Granthaalayah
BAIGA ARTIST - MANGALA BAI MARAWI

Original Article

Baiga artist - Mangala Bai Marawi

बैगा कलाकार - मंगला बाई मरावी

 

Sulekha Mehra 1*, Dr. Aparna Anil 2

1 Research Scholar, Government Sarojini Naidu Girls Postgraduate (Autonomous) College, Bhopal, India

2 Research Director, Government Sarojini Naidu Girls Postgraduate (Autonomous) College, Bhopal, India

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ABSTRACT

English: The arts of any place in the world are a reflection of its civilization, India is no exception. There are various types of arts and tribal arts in India which have developed along with the respective civilization. The arts of every state in India have their own originality. Different tribes reside in different states of India. According to research, more than 700 tribes are spread across India. For example, 'Sahariya tribe' lives mainly in Rajasthan, 'Korku tribe' lives mainly in Maharashtra, 'Santhal tribe' lives mainly in West Bengal and most of the tribes live in the state of Madhya Pradesh, among which Bhil, Gond and Baiga tribes are prominent.

 

Hindi: विश्व में किसी भी स्थान की कलाएं वहाँ की सभ्यता का स्वरूप होती है, भारत भी इसका अपवाद नहीं हैं। भारत में विभिन्न प्रकार की कलाएं व जनजातीय कलाएं हैं जो तत् सम्बंधी सभ्यता के साथ-साथ विकसित हुई हैं। भारत में हर एक प्रदेश की कलाएं अपनी मौलिकता लिए हुए हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। शोध के अनुसार लगभग 700 से अधिक जनजातियाँ भारत में फैली हुई है।  जैसे- ’सहरिया जनजाति’ भारत के मुख्यतः राजस्थान में ’कोरकू जनजाति’ मुख्यतः महाराष्ट्र में ’संथाल जनजाति’ मुख्यतः पश्चिम बंगाल में और अधिकतर जनजातियाँ भारत के मध्य प्रदेश राज्य में निवास करती है जिनमें भील, गोंड़ और बैगा जनजाति प्रमुख है।

 

Keywords: Arts, Sahariya, Koraku Tribe, Rajasthan

 


प्रस्तावना

विश्व में किसी भी स्थान की कलाएं वहाँ की सभ्यता का स्वरूप होती है, भारत भी इसका अपवाद नहीं हैं। भारत में विभिन्न प्रकार की कलाएं व जनजातीय कलाएं हैं जो तत् सम्बंधी सभ्यता के साथ-साथ विकसित हुई हैं। भारत में हर एक प्रदेश की कलाएं अपनी मौलिकता लिए हुए हैं। भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। शोध के अनुसार लगभग 700 से अधिक जनजातियाँ भारत में फैली हुई है।[1] जैसे- ’सहरिया जनजाति’ भारत के मुख्यतः राजस्थान में ’कोरकू जनजाति’ मुख्यतः महाराष्ट्र में ’संथाल जनजाति’ मुख्यतः पश्चिम बंगाल में और अधिकतर जनजातियाँ भारत के मध्य प्रदेश राज्य में निवास करती है जिनमें भील, गोंड़ और बैगा जनजाति प्रमुख है।

मैं अपना यह शोध पत्र बैगा जनजाति पर केंद्रित अध्ययन प्रस्तुत कर रही हूँ।

बैगा जनजाति मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों जैसे- मण्डला, डिण्डोरी, बालाघाट, सरगुजा, बिलासपुर, एवं अमरकंटक के पहाड़ी अंचलों में निवास करते हैं। बैगा अन्य जनजातियों के समान प्रकृति पुत्र हैं, जो वातावरण प्रभावित शारीरिक बनावट लिए हुए हैं। अधिकतर बैगाओं का रंग श्यामवर्णीय होता है। उनके शरीर के बनावट के अनुसार बैगाओं की नाक चैंड़ी होती है, ओंठ कुछ मोटे होते हैं, आँखे औसतन कम गोल व काली होती है एवं सम्पूर्ण शरीर की बनावट सुडोल होती है। बैगा आदिवासियों की वेशभूषा में सादगी हैं - पुरुष लंगोट या धोती, और सिर पर पगड़ी पहनते हैं। महिलाएं पारंपरिक रूप से घुटनों से ऊपर तक की धोती पहनती है अथवा ‘लुगड़ा’ (एक गुलाबी रंग का कपड़ा जो कमर से लपेटकर छाती के ऊपर से ले पाया जाता है।) पहनती है। पारंपरिक रूप से चोली का प्रायः अभाव रहता है किंतु वर्तमान समसामयिक आधुनिक प्रभाव के परिणाम स्वरूप पुरुष एवं स्त्रियों की वेशभूषा में काफी बदलाव देखा जा रहा है। स्त्री व पुरुष के बाल लंबे व घुंघराले होते हैं, उन्हें वह कौए की आकृति नुमा जूडा बांध कर रखते हैं।

