Original Article
MITHILA FOLK PAINTING: FROM TRADITIONAL ROOTS TO THE CONTEMPORARY GLOBAL HORIZON — AN ANALYTICAL STUDY
मिथिला
लोकचित्र कला:
पारम्परिक
जड़ों से समकालीन
वैश्विक
क्षितिज तक-
एक
विश्लेषणात्मक
अध्ययन
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1 Assistant Professor, Mangalayatan University, Aligarh, India |
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ABSTRACT |
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English: The initial journey of Mithila's folk painting was like a long internal journey where the pace of creation was fast but its echo was limited only to the folk environment. In the latter half of the 20th century, with the advent of paper, canvas and artificial colours, this art broke out of its traditional boundaries and became a part of the global market. While the devastating earthquake of 1954 shook the land of Mithila, it also inadvertently opened the doors of Mithila painting to the world stage. When the then SDM of Madhubani, William George Archer, was visiting the area for relief work, the amazing artworks carved on the walls amidst the debris caught his attention. He saved these rare murals in his camera. Later, when his research articles were published in the journal 'Marg', the art world was stunned. From here, crossing the threshold of Mithila, this art set out on a golden international journey, which continues even today. Since the 1970s, this art form has made deep inroads in countries like Japan, France, America and Germany. The biggest proof of this is the 'Mithila Museum' located in Tokamachi, Japan. Where thousands of rare specimens of this art are preserved. Apart from this, this art carved on the walls of Madhubani Railway Station and Koi International Airport has become a major center of attraction for foreign tourists. With the GI tag to Mithila painting, its global authenticity has increased further. Today it is not only a means of livelihood for thousands of rural women but is also leading Indian handicrafts on the global horizon through "Vocal for Local. "The incorporation of modernity has made it popular among the new generation as well, giving it an even brighter future on the international stage. Hindi: मिथिला
की
लोकचित्रकला
का
प्रारम्भिक
सफर एक लंबी
‘अंतर्यात्रा’
की तरह था
जहाँ सृजन की
गति तो तीव्र
