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AN ANALYTICAL STUDY OF THE DANCE COMPOSITIONS OF KATHAK GURU DR. SUCHITRA HARMALKAR IN THE CONTEXT OF TRADITION AND SOCIAL AWARENESS

Original Article

AN ANALYTICAL STUDY OF THE DANCE COMPOSITIONS OF KATHAK GURU DR. SUCHITRA HARMALKAR IN THE CONTEXT OF TRADITION AND SOCIAL AWARENESS

परंपरा एवं सामाजिक जागृति के सन्दर्भ में कथक गुरु डॉ. सुचित्रा हरमलकर जी की नृत्य संरचनाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन

 

Dr. Yogita Mandlik 1*

1 Assistant Professor, (Dance) Government Maharani Lakshmibai Girls College, Kila Bhavan, Indore, India

 

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ABSTRACT

English: The fundamental objective of Indian classical arts has always been rooted in the philosophical ideal of “Satyam Shivam Sundaram” (Truth, Auspiciousness, Beauty). Since ancient times, dance has not only been a medium of devotion to deities but also a means of guiding society toward moral values. In the present context, when society faces multiple challenges and contradictions, the role of art has become even more significant.

Renowned Kathak exponent Dr. Suchitra Harmalkar of the Raigarh gharana has preserved the purity of Kathak while establishing it as a platform for social discourse. Classical dance is often perceived as being confined to mythological narratives; however, Dr. Harmalkar has challenged this notion by connecting the traditional vocabulary of Kathak with contemporary social issues. Her choreographed dance-dramas are not merely stage performances but reflections of an artist’s sensitivity toward society.

This research analyzes her major choreographic works based on themes such as environmental conservation and women’s empowerment. It highlights how, through expressive gestures and rhythmic structures, she has effectively communicated complex social messages to the public in an accessible and impactful manner.

The study employs both primary and secondary sources, including video recordings of performances, reviews, and interviews reflecting her artistic vision.

 

Hindi: भारतीय शास्त्रीय कलाओं का मूल उद्देश्य सदैव “सत्यम् शिवम सुंदरम्” की अवधारणा पर आधारित रहा है। प्राचीन काल से ही नृत्य का प्रयोग केवल देवी देवताओं की स्तुति हेतु नहीं वरन् समाज को नैतिकता का मार्ग दिखाने के लिए भी किया जाता रहा है। वर्तमान परिपे्रक्ष्य में जब समाज विभिन्न चुनौतियों और विसंगतियों से जूझ रहा है कला की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। कथक के रायगढ़ घराने की प्रख्यात नृत्यांगना डॉ. सुचित्रा हरमलकर ने कथक की शुद्धता को अक्षुण रखते हुए उसे एक “सामाजिक विमर्श” के रूप में प्रतिष्ठित किया है। शास्त्रीय नृत्य को अक्सर पौराणिक कथाओं तक सीमित माना जाता है किंतु कथक गुरु डॉ. सुचित्रा जी ने इस धारणा को तोड़ते हुए कत्थक की पारंपरिक शब्दावली को समकालीन सामाजिक समस्याओं से जोड़ा है। आपके द्वारा निर्देशित नृत्य नाटिकाएं मात्र एक मंच प्रदर्शन नहीं वरन् वे समाज के प्रति एक कलाकार की संवेदनशीलता का प्रतिबिंब है।

शोध के अंतर्गत सुचित्रा जी द्वारा निर्देशित प्रमुख कृतियों जैसे पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण आदि पर आधारित नाटिकाओं का विश्लेषण किया गया है। यह शोध इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे उन्होंने अभिनय और ताल के माध्यम से कठिन सामाजिक संदेशों को जनमानस के प्रति सुलभ और प्रभावशाली बनाया है।

अध्ययन पद्धति में प्राथमिक और द्वितीय स्रोतों का उपयोग किया गया है, जिसमें उनकी प्रस्तुतियों के वीडियो रिकॉर्डिंग, समीक्षाएं और नृत्य निर्देशिका के रूप में उनके दृष्टिकोण का साक्षात्कार सम्मिलित है।

