Original Article
Mandana the expressive art form of tribal regions: literacy and social perspective
जनजातीय
अंचल की सरस
अभिव्यक्ति
मांडना: साहित्यिक
एवं सामाजिक
परिप्रेक्ष्य
प्रस्तावना
माण्डना लोक कला
जनजातीय अंचल
की एक समृद्ध,
सांस्कृतिक
और कलात्मक
धरोहर है जो
देश के विभिन्न
क्षेत्रों
मुख्यतरू
राजस्थान,
मध्यप्रदेश,
गुजरात और
अन्य जनजातीय
समुदाय में
प्रचलित है।
यह सदियों से
चली आ रही
पारंपरिक लोक
कला न केवल
सौन्दर्य
अंकन का
माध्यम है
बल्कि सामाजिक,
सांस्कृतिक
और धार्मिक
मूल्यों का
प्रतीक भी है
जो जनजातीय
समुदायों को
एक सूत्र में
पिरोहे हुए
हैं जो हर
क्षेत्र में
एक अलग नाम से
पहचानी जाती
है और चित्रण
अंकन विषयों
में भी भिन्नता
दिखाई देती
है। माण्डना
कला में ज्यामितीय
आकृतियों,
प्राकृतिक
तत्वों और
धार्मिक
प्रतीकात्मक चित्रों
का अधिकांश
अंकन देखने को
मिलता है जो
प्राचीन काल
से चली आ रही
परंपराओं का
एक अनोखा
तालमेल है,
जो
जनजातीय
समुदाय की
जीवनशैली,
धार्मिक
आस्था एवं
प्रकृति के
साथ गहरे लगाव
को प्रदर्शित
करता है। जब
से मानव की
उत्पत्ति हुई
हैं तब से लोक
कलाएं अनेको
रूपों में समुदायो
के साथ चली आ
रही हैं जो
समुदाय की एक
अलग पहचान है,
ऐतिहासिक
कला एवं
कहानियों को
जीवंत रखे हुए
हैं।
|
चित्र 1
|
समकालीन
युग में
मांडणा कला का
स्वरूप बदल रहा
है। नगरीकरण,
वैश्विक
स्तर व तकनीकी
युग के प्रभाव
से यह पारंपरिक
कला समकालीन
सन्दर्भों
में नए आयाम प्राप्त
करने में कुछ
हद तक सफल रही
है। वर्तमान
में मांडणा
कला को न केवल
ग्रामीण अंचल
में बल्कि
शहरों में भी
लोक कला से
जुड़े लोग अपने
घरों में
स्थान प्रदान
करने लगे हैं।
साथ ही कला
प्रदर्शनियों,
धार्मिक
एवं
सांस्कृतिक
मंचों एवं
वस्त्रों पर
भी देखा जा
सकता है जो
मांड़ना लोक
कला को विश्व
स्तर पर पहचान
दिलाने में
अहम भूमिका निभाएगा।
हालांकि इन
परिवर्तनो के
साथ ही कला को
अनेकों नई
चुनौतियों का
सामना करना पड़
रहा है जैसे
की पारंपरिक
ज्ञान का
लुप्त होना,
पर्यावरणीय
संसाधनों की
विलुप्तता,
वर्तमान
जीवनशैली के
दुष्प्रभाव।
इन चुनौतियों
का सामना करते
हुए मांडणा
कला जनजातीय समुदायो
की
सांस्कृतिक
धरोहर को
संरक्षित करने
और इसे नवीन
पीढ़ी तक
पहुंचाने में
महत्वपूर्ण
भूमिका निभा
रही है।
अध्ययन
का उद्देश्य -
प्रस्तुत शोध
पत्र में
जनमानस की
लोकप्रिय कला मांडणा
के समाज के
साथ ही
साहित्यिक
महत्व को
दर्शाने का
प्रयास किया
गया है। साथ
ही कालक्रम के
अनुसार आए
परिवर्तन को
दर्शाना है
जिससे कच्चे
घरों से पक्के
महलों तक का सफर,
खनिज
रंगों के
स्थान पर
कृत्रिम
रंगों को भी उपयोग
में लिया जाने
