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Original Article

INDIAN CULTURE AND SOCIAL VALUES: AN INTERRELATIONSHIP

भारतीय संस्कृति और सामाजिक सरोकार में अन्तर संबंध

 

Dr. Neeraj Chauhan 1*

1 Assistant Professor, Hindi, Government Maharani Laxmibai Girls Post Graduate College, Kila Bhavan, Indore, India

 

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ABSTRACT

English: Indian culture is regarded as a divine cultural tradition that inspires the inner consciousness of humanity toward higher ideals. It nurtures virtues and encourages individuals to grow ethically and socially. The foundation of Indian culture lies in connecting humanity rather than dividing it, promoting renewal instead of destruction, and fostering organization in place of disintegration. It acts as a transformative force that refines both the individual and society, guiding humans away from base instincts toward higher human values.

A significant feature of Indian culture is its capacity for moral refinement. Just as fire purifies metals by burning away impurities, cultural values reshape human behavior by replacing negative tendencies with constructive qualities. The core objective of Indian culture is the creation of morally enriched individuals. It serves as a revitalizing force that elevates human consciousness toward spiritual and ethical fulfillment.

 

Hindi: भारतीय संस्कृति देव संस्कृति है। समूची विश्व मानवता की अन्त-प्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने, सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने की क्षमता उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। भारतीय संस्कृति जिसका मूल ही है तोड़ने के बजाए मानव को जोड़ना, विनाश के बजाय नवीनता की खोज, विघटन के स्थान पर संगठन का भाव जाग्रत करना। भारतीय संस्कृति अनगढ़ और सुगढ़ बना देने वाला दिव्य रसायन है। इसकी मूलभूत अवधारणा यही रही है कि मानव मात्र ही पशुता से उभरकर मनुष्यता की ओर उन्मुख हो जाए।

भारती संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जिस प्रकार धातुओं को अग्नि में तपाकर कुसंस्कारो को भस्म कर देती है। उसी प्रकार मनुष्य के पशुवत व्यवहारों को इन संस्कारों के व्दारा बदला जा सकता है। भारती संस्कृति का मूलभूत उद्देश्य है, श्रेष्ठ संस्कारवान मानव का निर्माण। भारतीय संस्कृति अनगढ़ मानव को परमात्मा बना देने वाली संजीवनी जड़ी है।

 

Keywords: Indian Culture, Social Values, Moral Development, भारतीय संस्कृति, सामाजिक मूल्य, नैतिक विकास

 


प्रस्तावना

भारतीय संस्कृति हैं जग में अनुपम और महान।

अखिल विश्व ने इससे ही पाये अजस्त्र अनुदान।।

चारों तरफ घुमड़ती थी अज्ञान रात्रि जब काली।

इस संस्कृति ने फैलाई नवप्रभात की लाली।।

समता-ममता प्रेम-दया से बुना धर्म का बाना।

पूर्ण सृष्टि में एक भाव से ही सबको था जाना।।

मुक्त हस्त से बाँटा हमने अपनी शाशवत ज्ञान।

भारतीय संस्कृति है जग में अनुपम और महान।।”

 

भारतीय संस्कृति देव संस्कृति है। समूची विश्व मानवता की अन्त-प्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने, सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने की क्षमता उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। भारतीय संस्कृति जिसका मूल ही है तोड़ने के बजाए मानव को जोड़ना, विनाश के बजाय नवीनता की खोज, विघटन के स्थान पर संगठन का भाव जाग्रत करना। भारतीय संस्कृति अनगढ़ और सुगढ़ बना देने वाला दिव्य रसायन है। इसकी मूलभूत अवधारणा यही रही है कि मानव मात्र ही पशुता से उभरकर मनुष्यता की ओर उन्मुख हो जाए।

भारती संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जिस प्रकार धातुओं को अग्नि में तपाकर कुसंस्कारो को भस्म कर देती है। उसी प्रकार मनुष्य के पशुवत व्यवहारों को इन संस्कारों के व्दारा बदला जा सकता है। भारती संस्कृति का मूलभूत उद्देश्य है, श्रेष्ठ संस्कारवान मानव का निर्माण। भारतीय संस्कृति अनगढ़ मानव को परमात्मा बना देने वाली संजीवनी जड़ी है।

भारतीय संस्कृति की रुपरेखा के संबंध में बाबु गुलाबराय का मत- “संस्कृति को जातिगत संस्कारों में निहित माना है।”Gulabrai (2018) हर मानव जाति की अपनी-अपनी जातिगत विशेषताएँ होती है, हर जाति के भिन्न-भिन्न संस्कार होते हैँ और वह उनमें हमेशा निहित होते हैं।