बैगाओं का रहन सहन अत्यंत सादा होता हैं। पीने के लिए ’मद’ पेट भरने के लिए ‘पेच’ मिल जाए पर्याप्त हैं। यह कथन इनके सम्बंध में प्रचलित है।

बैगाओं का रहन सहन अत्यंत सादा है यद्यपि कलाओं के सम्बंध में अत्यंत समृद्ध हैं।

 

बैगा की कलाएं

बैगा जनजाति के लोग विभिन्न कलाओं में सिद्ध हस्त होते हैं, जैसे- गीत, नृत्य, भिति चित्रण, बॉस व लकड़ी पर नक्काशी एवं गोदना।

गीत: इस जनजाति के गीत विभिन्न सुअवसरों पर गाये जाते हैं जो इस प्रकार है-

करमा गीत: करमा गीत नई फसल के स्वागत और कर्म वृक्ष की पूजा करते समय गाया जाता हैं।

बिलमा गीत: विवाह एवं अन्य शुभ अवसरों पर गाया जाता है।

भड़ौनी गीत: भड़ौनी गीत नृत्य करते समय गाया जाता है।

परघौनी गीत: विवाह के दौरान गाया जाता हैं।

नंगाड़ा: संगीत और नृत्य का अभिन्न अंग है जो ढोल, टिमकी और वादययंत्रो का समूह है।

नृत्य: गीत की तरह इनके नृत्य भी विशेष शुभ अवसरों पर किए जाते हैं, जो इस प्रकार है-

करमा नृत्य: बैगा अपने ’कर्म’ को नृत्य-गीत के माध्यम से प्रस्तुत करते है इसी कारण इस नृत्य-गीत को करमा कहा जाता है। करमा नृत्य विजयदशमी के शुभ अवसरों पर किया जाता हैं। यह विजयदशमी से शुरू होकर बरसात के मौसम तक चलता है।[2]

झरपट नृत्य: यह करमा नृत्य का एक अंग हैं। इसमें पुरुष एवं महिलाएं अलग-अलग पंक्तियों में एक-दूसरे के सामने खडे़ होते हैं।[3]

रीना नृत्य: यह नृत्य केवल महिलाओं का नृत्य है। रीना नृत्य मंदार एवं टिमकी की ताल पर किया जाता हैं।

सैला नृत्य: सैला नृत्य को शरद पूर्णिमा की रात को युवा लड़के एवं लड़कियों के द्वारा किया जाता है।

बाँस व लकड़ी पर नक्काशी: बैगा जनजाति के लोग पहाड़ों व जंगलों में निवास करते हैं। प्रकृति से प्रेरित होकर जंगलों से प्राप्त होने वाले ’बाँस व लकड़ी’ पर प्राकृतिक दृश्यों लोक-पौराणिक कथाओं का ’चित्रण’ एवं ’नक्काशी’ किया करते है।

भिति चित्रण: बैगा नया मकान बनाते समय दीवारों पर मिटटी से ’नोहडोरा’ बनाते है नोहडोरा में घर की दीवारों पर मिट्टी से उभरे हुए स्वरूप और आलेखन बनाते हैं, जिसमें जनजातीय जीवन, देवी देवताओं और प्रकृति का चित्रण होता है। नोहडारा की कलाकार महिलाएं होती है।

 

