Original
Article
RELATIONSHIP BETWEEN FOLK ARTS OF THE MALWA REGION AND HOME SCIENCE
मालवांचल
की लोक कलाओं
का गृह
विज्ञान से
संबंध
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Mayuri
Yashodhra 1* 1 Professor, Government Maharani Lakshmibai Girls PG College, India |
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ABSTRACT |
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English: The Malwa region of Madhya Pradesh, located in the western part of the state, includes major cities such as Indore, Ujjain, Ratlam, Neemuch, and Dewas. Historically, it was part of the ancient Avanti Mahajanapada and is known for its prosperity, culture, and heritage. The major folk arts of Malwa include Mach folk theatre, Mandana decorative art, Sanja wall painting, the Malwa painting style, clay art, metal craft, and folk music and dance traditions such as Matki and Garba. These art forms vividly represent the cultural identity and lifestyle of the region. The folk arts of Malwa are not merely a source of entertainment; they also function as an effective medium for learning and understanding principles of Home Science. Through these arts, students can practically engage with concepts such as home decoration, culinary practices, family care, child upbringing, and social development and extension education. Thus, Malwa’s folk traditions provide a meaningful way to apply Home Science principles in everyday life. This article attempts to highlight how various folk arts of Malwa can serve as a foundation for understanding and teaching Home Science in a practical, culturally rooted manner. Hindi: मालवा
क्षेत्र
मध्यप्रदेश
का एक मुख्य
क्षेत्र जो
पश्चिम
मध्यप्रदेश
में स्थित है
इसमें
इंदौरए
उज्जैनए
रतलामए नीमच और देवास
जैसे प्रमुख
शहर
सम्मिलित है। मालवा
प्राचीन
अवंती
महाजनपद का
हिस्सा है यह
क्षेत्र
अपनी
समृद्धिए
संस्कृति और
इतिहास हेतु
जाना जाता
है। मालवा
क्षेत्र की
प्रमुख लोक
कलाओं में
माच ;लोकनाट्यद्ध
मंडानाए
संजा ;भित्तीचित्रद्ध मालवा
चित्रकला
शैलीए
मिट्टी की
कलाए धातु
कला और
लोकगीत व
नृत्य ;मटकीएगरबाद्ध
सम्मिलित है
जो क्षेत्र
की संस्कृति
और जीवन शैली
को दर्शाते
हैं मालवांचल
की लोक कला न केवल
मनोरंजन का
साधन है
बल्कि वह गृह
विज्ञान के
सिद्धांतों
को सीखने और
समझने का एक
प्रभावी
तरीका है इन
कलाओं के
माध्यम से
विद्यार्थी
गृह विज्ञान
के
सिद्धांतों
