Original Article
A Historical and Aesthetic Study of Mughal-Era Animal and Bird Painting
मुगलकालीन पशु पक्षिय
चित्रकला का
ऐतिहासिक
सौंदर्यात्मक
अध्ययन
प्रस्तावना
शोध लेख
मुगल
काल में पशु
और पक्षियों
का चित्रण
भारतीय लघु
चित्रकला की
एक अत्यंत
महत्वपूर्ण
विशेषता रही
है। यह चित्रण
केवल सजावटी
या मनोरंजन के
उद्देश्य से
नहीं किया गया
था,
बल्कि
उसमें
कलात्मक, वैज्ञानिक,
धार्मिक
और
प्रतीकात्मक
दृष्टि से भी
गहराई थी।
मुगल
चित्रकला में
पक्षी और
जानवरों का चित्रण
एक
महत्वपूर्ण
विषय है। मुगल
बादशाहों ने
अपने दरबार
में विभिन्न
प्रकार के
जानवरों और
पक्षियों को
पाला और उनका
चित्रण करवाया।
नीचे इसका
विस्तारपूर्वक
विवरण
प्रस्तुत है
मुगल चित्रकला की विषय-वस्तु
मुगल
चित्रकला का
आरंभ 16वीं
शताब्दी में
बादशाह
हुमायूँ के
शासनकाल से
माना जाता है।
हुमायूँ फारस
(ईरान) से दो प्रसिद्ध
चित्रकार -
मीर सैय्यद
अली और अब्दुस
समद को भारत
लाए। उन्हीं
के निर्देशन
में अकबर के
शासनकाल में
चित्रकला का
सुव्यवस्थित
विकास हुआ।
मुगल
चित्रकला
फारसी शैली,
भारतीय
लोकशैली और
प्राकृतिकता
के अद्भुत समन्वय
का परिणाम थी।
पक्षियों का चित्रण
मुगल
कलाकारों ने
पशु-पक्षियों
को केवल पृष्ठभूमि
के -प में नहीं,
बल्कि
मुख्य विषय के
-प में भी
चित्रित
किया। इन
चित्रों में
जीवंतता, यथार्थता
और सूक्ष्म
निरीक्षण का
भाव देखने को
मिलता है।
मुगल
चित्रकला में
पक्षियों का चित्रण
भी बहुत ही
लोकप्रिय था।
चित्रकारों ने
विभिन्न
प्रकार के
पक्षियों
जैसे कि तोते,
मोर, और बाज का
चित्रण किया।
इन चित्रों
में पक्षियों
की सुंदरता और
उनकी
गतिविधियों
को बहुत ही
विस्तार से
दिखाया गया
है।
·
विविधता:
मुगल
कलाकारों ने
विभिन्न
प्रकार की
पक्षियों का
चित्रण किया,
जिनमें
तोते, मोर, बाज, और अन्य
प्रजातियाँ
शामिल थीं।
·
सुंदरता
और गति: पक्षियों
के चित्रण में
उनकी सुंदरता
और गति को
उजागर किया
गया, जो
कलाकारों की
रचनात्मकता
और कौशल का
प्रदर्शन
करता है।
·
प्रतीकवाद:
पक्षियों का
चित्रण अक्सर
प्रतीकात्मक
होता था, जैसे कि
मोर का चित्रण
शाही वैभव और
सुंदरता का
प्रतीक था।
|
चित्र
1
|
|
चित्र
1 पक्षी
विश्राम पर
बाज (1615) उस्ताद
मंसूर
द्वारा
चित्रित यह
चित्र
संयुक्त
राज्य
अमेरिका में
क्लीवलैंड
संग्रहालय
में
संग्रहित
है। यह चित्र
श्जहाँगीरनामाश्
का हिस्सा
है। |
|
चित्र 2
|
|
चित्र
2 उस्ताद
मंसूर
द्वारा 17वीं
शताब्दी में, लगभग 1625 में बनाई गई
डोडो की
पेंटिंग को
अब विलुप्त
हो चुके इस
पक्षी का
जीवित नमूने
पर आधारित
सबसे सटीक, यथार्थवादी
और दुर्लभ
रंगीन
चित्रण माना
जाता है। यह
कलाकृति
सम्राट
जहांगीर
द्वारा बनवाई
गई एक मुगल
लघुचित्र
संग्रह का
हिस्सा है, जिसमें
संभवतः
मॉरीशस से
भारत लाए गए
दो डोडो में