लगा है।
वर्तमान समय
में लोककला पर
आधुनिकता का
प्रभाव बढ़ गया
है जिससे मांडणा
कला अपना मूल
स्वरूप खोती
जा रही है। यह
शोध आलेख लोक
कलाओं के
संरक्षण में
मील का पत्थर
साबित होगा,
साथ ही
भविष्य में
मांडणा कला को
मजबूत स्थिती
प्रदान
करेगा।
साहित्य
समीक्षा -
लोक कला
मांडना पर
साहित्य रचना
प्राचीन काल से
समृद्ध रही है
जो ग्रामीण
अंचल में
जनजातीयो से
जुड़ी हैं।
प्रारंभिक
कार्यों में
डॉ. हजारी
प्रसाद
द्विवेदी की
“हिंदी
साहित्य की भूमिका”
में लोक कलाओं
का
विस्तारपूर्ण
उल्लेख हुआ है,
जहाँ
मांडना लोक
कला को
मांगलिक एवं
वैदिक यज्ञ
वेदियो से
जोड़ा गया है।
यह लोक कला
मुख्यतः मीणा
जनजातीय
समुदाय की
प्राचीन काल
से चली सांस्कृतिक
परंपरा है जो
मध्यप्रदेश,
राजस्थान
के आदिम
समुदायों में
प्रचलित हैं।
यह शोध लेख
तकनीकी
माध्यम एवं
ज्यामितीय मांगलिक
एवं
प्राकृतिक चिन्हों
पर विस्तार से
चर्चा करता
है।
समकालीन
साहित्य में
मांडना कला को
राजस्थान की
विरासत के रूप
में चित्रित
किया गया है,
जहाँ पर
भौगोलिक
विस्तार में
पूर्वी
प्रदेशो
(जयपुर, टोंक,
सवाईमाधोपुर)
व दक्षिणी
जनजातीय
बाहुल्य प्रदेश
(उदयपुर, डुंगरपुर,
बांसवाड़ा)
के आस-पास
अपनी अलग
पहचान बनाए
हैं।
साहित्यकार
मांडना कला के
मांगलिक व
धार्मिक
पर्वों पर
अंकित
चित्रों व
माध्यमों का
उल्लेख करते
हैं, साथ
ही नगरी करण
से लोक कलाओं
को जिन
चुनौतियों का
सामना करना पड़
रहा है उन पर
प्रकाश डालने का
प्रयास करते
हैं, साथ
ही भील
जनजातियां जो
प्रकृति के
निकट हैं उनके
योगदान पर
ध्यान
आकर्षित करता
है,
जहाँ
मांडना को
प्रकृति एवं
दैनिक जीवन की
दिनचर्या से
जुड़े होने का
बतलाया गया
है।
इस
शोध पत्र में
पारंपरिक एवं
समकालीन
परंपरा तथा
साहित्यिक
भूमिका का
तुलनात्मक
विश्लेषण
करते हुए
माध्यम, उपयोग एवं
वर्तमान
स्थिति को
दर्शाने का
प्रयास किया
गया है।
जनजातीय
बाहुल्य
क्षेत्र का
सर्वेक्षण
करते हुए लोक
कला से जुड़े
तथ्यों को
एकत्रित किया
गया है, साथ ही
अनेकों
पुस्तकों,
पत्र-पत्रिकाओं
व वेबसाइट से
तथ्यों को
जुटाने का अथक
प्रयास किया
गया है। यह
शोध पत्र मांडना
कला के लिए एक
विश्वसनीय
स्रोत साबित
होगा।
पारंपरिक मांडना : उत्पत्ति, तकनीक एवं सांस्कृतिक महत्व
उत्पत्ति
एवं
क्षेत्रीय
विस्तार -
मांडणा कला की
उत्पत्ति
वैदिक युग से
मानी जाती है
जहाँ इसकी
प्रेरणा यज्ञ
वेदिकाओं एवं
वास्तु पुरुष
मंडलों से ली
गई है। यह लोक
कला जनजातीय
बाहुल्य
क्षेत्रों
में प्रचलित
रही है। मीणा,
भील, सहरिया,
श्रीमाली
ब्राह्मण
समुदायों में
यह मातृसत्तात्मक
रही है जो
इन्हें अपने
सुख-दुख, मांगलिक
अवसरों पर
महिलाएं अपने
