Granthaalayah
TRIBAL ARTS OF MALWA REGION

Original Article

Tribal Arts of Malwa region

मालवांचल की जनजातीय कलाएं

 

Sandhya Nirvel 1*Icon

Description automatically generated, Dr. Prerna Thakur 2

1 PhD Research Scholar (History), School of Social Sciences, Devi Ahilya University, Indore, Madhya Pradesh, India

2 Professor (History), Maharani Lakshmibai Government Girls Post Graduate College, Devi Ahilya University, Indore, Madhya Pradesh, India

 

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ABSTRACT

English: The Indian landscape is a confluence of many cultures, home to numerous classes, groups, and castes, each with its own distinct identity and traditions. India is divided into various social and cultural regions. Within these differences lies a society that, far removed from modernity, remains rooted in its ancient culture and lives its life in accordance with it. The western part of Madhya Pradesh, located in the center of India, is known as Malwa region, encompassing the districts of Indore, Dhar, Ratlam, Ujjain, Dewas, Mandsaur, Shajapur, Sehore, Agar-Malwa, and Jhabua. This region is surrounded by the Vindhya and Satpura mountains. Several tribes, including the Gond, Bhil, Korku, and Saharia, reside here. Malwa region preserves a rich folk tradition, characterized by tribal arts. The arts of these tribes are based on oral traditions, tattooing, and woodcraft. They have a distinct culture, rules, and systems, based on their religious beliefs, faith, and worship. These tribes consider nature and their ancestors to be superior. Their lives are artistically rich, expressing themselves through artistic forms. Their art, though simple, is vibrant and impressive. These tribal communities perform various arts on various auspicious occasions and festivals.

The tribal arts of the Malwa region reflect the rich cultural heritage of the tribes living in the region. These arts are inspired by nature, religious rituals, agriculture, and festivals, and are created using natural colors—ochre, cow dung, chalk, turmeric, clay—and local materials such as bamboo and metal. Tribal culture is reflected in various rituals. Their aesthetic sense of life is reflected in their paintings, dances, songs, and crafts. The images and colors seen in their art are deeply connected to their love for nature. Art is an essential part of their lives. In this research paper, the arts of the tribes living especially in Malwa region have been described.

 

Hindi: भारतीय भू-भाग पर कई संस्कृतियों का संगम है, जहाँ अनेक वर्ग, समूह, जातियां निवास करती है। इनकी अपनी अलग विशेष पहचान तथा परम्पराएं है।  भारत सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विभिन्न भागो में विभाजित है, इन्हीं विभिन्नताओं में एक ऐसा समाज भी स्थित है, जो आधुनिकता से दूर आज भी अपनी प्राचीन संस्कृति के साथ जुड़े हुए है तथा उसके अनुसार ही अपना जीवन यापन करते है। भारत देश के मध्य में स्थित मध्य प्रदेश का पश्चिम भाग मालवांचल के नाम से जाना जाता है, जिसके अंतर्गत इंदौर, धार, रतलाम, उज्जैन, देवास, मंदसौर, शाजापुर, सीहोर, आगर-मालवा, झाबुआ आदि जिले सम्मिलित है यह क्षेत्र विंध्य तथा सतपुड़ा पर्वतो से घिरा हुआ है। यहाँ गोंड, भील, कोरकू, सहरिया, जैसी कई जनजातियां निवास करती है। मालवांचल जनजातीय कलाओं से समृद्ध लोकपरम्पराओं को संजोये हुए है। इन जनजातियों की कलाएं मौखिक परम्पराओं, गोदना और लकड़ी शिल्प पर आधारित है। इनकी अलग संस्कृति, नियम, व्यवस्थाएं होती है, जिनका आधार उनकी धार्मिक आस्था, विश्वास, उपासना होती है। ये जनजातियां प्रकृति तथा अपने पूर्वजों को उच्चतर मानते है। इनका जीवन कलात्मक पूर्ण होता है। ये अपनी अभिव्यक्ति को कलात्मक रूप में व्यक्त करते है।  इनकी कलाएं साधारण होने के बावजूद जिवंत तथा प्रभावशाली होती है। ये जनजातीय समाज विभिन्न मांगलिक अवसरों व् उत्सवों पर विभिन्न कलाओ का प्रदर्शन करते है।