जैसे .
गृहसज्जाए
पाककलाए
परिवार के
सदस्यों की
देखभाल एवं बाल
पालन और
सामाजिक
विकास एवं
प्रसार
शिक्षा आदि विषयो
की
शिक्षा
प्राप्त कर
सकते
है।
मालवांचल की लोक
कला गृह
विज्ञान के
सिद्धांतों
को
व्यावहारिक
रूप से लागू
करने का एक
अच्छा साधन
है द्य इस लेख के
माध्यम से यह
उजागर करने
का प्रयास
किया गया है
कि मालवा की
विभिन्न लोक
कलाएं गृह
विज्ञान
विषय को
समझने एवं
उसकी शिक्षा
प्राप्त
करने हेतु
आधार बन सकती है। Keywords: Malwa Region, Folk Arts, Home Science,
Cultural Heritage, Traditional Crafts, मालवा
क्षेत्र, लोक
कलाएँ,
गृह
विज्ञान, सांस्कृतिक
विरासत, पारंपरिक
शिल्प |
||
प्रस्तावना
मालवांचल (मालवा क्षेत्र)
मध्य भारत
का एक
ऐतिहासिक
और सांस्कृतिक
अंचल है,
जो मुख्य
रूप से
मध्य प्रदेश
के पश्चिमी
भाग और
राजस्थान
के कुछ
दक्षिण-पूर्वी
हिस्सों में फैला
हुआ है।
मालवा एक ऊँचा
पठार है।
इसकी सीमाएँ
उत्तर में चंबल
नदी और
राजस्थान
का हाड़ौती
क्षेत्र तथा दक्षिण
में विंध्य
पर्वत शृंखला और नर्मदा
घाटी तक
फैली हुई
है यहाँ
की मिट्टी
काली और
बेहद उपजाऊ
है, जो
कपास, सोयाबीन
और गेहूँ
की खेती
के लिए
सर्वोत्तम
मानी जाती
है। शांत
जलवायु होने
के कारण
महान चीनी
यात्री फाह्यान ने मालवा
की जलवायु
को "विश्व
की सर्वश्रेष्ठ
जलवायु" कहा था,
क्योंकि यहाँ न तो
अधिक गर्मी
पड़ती है और न
ही अधिक
ठंड होती है।
मालवा को पश्चिमी
मध्यप्रदेश
का ह्रदय
कहा जाता
है, गहरी
ऐतिहासिक
जड़ों के
लिए जाना
जाता है।
इसकी सीमाएँ
उत्तर में चंबल
नदी और
राजस्थान
का हाड़ौती
क्षेत्र तथा दक्षिण
में
विंध्य पर्वत शृंखला
और नर्मदा
घाटी तक
फैली हुई
है। मालवा
का इतिहास
बहुत गौरवशाली
रहा है
प्राचीन काल यहाँ
महान राजा
विक्रमादित्य
का शासन
था। उज्जैन
(अवंतिका) प्राचीन भारत के
प्रमुख व्यापारिक
और सांस्कृतिक
केंद्रों
में से
एक था।
परमार वंश
राजा भोज (धार)
के शासनकाल
में मालवा
शिक्षा और कला
का केंद्र
बना। मुगल
और मराठा
काल: बाद
में यह
मुगलों और फिर
मराठों (होल्कर और सिंधिया)
के अधीन
रहा। देवी
अहिल्याबाई
होल्कर का शासनकाल
मालवा का स्वर्ण
युग माना
जाता है।
प्रमुख नदियों में चंबल,
शिप्रा, काली सिंध
और पार्वती
सम्मिलित
हैं। मालवा
पश्चिमी मध्यप्रदेश
के एक
बड़े हिस्से
को कवर
करता है
और थोड़ा
सा राजस्थान
में भी
फैला हुआ
है। स्थानीय
बोली मालवी
है, जिसमें
एक मधुर,
लयबद्ध स्वर है,
हालांकि हिंदी व्यापक
रूप से
बोली जाती
है। इसे
मध्यप्रदेश
की गेहूं
की टोकरी
कहा जाता
है। यह
सोयाबीन, गेहूं, कपास
और अफीम
(विशेष रूप से
मंदसौर और नीमच
में) का
एक प्रमुख
उत्पादक है। इंदौर,
उज्जैन, रतलाम, नीमच और देवास जैसे
प्रमुख शहर सम्मिलित