घर-आंगन में सृजित
करती हैं। यह
कला प्राचीन
काल में पर्यावरणीय
सामंजस्य
बनाए हुए रही
हैं जिसमें हर
एक माध्यम
प्रकृति से
जुड़ा रहा है।
|
चित्र 2
|
मांडना
अंकन माध्यम
एवं तकनीक -
पारंपरिक
मांडना कला की
शुरुआत
प्रमुखतः प्राकृतिक
सामग्रियों
पर आधारित रही
है जिन्हें
आदिवासी
महिलाएं अपने
आसपास से
आसानी से एकत्रित
कर लेती थीं
जिसमें
प्राकृतिक
धरातल तैयार
करने के लिए
गाय के गोबर
में मिट्टी
मिलाई जाती थी
और अपने
आशियाने की
भित्ती व आंगन
को नया रूप
प्रदान करती
थी। मांडना
अंकन के लिए
गेरू, खड़िया एवं
चूने का
प्रयोग
रंगाकन के लिए
किया जाता था।
चित्रण अंकन
के लिए खजूर
की टहनियों,
पशुओं की
पूँछ के बाल
एवं हाथ की
अंगुलियों का
प्रयोग
प्रमुखतः
किया जाता था।
यहाँ सफेद रंग
को शुद्धता
एवं गेरू को
उर्वरता एवं
प्रेम का
प्रतीक माना
जाता रहा है।
यह
राजस्थान में
आंगन, भित्ती व
दरवाजों पर
अंकित की जाती
है,
मध्यप्रदेश
में मुख्यतः
फर्श पर
अधिकांश चित्रण
देखने को
मिलता है जहाँ
ज्यामितीय
अनुपात की
अपेक्षा
बनावट
प्रधानतः रही
है। समकालीन
युग में
मांडना अंकन
को कपड़ा, कागज,
लकड़ी के
बोर्ड, वस्त्रों
पर भी अंकित
किया जाने लगा
जिसमें कृत्रिम
माध्यमों का
प्रयोग किया
जाने लगा है।
डिजीटल, रंग, ब्रश,
छापाकंन
प्रमुख हैं जो
इसके मूल
स्वरूप से अलग
पहचान प्रदान
कर रहा हैं।
ज्यामितीय
एवं
प्राकृतिक
रूप रूपांकन -
शुभ मांगलिक
अवसरों पर
आस्था से
प्रेरित जनजातीय
समुदाय होने
को प्राकृतिक
व ज्यामितीय चित्रों
का अंकन करता
रहा है जिसमें
हर एक चित्रण
का अवसर के
अनुसार अलग
महत्व रहा है
और प्रत्येक
चित्र का एक
स्थान
निश्चित होता
है जैसे
पग्लया
मांडना अंकन
दरवाजे पर किए जाते
थे,
ओम, स्वास्तिक
को मांगलिक
अवसरों पर
अंकित करते थे।
ज्यामितीय
चित्रों का
अंकन आंगन के
मध्य भाग में
फूल-पत्ती एवं
पशु-पक्षियों
को भी दरवाजों
पर सजावट के
रूप में अंकित
करते थे जो सजीवता
एवं मानव का
प्रकृति के
प्रति प्रेम
को दर्शाता
रहा है।
नृत्य
चित्रण भी भील
जाति की
महिलाएं
भित्तियों पर
अंकित करती
रही हैं जो
सामूहिक
मेलजोल एवं
एकता को
प्रदर्शित
करता है। साथ
ही अपने लोक
देवी-देवताओं
के चित्रण को
भी मांडना
अंकन में
दर्शाने का
प्रयास किया
जाता रहा है।
मुख्यतः
राजस्थान,
मध्यप्रदेश
में ये कला
दीपावली, होली,
रक्षाबंधन,
श्रावण
तीज एवं गणगौर
पर अंकित की
जाती है जिसमें
अवसर के
अनुसार
ज्यामितीय
एवं प्राकृतिक
चित्र को
शामिल कर लिया
जाता है।
यह
लोक कला
जनजातीय
संस्कृति के
साथ ही मानव का
प्रकृति के
प्रति प्रेम
को भी दर्शाती
रही है जिसके
प्रमाण हमें
देखने को
मिलते रहे
हैं। मांड़ना