गोदना

भारत में विभिन्न प्रकार की जनजातियाँ पायी जाती है और हर जनजाति में अलग-अलग प्रकार के ‘गोदना’ बनाए जाते हैं, जो उनकी पहचान निर्धारित करते हैं। बैगा जनजाति की पहचान उनके माथे पर बनाया गया गोदना ’चुल्हा’ द्वारा की जाती हैं। बैगा जनजाति में ’गोदना’ अधिकतर स्त्रियां बनाती अथवा बैगा महिलाएँ अपने पूरे शरीर पर ’गोदना’ गुदवाती है, जो 8 साल की उम्र से शुरू होकर उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर शरीर के अलग- अलग अंगों पर गुदवाये जाते हैं। ’गोदना’ करने वाली स्त्रियां ’बदनिन’ कहलाती है।

इस विधा में कलाकार तो अनेक है, परंतु मैंने अपने शोध पत्र के लिए ‘मंगला बाई मरावी’ को चुना।

 

मंगला बाई मरावी

मंगला बाई मरावी’ बैगा जनजाति के गोदना कलाकारों में से एक प्रमुख, गोदना कलाकार हैं, जो अनवरत गोदना पर कार्य कर रही है। वह अपनी परंपरा गोदना को कागज व केनवास पर बना कर उसे संरक्षित करती हैं व देश-विदेश में उसे प्रदर्शित कर स्वयं तो ख्याति प्राप्त कर ही रही है, साथ ही अपनी परंपरा, जनजाति, प्रदेश एवं भारत का नाम विश्व मानचित्र पर प्रकाशित कर रही हैं।

मंगला बाई का जन्म 1988 ई. को मध्य प्रदेश के डिण्डोरी जिले के लालपुर नामक गाँव मैं हुआ। इनके पिता का नाम ‘चमर सिंह मरावी’ एवं माता का नाम ‘शांति बाई मरावी’ हैं। शांति बाई मरावी स्वयं एक गोदना कलाकार के रूप में जानी जाती है। उन्हें भारत सरकार द्वारा ’देवी अहिल्या पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। मंगला बाई कुल चार बहिनें हैं मंगला बाई ने बहुत पहले ही सोच लिया था कि वह शादी नहीं करेंगी। इन्होंने अभी तक शादी नहीं की परंतु दो बच्चे गोद लिए हैं।[4]

मंगला बाई बचपन में अपनी माँ को गोदना बनाते हुए देखती एवं उनसे प्रभावित हो। छोटे-छोटे गोदना बनाया करती। अपनी उम्र के ‘सात वर्ष’ तक वह पूरे शरीर के गोदना बनाना सीख गई थी।              

गोदना’ बैगा जनजाति की एक परंपरा एवं सांस्कृतिक पहचान है, जिसे बैगा स्त्रियां स्वर्गिक अलंकरण मानती हैं और अपने पूरे शरीर पर गहनों की तरह धारण करती हैं। इनका मानना है कि गोदना जीवन पर्यन्त हमारे साथ रहता है एवं मरणोपरांत भी हमारे साथ आते हैं।

गोदना सिर्फ एक परंपरा एवं अलंकार नहीं बल्कि दर्द एवं बीमारी में प्रयोग किया जाने वाला उपचार भी हैं। मंगला बाई ने अपने साक्षात्कार में बताया कि गोदना से वह घेंघा, गठिया, जोड़ों के दर्द एवं मांसपेशियो की सूचन का उपचार करती हैं। इसके लिए वह अपनी गोदना की स्याही में जड़ी-बूटियों को मिलाती है।[5]  बैगा पुरुष सामान्यतः स्त्रियों की भांति गोदना नहीं करवाते, वे विरले ही कभी छोटी गोदना आकृतियाँ गुदवाते अथवा किसी दर्द के उपचार के लिए गोदना गुदवाते हैं। इनका मानना है कि गोदना करवाने से उन्हें शिकार करने में मुश्किल होगी। गोदना अनेक प्रकार के होते हैं व शरीर के अलग -अलग अंगो पर गोदे जाते हैं जैसें- कपाड़, पुखड़ा, पोरी, जांघ और छाती।

कपाड़ गोदाय- बैगाओं में सबसे पहला गोदना 8 साल की उम्र में कपाड़ (माथा) पर भूकुटी के बीच में ‘टिपकी, ‘खड़े व आड़े बेंडा’ गोदे जाते हैं। जिसे ‘व्ही आकार का चूल्हा’ कहा जाता है जिसका तात्पर्य घर, परिवार व समृद्धि से होता है।[6]     