थी परंतु
उसकी गूंज
केवल
लोक-परिवेश
तक ही सीमित
थी। 20वीं सदी
के
उत्तरार्द्ध
में जब कागज,
कैनवस
और कृत्रिम
रंगों का
प्रवेश हुआ
तब यह कला
‘चैकड़ी’ भरकर
अपनी
पारंपरिक
चारदीवारी
से, बाहर
निकली, और
वैश्विक
बाजार का
हिस्सा बनी। 1954 के
विनाशकारी
भूकम्प ने
जहाँ मिथिला
की धरती को
झकझोर कर रख
दिया, वहीं
अनजाने में
ही मिथिला
पेंटिंग के
लिए ‘विश्व
पटल’ के द्वार
खोल दिये।
मधुबनी के
तत्कालीन
एस.डी.ओ.
विलियम जी
आर्चर जब
राहत
कार्यों के
लिए
क्षेत्रों
का दौरा कर
रहे थे तब
मलबे के बीच
दीवारों पर
उकेरी गयी
अद्भूत
कलाकृतियों
ने उनका
ध्यान
खींचा।
उन्होंने इन
दुर्लभ भित्ति
चित्रों को
अपने कैमरे
में सहेज
लिया। बाद
में जब उनके
ये संकलन
शोधपरक लेख
‘मार्ग’ पत्रिका
में
प्रकाशित
हुए तो कला
जगत दंग रह गया।
यहीं से
मिथिला की
चैखट लांघकर
यह कला एक सुनहरे
अंतराष्ट्रीय
सफर पर निकल
पड़ी जो आज भी
अनवरत जारी
है। 1970 के दशक
के बाद से इस
कला ने जापान,
फ्रांस,
अमेरिका
और जर्मनी
जैसे देशों
में अपनी
गहरी पैठ
बनाई है।
जापान के
टोकोमाची
में स्थित ‘मिथिला
म्यूजियम’
इसका सबसे
बड़ा प्रमाण
है। जहाँ इस
कला के
हजारों
दुर्लभ
नमूने
संरक्षित हैं।
इसके अलावा
मधुवनी
रेलवे
स्टेशन और कई
अंतर्राष्ट्रीय
हवाई अड्डों
की दीवारों
पर उकेरी गयी
यह कला
विदेशी
पर्यटकों को
आकर्षित करने
का प्रमुख
केन्द्र बनी
है। मिथिला
चित्रकला को
जी आई (ळप्
ज्ंह) मिलने
से इसकी
वैश्विक प्रमाणिकता
और बढ़ गई है।
आज ये न केवल
हजारों ग्रामीण
महिलाओं की
आजीविका का
साधन है, बल्कि
‘वोकल फॉर
लोकल’ के
माध्यम से
वैश्विक क्षितिज
पर भारतीय
हस्त शिल्प
का नेतृत्व
कर रही है।
आधुनिकता के
समावेश ने
इसे नई पीढ़ी
के बीच भी
लोकप्रिय
बना दिया है।
जिससे इसका
भविष्य
अंतर्राष्ट्रीय
पटल पर और भी
सुनहरा हुआ है। Keywords: Mithila Folk
Painting, Traditional Roots, Global Recognition, Cultural Transition,
मिथिला
लोकचित्रकला, प्रांरभिक
सफर,
अंतर्राष्ट्रीय
सफर |
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प्रस्तावना
भारतीय
सांस्कृतिक
विरासत के रूप
में अपनी आध्यात्मिक
परम्परा, महिलाओं की
सृजनशीलता
तथा प्रकृति
के प्रति सम्मान
को प्रदर्शित
करनी वाली
मधुबनी लोकचित्र
कला ‘मिथिला
पेंटिग’
‘मिथिला
लोकचित्र कला’
जैसे कई नाम
से जानी जाती
है,
जो बिहार
के पूर्णिया
से लेकर
दरभंगा, मुजफरपुर, सहरसा, मधुबनी, जितवारपुर, समस्तीपुर, चंपारण, राँटी, तथा नेपाल
के तराई
क्षेत्र तक
फली फूली। एक
नये युग में
प्रवेश करने
वाली मिथिला
लोकचित्र कला
किसी समय घर
की दीवारों को
सजाने तक ही
सीमित थी, समय
परिवर्तन के
साथ आज
समकालीन
विचारों को आत्मसात
करते हुये
वैश्विक
क्षितिज पर
अपना परचम
लहरा रही है।