लोक कला
जनजातीय जीवन
का दर्पण कही
जाती है जिससे
उनकी आस्था
एवं मानसिक
विचारों का
पता लगाया जा
सकता है।
जनजातीय
बाहुल्य क्षेत्रो
|
चित्र 3
|
में
वर्तमान युग
में भी यह लोक
कला देखने को
मिल जाती है।
कुछ कलाकार इस
कला को
प्रदर्शनियो
में भी
प्रदर्शित
करते रहे हैं
जो कला की अपनी
लोकप्रियता
को बनाए रखने
का काम कर रही
है।
समकालीन
परिप्रेक्ष्य
एवं प्राचीन
रूप सौंदर्य -
समकालीन युग
में नगरीकरण
के कारण लोक
कलाएं संकट की
स्थिती में
हैं। हर
क्षेत्र में
विकास के नाम
पर प्राचीन
काल से चली आ
रही कलात्मक परंपराओं
को पीछे छोड़
आगे बढ़ने की
होड़ लगी हुई है
जिसके कारण
लोक कलाओं पर
भी आधुनिकता
की मार पड़ी है
और वर्तमान
में जनजातीय
लोक कलाओं को
संरक्षित
रखना चुनौती
बनता जा रहा
है।
कच्चे
आशियानो की
जगह पक्के
महलों ने ली
जहाँ मिट्टी
का प्रयोग
नहीं होकर
कंक्रीट को
उपयोग में
लिया जा रहा
है जिसमें
लोककला को
अंकित करना
पहले की
अपेक्षा कठिन
हो गया है और
मानव रंग-रोगन
की चमक में
उलझ कर अपने
अतीत को भुलता
जा रहा है।
इसके साथ ही
डिजिटल युग के
कारण नारी
जीवन भी
मोबाइल एवं
अन्य कार्यों
में व्यस्त हो
गयी है जो लोक
कलाओं को
अंकित करने का
कार्य करती
थी। आज
शिक्षित वर्ग
के कारण समय
की
अपर्याप्तता
भी एक बड़ा
कारण बनता जा
रहा है।
|
चित्र 4
|
जनजातीय
समुदायो में
भी अब विकास
की होड़ लगी है
जिसकी वजह से
इस कला को समय
नहीं दे पाने
के कारण पीढ़ी
दर पीढ़ी ह्रास
होता जा रहा
है। फिर भी
कुछ समकालीन
लोक कलाकारों
के माध्यम से
इस कला को
जीवंत रखने के
अथक प्रयास
किए जा रहे हैं।
कला
प्रदर्शनियो,
पर्यटन
स्थलों, सांस्कृतिक
मंचों एवं
डिजिटल
दुनिया के माध्यम
से लोक कला का
प्रचार-प्रसार
करने के अथक प्रयास
किए जा रहे
हैं।
लोक
कला मांडना
परंपरा
एवं वैश्विक
प्रसार -
समकालीन लोक
कला मांडना,
कपड़ा,
कैनवास,
हार्डबोर्ड
पर
स्थानांतरित
हो गया है
जिसमें अंकन
के लिए
प्रशिक्षित
कलाकार
तुलिका के माध्यम
से खनिज रंगों
के स्थान पर
तेल रंगों को
प्रयोग में
लेने लगे हैं।
चित्रण अंकन
में भी
पारंपरिक
विषयों के
स्थान पर
आधुनिक
विषयों को
अंकित करने
लगे हैं।
जनजातीय
क्षेत्रों में
कला
प्रदर्शनिया
एवं शिविर
आयोजित कर लोक
कला से जुड़े
समुदायों को
प्रशिक्षित
किया जा रहा
है। उन्हें
स्थानीय स्तर
पर रोजगार के
अवसर प्रदान
किए जा रहे
हैं ताकि वे
अपनी परंपरा
से जुड़े रहे।
|
चित्र 5
|
प्रशासनिक
स्तर पर भी
अनेक लोकिक
जीवन उत्थान
के लिए
प्रयोजनाएं
चलाई जा रही
हैं ताकि इस कला
को देश-प्रदेश
के साथ ही
वैश्विक स्तर
पर भी पहचान
प्रदान की जा
सके। कलाकार
नई डिजिटल मीडिया
तकनीकी का