 

पुखड़ा गोदाय: 15-16 वर्ष की उम्र मैं पुखड़ा (पीठ) गुदवायी जाती है। पीठ पर चकमक, टिपका, सांकल, मछली कांटा और बेंड़ा के गोदना मछली व कांटा आकृति मछली पकड़ने के पारंपरिक उपकरण से प्रेरित है, जो इनकी जीविका और दैनिक जीवन को दर्शाता है।

सॉकल: यह समुद्र की लहरों को दर्शाता है।

पोरी गोदाय: 18 वर्ष की उम्र में पोरी हाथद्ध गुदवाये जाते हैं। इसमें कोहनी से लेकर हाथ तक गुदवाया जाता है। इसमें मछली कांटा व झेला बनाए जाते हैं।

झेला- पौधों की जड़ों का प्रतीक हैं जो पूर्वजों और प्रकृति से मजबूत जुडाव को दर्शाता है।

 

 

जांघ गोदाय: बैगा जनजाति में जांघ को विवाह से पूर्व गुदवाया जाता है इसमें लंबे झेला, बैल की आँख, दीया, मछली कांटा व बेंड़ा आदि गोदे जाते है।

बैल की आंख- कृषि कार्यों, और रोजमर्रा की बैगा संस्कृति में पशु के महत्व को संदर्भित करता हैं।

दीया- प्रकाश व ऊर्जा को दर्शाता है।

 

छाती गोदाय: छाती विवाह के बाद गोदी जाती है। बैगा स्त्रियां अपने स्तनों को ’छोड़कर छाती पर टिपका, दौरा और मोरेला आदि गुदवाती है।

दौरा- एक टोकरीनुमा बर्तन को दर्शता है जो अनाज को अलग करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

मोरेला- तीन संकेंद्रित वृत्तों से युक्त मोर की आकृति।

इस प्रकार बैगा स्त्रियां अपने पूरे शरीर पर गोदना करवाती हैं बैगाओं के सम्बंध में यह कथन प्रचलन में है कि जिस स्त्री की देह पर जितने अधिक गोदना होते हैं वह उतनी अधिक धनी एवं सुंदर हैं। अधिक गोदना वाली स्त्री को उसके सुसराल में भी अधिक इज्जत दी जाती है। कम गोदना वाली स्त्री को निर्धन समझा जाता है।[7]

 

मंगला बाई की गोदना तकनीक

बैगा जनजाति में गोदना बनाने के लिए प्राकृतिक स्याही एवं सुई का प्रयोग किया जाता है। मंगला भी इसी तकनीक पर निर्भर हैं। मंगला बाई ने अपने साक्षात्कार में बताया कि वह स्याही बनाने के लिए रमतिला को अच्छे से कूटकर उसे मिट्टी के पात्र में भुना जाता है एवं उसके ऊपर एक और मिट्टी का पात्र (परोयी) ढककर रख दिया जाता हैं। कुछ समय पश्चात ऊपर वाले पात्र मैं रमतिला का धुंआ काजल बनकर जम जाता है, उस काजल को एकत्रित कर लिया जाता हैं। जब गोदना बनाया जाता है तब उस काजल में पानी मिलाकर स्याही बना ली जाती है।[8]

पारंपरिक तौर पर सुई बनाने के लिए यह राम बाँस का प्रयोग करते थे। जहाँ 15-20 बाँस की बनी हुई पतली-पतली सुईयों को एक साथ बांध कर एक बना लिया जाता था। इस एक सुई को पहले 4-6 महीने तक प्रयोग में लाया जाता था। किंतु आब बाजार में आसानी से उपलब्ध होने वाली आधुनिक स्टील धातु की सुई का प्रयोग किया जाता हैं।

गोदना बनाने के पूर्व जहाँ गोदना बनाना है उस स्थान को पानी द्वारा अच्छे से साफ कर लिया जाता है। फिर उस सई को स्याही में डुबोकर विभिन्न प्रकार के आलेखन आकृतियाँ (गोदना) बनाए जाते हैं। गोदना बनने के बाद उस जगह को गुनगुने पानी या गाय के गोबर से धोया जाता है। जिस सुई से गोदना बनाया जाता है उस सुई को गोदना बनवाने वाली स्त्री के सिर के चारों तरफ मंत्र पढ़कर घुमाया जाता है जिसे ’सुई उतारना’ कहा जाता है। इस प्रकार गोदना बनाने की प्रक्रिया को पूरा किया जाता हैं।