यह शोधपत्र मिथिला
लोकचित्र कला
की विशिष्ट
तकनीक, प्रकार, महत्व एवं
आधुनिकता के
दौर में इसके
परिवर्तित
स्वरूप को
प्रकाशित
करने के
साथ-साथ वैश्विक
क्षितिज पर इस
उत्कृष्ट लोक
कला की पहचान
का विश्लेषण
करता है।
विभिन्न
ग्रन्थों व
पुराणों में
जो वर्णन
मिलता है
तद्नुसार
मिथिला चित्रकला
की ऐतिहासिक
पृष्ठभूमि
राजा जनक के
समय तक जाती
है,
जब
उन्होंने
अपनी पुत्री
सीता के विवाह
के समय अपने
महल एवं
सम्पूर्ण
राज्य को
सजाने के लिये
महिलाओं को
नियुक्त किया
जिसमें
उन्हें राम और
सीता विवाह के
अलौकिक
क्षणों को
चित्रित करने
का आदेश था
तभी से मिथिला
की स्त्रियाँ
मिथिला
लोकचित्र कला की
सृजनिका बनी
एवं एक पीढ़ी
से दूसरी पीढ़ी
को सौंपती आयी
है, ये चित्र
‘कोहबर’ एवं
‘अरिपन’ के रूप
में मुख्यतः
बनाये गये है।
कोहबर
दूल्हा-दुल्हन
के कक्ष कहा
जाता है जिसकी
भीतरी दीवार
पर ‘कोहबर’ चित्रण
की परम्परा
स्वरूप
प्रतीकों के
रूप में बाँस
को वंश वृद्धि
के लिए, पवित्रता के
लिए कमल के
पुष्प का, शिव एवं
गौरी का अंकन
प्रेम एवं
सम्रद्धि स्वरूप
एवं कच्छप, सर्प, मयूर, मछली आदि
चित्रण
प्रमुख रूप से
मिलता है। भूमिचित्रों
के रूप में
‘अरिपन’ को
विभिन्न
ज्यामितीय
आलेखनों
द्वारा अंकित
किया गया।
पारम्परिक
रूप से मैथिल
चित्रों को
गाय के गोबर
एवं मिट्टी से
लिपाई स्वरूप
तैयार धरातल
पर चावल के
लेप का प्रयोग
करके
प्राकृतिक
रंगों से बाँस
की बनी
कंघियों तथा
लकड़ी से बनी
कूंचियों
द्वारा बनाया
एवं चित्रित
किया जाता है
मिथिला
चित्रकला के
चित्रों में
कही भी रिक्त
स्थान छोड़ने
की परिपाटी नहीं
है। इन रिक्त
स्थानों को
विभिन्न
प्रकार के
फूलों, पत्तियों, पक्षियों, पशुओं तथा
ज्यामितीय
डिजायनों
द्वारा पूरित
करना मिथिला
चित्रकला की
विशेषता रही
है। मधुबनी
चित्रकला की
पाँच प्रमुख
शैलियाँ कचनी, भरनी, गोदना, तांत्रिक
और कोहबर भारत
ही नहीं पूरे
विश्व पटल पर
अपनी चमक
बिखेर रही है।
प्राकृतिक
चटख रंगों से
निरूपित
चित्र
द्विआयामी
रूप से चित्रित
होते है। इन
चित्रों की
महत्ता इसी
में झलकती है
कि इन्हें
शादी-विवाह, विभिन्न
उत्सवों, त्यौहारों
जैसे विशेष
अवसरों पर
अवश्य ही बनाने
की प्रथा रही
है। कचनी शैली, में चित्र
व पारम्परिक
रूप से पैटर्न
की जटिलता, बारीक
रेखाओं जो कि
समानांतर होती
है,
लाल, काले, सफेद
जैसे रंगों
द्वारा पूरा
किया जाता है।
जहाँ कचनी
शैली का
केन्द्र
बारीक
रेखायें है वहीं
भरनी शैली में
चित्र ठोस एवं
चटकीले रंगों
के प्रयोग से
(लाल, नीला, हरा, पीला)
ब्राहमण
स्त्रियों के
द्वारा
वैवाहिक अनुष्ठानों, प्रमुख
त्यौहरों पर
बनाये जाते
थे। भरनी शैली
का प्रयोग
चित्रों के
खाली स्थानों
को भरने में
किया जाता है।
वेगा, भील, गोंड, आदिवासियों
की कला ‘गोदना