 

Keywords: Art and Society, Dance Drama, Public Awareness, Kathak कला और समाज, नृत्य नाटिकाएं, जन जागरूकता, समाज कल्याण

 


प्रस्तावना

मानव सभ्यता के विकास के साथी अभिव्यक्ति के माध्यमों का प्रादुर्भाव हुआ। अंगिका, वाचिक, आहार्य और सात्विक अभिनयों का समुच्चय ही नृत्य है। भारतीय संदर्भ में नृत्य केवल दैहिक सौंदर्य नहीं वरन आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना का संवाहक रहा है।

        भरत मुनि कृत नाट्यशास्त्र में उल्लेख है कि नृत्य और नाट्य का निर्माण ही समाज के मनोरंजन और उपदेश के लिए किया गया था-

        दुःखार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्।

        विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद्भविष्यति“।। (अध्याय 1, श्लोक 114)

        कथक का मूल आधार कथा है। प्राचीन काल में कुशीलव और कथिक लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर महाकाव्यों जैसे रामायण, महाभारत आदि की कथाएं अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करते थे। “कथा कहे सो कथक कहावे” यह उक्ति कथक के मूल में निहित नाट्य पक्ष की प्रधानता को स्पष्ट करती है। कपिला वात्स्यायन की ‘भारतीय शास्त्रीय नृत्य’ के अनुसार ‘कथक’ का मूल कार्य समाज को कथाओं के माध्यम से शिक्षित करना था। समय के साथ इसमें संगीत और पद संचालन जुड़ता गया। जिससे यह एक पूर्ण शास्त्रीय विधा बन गई कथक के प्रस्तुतीकरण में विभिन्न कालखंडो का प्रभाव दिखलाई पड़ता है। इसे संक्षिप्त रूप में इस प्रकार समझ सकते हैं -

कालखंड

नृत्य का स्वरूप

अभिनय/नाटकीय तत्व

प्राचीन एवं मंदिर काल

भक्तिपरक, ध्रुपद गायन के साथ

पौराणिक आख्यान एवं उपदेशात्मक कथा वाचन

मध्यकाल (मुगल काल)

दरबारी प्रदर्शन, तकनीकी जटिलता

गतभाव एवं गतनिकास के माध्यम से छोटी-छोटी कथाओं का प्रदर्शन

आधुनिक काल

मंच प्रदर्शन

सामूहिक नृत्य नटिकाएं और सामाजिक विषय

 

कथक में अभिनय की अपनी एक अनूठी संकेतात्मक पद्धति है। एकहार्य (एक ही वेशभूषा में अनेक पत्रों का निर्वाह) की विशेषता कथक के अभिनय पक्ष को सशक्त स्वरूप प्रदान करती है। नर्तन बिना अपनी वेशभूषा बदले गतनिकास एवं गतभाव के माध्यम से पूरी कथा को समेट लेता है। नर्तन अकेला ही मटकी, घूंघट आदि के माध्यम से गोपी का भाव बतलाता है तो वहीं पलट कर (जिसे तकनीकी शब्दावली में गतपलटा कहते हैं) मोर मुकुट, बंसी आदि के माध्यम से कृष्ण स्वरूप को प्रदर्शित करता है। कथक में अभिनय, नाटकीयता भौतिक साधनों पर अवलंबित नहीं है बल्कि कल्पनाशीलता पर आधारित है।

कथक गुरु डॉ. सुचित्रा हरमलकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य जगत का एक ऐसा देदीप्यमान नक्षत्र है, जिन्होंने रायगढ़ घराने की समृद्ध विरासत को अपनी साधना से नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। उनका व्यक्तित्व केवल एक नृत्यांगना का नहीं बल्कि एक शोधकर्ता, गुरु और समाज सुधारक का भी है। रायगढ़ घराने की विशेषता - उसकी मौलिकता और राजा चक्रधर सिंह के दरबार की वह शैली है जहाँ ताल के साथ-साथ साहित्य का अद्भुत संगम मिलता है। जिसे सुचित्रा जी ने गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत आत्मसात किया है।