 

मंगला बाई के चित्र

मंगला बाई ने कागज व केनवास पर गोदना के साथ-साथ अब चित्रण कार्य भी शुरू किया हैं। इन्होंने अभी तक दो चित्र बनाए है, जो लगभग समान ही हैं। चित्र में तीन महिला आकृतियां है जिसमें बीच वाली आकृति के पूरे शरीर पर गोदना किया हुआ है। इसके दोनों तरफ की आकृतियों के चेहरे व शरीर पर गोदना न बनाकर, कलाकार ने इन महिलाओं की मांग में सिंदूर व माथे पर बिंदी लगाई है और गले में आभूषण पहने चित्रित किया है। यह चित्र एक खुशनुमा परिवार को दर्शाता है। इन मुखाकृतियों के नीचे कचनार वृक्ष बनाया गया है जो समृद्धि सम्पन्नता एवं खुशियों का प्रतीक है। यह चित्र कैनवास पर बना है मंगला बाई ने कैनवास पर आधुनिक रंगों का बहुत ही बारीकी एवं लयबद्ध तरीके से प्रयोग कर बैगा व गोंड जनजाति के समन्वय को दर्शाया हैं। यह पेंटिंग शुभ, सौभाग्य, वैभव और समृद्धि का प्रतीक है। वर्तमान में यह दोनों पेंटिंग जिसमें से पहली पेंटिंग रविन्द्र भवन, भोपाल में है एवं दूसरी पेंटिंग उनके सहायक अमित अर्जेल शर्मा के संग्रह में है।

 

मंगला बाई की विशेषताएं

मंगला बाई बचपन से हो गोदना बना रही है। जिसके कारण अब उन्हें किसी भी प्रकार के गोदना बनाने में कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। इनके गोदना कला की कुछ विशेषताएं इस प्रकार है-

1)     मंगला बाई अपनी परंपरा गोदना को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। मंगला के गोदना आकृतियों में चुल्हा, मछली काँटा, बैल की आँख, सांकल, चकमक, बेंडा, झेला, दीया, दौरा, मॉरेला आदि विशेष है। इनके सम्बन्ध में पूर्व में विस्तार से उल्लेख किया जा चुका है।

2)     इन्होंने गोदना को सिर्फ मानव शरीर पर ही नहीं बल्कि इसे कागव व कैनवास पर बनाया और उससे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।

3)     कैनवास पर इन्होंने गोदना के साथ-साथ चित्रण कार्य भी किया है। अपने चित्रों में मंगला ने पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, मानवाकृतिओं एवं जनजातीय कथाओं को अपना विषय बनाया।

4)     कैनवास पर गोदना अंकन में मंगला बाई तूलिका से ही सुई जैसी महीन एवं सीधी रेखा बनाने में सफल रहीं।

5)     उनकी शैली मैं प्राकृतिक लय और अलंकरणात्मक सौंदर्य साफ दिखाई देता है।

6)     अपने चित्रों के लिए उन्होंने आधुनिक रंगो को चुना जिनका प्रयोग यद्यपि सरल किन्तु पर्याप्त प्रभावशाली रहा है। इन रंगों से चित्रों में जीवंतता आ गई है।

7)     पारंपरिक लोककला को आधुनिक माध्यमों से जोड़ना उनकी कला की खास पहचान है।

संग्रह उपलब्धि एवं पुरस्कार

मंगला बाई जब 12 वर्ष की थी, तब वह पहली बार गोदना बनाने के लिए अपने गाँव से बाहर अपनी माँ के साथ जनजातीय संग्रहालय गई थी। वहाँ उन्होंने 30-40 दिन रहकर कार्य किया। इसके बाद मंगला बाई रुकी नहीं उन्हें निरंतर सरकारी व निजी कार्यक्रमों में अपनी कला प्रस्तुत करने के लिए बुलाया जाता रहा।