कला’ कहलाती
है। आत्मिक
जुडाव, जहाँ
सौन्दर्य से
ओत-प्रोत
प्रकृति
प्रेरणा ‘‘गोदना
कला’’ की
विशिष्टता
दर्शाती है
जिसमें त्वचा
के अन्दर प्राकृतिक
स्याही
द्वारा अंकन
करने की प्रथा
है। वहीं
आध्यात्मिक
जगत एवं भौतिक
कला को सेतु
भारतीय
पारंपरिक
ब्रहमांड की
ऊर्जा को नियन्त्रित
करने वाली
ज्यामितीय
आकृति ‘तांत्रिक
शैली’ कहलाई।
मिथिलांचल के
मधुबनी जैसे
एक छोटे जिले
से शुरू होने
वाली ‘मिथिला
लोक चित्रकला’
आज वैश्विक
क्षितिज पर
अपनी धाक जमा
रही है।
दुनिया के
लिये आधी सदी
तक अज्ञात
अद्भुत, अलौकिक
मिथिला
लोकचित्र कला 1934 में
उत्तरी बिहार
में आये
प्रलयकारी
भूकंप के
दौरान प्रकाश
में आयी जब
ब्रिटिश
अधिकारी डब्ल्यू
जी आर्चर ने
इस क्षेत्र का
व्यापक सर्वेक्षण
किया, वहाँ
की भूकंप के
दौरान गिरी
हुई दीवारों
पर पाश्चात्य
एवं आधुनिक
चित्रकारों
के चित्रों से
मेल खाते हुये
चित्र देखे
उन्होनें इन
अद्भुत
चित्रों को
अपने कैमरे
में संजो लिया
और कला एवं
सांस्कृतिक
पत्रिका
‘मार्ग’ में
अपने लेख के
माध्यम से
प्रकाशित
किया। आर्चर
के आलेख में
इस लोकचित्र
कला का परिचय
‘मैथिल पेटिंग’
के नाम से
होता है। 1964 ई0
में जब अकाल
पड़ा तब इस कला
को भी राहत
कार्यक्रम
में जोड़ा गया।
तब लगभग बीस
वर्षो के
अन्तराल के
बाद इस कला को
वैश्विक
क्षितिज पर
पहचान मिली, मिथिला
लोकचित्र कला
ने सफलता की
सीढ़ी पर पहला
कदम तब रखा जब 1948 में भारत
की लोक
चित्रकला का
प्रदर्शन
लंदन में
स्थित आर्ट
गैलरी में
हुआ। 1934 के
भूकंप के तीन
दशक बाद 1964 मे अकाल के
दौरान भारतीय
अखिल हस्त
शिल्प की बोर्ड
निदेशक डा0 पुपुल
जयकर के
निर्देशन में बॉम्बे
के कलाकार, भास्कर
कुलकर्णी
द्वारा
मिथिला की
महिलाओं को
कागज, कैनवास, कपड़े, बोर्ड आदि
विभिन्न
प्रकार के
आधुनिक एवं
हल्कें
माध्यमों पर
चित्रण करने
के लिए
प्रशिक्षण
प्रदान किया
गया।
पूर्वाद्ध
बीसवीं सदी तक
जो कला अपनी
पारंपरिक
चैखट, एक
विशेष
क्षेत्र तक
सीमित थी जो
आमजन की आस्था
जन प्रचलित
रीति-रिवाज
तथा घर आँगन
की दीवारों तक
ही समाहित थी
वो आज बीसवीं
सदी के
उत्तरार्द्ध
मे उन दीवारों
को फाँदकर
वैश्विक
क्षितिज के सफर
पर निकल पड़ी।
सीता देवी
मिथिला कला की
पहली कलाकार
बनी
जिन्होनें
मधुवनी
चित्रकला को दीवारों
से बाहर
निकाला और
कागज तथा
कैनवास पर प्रथम
बार प्रयोग
किया।
जितवारपुर
निवासी जगदम्बा
देवी जो कि
बाल विधवा थी।
महापात्र परिवारी
सीता देवी
मधुबनी
चित्रण में
दक्षता के साथ
अभावग्रस्त
परिस्थितियों
में जीविका वहन
कर रहीं थी।
भास्कर
कुलकर्णी ने
सीता देवी एवं
जगदम्बा देवी
को सस्ते कागज
पर व्यवसायिक
रूप में
चित्रण करने
का आग्रह
किया। इन्ही
के साथ भास्कर
कुलकर्णी
द्वारा ही
जितवारपुर की