मालवा क्षेत्र की जनजातीय कलाएं उसके क्षेत्र में रहने वाली जनजातियों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं। ये कलाएं प्रकृति, धार्मिक अनुष्ठान, कृषि एवं उत्सवों से प्रेरित होती है, जो प्राकृतिक रंग- गेरू, गोबर, चाक, हल्दी, मिट्टी एवं स्थानीय सामाग्री जैसे-बाँस, धातु से निर्मित होती हैं। जनजाति संस्कृति के दर्शन हमें विभिन्न अनुष्ठानों में दिखाई देता है। इनके जीवन का सौंदर्य बोध इनके चित्रों, नृत्य, गीत, शिल्प कला में परिलक्षित होता है। इनकी कलाओं में दिखाई देने वाले चित्र तथा रंगों से इनका प्रकृति प्रेम का गहरा संबंध होता हैं। कला इनके जीवन एक अनिवार्य अंग होता है।

इस शोध पत्र में विशेष रूप से मालवांचल में रहने वाली जनजातियों की कलाओ का वर्णन किया गया है।

 

Keywords: Bhil, Gond, Korku, Tribes, Nature, Culture, Art, Paintings, Colours, भील, गोंड, कोरकू, जनजातियां, प्रकृति, संस्कृति, कला, चित्र, रंग

 


प्रस्तावना

मध्य प्रदेश का डग-डग रोटी, पग-पग नीर वाला मालवांचल क्षेत्र जो उर्वर भूमि, अप्रतिम हरियाली, प्राक्रतिक सुषमा तथा विपुल धन-धान्य से परिपूर्ण है। यह क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध हैं। अपनी अलग लोक संस्कृति, परम्पराओं के कारण मालवांचल की अपनी विशेष पहचान हैं।Tiwari (2014) यह मध्यप्रदेश के पश्चिम में स्थित हैं। जिसमें एक विशाल भूभाग समाहित है। मालवा गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की संस्कृतियों का संगम स्थल है। मालवा शब्द प्राचीन आर्य जनजाति मालव से संबंधित हैं। यहाँ की परम्पराओं में सम्पूर्ण भारत का प्रभाव दिखाई पड़ता है साथ ही सम्पूर्ण भारत पर मालवा का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है। प्राचीन समय में भी मालवा भारत के उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक के मार्ग का चैराहा था। इस कारण भी मालवा सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा हैं।Rajpurohit (2004)

संगीत, नृत्य एवं कला प्राचीन काल से मानव की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम रही है क्योंकि प्राचीन समय में जब सुदृढ़ भाषा व लिपि का विकास नहीं हुआ था तब नृत्य ही मानव के भावों को व्यक्त करने का माध्यम थे।Ninama (2022)

 

भील जनजाति का परिचय

भील जनजाति मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति हैं। इनकी समृद्ध संस्कृति है, जो उनके रीति-रिवाज, गीत, नृत्य, देवी - देवताओं, टैटू, मिथक भील लोक कथाओं में दिखाई पड़ती है। भीलों में चित्रकला अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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भील जनजातीय संगीत, नृत्य

वर्तमान में आधुनिकीकरण में भी भील समुदाय में लोक नृत्य इस तरह से समाहित है, कि सामान्य लोग भी इससे आनंदित हो उठते हैं। भीलों में मुख्य रूप से गवरी नृत्य, गैर नृत्य, विवाह नृत्य, होली नृत्य, नेजा नृत्य, ठेगना नृत्य तथा शिकार एवं भैरव नृत्य प्रचलित हैं। भील जनजाति प्रचलित नृत्यों में सुरताल देशी वाघ यंत्रों का प्रयोग अधिक किया जाता है। इसके अतिरिक्त ढोलक, नगाड़ा, तम्बूरा, रावण- हत्था, बाकिया, इकतारा एवं तुरई का प्रयोग किया जा सकता है।Ninama (2022)

 