से एक को
दर्शाया गया
है। |
|
चित्र 3
|
|
चित्र
3 शैली:
यह मुगल काल
के दौरान, लगभग
1625
ईस्वी में
निर्मित एक
भारतीय लघु
चित्रकला है। संग्रह: यह
कलाकृति सर
कावसजी
जहांगीर
संग्रह का
हिस्सा है। |
पशुओं का चित्रण
मुगल
चित्रकला में
जानवरों का
चित्रण भी बहुत
विस्तृत और
वास्तविक
होता था।
चित्रकारों ने
विभिन्न
प्रकार के
जानवरों जैसे
कि शेर, हाथी,
घोड़े,
और कुत्ते
का चित्रण
किया। इन
चित्रों में
जानवरों की
गतिविधियों
और उनके
प्राकृतिक
आवासों को
बहुत ही
विस्तार से
दिखाया गया
है।
·
वास्तविकता:
मुगल
कलाकारों ने
पशुओं को
वास्तविक और
विस्तृत -प
में चित्रित
किया, जिसमें
उनके शरीर की
बनावट, फर, और
गतिविधियों
का सटीक
चित्रण किया
गया।
·
शाही
पशु: शाही
पशुओं जैसे
शेर, हाथी,
और घोड़ों
का चित्रण
विशेष -प से
किया गया,
जो शाही
शक्ति और वैभव
का प्रतीक थे।
·
शिकार
के दृश्य:
शिकार के
दृश्यों में
पशुओं का
चित्रण आम था,
जो शाही
मनोरंजन और
शक्ति का
प्रदर्शन
करता था।
|
चित्र 4
|
|
चित्र
4 मंसूर, जेबरा, 1621, कागज पर
अपारदर्शी
जलरंग और
सुनहरा रंग, 18.3 Û 24 सेमी
(विक्टोरिया
और अल्बर्ट
संग्रहालय, लंदन) |
मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित
1)
यथार्थता
(त्मंसपेउ):
कलाकारों ने
पशु-पक्षियों
का सूक्ष्म
अध्ययन किया
और उन्हें
बहुत ही
वास्तविक प
में प्रस्तुत
किया। बाल,
पंख, शरीर की
मुद्रा, आँखों की
चमक अत्यंत
बारीकी से
उकेरा गया। सबकुछ
2)
प्राकृतिकता
(छंजनतंसपेउ): चित्रों में
पशु-पक्षियों
के आस-पास का
प्राकृतिक
वातावरण - पेड़,
घास, जल, पर्वत भी
यथार्थ -प में
दिखाया गया
है।
3)
भावाभिव्यक्ति
- जानवरों
की मुद्राएँ
और भाव इस
प्रकार चित्रित
किए गए कि वे
जीवंत लगें-
जैसे सिंह का
गर्व, हाथी का
बल,
हिरण का
सौंदर्य, या
पक्षियों की
चंचलता।
4)
रंग
योजनाः रंगों का
प्रयोग
अत्यंत कोमल
और संतुलित
था। सुनहरा,
नीला,
हरा, भूरा आदि
रंगों का
संतुलन दृश्य
को आकर्षक बनाता
था।
मुगल
काल में पक्षी
और जानवरों के
चित्रण का विकास
चार प्रमुख
शासकोंकृअकबर,
जहाँगीर,
शाहजहाँ
और
औरंगजेबकृके
समय अलग-अलग -प
में दिखाई
देता है।
प्रत्येक
सम्राट की
अपनी कला-रुचि
थी,
और उसी के
अनुसार
चित्रकला में
प्रकृति, जीव-जंतुओं
तथा पक्षियों
पर अलग-अलग
प्रकार का काम
हुआ। नीचे
क्रमवार
विस्तृत
विवरण दिया गया
है-
बाबर
और हुमायूं के
काल
(प्रारंभिक
मुगल काल) में
पशु-पक्षियों
के प्रति गहरा
प्रेम और वैज्ञानिक
रुचि देखने को
मिली। बाबर ने
अपनी आत्मकथा
श्बाबरनामाश्
में भारत के
अनेक पशु-पक्षियों
का वर्णन किया
है। इस दौरान
शिकार के लिए
चीता, बाज, और घोड़ों
का उपयोग होता
था,
जबकि
प्रकृति
प्रेम और कला
में भी
पशु-पक्षियों
का चित्रण शु-
हुआ था।
बाबर और हुमायूं के काल में पशु-पक्षी