अन्य महिलाओं, गंगा देवी, उरवा देवी, भूमादेवी, महासुन्दरी
देवी, कुसुमा
देवी, बौआ
देवी, गोदावरी
दत्त यमुना
देवी आदि को
भित्ति चित्रों
का
व्यावसायिक
रूप में कागज
पर चित्रण के लिये
प्रेरित
किया। इन
महिलाओं
द्वारा जो चित्र
बनाये गये
उनकी
प्रदर्शनी
सेन्ट्रल काटेज
इम्पोरियम, नई दिल्ली
में कुलकर्णी
के
मार्गदर्शन
में लगी इस
प्रदर्शनी का
उद्घाटन
तत्कालीन
भारत की
प्रधानमंत्री
श्रीमती
इंदिरा गाँधी
द्वारा किया
गया, भरपूर
सराहना मिलने
पर मिथिला
पेटिंग की प्रदर्शनी
एवं बिक्री की
शुरूआत हो
गयी। पहले मिथिला
पेटिंग कागज
पर प्राकृतिक
रंगों से बनायी
गयी किन्तु
बाद में ‘‘फोक
टच’’ के लिये
मिट्टी एवं
गोबर के घोल में
चारकोल पाउडर
मिलाकर कागज
पर लगाने के
लिये लेप का
प्रयोग किया
जाने लगा। उस
तकनीक का प्रयोग
कलाकार अपनी
पेटिंग में आज
भी करते है। 1970 में
लोकचित्र को
‘‘मिथिला कला’’
की मान्यता
मिली। उसके
बाद जापान के
हासीगावा के
द्वारा ‘‘मिथिला
म्यूजियम’’ की
स्थापना हुई
जो आज विश्व का
अकेला
अन्तर्राष्ट्रीय
संग्रहालय
है। जहाँ
हजारों
मिथिला चित्र
संग्रहित है।
इसके अलावा
‘चंद्रधारी
संग्रहालय’
दरभंगा, ‘मिथिला आर्ट
सेंटर’ मधुबनी, ‘मिथिला
ललित कला से
संग्रहालय’
सौराठ, बैनीपट्टी
में ‘वैदेही
ग्राम विकास
परिषद’ राँटी
प्रमुख
केन्द्र हैं
जहाँ मिथिला
पेटिंग
संग्रहित
हैं। अमेरिका
के एथनिक
आर्टस
फाउन्डेशन से
रेमन्ड ली एवं
डेविड सेन्टन
द्वारा
मधुबनी की
यात्रा के
दौरान मिथिला
लोकचित्र कला
के ऊपर पुस्तक
लिखी गयी।
मिथिला
चित्रकला के
विस्तार
स्वरूप मॉरीशस, वॉशिंगटन, कोलंबिया, मेक्सिकों, जर्मनी, गुआयना, ब्राजील, थाइलैण्ड, शिकागों, इग्लैण्ड, कनाडा, म्यांमार, पेरू, फ्रांस, लीथोपीडिया, पनामा
सल्वाडोर, रियूनियन
द्वीप आदि
देशाों में
प्रदशर्नियाँ
आयोजित की
गयी। अमेरिका
के नेतृत्व
शाशी रेमण्ड
द्वारा
‘‘मुन्नी’’, ‘‘ए डे इन
मिथिला’’ ‘‘फाइव
पेन्टर्स इन मिथिला’’
के नाम से डॉक्यूमेंटरी
बनायी गयी।
इसी के साथ ही
गंगा देवी, सीता देवी, गोदावरी
दत्त, बौआ
देवी, महासुन्दरी
देवी जैसी
अनेक
कलाकारों ने
विदेश की
यात्रा की
जिनमें
गंगादेवी ने
अमेरिका यात्रा
के अनुभव को
अपनी पेटिंग
‘‘अमेरिका यात्रा’’
नाम से साझा
किया। पूर्व
में मधुबनी
चित्रकला
पारंपरिक रूप
में धार्मिक
अनुष्ठान तक
ही सीमित रही
गंगादेवी ने
अपने
व्यक्तिगत अनुभवों
के चित्रण
द्वारा विषय
सीमाओं को तोड़ते
हुये बाहर की
दुनिया को
कैनवास पर
चित्रित किया।
ग्रामीण
महिला के
मार्मिक जीवन
(जन्म से
विवाह तक)
चित्रण, अपने व्यक्तिगत
संघर्ष के रूप
में कैंसर से
स्वयं की जंग
को चित्रित कर
मिथिला
चित्रकला के
विषयों को
विस्तार
प्रदान किया
एवं वर्तमान
कलाकारों के
लिए नारी
सशक्तिकरण, प्रदूषण, भ्रूण
हत्या, दहेज
हत्या जैसे
