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HANDMADE PAPERMAKING IN MAHARASHTRA: TRADITION, HISTORICAL DEVELOPMENT, TECHNIQUES, ENVIRONMENTAL SUSTAINABILITY AND USE IN CONTEMPORARY ART

Original Article

Handmade papermaking in Maharashtra: tradition, historical development, techniques, environmental sustainability and use in contemporary art

महाराष्ट्र में हस्त निर्मित कागज़ निर्माण: परंपराए ऐतिहासिक विकासए तकनीकए पर्यावरणीय शाश्वतता तथा समकालीन कला क्षेत्र में उपयोग

 

Kunika Vijendra Pathak 1*Icon

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1 K. K. Wagh College of Fine Arts, Nashik, Maharashtra, India

 

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ABSTRACT

English: In India, the practice of drawing on tree barks began in historical times. Subsequently, during the time of the sages, the tradition of writing on palm leaves using Boru began.

The history of papermaking in India, which began with handcrafts during the British period, has evolved into a major industry with the development of mechanization and private industry after independence, playing a significant role in the country's economy.

In ancient times, the art of papermaking first came to India from China. Large-scale papermaking first began in Kashmir, Bengal, and Maharashtra. During the Mughal era, it was made from scraps of cloth and sugarcane fibers. During the Swadeshi movement of the Indian independence movement, paper began to be made from various materials.

Producing handmade paper is an ancient, cultural, and environmentally friendly tradition of Maharashtra. Cotton and sugarcane straw, the materials required for handmade paper production, are readily available due to Maharashtra's agricultural resources. Institutions like the "Pune Handmade Khadi Village Industries" were established in Maharashtra in the post-independence period.

Handmade paper has been used historically for administration, religious literature, and artistic expression. The use of handmade paper is very important in the fine arts. Handmade paper is used extensively in drawings, manuscripts, paintings, sculptures, coinage, miniature paintings, printing, newspapers, magazines, education, books, diaries, and experimental art. Handmade paper art is of major importance in contemporary fine arts.

The primary objective of this research paper is to examine the historical development of traditional handmade paper art in Maharashtra, its spatial mechanisms, the natural literature used, and its environmental role; the history of renowned institutions like the "Pune Handmade Khadi Village Industries"; and, most importantly, the special artistic and cultural uses and significance of paper in the fine arts field, its development, and contemporary changes. This research paper focuses on environmental sustainability and contemporary art education. And it will be important from the point of view of promotion of paper in traditional handicrafts.

 

Hindi: भारत में ऐतिहासिक काल में पेड़ की छालों पर चित्रलिपी बनाने की शुरुवात हुई| उसके बाद भारत में ऋषीमुनीओंके काल में बोरु से ताडपत्र पर लिखने की परंपरा शुरू हुई|

भारत में कागज बनाने का इतिहास, जो ब्रिटिश काल में हाथ से बनी कारीगरी से शुरू हुआ था| आजा़दी के बाद मशीनीकरण और निजी उद्योग के विकास के साथ एक बड़ी इंडस्ट्री बन गई है, जिसने देश की आर्थिक क्षेत्र में एक बड़ी भुमिका निभाई है|

प्राचीन काल में कागज निर्मिती की कला सबसे पेहले चीन से भारत में आयी| भारत में सबसे  पेहले कश्मीर, बंगाल और महाराष्ट्र में कागज़ निर्मिती बडे पैमाने में होने लगी| मुगलोंके जमाने में कपडो़ के तुकडे, गन्ने के चिओंसे से भारत में बनाया जाता था | भारतीय स्वतंत्र्यता आंदोलन के स्वदेशी आंदोलन में कागज़ अलग अलग चिजों से बनना शुरू हुआ|

हस्तनिर्मित कागज़ की निर्मिती करना ये महाराष्ट्र की प्राचीन, सांस्कृतिक और पर्यावरण पूरक परंपरा है| हस्त निर्मित कागज़ निर्मिती के लिए लगने वाला कपास और गन्ने का बचा हुआ भुसा महाराष्ट्र में होने वाली खेती के कारण सहज उपलब्ध होता है| जिसकी  वजह से महाराष्ट्र मे ‘पुणे हस्त निर्मित खादी ग्रामउद्योग’ जैसी संस्थाने स्वातंत्र्योत्तर कालखंड मे बनी|