भील चित्रकला : भील जनजाति के लोग शरीर पर गुदना गुदवाते हैं इसका उद्देश्य मात्र शरीर अलंकृत करना नहीं बल्कि प्रतीकात्मक रेखाओं के माध्यम से अन्वेषित अर्थों को कई पीढ़ियों तथा सदियों से अपने शरीर पर सुरक्षित रखना है। गुदना चित्र मृत्यु के साथ मात्र यह चित्र ही होते है। भील जनजाति की चित्रकला में पिथौरा कला प्रमुख है जिसमें मिथकीय घोड़े के चित्र बनाये जाते है, घोड़े के चित्र को देवताओं को अर्पित किया जाता है। Lok Rang Srishti (1992) भील चित्रकला जनजाति की कलात्मक और कल्पनाशील कृतियाँ होती है, जिन्हें भारत की सबसे प्राचीन आदिवासी कला माना जाता है। भील मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर रहते हैं। इनके लोकगीत, अनुष्ठान, टेटू और गीत उनकी कला के केन्द्र होते है। उनके चित्रों में बदलते मौसम, कटाई के दौरान खेतों के परिदृश्य और देवताओं के अनुष्ठानों को दर्शाया जाता है। भील कला पर प्रकृति का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

भील चित्रकला का उपयोग पारंपरिक रूप से घरों के संवारने में किया जाता है। ये जनजाति प्रत्येक वर्ष अपने घरों को मिट्टी के प्लास्टर से तैयार करती है। उनके दीवारों और फर्श पर पौराणिक कहानियों और प्रकृति से चित्रों को चित्रित करते हैं। भील जनजाति अपने घर, धार्मिक स्थल तथा मंदिरों की दीवारों को पारंपरिक कला के स्वरूप में सजाते हैं। मिट्टी की दीवारों पर कलात्मक चित्र और पेंटिंग बनाने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। ये रंग फूल तथा पत्तियों द्वारा तैयार किए जाते है तथा रंग भरने के लिए नीम की टहनियों का उपयोग ब्रश के रूप में किया जाता है। परम्परागत रूप से रंग भरने के लिए ये लोग अपने दाहिने हाथ की मध्यमा (अनामिका) ऊंगली का उपयोग करते है। कोशिकाओं से कार्बन का काला रंग बनाया जाता हैं, हल्दी से पीला रंग बनाया जाता था, नीले तथा बैंगनी रंग के लिए ब्लैक बेरी का तथा सफेद रंग के लिए चूने का उपयोग किया जाता है। इन सभी रंगों की सामाग्री प्रकृति से प्राप्त होती है। इन कच्चे माल को पाउडर के रूप में पीसकर गर्म पानी में मिलाकर पेस्ट बनाया जाता हैं। पेंट बनाने के लिये चावल के पाउडर को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाया जाता हैं। वर्तमान में भील जनजाति की युवा पीढ़ी पेंटिंग बनाने में ऐक्रेलिक या सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल करती है। तथा रूपरेखा के लिए पेन्सिल का इस्तेमाल भी किया जाने लगा है।

चित्र 2

 

 

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भगोरिया मेला: भगोरिया मेला भील जनजाति का प्रमुख मेला है जो मध्यप्रदेश के भील जनजाति बहुल क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। इस मेले में भील जनजाति के कुंवारे लड़के व लडकियाँ शामिल होते हैं। इस मेले में भावी वर- वधु के रिश्ते तय किये जाते हैं।

भील कलाकार:  अनिता बारिया, भूरीबाई (पटोला), भूरीबाई (सेर), गंगूबाई, लाडोबाई, जोरसिंह, रमेश सिंह करटारिया, शेर सिंह, सुभाष भील, भीमा पारगी, चम्पा पारगी तथा प्रेमी आदि कलाकारों ने चित्र परम्परा को सहेजा है। इन कलाकारों ने मध्यप्रदेश की भील कला को उन्नति की राह दिखाई तथा आदिवासी कला को विश्व नक्शे में स्थान दिलाने का प्रयास किया।

 

 

गोंड जनजाति का परिचय

गोंड जनजाति मध्यप्रदेश की दूसरी बड़ी जनजाति है, गोंड जैविक रूप से प्रकृति प्रिय होते हैं। इनके देव भी प्रकृति संबंधित होते है। इनका विश्वास अलौकिक शक्ति में अधिक होता है। इनके गीत, नृत्य रूप, पौराणिक गाथाएं, किंवदंतियां, लोककथाएं, रीतिरिवाज तथा धार्मिक कार्य प्रकृति के साथ घनिष्ठ संबंध परिलक्षित करते है। गोंड समुदाय अपने गीतों, त्योहारों, रीति-रिवाजों के माध्यम से अपनी संस्कृति से जुड़े हुए हैं।