सामाजिक
आधुनिक
मुद्दों को चित्रित
करने हेतु
मार्ग
प्रशस्तीकरण
का उत्तम
उदाहरण बनी।
इन कलाकारों
को अनेक
राजकीय, राष्ट्रीय
एवं
अन्तर्राष्ट्रीय
पुरूस्कार
प्राप्त हुए
है। मधुबनी
चित्रकला में
अब प्राकृतिक
रंगों के
साथ-साथ
रासायनिक
रंगों द्वारा
चित्रण शुरू
हो चुका था। 1984 से
मिथिला की
प्रख्यात
मधुबनी
कलाकार भारती दयाल
ने अपनी
पारंपरिक
लोककला में
रासायनिक रंगों
(एक्रेलिक) का
आधुनिक रंगों
के रूप में समावेश
किया। ये अपनी
विशिष्ट
समकालीन चित्रकला
शैली के लिए ‘ए
आई एफ ए एस’, राष्ट्रपति
पुरस्कार
जैसे अनेक
सम्मान से नवाजी
जा चुकी है।
महिलाओं
द्वारा शुरू
हुई घरेलू
चित्रकला कही
जाने वाली
लोककला को आज
पुरूषों ने भी
अपनाया है।
उन्होनें
मिथिला पेटिंग
की विशिष्ट
शैलियों तथा
परम्पराओं को
अपनाते हुए
स्थानीय
महाकाव्य, रामायण के
एपीसोड, अनुष्ठान, किस्से, ग्राम्य
जीवन, आत्मकथा
चित्र, राष्ट्रीय, स्थानीय, अन्तर्राष्ट्रीय
घटनाओं, ग्लोबल
वार्मिंग, आतंकवाद, बाढ़, नारी से
सम्बन्धित
मुद्दों जैसे-
महिला सशक्तिकरण, दहेज
हत्या, भ्रूण
हत्या, कन्या
शिक्षा आदि
विषयों को
चित्रण के रूप
में चुना है।
इन
चित्रकारों
में
कृष्णानंद झा, सत्यनारायण
लालकर्ण, जगदीश
चन्द्र झा का
नाम प्रमुख
है। जिन्होंने
इस कला के
प्रचार एवं
विकास में
महत्वपूर्ण योगदान
दिया है।
मिथिला
चित्रकला के
अपने पूर्व
में मिथिला
ब्राहमण
स्त्रियों
द्वारा चटख
रंगों के साथ
पौराणिक
विषयों पर
चित्र बनाये, कायस्थ
स्त्रियों ने
जटिल
रेखाचित्रों
द्वारा ग्रामीण
दृश्यों का
अंकन किया, हरिजनों
ने अमूर्त
पैटर्न
स्वरूप
‘‘गोदना’’ पर ध्यान
केन्द्रित
किया समय
परिवर्तन
स्वरूप इस कला
ने जाति बंधन
को तो तोड़ा ही
साथ ही पुरूषों
की भागीदारी
भी सुनिश्चित
की है। समय के
साथ इसके
विषयों रंगों
और रचनाओं में
अन्तर आया है।
अब इस कला ने
व्यवसायी करण
की ओर रूख किया
है। सदियों से
मिट्टी की
दीवारों एवं
भूमि पर
परिलक्षित
होने वाली
लोककला आज
कैनवास, कागज, कपड़ा, साड़ी, सूट, चिकनी
मिट्टी से बने
बर्तनों, पेड़-पौधों
विज्ञापन
चित्रों, रेल के
डिब्बे, स्टेशन, आदि पर बनने
लगी है।
समकालीन
राजनैतिक
अस्थिरता को
दर्शाते
संतोष कुमार
जी के चित्रों
में
पारम्परिक
तथा समकालीन
कला का संयोजन
मिलता है। 1962 मे
जन्में
मिथिला
कलाकार संतोष
कुमार जी के कृष्णा
सीरीज एवं
गुजरात
श्रंखला सबसे
प्रसिद्ध
चित्र है। जो
मिथिला कला को
नवीन रूप से सजाते
हे। 2007
में मिथिला
पेटिंग को
(ज्योग्राफिकल
इंडिकेशन)
मिला था, ‘जी आई’ टैग
मिलने से यह
कला विहार के
जिले मधुबनी
की पहचान बन
गयी है जिसके
बाद इसकी
लोकप्रियता
में
अप्रत्याशित
वृद्धि हुई
है। अतः ये कला
भारत ही नहीं
वरन वैश्विक
क्षितिज पर
अपना परचम
लहरा रही है।
सरकार और निजी