बाबर
का प्रकृति
निरीक्षण:
बाबर को
प्रकृति से
गहरा लगाव था।
उसने अपनी आत्मकथा
में भारत के
गैंडे, हाथी,
जंगली
भैंस, हिरण,
मोर, और तोते
जैसे
पशु-पक्षियों
का विस्तृत और
सजीव वर्णन
किया है।
शिकार
का शौक: मुगलों
की परंपरा के
अनुसार, इस काल
में शिकार एक
लोकप्रिय
मनोरंजन और
अभ्यास था।
शिकार के लिए
विशेष -प से
प्रशिक्षित चीतों
(बिममजी) और
बाज (थ्ंसबवद)
जैसे
पक्षियों का
उपयोग किया
जाता था
ळववहसम ।तजे -
ब्नसजनतम,
पापचमकपं।
चित्रकला
में पशु-पक्षी:
यद्यपि मुगल
चित्रकला
अपने
चरमोत्कर्ष
पर जहाँगीर के
समय (उस्ताद
मंसूर) पहुँची,
लेकिन
बाबर और
हुमायूं के
समय से ही
प्रकृति और
जीवों को
चित्रों में
स्थान मिलने
लगा था।
गाय
के प्रति
सम्मान:
छंअइींतंज
ज्पउमे के
अनुसार, बाबर ने
हिंदू
भावनाओं का
सम्मान करते
हुए अपने
शासनकाल में
गाय की
कुर्बानी पर
रोक लगाई थी।
इस
काल में
पशु-पक्षी
केवल मनोरंजन
या शिकार के
साधन नहीं थे,
बल्कि
उन्हें अपनी
प्राकृतिक
सुंदरता के लिए
भी सराहा जाता
था।
अकबर
काल (1556-1605)- मुगल
नैचुरलिस्टिक
शैली की नींव
अकबर
के समय में
चित्रकला को
सबसे अधिक
संरक्षण
मिला।
मुख्य
विशेषताएँ
अकबर
ने फारसी
कलाकारों (मीर
सैयद अली,
अब्दुस्समद)
के साथ भारतीय
चित्रकारों
को मिलाकर एक
नई संयुक्त
शैली विकसित
की।
उसके
कार्यशालाओं
(तसवीरखाना)
में जानवरों और
पक्षियों का
अध्ययन कराया
जाता था ताकि
वास्तविक
चित्रण हो
सके।
अकबरनामा,
आइने-अकबरी
और हम्जानामा
जैसे ग्रंथों
में कई
दृश्यों में
हाथी, घोड़े,
शेर, बाज, ऊँट, हिरन आदि
का अत्यंत
जीवंत चित्रण
मिलता है।
शिकार
के दृश्य
(हौजों, दंगलों,
हाथियों
की लड़ाई) बहुत
लोकप्रिय थे।
इस
काल में
ष्तुतिनामाष्,
ष्अकबरनामाष्,
और
ष्आयने-अकबरीष्
जैसे ग्रंथों
में अनेक पशु-पक्षी
चित्रित किए
गए।
चित्रकार
बसावन, मंसूर,
दसवंत,
केसर,
और लाल
जैसे
कलाकारों ने
अत्यंत जीवंत
पशु-पक्षी
चित्र बनाए।
शिकार
के दृश्य
(भ्नदजपदह बेमदमे)
विशेष -प से
प्रसिद्ध थे,
जिनमें
शेर, हाथी,
घोड़े,
हिरण,
चीते आदि
प्रमुख -प से
चित्रित हुए।
परिणाम
अकबर
के समय में
पहली बार मुगल
चित्रकला में
प्रकृति और
जीव-जंतुओं को
बड़े पैमाने पर
वैज्ञानिक
दृष्टि से
उकेरा गया।
जहाँगीर
काल (1605-1627) -
प्रकृति-चित्रण
का स्वर्ण युग
जहाँगीर
खुद प्रकृति,
पक्षियों
और जानवरों का
बड़ा प्रेमी
था।
उसने
अपनी डायरी
तुजुक-ए-जहाँगीरी
में भी प्राकृतिक
सौंदर्य के
प्रति अपने
लगाव को लिखा
है।
मुख्य
विशेषताएँ
जहाँगीर
के काल में
पक्षी और
जानवरों के
सबसे उत्तम और
सटीक चित्र
बने।
उस्ताद
मंसूर जैसे
महान कलाकार
इसी काल में हुए।
उन्होंने
साइबेरियन
सारस, बंगाल
टाइगर, बकरी,
मोर, तीतर,
कस्तूरी
हिरन सहित
अनेक दुर्लभ
जीवों के चित्र
बनाए।
चित्रों
में
वैज्ञानिक
शुद्धता, सूक्ष्मता