चित्र 4

 

गोंड नृत्य : इनके प्रमुख नृत्य कर्म (करमा) नृत्य, सईला, रीना तथा दादरिया नृत्य, सुआ नृत्य रूप हैं, जिन्हें स्वांग, गम्मत या तमाशा कहा जाता हैं। इन नृत्यों में गुटूग, टिमकी, नगाड़ा जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग करते है। गोंड समुदाय कहानियों, मुहावरों, पहेलियों तथा संगीत के भी बहुत शौकीन हैं। गोंड जनजाति में बीदारी पूजा, हरदिली, नवाखानी, जवारा, मदई, छेरता, बकबधी आदि अलग- अलग ऋतु से जुड़े त्यौहार मनाये जाते हैं। आदिवासी समुदाय अपने घरों का निर्माण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामाग्रियों का उपयोग करके बनाए जाते हैं वे प्रकृति प्रेमी होते हैं, पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

गोंड कला: गोंड कला आदिवासी लोक जीवन से संबंधित होती हैं, ये अपने अनोखे कलात्मक सौन्दर्य के लिए जाना जाती हैं। ये लोग कला के पुजारी होते है, जो आदिवासी लोक जीवन और उनके सांस्कृतिक परिवेश को अलग-अलग रूप में ओजस्वी रंगों में रंगकर अभिव्यक्त करते हैं।Tiwari (2006) इन रूपों में बहुत रचनात्मकता होती हैं। गोंड समाज में स्थानीय नृत्य, लोकगीत, लोक संगीत, स्थापत्य, मूर्ति एवं परम्परागत कथाओं का वाचन की परम्परा तथा जीवन उपयोगी वस्तुओं के निर्माण की कला को भी देखा जा सकता है। इनके घर के फर्श, दीवारों, दरवाजों, खिड़की पर नक्काशी व कला के अदभुत नमूने दिखाई देते हैं, जो उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक स्वरूप एवं प्रकृति से प्रेम को दर्शाते हैं। परम्परागत रूप से गोंड समाज में पारम्परिक गीत, नृत्य और कला का नाम प्रमुख है।

चित्र 5    

                

 

गोंड लोग धर्म, संस्कृति और प्रकृति तथा पारम्परिक चित्र को जीवन का प्रमुख अंग मानते है। गोंड परम्परा में दिवारों पर चित्र बनाए जाते जिसे ’चिन्हा बाना’ कहते है। घर के धरातल को ज्यामितीय नमूनों द्वारा सजाया जाता है, जिसे दिग्ना कहा जाता है।Karcham (2017)

गोंड लोग घरों को विवाह तथा त्योहारों में डिगना तथा भित्ति चित्र से सजाते हैं। वे घरों की दीवारों को बाहर तथा भीतर डिगना से रंगते है इन भित्ति चित्र में पशुओं, पक्षियों, फूलों की रचना की जाती हैं। गोंड कला में रंगों के लिए वनस्पति, खनिज रंजकों जैसे पुष्प, पत्तियां, चिकनी मिट्टी, पत्थर, चावल, हल्दी का प्रयोग करते है। ब्रश के रूप में हस्तनिर्मित नीम या बबूल के पेड़ की टहनी के प्रयोग द्वारा बनाया जाता है।

गुदना: गोंड जनजाति की रचनात्मक अभिव्यक्ति में गुदना भी शामिल हैं जिसमें सूर्य, चंद्र तथा विभिन्न तत्वों के चित्र शरीर पर बनाए जाते हैं। जो उनके परलोक में विश्वास को दर्शाता हैं।