संस्थान इस
अलौकिक कला को
सवंर्धित एवं
सरंक्षित करने
के लिए
प्रयासरत है।
डिजिटल
प्लेटफाॅर्म
पर कलाकार
जटिल पैटर्न
एवं रूपांकन
के द्वारा
सोशल मीडिया
डिजायनर
बेबसाइटों डिजिटल
प्रिंट, ग्राफिक्स
तथा डिजिटल
चित्र बना रहे
है। जिससे इस
कला का
विस्तार एवं
पहुँच
वैश्विक स्तर पर
हुआ है।
मिथिला
चित्रकला का
व्यवसायीकरण होने
से वहाँ
महिलायें
आर्थिक रूप से
सशक्त हुई तो
ये लोककला
महिला
सशक्तिकरण का
उदाहरण बनी।
वैश्विक फैशन
जगत एवं
मिथिला
संग्रहालय से
जुड़ाव ने
मधुबनी
चित्रकला के
वैश्विक कला के
रूप में
स्थापित होने
के साथ-साथ इस
कला को
चुनौतियों का
भी सामना करना
पड़ रहा है। आज
पारंपरिक रूप
से घरों की
दीवारों पर
महिलाओं
प्राकृतिक
रंगों एवं
पारंपरिक
विषयों, लोकजीवन, प्रकृति
आदि का अंकन
किया जाता था
वही आज व्यावसायिक
उत्पाद के रूप
में प्रचलित
हो रहा है। मशीन
से निर्मित
उत्पादों ने
कलाकारों की
आजीविका को
संकट में ला
दिया है।
गुणवत्ता में
गिरावट, नकल एवं
प्रिंटेड से
वास्तविक
वास्तुशिल्प को
खतरा है।
निष्कर्ष
मिथिला
पेंटिंग ने
अभी हाल ही
में 24 अप्रैल
से 26
अप्रैल के
मध्य पद्म
श्री बउआ देवी
के निर्देशन
में लगभग 50 छा़त्रों
द्वारा 18.69 मीटर की
पारंपरिक
शैली में
प्राकृतिक
रंगों का
प्रयोग करते
हुए कृति
तैयार करके
आधिकारिक रूप
से 27
अप्रैल 2025 का गिनीज
वल्र्ड बुक
में अपना नाम
दर्ज कराया है।
अनेक
चुनौतियों के
बाद भी मिथिला
लोक चित्रकला
वैश्विक
क्षितिज पर
अपनी पहचान
बना चुकी है।
यूनेस्को
द्वारा
मान्यता, अनेक मिथिला
कलाकारों को
अन्तर्राष्ट्रीय
सम्मान
विदेशों में
अनेक
प्रदर्शनियाँ
इसका उदाहरण
है। भारत तथा
नेपाल में
सरकारी भवन, रेलवे
स्टेशन, एयरपोर्ट
मधुबनी
लोककला से सजे
हुए है। इसकी
केवल
शब्दावली
अभिव्यंजना की
सीमा में
बदलाव हुआ है।
समकालीन
विषयों के अनुकूल
होने के कारण
आज मिथिला लोक
चित्रकला और
भी प्रासंगिक
वन पड़ी है। ये
न केवल हजारों
ग्रामीण
महिलाओं की
आजीविका का
साधन है बल्कि
‘‘वोकल फॉर
लोकल’’ के
माध्यम से
वैश्विक
क्षितिज पर
भारतीय
हस्तशिल्प का
नेतृत्व कर
रही है।
आधुनिकता के
समावेश ने इसे
नई पीढ़ी के
बीच भी
लोकप्रिय बना
दिया है।
जिससे इसका
भविष्य
वैश्विक क्षितिज
पर और भी
सुनहरा हुआ
है।
REFERENCES
Baranwal, S.
(2024). Commercialization and Contemporary Development of Folk Paintings (व्यवसायीकरण
व लोक
चित्रकलाओं
का समकालीन विकास). ShodhKosh: Journal of Visual and Performing Arts,
5(5), 666–674.
https://doi.org/10.29121/shodhkosh.v5.i5.2024.1266
Pathak, S. N.
(2010). Sanskritik Prateek Kosh (सांस्कृतिक
प्रतीक कोश), 96. Prabhat Prakashan.
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