है। इंदौर
वाणिज्यिक
राजधानी और भारत
का सबसे
स्वच्छ शहर है।
मालवा की लोक
कलाओं में
माच (लोकनाट्य),
मांडणा (चित्रकला), संजा (भित्तीचित्र) मालवा
चित्रकला
शैली, मिट्टी
की कला,
धातु कला
और लोकगीत
व नृत्य (मटकी,गरबा) सम्मिलित है जो क्षेत्र की संस्कृति
और जीवन
शैली को
दर्शाते हैं। इनका
निर्माण न
केवल कलात्मक
है, बल्कि
इनके पीछे
एक व्यवस्थित
प्रक्रिया
और वैज्ञानिक
आधार भी हैं।
माच मध्य
प्रदेश के मालवा
अंचल का
एक प्रमुख
और अत्यंत
लोकप्रिय
लोकनाट्य
है। यह
न केवल मनोरंजन का साधन
है, बल्कि
मालवी संस्कृति और परंपराओं
का जीवंत
प्रतीक भी है।
माच शब्द
संस्कृत के मंच
से बना
है। इसका
प्रदर्शन
लकड़ी के
ऊंचे तख्तों
पर किया
जाता है,
ताकि दूर
बैठे लोग
भी इसे
देख सकें।
पारंपरिक
रूप से
यह रात
भर चलता
है और
अक्सर होली के
आसपास या विशेष
उत्सवों पर आयोजित
होता है।
परंपरागत
रूप से
माच में
केवल पुरुष
ही भाग
लेते हैं।
महिला पात्रों (महिला भूमिकाओं)
का अभिनय
भी पुरुष
ही करते
हैं।इसमें
ढोलक और
सारंगी का मुख्य
प्रयोग होता है।
संवाद गायन शैली
में होते
है। माच
की कहानियाँ
आमतौर पर पौराणिक
कथाओं, ऐतिहासिक वीर गाथाओं
(जैसे राजा
भरथरी, राजा हरिश्चंद्र)
और स्थानीय
प्रेम कहानियों पर आधारित
होती हैं।
इसके संवादों
में मालवी
बोली की
मिठास और लोक
जीवन के
मुहावरे स्पष्ट झलकते हैं।
मांडणा मध्य प्रदेश
की एक
पारंपरिक
लोक कला
है मांडणा
(Mandna) राजस्थान
और मध्य
प्रदेश के मालवा
क्षेत्र की एक बहुत ही
खूबसूरत और पारंपरिक
लोक कला
है। यह
मुख्य रूप से
दीवारों और फर्श
पर बनाई
जाने वाली
एक प्रकार
की रंगोली
है। मांडणा
शब्द 'मंडन'
से आया
है, जिसका
अर्थ होता
है "सजावट"
या "अलंकरण"।
यह कला
केवल सजावट
के लिए
नहीं, बल्कि
शुभ अवसरों
पर देवताओं
के स्वागत
और नकारात्मक
ऊर्जा को दूर
रखने के
लिए बनाई
जाती है।
इसे आमतौर
पर मिट्टी
और गोबर
से लिपे
हुए फर्श
या दीवारों
पर बनाया
जाता है।इसमें
मुख्य रूप से
दो ही
रंगों का उपयोग
होता है
- खड़िया (सफेद मिट्टी)
आकृतियाँ
बनाने के लिए
तथा
गेरू (लाल मिट्टी)
पृष्ठभूमि
तैयार करने के
लिए । पुराने
समय में
इसे उंगलियों
या दातून
की कूची
से बनाया
जाता था।
मांडणा में ज्यामितीय
आकृतियों
का बहुत
महत्व है। इसमें
अक्सर पगल्या, साथिया (स्वास्तिक) पशु-पक्षी मोर,
कछुआ, कमल
का फूल
और बेल-बूटे
बनाई जाती
है। मांडणा
मुख्य रूप से
त्योहारों
(जैसे दीपावली,
होली और
गणगौर) और शादी-ब्याह,
, बच्चे का जन्म
आदि शुभ
अवसरों पर बनाया
जाता है। मांडणा
कला में
रेखाओं का गणित
बहुत सटीक
होता है।
बिना किसी
स्केल या सांचे
के, महिलाएं
केवल अपनी
उंगलियों
से बेहद
जटिल और
सटीक त्रिकोण
और वृत्त