·        2001, 2002 में जब 13-14 वर्ष की थी, तब उन्हें मुल्ला रामोची संस्कृति भवन भोपाल से निमंत्रित किया गया। था, जहाँ उन्होंने कुछ दिन रहकर कार्य किया और अपनी कला से लोगों को आकर्षित किया।

·        2005-2007 में पुरातत्व संग्रहालय खजुराहों से बुलाया गया।

·        2007, 08, 09, में दक्षिण संस्कृति केंद्र नागपुर के द्वारा कोलकाता भेजा गया।

·        2007-2015 तक लगातार मानव संग्रहालय व भारत भवन भोपल में जाकर काम करती रही।

·        10 साल बाद 2025 में उन्हें वापिस मानव संग्रहालय भोपाल में निमंत्रित किया गया वहाँ उन्होंने 1-2 महीने रहकर कार्य किया।

2024 में मंगला बाई ने अपनी पहली विदेश यात्रा की वहाँ वे अपने सहायक अमित अर्जेल शर्मा के साथ गई थी। वहाँ ’चाउ चक विंग संग्रहालय’ सिड़नी में दो महीने रहकर उन्होंने 15 फुट कैनवास पर गोदना बनाए और उन्हें वहाँ प्रदर्शित किया गया। इससे पहले भी मंगला बाई का काम विदेश जाता रहा परंतु सिडनी में उन्होंने स्वयं जाकर कार्य किया।

मंगला बाई को अपने कला क्षेत्र में योगदान हेतु ‘पुरुष्कृत’ भी किया गया।

2025 में लेख सिटी विश्वविद्यालय भोपाल में उन्हें ’कला संरक्षण’ पुरस्कार प्रदान किया गया।

2025 में उन्हें दिल्ली में ’महिला युवा सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

 

उपसंहार

बैगा जनजाति के लोग गोदना को पहले संचार के रूप में प्रयोग करते थे, लेकिन आधुनिक संचार माध्यमों के प्रभाव से परंपरागत संचार की इस विधा (गोदना) का आकर्षण नव युवक-युवतियों पर कम हो गया है।

मंगला बाई मरावी अपनी इस परंपरा को जीवित रखने का निरंतर प्रयास कर रही है। वह अपनी इस कला को नव युवक-युवती को भी सिखा रही है। जिससे उनकी यह परंपरा उनके बाद आने वाली पीढ़ियो में भी बनी रहे।

  

ACKNOWLEDGMENTS

None.

 

REFERENCES

Deshpande, M. (2016). A Sociological Study of the Baiga Tribe (बैगा जनजाति का समाजशास्त्रीय अध्ययन. बालाघाट जिले के संदर्भ में).

https://ijrrssonline.in

https://www.Jagranjosh.com

Nirgune, V. (2010). Academy of Tribal Folk Art and Tulsi Literature आदिवासी लोककला एवं तुलसी साहित्य अकादमी), 176.

Rathudiya, B., and Vasant, N. (2013). Baiga Geet (Occasional Traditional Songs). Academy of Tribal Folk Art and Dialect Development (बैगा गीत (अवसरानुकूल पारंपरिक गीत), आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय), Madhya Pradesh Culture Council, Madhya Pradesh Tribal Museum. 78.

Tiwari, K. K. (2019). Tattoo Traditions of the Baiga Tribe (बैगा जनजाति की गोदना परंपराए). uunramajpatanvatha, 838.

Tripathi, S., Bansal, S., and Choudhary, P. (2024). Madhya Pradesh general knowledge. McGraw Hill Education (India) Private Limited.



[1] https://www.Jagranjosh.com

[2] https://ijrrssonline.in

[3] Tripathi Snehil, Bansal Sonali, Choudhary Pavan, Madhya Pradesh General Knowledge, Mcgraw Hill Education (India) Private Limited, 2024, P-4.16

[4] मंगला बाई से साक्षात्कार

[5] मंगला बाई से साक्षात्कार

[6] निरगुणे, वसन्त, सम्पदा डॉ. कपिल तिवारी, आदिवासी लोककला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, 2010, P-176

[7] निरगुणे, वसन्त, सम्पदा डॉ. कपिल तिवारी, आदिवासी लोककला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, 2010, P-176

[8] मंगला बाई से साक्षात्कार

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