 शास्त्रीय नृत्य कत्थक में एकल प्रस्तुति की प्रधानता रही है और डॉ. सुचित्रा जी ने विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एकल नृत्य प्रदर्शन किया है वही अपने नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से सामूहिक अभिव्यक्ति को भी प्रधानता दी है। नृत्य नाटिका एक ऐसा प्रारूप है जहां संगीत, अभिनय, नृत्य और कथावस्तु का सम्मिश्रण होता है। जब इस माध्यम का प्रयोग सामाजिक मुद्दों के लिए किया जाता है तो वह सीधे दर्शकों के हृदय पर प्रहार करता है। डॉ. सुचित्रा जी के निर्देशन में कथक की सूक्ष्मता, नाटिका के व्यापकता के साथ मिलकर एक नया अनुभव प्रदान करती है। आपके द्वारा निर्देशित नित्य नाटकों में प्रमुख है अनुकृति, अमृतस्य नर्मदा, कृष्णायन, नवल रंगीनी गाथा रघुनंदन की,  विलयन आदि।

अनुकृति” भारतीय नारी की शौर्य गाथा पर आधारित इस नृत्य नाटिका में भारत की उन महान नारियों के बलिदान एवं शौर्य का वर्णन है जिन्होंने नारी अस्मिता और विदेशी आतातायियों से मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इस नृत्य नाटिका की शुरुआत नारी के देवी स्वरूप मां दुर्गा की आराधना से होती है। जिसमें नारी सर्वत्र पूज्यते एवं उसके मातृ एवं शक्ति स्वरूप का प्रदर्शन दुर्गा स्तुति के माध्यम से किया गया है। साथ ही नर्तकिया हाथों में जलता हुआ दीप लिए मंच पर आती है तो वह केवल एक दीपक नहीं रह जाता वह साक्षात शक्ति का विग्रह बन जाता है। जब कथक की कोमल मुद्राओं और पद संचालन के बीच दीपक का प्रकाश नृत्य करता है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश के नक्षत्र धरा पर उतरकर देवी की आरती में सम्मिलित हो गए हो।  ततपश्चात रानी पद्मिनी की शौर्य गाथा जिसमें नारी अस्मिता की रक्षा के लिए उन्होंने बलिदान दे दिया था। लाल पीले दुपट्टों से अग्नि की धधकती ज्वाला का विहंगम दृश्य का संयोजन तथा मध्य प्रदेश की आधुनिक साहित्यकार डॉ. पद्मा सिंह द्वारा रचित रचना में डॉ. सुचित्रा जी द्वारा किए पारंपरिक प्रयोग का प्रस्तुतीकरण अत्यंत रोमांचक उत्पन्न कर देता है। संत कवि मीराबाई की रचनाओं पर भक्ति की पराकाष्ठा का जीवंत उदाहरण भी अपने अत्यंत भावपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया है। उसी के साथ न्याय की देवी लोकमाता अहिल्या देवी होलकर की शिवभक्ति, उनके राजधर्म एवं प्रजावत्सल रूप को प्रदर्शित किया गया है। यह प्रस्तुति दर्शकों को एक ऐसी शासिका से साक्षात्कार कराती है जिसे “राज” को “सेवा” और “सत्ता” को “साधना” बना दिया था। इसी के साथ स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महती भूमिका निभाने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध कौशल और युवावस्था में ही देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाली साहसी नारी की कथा को सुभद्रा कुमारी चैहान की रचना “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी” के माध्यम से रानी के शौर्य और साहस को चरितार्थ किया।