गोंड कलाकार: गोंड कला के प्रसिद्ध कलाकार जगढ़ सिंह श्याम कागज तथा कैनवास के प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। उनके चित्रों से भारत भवन के गुम्बदो में से एक गुम्बद के सजाया गया। उन्होंने राज्य की विधानसभा की एक दीवार विशाल एयरक्राफ्ट बनाया तथा उनके द्वारा भोपाल के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय म्युजियम में नर्मदा की चिकनी मिट्टी से बनी नक्काशी देखी जा सकती हैं। पेरिस में सन् 1989 में एक प्रदर्शिनी धरा के जादूगर ’मेजिश्यन ऑफ द अर्थ’ के नाम से आयोजित की गयी, जिसमें उनके चित्रों को बहुत सराहना मिली थी। यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली गोंड कला के लिए प्रथम प्रदर्शनी थी। इसमें विश्व के बहुत से विशेषज्ञों को अपनी ओर आकर्षित किया।Das (2017)   

 

अन्य गोंड कलाकार

आनंद सिंह श्याम, भज्जू श्याम, बीरबल सिंह उइकी, छोटी टेकम, धनइया बाई, दिलीप श्याम, दुर्गा बाई, गरीबा सिंह टेकम, हरगोविंद सिंह उरवेटी, हरिलाल ध्रूवे, इंदुबाई मरावी, जापानी, ज्योति बाई उइकी, कला बाई, मन्ना सिंह व्याम, मानसिंह व्याम, मोहन सिंह श्याम, प्रसाद कुसराम, प्रेमी बाई, प्यारेलाल व्याम, राधा टेकम, राज कुमार श्याम, राजन सिंह उइकी, राजन प्रसाद कुसराम, रजनी व्याम, राजेंद्र सिंह श्याम, रामबाई टेकम।

 

कोरकू जनजाति का परिचय

यह अत्यंत प्राचीन जनजाति हैं, कोरकू जनजाति अपनी प्राचीन संस्कृति, लोक कलाएं, परम्पराएँ, उनके लोक उपचार व देशज के लिए जानी जाती है, जो इनकी मौखिक रूप से इनके धार्मिक विश्वासों, रीतिरिवाज, प्रथाओं में भी परिलक्षित होता है।Jaiswal (2023)

चित्र 6

 

कोरकू जनजाति की लोक कलाएं : कोरकू जनजाति की लोक कलाओ में उनके नृत्य, परम्पराएँ, लोकगीत शामिल है, जो विभिन्न ऋतुओं के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

कोरकू नृत्य : कोरकू जनजाति में झूला, डंडा, होशियार, गोल, खम्बा, खड़ा, गडाली, चाचारी, टिमकी, होरोरिया, चिल्लूडी नृत्य जो भिन्न भिन्न ऋतु/अवसर पर किये जाते हैं। कोरकू परम्परा में नृत्य और संगीत महत्वपूर्ण स्थान रखते है। नृत्य तथा संगीत में कई संगीत वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है जैसे- ढोल, मृदंग, ढोलक, ढप या घेरा, खंजरी, झांझ, टोंक्या, किंगारी, तुमड़ी, टिमकी, डमरू, सिंधी, चंग, एकतारा, चितकोरा, टूटड़ी, घुंघरू पर्व आदि इनके माध्यम से आसानी से नृत्य किया जाता हैं।

 

 

 