और वास्तविक
आकृति
अत्यधिक दिखाई
देती है।
फूल
और पौधों का
भी अत्यंत
सुंदर और
प्राकृतिक -प
से चित्रण
होता था।
जहाँगीर
ने विदेशी
जानवरों
(तुर्की, अफ्रीकी,
फारसी) का
भी चित्रण
करवाया, जैसेकृकाला
हिरन, कैमल-हॉप,
विदेशी
पक्षी आदि।
जहाँगीर
स्वयं
प्रकृति और
प्राणिजगत का
गहरा अध्येता
था।
उसने
अनेक
पशु-पक्षियों
का वैज्ञानिक
दृष्टि से
अध्ययन
करवाया।
प्रसिद्ध
चित्रकार
उस्ताद मंसूर
ने इस काल में
पक्षियों और
विदेशी
जानवरों (जैसे
टर्की, जेब्रा,
क्रेन
आदि) के
अत्यंत
यथार्थ चित्र
बनाए।
जहाँगीर
ने अपने
संस्मरण
ष्तुजुक-ए-जहाँगीरीष्
में कई
स्थानों पर
पशु-पक्षियों
के चित्रण की
प्रशंसा की
है। उदाहरण-
ष्फाल्कन विद
मैनष्, ष्ब्लैक
बकष्, ष्सारस और
उसके बच्चेष्
आदि
परिणाम
जहाँगीर
का समय मुगल
नैचुरल
हिस्ट्री
आर्ट का
सर्वश्रेष्ठ
दौर माना जाता
है।
|
चित्र
5
|
|
चित्र
5 चिनार के
पेड़ पर
गिलहरियाँ, अबूश्ल हसन
द्वारा रचित, सोने के साथ
गौचे रंग, लगभग 1610, 14 Û 8.9 इंच, इंडिया
ऑफिस
लाइब्रेरी
एंड
रिकॉर्ड्स, लंदन, जॉनसन
एल्बम 1, संख्या 30।
फोटो सौजन्य-
विकिमीडिया
कॉमन्स |
शाहजहाँ
(1628 दृ 1658) - भव्यता
और सजावट का
युग
शाहजहाँ
के समय
चित्रकला में
प्रकृति का
चित्रण जारी
रहा, परन्तु
शैली अधिक
सजावटी बन गई।
मुख्य
विशेषताएँ
जानवरों
और पक्षियों
को ज्यादा
सजावटी और राजसी
ढंग से दिखाया
गया।
वास्तविक
अध्ययन की
गहराई थोड़ी कम
हुई, पर
सौंदर्य और
-पांकन पर
अधिक ध्यान
दिया गया।
महलों,
किलों,
सिंहासनों
और दरबारों के
दृश्यों में
तोते, कबूतर,
मोर, बगुले,
हाथी,
घोड़े आदि
को
प्रतीकात्मक
-प में दिखाया
जाता था।
नक्काशी
और
स्थापत्यकला
(जैसे ताजमहल,
आगरा
किले) में भी
पत्तियों,
फूल-पौधों
और कुछ पशु
-पों का बारीक
उपयोग दिखता
है।
परिणाम
इस
काल में
प्राकृतिक
चित्रण
कलात्मक
सौंदर्य और
विलासिता की
ओर अधिक झुका।
औरंगजेब
(1658 दृ 1707) - चित्रकला
का पतन
औरंगजेब
व्यक्तिगत -प
से चित्रकला
और संगीत का
विरोधी था।
मुख्य
विशेषताएँ
राजकीय
संरक्षण लगभग
समाप्त हो
गया।
कलाकार
बिखरने लगे और
लघुचित्र
परम्परा कमजोर
होने लगी।
पक्षी
और जानवरों के
चित्र बहुत कम
संख्या में
बने।
जो
बने भी, वे पहले
से विकसित
शैली को ही
दोहराते थे,
उसमें नई
मौलिकता नहीं
थी।
परिणाम
औरंगजेब
के काल में
प्राकृतिक
चित्रण सहित पूरी
मुगल
चित्रकला
परंपरा बहुत
कमजोर हो गई।
औरंगजेब
के काल में
धार्मिक
कारणों से
चित्रकला का
पतन शु- हो गया,
इसलिए
पशु-पक्षी
चित्र कम बने।
समग्र
निष्कर्ष
शासक
पक्षीध्जानवर
चित्रण की
विशेषता
अकबर
आधार तैयारय
शिकार और
दरबारी
दृश्यों में
जीव-जंतुओं का
विस्तृत
उपयोग
जहाँगीर
सर्वश्रेष्ठ
प्राकृतिक
चित्रणय
वैज्ञानिक और
अत्यंत
सूक्ष्म
विवरणय उस्ताद
मंसूर का दौर
शाहजहाँ सजावटी
और
सौंदर्यपूर्ण