भारतीय संस्कृति की अपनी एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि अन्य देशों की संस्कृतियों की तुलना में अन्य संस्कृतियों से भिन्न रही है और उसमें कई प्रकार की अनुरूपताएँ हैं। जैस भाषा-भाव, आचार-विचार और रहन-सहन की दृष्टि से देखा जाये तो ऊपरी तौर पर भारत एक देश नहीं प्रतीत होता है। वह तो अनेक भागों के छोटे-छोटे देशों के खण्ड़ों में अनेकता में एकता की भावना निहित हैं। भारतीय लोगों के संबंध में डॉ. राधाकृष्णन अपना अभिमत व्यक्त करते हैं-“भारतीय विचारधारा लोगों को जीवन के किसी विशेष रास्ते पर चलने को बाध्य नहीं करती। वह भारत भूमि पर रहने वाले हर समुदाय को प्रेरित करती थी कि वह अच्छे जीवन की अपनी परिभाषा के अनुसार जीवन-यापन करें।”Surendran (1997)

भारतीय संस्कृति में सामाजिक सरोकार की समन्वयता की भावना पूर्ण रुप से दिखाई देती है। उसके भीतर आस्था, निष्ठा एवं भौतिकता का सुन्दर समन्वय मिलता है किन्तु अन्य देशों की संस्कृतियों में समन्वयता की भावना नहीं देखने को मिलती है। भारतीय संस्कृति में आत्मा के विकास के लिए आध्यात्मिकता तथा शारीरिक, मानसिक विकास के साथ-साथ भौतिक समृद्धि के महत्व को बताया गया है। अज्ञेय जी के अनुसार-“भारतीय संस्कृति व्यक्ति-व्यक्ति में किसी प्रकार के भेद को अंगीकार नहीं करती है। अपनी इसी भावना के कारण इतने आक्रान्तओं को भी अपने कोड में स्थान दिया है।”Agnyea (2010) भारतीय संस्कृति में मानव की समन्वयता भावना का संबंध जन्म से ही रहा है क्योंकि भारतीय संस्कृति में मानव एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देता है।

नैतिकता की भावना भारतीय संस्कृति में नैतिकता एवं शिष्टाचार का हमेशा से सर्वोच्च स्थान रहा है। भारतीय संस्कृति में नैतिकता के आधार पर सारे मनुष्यों के विचार खरे उतरते हैं। अतः तप, जप, त्याग, कल्याण,संयम, सत्यअंहिसा, भाईचारा, समशीलता बड़ों के प्रति सम्मान की भावना एवं सदाचार नैतिकता का ही मार्ग प्रशस्त करती आयी है।

भारतीय समाज में सामाजिक सरोकार के साथ-साथ सत्य और अंहिसा का गुण अति प्राचीन है। ये सभी जीवों एवं मानवों को स्नेह की भावना में अभिमत व्यक्त करती है। अंहिसा का अर्थ होता है सत्यशील, सौन्दर्य एवं माधुर्य का साहस के मैत्रीय भाव का पान करने में सहायता प्रदान करना है।

भारतीय विचारकों ने मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर गम्भीरता से विचार किया है जीवन का बहुमुखी विकास भारतीयों का प्रमुख लक्ष्य रहा है, यही कारण है कि भारतीय संस्कृति का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत एवं व्यापक भी रहा है।

भारतीय समाज में सामाजिक सरोकार और सहिष्णुता, उदारता की भावना भारतीयों की अपनी एक प्राचीन विशेषता पहले से ही रही है। इन सभी को अपने अस्तित्व में धर्म के माध्यम से परस्पर सहिष्णुता की भावना ने अनेक राजाओं को भी भारतीय देश के अन्य विद्वानों ने नही किया होगा क्योंकि भारतीय  परम्परा में पुरूषार्थ की अवधारणा प्राचीन काल से है। उक्त भावना कि अन्तर्गत धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष सभी को पुरुषार्थ या जीवन के आधारभूत तत्व माने हैं। इसका अभिप्रायः यह है कि भारतीय दार्शनिकों ने धर्म या नैतिकता को महत्व दिया है। दार्शनिकता का महत्व देते हुए अरविंद ने लिखा है-“भारतीय सभ्यता में धर्म व्दारा क्रियाशीलता हुआ दर्सन और दर्शन व्दारा आलोकित धर्म ही नेतृत्व करते आए है शेष सभी वस्तुएँकला, काव्य आदि यथा संभव अनुसरण करती रही है, निःसंदेह भारतीय सभ्यता की पहली विशेषता यही है। इसके पीछे तथ्य यह है कि भारतीय संस्कृति आरम्भ से ही एक आध्यात्मिक एवं दार्शनिकता का प्राद्यान्न रहा है।”Ranjan (n.d.) धर्म, दर्शन के द्वारा भारतीय संस्कृति कभी नहीं नष्ट हो सकती है, क्योकिं उसमें मानव धर्म-दर्शन के सभी गुण पाये जाते हैं।

भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता की भावना हमेश से समावेशित होती आयी है। इस कथनके संदर्भ में अरविन्द घोष का मत है-“आध्यात्मिकता भारतीय मस्तिष्क को समझने की कुंजी है।”Wattipal (n.d.) भारतीय मनुष्य आत्मा एवं देवत्व में गहरी आस्था एवं निष्ठा रखते हैं, साथ ही वे भगवान को इस सृष्टि का जनक मानते है।

भारतीय समाज और संस्कृति में सामाजिक सरोकार में लोक कल्याण की भावना सदैव से ही विद्यामान रही है। ‘सर्वभवतु सुखिनाः सर्वे संतु निरामयः यही कल्याण भावना मानव को अपनी ओर लुभाती है। इस धरा पर सभी मानव सुखी हो, सभी बीमारी रहित और सबका हमेशा कल्याण हो। यह इसका मूल तत्व है। समित्रानंदन पंत का मत- “लोककल्यण के लिए जीवन की बाहृय एवं अंतरिक (सम्प्रति, राजनीतिक, आर्थिक और आभ्यंतरिक्त ,  सांस्कृतिक, आध्यात्मिक) दोनों ही गतियों का संगठन करना आवश्यक है।”Pant (1939) लोककल्याण की भावना के लिए मानव को कई प्रकार के कठिन संकटों से गुजरना पड़ता है। भारतीय संस्कृति में मनुष्य तप-जप के व्दारा ही लोककल्याण की भावना प्राप्त कर सकता है। जब तक मानव के अन्दर यह भाव जाग्रत नहीं हो सकते हैं तब तक लोकल्याण की भावना भी नहीं कर सकता।

निष्कर्ष स्वरुप भारतीय सामाजिक सरोकार और संस्कृति की विभिन्न परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति की विभिन्न परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति विश्व की संस्कृतियों से भिन्न और श्रेष्ठ है। आचार-विचार, रहन-सहन, लोक व्यवहार, जीवन-मूल्य, वेशभूषा, उत्सव, विवाह-विषयक रीतियाँ, आदि बातें संस्कृति की पहचान है। किसी व्यक्ति,जाति, राष्ट्र आदि को वे सब बातें जो उनके मन,रुचि, आचार -विचार, कला-कौशल और सभ्यता के क्षेत्र में बौद्धिक विकास की सूचक होती है, अर्थात् हमारे उन संस्कृति मूल्यों को समाज स्वीकृति देता हैं जो मानव के विकास और उसके हित में सहायक होते हैं। संस्कृति मानव के दैनिक जीवन में पाई जाने वाली समस्त वस्तुऐं में आ जाती है। यह अर्जित व्यवहारों की वह व्यवस्था है जिसका उपयोग समाज के व्दारा होता है। संस्कृति में समस्त रीति-रिवाज, प्रथाएँ, रुढ़ियाँ आदि आ जाती है। चाहे व कल्याणकारी हो अथवा न हो।

  

संदर्भ

Gupta, R. (2006). Indian Culture Eternal Approach to Life and Music (भारतीय संस्कृति शास्वत जीवन दृष्टि एवं संगीत). Kanishka Publishers.

Gulabrai, B. (2018). Bharatiya Sanskriti Ki Rooprekha (भारतीय संस्कृति की रुपरेखा), 1. Prabhat Prakashan.

Surendran, R. (1997). Swatantrayottar Hindi Upanyas (स्वतांन्न्योत्तर हिन्दी उपन्यास), 16. Lok Bharati Prakashan.

Agnyea (Ed.). (2010). Aadhunik Hindi Sahitya (आधुनिक हिंदी साहित्य ). 18. Sasta Sahitya Mandal.

Ranjan, H. (n.d.). Sankshipt Shabdkosh (संक्षिप्त शब्दकोश), 8. V&S Publishers.

Wattipal, R. S. D. (n.d.) titled Internationalism: The Growth of Our Love (शीर्षक अन्तर्राष्ट्रीयता हमारे प्रेम का विकास), 12.

Pant, S. N. (1939). Yugvani (युगवाणी). BharatDiscovery.org.

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