हस्त निर्मित कागज़ का इस्तेमाल ऐतिहासिक काल से प्रशासन, धार्मिक साहित्य, कलात्मक अभिव्यक्ती के रूप हो रहा है| ललित कला में हस्त निर्मित कागज का इस्तेमाल बहुत महत्वपूर्ण है| चित्रलिपी, रेखाचित्र, हस्तलिखित ग्रंथ, चित्रकला, शिल्पकला, मुद्रा चित्रण, मिनिएचर चित्रकला, छपाई, वृत्तपत्र, पत्रिका, शिक्षण क्षेत्र में, किताबें, डायरी, प्रयोगशिल कला प्रकार में हस्त निर्मित कागज का इस्तेमाल बहुत बड़े पैमाने मे हो रहा है| हस्त निर्मित कागज़ कला का समकालीन ललित कला में प्रमुख महत्त्व है|

इस शोध पत्र का प्रमुख उद्देश महाराष्ट्र की पारंपरिक हस्त निर्मित कागज़ कला निर्मिती का ऐतिहासिकदृष्ट्या विकास, स्थानिक तंत्रज्ञान, इस्तेमाल होनेवाले नैसर्गिक साहित्य और पर्यावरणीय भुमिका, ‘पुणे हस्त निर्मित खादी ग्रामउद्योग’ जैसे प्रसिद्ध संस्थानों का इतिहास और सबसे महत्वपूर्ण ललित कला क्षेत्र में कागज़ का विशेष कलात्मक और सांस्कृतिक उपयोग तथा महत्त्व, विकास और समकालीन बदल इस सब मुद्दों का सविस्तर अध्ययन करना है| ये शोधपत्र पर्यावरणीय शाश्वतता, समकालीन कला शिक्षण और पारंपरिक हस्त कले में काजग के संवर्धन के दृष्टीसे महत्वपूर्ण होगा|

 

Keywords: Handmade Paper, Maharashtra, Traditional Techniques, Environmental Sustainability, Pune Handmade Paper, Fine Arts, Contemporary Art, हस्तनिर्मित कागज़ए महाराष्ट्रए पारंपरिक तकनीकेंए पर्यावरणीय सततताए पुणे हस्तनिर्मित कागज़ए ललित कलाए समकालीन कला

 


प्रस्तावना

कागज़ मानव सभ्यता के बौद्धिक सांस्कृतिक और कलात्मक विकास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। भारतीय परंपरा में हस्तनिर्मित कागज़ केवल लेखन सामग्री नहीं बल्कि वह स्वदेशी विचारए आत्मनिर्भरताए पर्यावरणीय चेतनाए संतुलन और कला अभिव्यक्ती का प्रतीक बनकर उभरा।

महाराष्ट्र में विशेषतः पुणे में  हस्तनिर्मित कागज़ की परंपरा का एक प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है। यहाँ इस कला को न केवल तकनीकी रूप में विकसित किया गया बल्कि संस्थागत स्वरूप भी प्रदान किया गया। यह शोधपत्र महाराष्ट्र में हस्तनिर्मित कागज़ निर्माण की परंपरा को ऐतिहासिक तकनीकी पर्यावरणीय और समकालीन कला.दृष्टि से समझने का प्रयास करता है।

 

कागज़ का इतिहास एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य

कागज़ मानव द्वारा विकसित एक अत्यंत महत्वपूर्ण आविष्कार है जिसने ज्ञान के संरक्षण अभिव्यक्ति और प्रसार को स्थायित्व प्रदान किया। सेल्यूलोज रेशों से निर्मित यह पतली लचीली एवं बहुउपयोगी सामग्री लेखन मुद्रण प्रशासनिक अभिलेखन तथा कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम रही है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार कागज़ का आविष्कार प्राचीन चीन में लगभग 105 ईस्वी में त्साई लुन द्वारा किया गया। उन्होंने बांस के रेशों वृक्षों की छाल और वस्त्रों के अवशेषों का प्रयोग कर कागज़ निर्माण की विधि विकसित की। प्रारंभिक काल में यह तकनीक चीन तक सीमित रही और इसे राज्य.गोपनीय ज्ञान के रूप में संरक्षित किया गया।