कोरकू गीत

·        बुसारा सिरिंज - उषा काल पूजा के गीत

·        झूड़ी सिरिंज - झोली गीत या लोरी

·        चिलोरी सिरिंज - किशोर वय की बालिकाओं का नृत्य गीत

·        चिटकोरा सिरिज- चिटकोरा नामक वाद यंत्र के साथ गाया जाने वाला गीत

·        ढांडल सिरिंज - पुरुषों हारा किये जाने वाले नृत्य के गीत

·        डोलार सिरिंज - सावन के झूलों के गीत

·        चाचरी सिरिंज सिरिंज - होली के पश्चात गाया जाने वाला नृत्य गीत

·        फगनई सिरिंज - फाग के गीत

·        हूड़ी सिरिंज - होली गीत

·        झमटा सिरिंज - होली के बाद गायें जाने वाले फाग गीत

·        होरोरिया सिरिंज - पुरुषों दारा फागुन से चेत तक किया जाने वाला नृत्य गीत

·        खम सिरिंज - खम्म गममत के गीत

·        लेंगी सिरिंज - डंडा नृत्य के पहले गाये जाने वाले गीत

·        चेटो सिरिंज - चैत माह में गाये जाने वाले गीत

·        जेठ सिरिंज- जेठ माह में गाये जाने वाले गीत

·        जाटी सिरिंज - घट्टी पीसने के गाये जाने वाले गीत

·        हलूर सिरिंज - दल के पीछे काम करते हुए गाया

·        गमनाय सिरिंज - मेंढक के गीत जो पानी के आहृवान हेतु बच्चों द्वारा

ढोलारा सिरिंज (सावन के गीत), जतरा गीत (मेले का गीत), गरबो पूजा सिरिंज (गर्भवती माँ के लिए प्रार्थना गीत), बियाओ सिरिंज (शादी के समय गाये जाने वाले गीत), हारोरा सिरिंज (उत्सव के गीत) कोरकुओं द्वारा गाये जाने वाले गीत है। इन गीतों को सामूहिक रूप से ही गाया जाते है।Pare (2010)

कोरकू घर : कोरकू लोग घरों को दो पंक्तियों में आमने-सामने बने होते हैं। घर के सामने ओटले (चबूतरे) को गेरू, चूने, पीली मिट्टी से कलाकृतियां बनाई जाती हैं। दिवाली की रात ग्वाले (थात्या) परिवार की महिलाएं कोरकू घर की दीवार पर चूने तथा लाल मिट्टी से शुभ चित्र बनाती है, जिन्हें ’गुड़नियान’ कहते है।

गुदना: कोरकू महिलाएं गुदना प्रिय होती है ये माथे, ठुड़्डी, गाल और नाक पर बिंदु बनवाते है हाथ पर चैक, रानी गोद आदि आकृतियाँ भी बनवाते है। कोरकू लोगों में गोदना शरीर की सजावट के साथ शरीर को रोगों से मुक्त तथा मजबूत बनाने का भी एक तरीका है।

 

निष्कर्ष

जनजातीय संस्कृति हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुडी हुई है। जनजातियां सामान्यतः शहरों से दूर जंगलो तथा पहाड़ो में अपना जीवन यापन करते ह,ै ये हमारी  प्राचीन इतिहास संस्कृति की परिचायक है। इन्होंने अपनी लोक कलाओं के माध्यम से  अपनी संस्कृति को जीवित रखा है। वर्तमान समय में जो जनजातियाँ आधुनिकता की तरफ आगे बढ़ रही है वे अपनी संस्कृति को पीछे छोड़ रही है जिसके कारण जनजातीय लोक संस्कृति, लोक कलाएं,  भाषा तथा उनकी संस्कृति में निहित ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है। वर्तमान में आवश्यकता है, ऐसे सम्मिश्रित वातावरण की जो प्राचीन संस्कृति और आधुनिकता में सामंजस्यता बनाये रखे ताकि मानव आधुनिकता की तरफ बढ़ते हुए भी अपनी प्राचीन संस्कृति से जुड़े रहे।

  

REFERENCES

Tiwari, R. (2014). Chaimasa Magazine (चैमासा पत्रिका). Madhya Pradesh Sanskriti Parishad, Bhopal, 137.

Rajpurohit, B. L. (2004). Malvi Culture and Literature (मालवी संस्कृति और साहित्य). Adivasi Lok Kala Evam Boli Vikas Academy, Bhopal, 36.

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Lok Rang Srishti. (1992). Exhibition Based on Works of Tribal Painters of Madhya Pradesh (लोक रंग सृष्टि – म.प्र. के जनजातीय चित्रकारों की कृतियों पर आधारित चित्र प्रदर्शनी). Madhya Pradesh Adivasi Lok Kala Parishad Publication.

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Karcham, T. (2017). Gond Life and Culture (गोंड जनजीवन और संस्कृति). Synergy Books India, New Delhi, 131.

Das, A. (2017). Jangarh Singh Shyam: The Enchanted Forest (जनगढ़ सिंह श्याम – द एनचेन्टेड फॉरेस्ट). Roli Books, 109–110.

Jaiswal, M. (2023). Indigenous Knowledge System Among the Korku Tribe: A Local Oral Knowledge Tradition (कोरकू जनजाति में देशज ज्ञान प्रणाली – एक स्थानीय मौखिक ज्ञान परम्परा).

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https://universaltribes.com/?ref=VI4fM5oz

www.mptourism.com/bhagoria-tribal-festival

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http://lisindia.ciil.org/Korku/korku_cult.html

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