बना लेती
हैं। जिसमें
देवी-देवताओं
का स्वागत
करने, त्योहार
मनाने और घर की रक्षा
करने के
लिए मिट्टी
से सनी
दीवारों या फर्श
पर जटिल
सफेद आकृतियाँ
बनाई जाती
हैं। महिलाएं
सफेद चाक
या चूने
का उपयोग
करके वर्ग,
त्रिभुज और वृत्त
जैसे ज्यामितीय
पैटर्न बनाती हैं,
जो अक्सर
देवी-देवताओं
या प्रकृति
का प्रतिनिधित्व
करते हैं।
संझा परंपरागत
रूप से
गाय के
गोबर और
मिट्टी/टेराकोटा से तैयार
फर्श या
दीवारों पर सफेद
चाक (खड़िया),
चूना या
ऐक्रेलिक
रंगों का उपयोग
करके चित्र
बनाए जाते
हैं। संझा
मुख्य रूप से
पितृपक्ष
(श्राद्ध पक्ष) के
16 दिनों के दौरान
मनाया जाने वाला
पर्व है।
इसमें कुँवारी कन्याएँ दीवारों
पर गोबर
से आकृतियाँ
बनाती हैं और
उनकी पूजा
करती हैं।
इसे बनाने
के लिए
ताजे गाय
के गोबर,
ताजे फूलों
की पंखुड़ियों,
चमकीली पन्नी (किन्नी)
और कौड़ियों
का उपयोग
किया जाता
है। गोबर
से दीवार
पर प्रतिदिन
अलग-अलग आकृतियाँ उकेरी जाती
हैं। हर
दिन की
एक निश्चित
आकृति होती है,
जैसे-पूनम
का पाटा,
सांतिया (स्वस्तिक), डोकरा-डोकरी,
और अंत
में श्कलाकोटश्।
संझा केवल
चित्रकारी
नहीं, बल्कि
संगीत का भी उत्सव है।
शाम के
समय किशोरिया
एकत्रित होकर पारंपरिक
गीत गाती
हैं। इन
गीतों में सांझा
माता को
एक सहेली
या बेटी
की तरह
संबोधित किया जाता
है। यह
पर्व किशोरियों
को कलात्मक
अभिव्यक्ति
सिखाता है और समाज में
मिलजुलकर
रहने की
भावना विकसित करता है।
यह मालवा
की ग्रामीण
संस्कृति
की एक
जीवंत पहचान है,
जो अब
धीरे-धीरे
शहरों से लुप्त
होकर गाँवों
तक सीमित
होती जा
रही है।
मालवांचल
की लोक
कलाएँ केवल सौंदर्य
का प्रतीक
नहीं हैं,
बल्कि वे गृह
विज्ञान के विभिन्न
सिद्धांतों
जैसे कि
संसाधन प्रबंधन, पोषण, स्वच्छता
और आंतरिक
सज्जा का एक जीवंत उदाहरण
हैं। मालवा
में घरों
के आंगन
और देहरी
पर बनाए
जाने वाले
मांडणा गृह विज्ञान
के श्इंटीरियर
डिजाइनश्
का हिस्सा
हैं।संसाधन
प्रबंधनरू
मांडणा में गेरू
(लाल मिट्टी)
और खड़िया
(सफेद मिट्टी)
जैसे स्थानीय
और प्राकृतिक
रंगों का उपयोग
किया जाता
है, जो
कम लागत
में घर
को सुंदर
बनाने की कला
सिखाते हैं। रंगों
और आकृतियों
का चयन
सकारात्मकता
और अतिथि
सत्कार की भावना
विकसित करता है,
जो परिवार
के मानसिक
स्वास्थ्य
के लिए
आवश्यक है। मालवा
की संस्कृति
जितनी अपनी मिठास
(बोली) के
लिए जानी
जाती है,
उतनी ही
अपनी हस्तशिल्प
के लिए
भी प्रसिद्ध
है। यहाँ
की मिट्टी
और धातु
कला में
पीढ़ियों का अनुभव
और मिट्टी
की सोंधी
खुशबू रची-बसी है। मालवा
में मिट्टी
से कलाकृतियां
बनाना केवल एक
व्यवसाय नहीं, बल्कि
परंपरा और श्रद्धा
से जुड़ा
काम है।
मालवा के कुंभकार
(कुम्हार) मिट्टी को पकाकर