कालांतर में यह विद्या मध्य एशिया अरब देशों और यूरोप तक पहुँची। बारहवीं शताब्दी तक कागज़ वैश्विक स्तर पर प्रचलित हो गया जिससे हस्तलिखित पांडुलिपियों धार्मिक ग्रंथों और शैक्षणिक साहित्य के निर्माण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस प्रकार कागज़ का इतिहास मानव बौद्धिक विकास के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है।

भारत में कागज़ एवं लेखन परंपरा

भारत में लेखन की परंपरा कागज़ के आगमन से पूर्व भी समृद्ध थी। ताड़पत्र भोजपत्र वृक्ष की छाल और धातु पट्टिकाओं पर ग्रंथ लेखन की परंपरा प्राचीन काल से विद्यमान रही है। किंतु मध्यकाल में कागज़ के आगमन ने ज्ञान के प्रसार को अधिक सरल सुलभ और व्यापक बना दिया।

ऐतिहासिक दृष्टि से कागज़ निर्माण की कला भारत में मध्यकाल में आई। इसके प्रारंभिक केंद्र कश्मीर बंगाल और महाराष्ट्र में विकसित हुए। मुगल काल में कपड़े के टुकड़ों और गन्ने के अपशिष्ट से कागज़ निर्माण को विशेष प्रोत्साहन मिला। इस काल में हस्तनिर्मित कागज़ का उपयोग प्रशासनिक दस्तावेजों लघुचित्रों धार्मिक ग्रंथों और साहित्यिक कृतियों में व्यापक रूप से हुआ।

भारतीय संदर्भ में कागज़ निर्माण केवल औद्योगिक गतिविधि नहीं रहा बल्कि यह शिल्प और हस्तकला से भी गहराई से जुड़ा रहा। यही कारण है कि हस्तनिर्मित कागज़ में सौंदर्यात्मक गुणवत्ता बनावट और दीर्घायु विशेष रूप से देखी जाती है।

 

 

 

महाराष्ट्र में हस्तनिर्मित कागज़ परंपरा

महाराष्ट्र में हस्तनिर्मित कागज़ की परंपरा स्थानीय संसाधनों और पर्यावरणीय चेतना से जुड़ी रही है। यहाँ कपास सूती वस्त्रों के चिथड़े कृषि अपशिष्ट तथा प्राकृतिक रेशों से कागज़ निर्माण की प्रक्रियाएँ विकसित हुईं। यह परंपरा स्वदेशी ज्ञान प्रणाली और आत्मनिर्भरता के विचार को सुदृढ़ करती है।

विशेषतः पुणे शहर इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वदेशी विचारधारा के प्रभाव में हस्तनिर्मित कागज़ को औद्योगिक कागज़ के विकल्प के रूप में देखा गया। इस संदर्भ में महात्मा गांधी और उनके विचारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

पुणे हैंडमेड पेपर इंस्टिट्यूट, खादी ग्रामउद्योग’ , पुणे : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

‘पुणे हैंडमेड पेपर इंस्टिट्यूट’ भारत की प्रथम हस्तनिर्मित कागज़ निर्माण संस्था है। इसकी स्थापना भारत की स्वतंत्रता से पूर्व वर्ष 1940 में की गई। यह संस्था महात्मा गांधी की परिकल्पना और वैज्ञानिक के. बी. जोशी के नवाचारी प्रयोगों का परिणाम थी।

इस संस्था का उद्घाटन 1 अगस्त 1940 को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया। इस संस्था ने भारत में संगठित हस्तनिर्मित कागज़ उद्योग को एक नई दिशा प्रदान की और इसे स्वदेशी आंदोलन से जोड़ा।

 

के. बी. जोशी और स्वदेशी विचारधारा

1930 के दशक में के. बी. जोशी ने कपास लिंटर्स और पुराने सूती वस्त्रों से कागज़ निर्माण के सफल प्रयोग किए। महात्मा गांधी ने मशीनी कागज़ के स्थान पर हस्तनिर्मित कागज़ को स्वदेशी विकल्प के रूप में अपनाने पर बल दिया।

1936 में भूमि लीज़ पर लेकर घ. ह. गोंधळेकर के सहयोग से बॉम्बे खादी समिति की स्थापना की गई। यह प्रयास केवल तकनीकी नहीं बल्कि वैचारिक भी था जिसका उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को साकार करना था।

पुणे हैंडमेड पेपर : तकनीकी विशेषताएँ 

यह भारत की पहली ऐसी संस्था है जहाँ पूर्णतः वुड-फ्री पेपर का निर्माण किया जाता है। कागज़ निर्माण की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के वृक्ष गन्ने या कृत्रिम रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता।

