है। वास्तुकला के प्रति भी आदिवासियों कीं अभिरूचि दृष्टव्य है अपने निवास गृहों को ये इस प्रकार बनाते है की इनकी समस्त आवष्यकताएं पूर्ण तो हों ही जाती है। साथ ही साथ पषुओं के बांधने की भी पर्याप्त व्यवस्था रहती हैं। संगीत नृत्य आदि कलाएं आदिवासियों की उदान्त रूचि से ओझल नही हों सकी।  यह स्पष्ट है कीं इन आदिवासी कलाओं ने षास्त्रीय कलाओं को जनक के रूप में अभिव्यंजित किया है। ’’स्वाभिमानी आदिवासियों की युद्ध कला इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है यों तो ये बडे शांत तथा सुशासित है। लेकिन अनाचार को ये किसी भी रूप में सह नही सकतें। भयानक यौद्धो के लोमहर्षक विवरण आदिवासी गीतों में उपलब्ध है। महाराणा प्रताप के साथी ये ही वनवासी थें जिन्होंने अपने शस्त्रों से शत्रुओं के दांत खट्टे कर दिए थें। इस सम्बन्ध में डॉ. महादेव साहा द्वारा लिखित ’साम्राज्यवाद विरोधी संग्राम और आदिवासी षीर्षक पठनीय है।’’

आदि संस्कृति के जनक ये आदिवासी है जिन्होंने कला के शुद्ध स्वरूप को प्रस्तुत कर आदिमानव के उत्कर्ष को बहूरूपों में स्थापित किया गया। सौन्दर्यानुभूति अनुस्यूत आदिवासी कला अपने महत्व में गरिमामयी है। उसकी उपेक्षा अवांछनीय है। आज के प्रगतिषील युग में उसकी रक्षा कें पर्याप्त उपाए अपेक्षित है सुधार अवष्य हो लेकिन प्राचीन संस्कृति शव पर नही अपितु पुरातन सांस्कृतिक चेतना की अभिवृद्धि कें साथ नूतनता का स्वागत अभिलक्षित है, अभिनन्दनीय हैं।

 

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