सुंदर खिलौने, मूर्तियाँ
और सजावटी
सामान बनाते हैं।
यह मालवा
की अपनी
एक अलग
पहचान है, जिसमें
लोहे, पीतल
और कांसे
का अद्भुत
काम देखने
को मिलता
है। मालवा
के लोहार
समुदाय द्वारा कृषि उपकरण
तो बनाए
ही जाते
हैं, लेकिन
साथ ही
सजावटी लैंप, पशु-पक्षियों
की आकृतियां
और प्राचीन
काल में
युद्ध के शस्त्र
भी यहाँ
बड़े पैमाने
पर बनाए
जाते थे।
इंदौर और उज्जैन
के पुराने
बाजारों में आज
भी हाथ
से ठोककर
बनाए गए
पीतल के
बर्तन मिलते हैं।
इन पर
की जाने
वाली नक्काशी
मालवा की पहचान
है। हालांकि
धोकरा शिल्प मूलतः
बैतुल और बस्तर
(छत्तीसगढ़)
का है,
लेकिन मालवा के
हाट-बाजारों
में इस
श्लॉस्ट वैक्सश् तकनीक से
बनी मूर्तियों
का काफी
प्रभाव और व्यापार
देखा जाता
है। मालवा
अंचल अपनी
समृद्ध सांस्कृतिक
विरासत और मधुर
लोक संगीत
के लिए
जाना जाता
है। यहाँ
के लोक
गीतों में मालवी
बोली की
मिठास और यहाँ
के जनजीवन
की सादगी
साफ झलकती
है।
भरथरी और निर्गुणी
गायन, संजा
गीत, हीड़
गायन ,लावणी,
बरसाती बारमासा एवं गरबा
(मालवी शैली) आदि।
मालवा के इन गीतों में
यहाँ की
मिट्टी की खुशबू
आती है
जो आज
भी गाँवों
और कस्बों
में जीवित
है। मालवांचल
की लोक
कलाएँ केवल सौंदर्य
का प्रतीक
नहीं हैं,
बल्कि वे गृह
विज्ञान के विभिन्न
सिद्धांतों
जैसे कि
संसाधन प्रबंधन, पोषण, स्वच्छता
और आंतरिक
सज्जा का एक जीवंत उदाहरण
हैं। मालवांचल
की लोक
कला
न केवल मनोरंजन का साधन
है बल्कि
वह गृह
विज्ञान के सिद्धांतों
को सीखने
और समझने
का एक
प्रभावी तरीका है
इन कलाओं
के माध्यम
से
विद्यार्थी
गृह विज्ञान
के सिद्धांतों
जैसे - गृहसज्जा,
पाककला, परिवार के सदस्यों
की देखभाल
एवं बाल
पालन, संचार,
आंतरिक सज्जा और सामाजिक विकास एवं
प्रसार शिक्षा आदि
विषयो की शिक्षा प्राप्त कर सकते है। गृह
विज्ञान का एक बड़ा उद्देश्य
है सामाजिक
जागृति। माच
जैसे लोकनाट्य
का उपयोग
करके ग्रामीण
इलाकों में स्वास्थ्
शिक्षा और स्वछता
जैसे संदेश
स्वछता आसानी से
पहुंचाए जा सकते
है। गृह
विज्ञान में परिधान
एवं वस्त्रो
का भी
अध्यन लिया जाता
है। माच
के परिधान,
मुकुट, और पारंपरिक
श्रृंगार
का डिज़ाइन
और उनका
रख-रखाव इस विषय
से सीधा
जुड़ा है।
घर और
मंच को
सजाना गृह विज्ञान
का हिस्सा
है।
माच में
जो मंच
बनाया जाता है,
उसमें स्थानीय कला और
सजावट का उपयोग
होता है।
कार्यक्रमों
के दौरन
में जो
स्थानीय खाद्य स्टॉल
लगते हैं,
उनकी स्वच्छता
और पोषण
का प्रबंधन
गृह विज्ञान
के सिद्धांतों
पर आधारित
होता है।
माच केवल
एक नाच-गाना
नहीं है,
बल्कि ये संचार,
कपड़े और
संस्कृति
का एक
मिश्रण है, जो गृह विज्ञान
के मुख्य
अध्याय हैं। मालवा
में घरों
के आंगन
और देहरी
पर बनाए
जाने वाले
मांडणा गृह विज्ञान