 नारी के शक्ति स्वरूपा, वात्सल्य और धैर्य की प्रतिभूति तथा संघर्ष और स्वावलंबन पर आधारित नृत्य संरचना “अनुकृति“ में डॉ. सुचित्रा जी ने नारी को केवल एक पात्र के रूप में नहीं बल्कि एक ऊर्जा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। जिसने स्त्री के जीवन, उसके संघर्ष और उसकी विजय को एक “चरितार्थक” विस्तार दिया है साथ ही उनकी यह नृत्य संरचना समाज को यह संदेश भी देती है कि समाज का उत्थान तभी संभव है जब नारी के इन सभी स्वरूपों को सम्मान और स्थान मिले।

 आपकी एक और नृत्य संरचना अमृत्स्य नर्मदा -  नर्मदा नदी की जीवन गाथा। जिसमें जल संरक्षण एवं पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का आवाहन निहित है। मालवा और निमाड़ के लोक संस्कृति, कथक की शास्त्रीयता और दार्शनिक गहराई का अद्भुत संगम इस नृत्य नाटिका में दिखाई पड़ता है। इसमें उन्होंने केवल एक नदी की कहानी नहीं कही है बल्कि नर्मदा को जीवंत चेतना और मानवता की रक्षक के रूप में चित्रित किया है। अमृतस्य नर्मदा केवल पौराणिक प्रस्तुति नहीं वरन यह नर्मदा बचाओ और प्रदूषण मुक्ति जैसे तात्कालिक सामाजिक जागरूकता से भी जुड़ती है और अंत में स्वयं नर्मदा नदी की व्यथा का भाव अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है और समाज को सचेत किया है कि यदि यह जीवन दायिनी नदी प्रदूषित होती है तो मानवीय सभ्यता का अंत निश्चित है।

 इसके अलावा भी आपने ऐसी कई नृत्य संरचनाओं को निर्देशित किया है जिसमें परंपरा और सामाजिक चेतना का भाव परिलक्षित होता है। जैसे समाज में आस्था और भारतीय पौराणिक कथाओं से दर्शकों को आनंद और भक्ति से ओतप्रोत करती “नवल रंगिणी गाथा रघुनंदन की” जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन को केवल एक इतिहास की तरह नहीं बरन जीवन जीने की एक आचार संहिता के रूप में प्रस्तुत किया है। यह नृत्य नाटिका दर्शकों को अपने भीतर के रावण रूपी अहंकार को मिटाने और राम रूपी विवेक को जागृत करने का आवाहन करती है।

कृष्णायन - कृष्ण लीला केवल द्वापर युग की कथा नहीं रह जाती बल्कि वह परंपरा और जन जागरूकता के बीच एक जीवंत संवाद बन जाती है। उन्होंने कत्थक की शास्त्रीयता का उपयोग करते हुए कृष्ण के चरित्र को आधुनिक समाज के दर्पण के रूप में प्रस्तुत किया है संसाधनों का सम्मान वितरण और बाल सुलभ आनंद का संरक्षण - माखन चोरी लीला के माध्यम से, पर्यावरण संरक्षण जल प्रदूषण - कालिया मर्दन लीला के माध्यम, नारी गरिमा - द्रोपदी चीर हरण के माध्यम से, प्रकृति पूजा एवं सामुदायिक एकता - गोवर्धन लीला के माध्यम से।

 डॉ. सुचित्रा जी द्वारा निर्देशित कृष्ण लीला केवल एक मंच प्रदर्शन नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक जागरण है।