अनुप्रयोग कर
कला उत्थान में
अपनी भूमिका
अदा कर रहे
हैं जिससे कला
का पुनरुद्धार
हो सके और
विश्वपटल पर
अपनी अलग सांस्कृतिक
पहचान बना
सके।
सामाजिक
एवं
साहित्यिक
परिप्रेक्ष्य
में मांडना
कला - आदिवासी
समुदाय में
लोककला
परंपरा
आदिकाल से चली
आ रही है
जिसमें वे
गाने बजाने के
साथ चित्र
अंकन को भी
अनेकों
धार्मिक एवं
मांगलिक अवसरों
पर बखूबी करते
रहे हैं।
मुख्यतः
मांडना अंकन
परंपरा जो
इनके जीवन का
एक अभिन्न अंग
बन चुकी है।
तीज - त्यौहार,
वैवाहिक,
सामाजिक,
मांगलिक
उत्सवों में
मांडना के
बिना इनकी रस्म
आरंभ नहीं
होती। साथ ही
महिलाएं
चित्रांकन के
साथ लोकगीतों
को भी
गुनगुनाती है
जो तीज - गणगौर
पर्व पर
सर्वाधिक गाए
जाते हैं।
“रंगीला
ईसर गौरां ले
पधारो महारे
पांवणा
अजी हाँ
जी प्यारा
पांवणा
घिस - घिस
चंदन आंगना
लिपांवा
मोतियां
रा चैक
पुरावणा।।”
सावन
मास में तीज
के उत्सव एवं
गणगौर पर इन
लोकगीतों को
गुनगुनाते
हुए महिलाएं
आंगन में मांडना
अंकन करती
हैं। कई लोक
गीत ऐसे भी
हैं जिनमें
मांडना
आकृतियों की
तकनीक का
उल्लेख किया
गया है।
ग्रामीण अंचल
में गोबर से
कच्चे फर्श की
लिपाई करने के
बाद चैक मांड़ा
जाता है जिसका
बड़ा ही सुंदर
वर्णन इस गीत
में किया गया है
.
“हरा - भरा
गोबर आंगना
लिपांवा
मोतियां
रा चैक
पुरावणा
भाई आज
सुदिन करांणा
बधावणा।। ”
इस
लोक साहित्य
ने लोक कलाओं
को आज भी
ग्रामीण अंचल
के जनजातीय
समुदायों में
जीवंत रखा हुआ
है। मुख्यतः
त्योहारों पर
एवं सावन मास
में महिलाएं
मांडणा अंकन
करती हैं और
साथ में लोकगीतों
को दोहराती
है।
|
चित्र 6
|
निष्कर्ष
जनजातीय
अंचल की
सदियों से चली
परंपरा में मांडना
कला
सांस्कृतिक
धरोहर का
जीवंत प्रतीक है
जो प्राचीन
काल से
वर्तमान
अनुकूलता की
यात्रा को
प्रदर्शित
करती है। यह
लोक कला न
केवल
सौन्दर्यबोध
को दर्शाती
हैं बल्कि
सामुदायिक
एकता, पर्यावरण
के प्रति
प्रेम को भी
प्रतिबिंबित करती
हैं। समकालीन
चुनौतियों के
बावजूद आज भी
कैनवास, वस्त्र,
डिजिटल
मीडिया
रूपांतरण ने
नई पीढ़ी को
आकर्षित किया
है।
लोक
कला संरक्षण
के लिए
प्रशासनिक
नीतियों के
माध्यम से
वैश्विक
मंचों पर लोक
कला को प्रदर्शित
करने का
प्रयास किया
जा सकता है।
अतः यह शोध
पत्र
पारंपरिक एवं
समकालीन लोक
कला में परिवर्तन
को दर्शाने का
प्रयास करेगा,
साथ ही
मांडना कला
में भविष्य
में नए अवसर
प्रदान
करेगा। जिससे
सांस्कृतिक
धरोहर मांडना को
सदियों तक
जीवंत रखा जा
सकेगा।
युवाओं और शोधार्थियों
के लिए अति
ज्ञानवर्धक
रहेगा। इससे
आदिम लोक कला
का ज्ञान
अर्जन किया जा
सकेगा।
ACKNOWLEDGMENTS
None.
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