यहाँ निर्मित कागज़ शुद्ध कपासए से बनाया जाता है जिसके कारण यह शीघ्र फटता नहीं और दीर्घकाल तक सुरक्षित रहता है। इस हस्तनिर्मित कागज़ की न्यूनतम 100 वर्षों तक स्थायित्व.गारंटी इसकी विशिष्टता को दर्शाती है।

पुणे हस्तनिर्मित कागज़ : आवश्यकता एवं महत्व

वर्तमान समय में विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 30 करोड़ टन कागज़ का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग 90 प्रतिशत लकड़ी के गूदे से निर्मित होता है। कागज़ उद्योग वैश्विक Co2 उत्सर्जन में लगभग 9 प्रतिशत योगदान देता है जिससे तापवद्धि अम्लीय वर्षा, ओजोन क्षरण और वनों का तीव्र क्षय होता है।

ऐसे परिदृश्य में पुणे का हस्तनिर्मित कागज़ एक टिकाऊ पर्यावरण-संवेदनशील और स्थायी विकल्प के रूप में उभरता है। यह न केवल वृक्षों की कटाई को कम करता है बल्कि स्थानीय संसाधनों और मानव श्रम को भी महत्व देता है।

 

पर्यावरणीय शाश्वतता

हस्तनिर्मित कागज़ केमिकल-फ्री ट्री-फ्री और पूर्णतः पुनर्चक्रण योग्य होता है। यह सुती वस्त्र, वेस्ट जूट बांस भांग गेहूँ के छिलके और कागज़ अपशिष्ट से निर्मित होता है। इस कारण यह प्रक्रिया  Earth Positive और  Carbon Negetiv मानी जाती है।

ललित कला एवं समकालीन उपयोग

समकालीन ललित कला के क्षेत्र में हस्तनिर्मित कागज़ का उपयोग विशेष रूप से जलरंग चित्रकला, प्रिंटमेकिंग, रेखाचित्र ,इंस्टॉलेशन तथा मिक्स्ड मीडिया में व्यापक रूप से देखा जाता है। प्रिंटमेकिंग विधाओं में इसकी प्राकृतिक बनावट, उच्च शोषण क्षमता तथा टिकाऊ सतह इसे एक विशिष्ट और प्रभावशाली माध्यम प्रदान करती है, जिससे कलाकार अभिव्यक्ति के नए आयाम स्थापित कर पाते हैं।

इसके अतिरिक्त हस्तनिर्मित कागज़ का प्रयोग डायरी, स्टेशनरी, गिफ्ट उत्पाद, पेपर मैशे, महाराष्ट्र की पारंपरिक दिवाली कागज़ी लालटेन, पर्यावरण–पूरक गणेश मूर्तियाँ तथा सजावटी वस्तुओं जैसे व्यावहारिक और डिज़ाइन उत्पादों में भी निरंतर बढ़ रहा है। इस प्रकार के उपयोग न केवल पर्यावरणीय शाश्वतता को प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि पारंपरिक कारीगरों को आजीविका प्रदान करते हुए हस्तनिर्मित कागज़ की परंपरा को समकालीन संदर्भ में नया जीवन भी प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष

अंततः यह स्पष्ट होता है कि हस्तनिर्मित कागज़ केवल लेखन सामग्री नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहर का अभिन्न हिस्सा है। महाराष्ट्र विशेषतः पुणे इस परंपरा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है।

यह कागज़ पर्यावरण-संवेदनशील टिकाऊ और समकालीन कला के लिए अत्यंत उपयोगी माध्यम है। इसके संरक्षण अकादमिक अध्ययन और वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार से यह परंपरा न केवल जीवंत रह सकती है बल्कि नई पीढ़ियों को भी आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय चेतना की ओर प्रेरित कर सकती है।  

 

ACKNOWLEDGMENTS

None.

 

REFERENCES

HMPI Archives (HMPI अभिलेखागार), Pune.

Studio Mars Reports

Site Visits and Interviews (स्थल भेंट एवं साक्षात्कार)

I Express my Heartfelt Gratitude to All the Artisans, Research Assistants, Guides and Institutions (में सभी कारीगरो, शोध सहायको, मार्गदर्शको और संस्थानों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ).

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