 डॉ. सुचित्रा जी द्वारा निर्देशित एक और कृति फ्यूजन एक ऐसी कलाकृति है जो दो शैलियां को के मिलन के साथ ही शास्त्रीय गरिमा और मिट्टी की महक का एक हृदय स्पर्शी संवाद  है। मालवा की लोक संस्कृति और कथक के संयोजन के माध्यम से कई गहरे संदेश भी पिरोये गए हैं जैसे एक ओर कथक की व्याकरणिक शुद्धता है तो दूसरी ओर मालवी लोक नृत्य की उन्मुक्तता और ऊर्जा। यह संयोजन दर्शाता है कि जिस प्रकार अलग-अलग रंग मिलाकर एक सुंदर चित्र बनाते हैं उसी प्रकार विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियाँ मिलकर भारतीयता के अखंड स्वरूप का निर्माण करती हैं। “प्यारो लागो रे मारो मालवो देश” क्षेत्रीय भाषा पर आधारित गीत पर कथक नृत्य की शास्त्रीयता का प्रस्तुतीकरण अत्यंत मनोरम है। इस फ्यूजन के दूसरे भाग में बृज की होली का लोक एवं शास्त्रीय  स्वरूप में प्रदर्शन दर्शकों को भाव विभोर कर देता है। ब्रज की होली एक लोक परंपरा है जबकि ठुमरी एक शुद्ध शास्त्रीय विद्या। डॉ. सुचित्रा जी ने इस फ्यूजन में होली, समाज को जोड़ने का उत्सव है और ठुमरी शास्त्रीयता की ओर जाने की प्रक्रिया। दोनों का मिलन यह संदेश देता है कि उत्सव वही है जो हमारी आत्मा को तृप्त करें और समाज में सौह्याद्र के रंग घोले।

 इसके अलावा भी आपने कुछ अन्य नृत्य संरचनाओं जैसे शिवकल्याण, रस विश्रान्ति, नृत्य रंग, नृत्य विविधा आदि का सफल निर्देशन किया है जिसमें आनंद, मनोरंजन एवं जन कल्याण का भाव निहित है।

 

उपसंहार

डॉ. सुचित्रा हरमलकर जी का नृत्य - “कला, कला के लिए नहीं बल्कि कला समाज के लिए” के सिद्धांत पर आधारित है। उनके नृत्य संरचनाओं परंपरा की जड़ों से पोषण लेती हैं और सामाजिक जागृति के लिए नए क्षितिज छूती है। वे शास्त्रीय नृत्य को एक ऐसी भाषा के रूप में उपयोग करती हैं जिसे जनसामान्य भी समझ सके और प्रभावित हो सके। आपने नृत्य को परंपरा और सामाजिक जागृति के सेतु के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

डॉ. सुचित्रा की नृत्य यात्रा परंपरा के प्रति आदर और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का अंगूठा संगम है। उनकी संरचनाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि एक कलाकार अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी कैसे समाज को नई दिशा दे सकता है।

 एक शिष्य के रूप में इन महान कृतियों के माध्यम से मुझे न केवल कथक के रायगढ़ घराने की व्याकरणिक शुद्धता को जीने का अवसर मिला अपितु जीवन को मर्यादा, भक्ति और सामाजिक चेतना के दृष्टिकोण से देखने की नई दृष्टि भी मिली। मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली और धन्य अनुभव करती हूँ कि मुझे ऐसी प्रखर विदुषी के मार्गदर्शन में कला के इन विविध आयामों को मंच पर चरितार्थ करने का गौरव प्राप्त हुआ। आपके सानिध्य में बिताया हर पल मेरी कलात्मक यात्रा की अमूल्य थाती है। आपको कोटि-कोटि नमन!

  

REFERENCES

Harmalkar, S. (2021). LALIT PARV ललित पर्व 30.08.2021 [Video]. YouTube.          

Harmalkar, S. (n.d.). Amṛtasya Narmadā [अमृतस्य नर्मदा] [Live stream]. YouTube.    

Harmalkar, S. (n.d.). Anukṛti [अनुकृति] [Video]. Facebook.     

Harmalkar, S. (n.d.). kathak yatra vidushi Dr. Suchitra Harmalkar [Video]. YouTube.    

Harmalkar, S. (n.d.). Raigarh Gharane ki baarikiyo par charcha by Dr. Suchitra Harmalkar [Video]. YouTube.     

Shastri, B. (1985). Bharata Muni nāṭyaśāstra [भरत मुनि नाट्यशास्त्र]. Chaikhamba Sanskrit Sansthan.

Vatsyayan, K. (2015). Bhartīya śāstrīya nṛtya [भारतीय शास्त्रीय नृत्य]. Prakashan Vibhag, Suchna aur Prasaran Mantralaya.

     

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