के आंतरिक
सज्जा का हिस्सा हैं। मांडणा
में गेरू
(लाल मिट्टी)
और खड़िया
(सफेद मिट्टी)
जैसे स्थानीय
और प्राकृतिक
रंगों का उपयोग
किया जाता
है, जो
कम लागत
में घर
को सुंदर
बनाने की कला
सिखाते हैं।रंगों
और आकृतियों
का चयन
सकारात्मकता
और अतिथि
सत्कार की भावना
विकसित करता है,
जो परिवार
के मानसिक
स्वास्थ्य
के लिए
आवश्यक है। संझा
कुंवारी कन्याओं द्वारा गोबर और
फूलों से बनाई
जाने वाली
संझा कला,
किशोरियों
को कलात्मक
कौशल के
साथ-साथ गृह प्रबंधन
के शुरुआती
पाठ सिखाती
है। इसमें
धैर्य, एकाग्रता और उपलब्ध
प्राकृतिक
संसाधनों
(गोबर, फूल,
पत्तियां)
के रचनात्मक
उपयोग पर जोर
दिया जाता
है। मालवा
का खान-पान
गृह विज्ञान
के खाद्य
एवं पोषण
विभाग से सीधा
जुड़ा है।
मुख्य रूप से
दाल-बाटी और बाफले
यह एक
संतुलित आहार है
जिसमें कार्बोज, प्रोटीन और वसा
का सही
मिश्रण होता है।
मालवा में पापड़,
बड़ी, बिजौड़ी
और अचार
बनाने की परंपरा
खाद्य संरक्षण के वैज्ञानिक
तरीकों को दर्शाती
है, ताकि
बेमौसम भी पौष्टिक
भोजन उपलब्ध
रहे। मालवा
की पारंपरिक
वेशभूषा और यहाँ
की छीपा
कला (हैंड
ब्लॉक प्रिंटिंग)
वस्त्र विज्ञान का हिस्सा
है। सूती
कपड़ों पर प्राकृतिक
रंगों का उपयोग
त्वचा के लिए
सुरक्षित
और मालवा
की गर्म
जलवायु के अनुकूल
होता है।
मालवा के ग्रामीण
क्षेत्रों
में मिट्टी
के बर्तनों
का उपयोग
स्वच्छ और पर्यावरण
अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा
देता है।
मिट्टी के घड़े
का पानी
प्राकृतिक
रूप से
शीतल और
क्षारीय होता है,
जो स्वास्थ्य
के लिए
उत्तम है। मालवा
की लोक
कलाएँ दरअसल ष्व्यावहारिक
गृह विज्ञानष्
हैं। जहाँ
एक ओर
ये कलाएँ
घर को
जीवंत बनाती हैं,
वहीं दूसरी
ओर ये
परिवार के सदस्यों
के स्वास्थ्य,
बजट और
संवेगात्मक
विकास का ध्यान
भी रखती
हैं। यह
शोध पत्र
मालवांचल
की पारंपरिक
लोक कलाओं
और गृह
विज्ञान के बीच
के अंतर्संबंधों
का एक
व्यवस्थित
विश्लेषण
प्रस्तुत
करता है।
अध्ययन यह उजागर
करता है
कि मालवांचल
की पारंपरिक
लोक कला
वास्तव में गृह
विज्ञान के खाद्य
एवं पोषण,
परिधान एवं वस्त्र
विज्ञान, गृह
प्रबंध, खाद्य संरक्षण
और संचार
के सिद्धांतों
पर आधारित
हैं। मालवा
की मांडणा
कला, संजा
कला और
पारंपरिक
पाक कला
केवल सांस्कृतिक
धरोहर नहीं हैं,
बल्कि वे गृह
प्रबंधन, स्वच्छता, और सौंदर्यशास्त्र
के वैज्ञानिक
आधारों पर टिकी
हैं। यह
पत्र यह
समझने का प्रयास
करता है
कि कैसे
ये कलाएं
एक कुशल
गृह संचालन
में सहायक
होती हैं।
निष्कर्ष
बताते हैं कि
ये लोक
कलाएं न केवल सांस्कृतिक
गौरव हैं,
बल्कि एक सतत
और स्वस्थ
जीवनशैली
का आधार
भी हैं।
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