शैलीय
वास्तविकता
की जगह आकर्षण
पर जोर
औरंगजेब
संरक्षण
समाप्तय
चित्रकला का
पतनय नए
प्रयोग बंद
पशु-पक्षी चित्रण के प्रकार
1)
शिकार
दृश्यः
राजा और
शिकार में लगे
सैनिकों के
साथ-साथ शेर,
चीते,
हिरण आदि
दिखाए जाते
थे।
2)
अकेले
पशु-पक्षियों
के अध्ययन
चित्र (जनकल
च्ंपदजपदहे):
किसी एक
जानवर या
पक्षी को
अत्यंत
यथार्थ -प में
प्रस्तुत
किया जाता था,
जैसे दृ
बाघ, तोता,
सारस,
मोर आदि।
3)
प्रतीकात्मक
चित्रणः
कुछ
पशु-पक्षियों
को धार्मिक या
सांस्कृतिक प्रतीकों
के -प में
दिखाया गया-
जैसे हंस को
पवित्रता का
प्रतीक, शेर को
शक्ति का
प्रतीक आदि।
मुगल
काल के पशु और
पक्षी चित्रण
के कलाकारों ने
अपनी
रचनात्मकता
और कौशल का
प्रदर्शन किया।
इनमें से कुछ
प्रमुख
कलाकार हैं-
उस्ताद
मंसूर: वह एक
प्रसिद्ध
पक्षी
चित्रकार थे
जिन्होंने
जहाँगीर के
दरबार में
कार्य किया
था। उनका बनाया
हुआ डोडो
पक्षी का
चित्र बहुत
प्रसिद्ध है।
अबुल
हसन: वह एक
व्यक्ति
चित्र
विशेषज्ञ थे
जिन्होंने जहाँगीर
की आत्मकथा
‘तुजु0के जहाँगीर’
के मुख्य
पृष्ठ के लिए
चित्र बनाया
था।
दसवंत:
वह एक
चित्रकार थे
जिन्होंने
रज्मनामा
नामक पांडुलिपि
में जानवरों
और पक्षियों
के चित्र बनाए
थे।
अब्दुस्समद:
वह एक
चित्रकार थे
जिन्होंने
हम्जानामा
में जानवरों
और पक्षियों
के चित्र बनाए
थे।
इन
कलाकारों ने
मुगल काल में
पशु और पक्षी
चित्रण की
उत्कृष्टता
को दर्शाया
है। उनके चित्र
न केवल सुंदर
हैं बल्कि उस
समय के
सामाजिक और
सांस्कृतिक
संदर्भ को भी
दर्शाते हैं
|
चित्र
6
|
|
चित्र 6 अबू
अल हसन, जहाँगीर ने
मलिक अंबर को
गोली मारी, लगभग 1620, कागज पर
गौचे, 25.8 Û 16.5 सेमी
(चेस्टर बीटी
लाइब्रेरी, डबलिन) |
कला और विज्ञान का संगम
जहाँगीर
काल में
पशु-पक्षी
चित्रण केवल
कलात्मक नहीं,
बल्कि
वैज्ञानिक
दृष्टिकोण से
भी किया गया। उस्ताद
मंसूर को
कभी-कभी “भारत
का पहला
वन्यजीव
चित्रकारष्
कहा जाता है
क्योंकि उसने
अनेक दुर्लभप्रजातियों
का सटीक
दस्तावेजन
किया।
निष्कर्ष
मुगल
काल का
पशु-पक्षी
चित्रण
भारतीय कला
इतिहास का एक
स्वर्ण
अध्याय है। यह
केवल शासकों के
वैभव का दर्पण
नहीं, बल्कि
प्रकृति के
प्रति
संवेदनशीलता,
वैज्ञानिक
दृष्टि और
कलात्मक
कल्पना का अद्वितीय
संगम भी है।
मुगल
चित्रकारों
ने जिस बारीकी
और सौंदर्य के
साथ जीव-जगत
को अंकित किया,
वह विश्व
कला इतिहास
में अपनी
विशिष्ट
पहचान रखता
है। इसमें
प्रकृति और
जीवन के प्रति
गहरी संवेदना,
कलात्मक
कौशल और
वैज्ञानिक
दृष्टिकोण का
अद्भुत मेल
दिखाई देता
है। इन
चित्रों के
माध्यम से
मुगल
कलाकारों ने न
केवल अपनी
कलात्मक प्रतिभा
का परिचय दिया,
बल्कि
भारत की जैव
विविधता को भी
अमर कर दिया।
ACKNOWLEDGMENTS
None.
REFERENCES
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