Original Article
ORIGIN AND CHRONOLOGICAL ANALYSIS OF SHIVA IMAGES IN THE MALWA REGION IN INDIAN ART TRADITION AND HISTORY (WITH SPECIAL REFERENCE TO THE PARAMARA PERIOD)
भारतीय
कला परंपरा और
इतिहास में
मालवा क्षेत्र
की शिव
प्रतिमाओं का
उद्भव और उनका
कालक्रमिक
विवेचन (परमार
काल के
सन्दर्भ में)
प्रस्तावना
भारतीय
कला का इतिहास
अतिप्राचीन
और समृद्ध है
जो
प्रागैतिहासिक
शैलचित्र व
अवशेषों से आज
के वर्तमान
परिवेश तक
फैला हुआ है।
भारतीय कला की
परंपरा में
वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला
तथा कई
लोककलाओ का
रूप शामिल है।
जिनमे गुफाओ
से लेकर
मंदिरों की
यात्रा के
उत्कृष्ट
उदाहरण
प्राप्त होते
है। भारतीय
कला जो सदैव
ही
आध्यात्मिकता, सामाजिक
मूल्यों, संस्कृतियों
को दर्शाती
है। इस कला
में भारत भूमि
के इतिहास और
संस्कृति के
केंद्र के रूप
में मालवा को
जाना जाता
हैं। यह वह
केंद्र है जहाँ
कई राजनैतिक
परिवर्तन हुए
परन्तु संस्कृति
के परिवर्तन
में कोई बड़ा
बदलाव नही
आया। यु तो इस
क्षेत्र में
लोगो की
धार्मिक
भावना के प्रबल
और संरक्षण
कर्ता राजाओ
की आस्था के
कारण कई
मंदिरों
(स्थापत्यो)
और प्रतिमाओ
का निर्माण
कार्य हुआ है।
परन्तु इस
क्षेत्र पर
प्राप्त शैव
सम्बन्धी
प्रमाणों के
अधिक प्राप्त
होने से यह
भूमि शैव भाव
से ओत - प्रोत
सी लगती हैं।
शैव धर्म
जिसकी
प्राचीनता
मनुष्यों के
साथ जुडी
आस्था और
विश्वास से
सम्बंधित है
आदिकाल में
ईश्वर के जिस
मंगलमय
स्वरूप की
कल्पना हम
करते हैं। वह
शिव रूप में
दिखलाई देती
है। इसका
उल्लेख
इतिहास, साहित्यिक
ग्रंथो और
पुरातात्विक
अवशेषों
द्वारा होता है।
शैव धर्म
सिन्धु
सभ्यता से
प्रारंभ हो
वर्तमान समय
तक विद्यमान
है। शैव रूप
विभिन्न स्वरुपो
में कल्पना का
आधार बना और
यह शैव मत मालवा
में भी फ़ैल
गया।
साथ
ही
पुरातात्विक
संदर्भो के
आधार पर हमें मालवा
क्षेत्र के
विभिन्न
राजवंशो में
विद्यमान शैव
मत के क्रमिक
इतिहास की
जानकारी भी प्राप्त
होती है। फिर
प्रघोत कालीन
मालवा हो जिसकी
आहत मुद्रा
में शैव का
अंकन हो या
शुंग, सातवाहन, शक तथा
नाग वंश हो
जिसका भी
मालवा की भूमि
पर एक लम्बा
राज्यकाल रहा
है। इस समय की
प्राप्त शैव
मूर्तियाँ और
शिवलिंग भी
शैव मत की
प्रधानता का
वर्णन करते
है। इसी क्रम
में गुप्त -
औलिकरकालीन
मालवा जहाँ
शैव मत का
पूर्ण रूप से
विकसित
स्वरुप मिलता
है। जिसमे शिव, ब्रह्मा
और विष्णु इन
त्रिमूर्ति
का अंकन हुआ
और सिक्के, साहित्य
भी शैव मत से
पूर्ण जान
पड़ते है।
शोधपत्र
शीर्षक में हम
परमारकालीन
मालवा में शैव
धर्म का
अभूतपूर्व
विकसित रूप
देखते है।
परमारकाल में
ब्राह्मण
मतावलम्बी
किन्तु धर्म
सहिष्णु
परमारों के
समय में वैदिक
मान्यताओ और
शिवपूजन, उपासना का
अधिक महत्त्व
था। मालवा को
सांस्कृतिक व
धार्मिक
महत्त्व
प्रदान करने
में उज्जैन के
महाकाल मंदिर
का अपना
महत्वपूर्ण
योगदान रहा
हैं।
श्रंगारमंजरी
और
नवसाह्सांक चरित
पुस्तकों में
भी शिवजी के
कैलास से यहाँ
आकर रहने का
वर्णन
प्राप्त होता
हैं। इस मंदिर
में
सिन्धुराज के
दर्शन करने व
एक शिवलिंग जो
नागराज
शंखपाल को दान
किया गया, जिसे धार
नगरी में
स्थापत्य
किया गया था, का उल्लेख
हैं। Bhartiya (1963)
परमारकाल
में सर्वाधिक
शैव मंदिर व
प्रतिमाओ के
निर्माण
कर्ता के रूप
में
राजाभोज को
जाना जाता है, जो स्वयं
एक प्रतापी व
कला - साहित्य
के महान संरक्षण
कर्ता थे। तथा
इनका समय
परमार काल के
स्वर्णिम युग
के नाम से
जाना जाता
हैं। यह स्वयं
कविराज थे, इन्होने 84 ग्रंथो
का निर्माण
करा जिसमे
समरांगणसूत्रधार, वास्तु और
मूर्तिकला के
लिए प्रमुख
रहा हैं। इसके
अलावा
श्रंगार
मंजरी और तत्व
प्रकाश जैसे
अन्य ग्रन्थ
भी है, जो
शैव मत से
परिपूर्ण
हैं।
इस वंश
के राजाओ के
समय के
ताम्रपत्रो तथा
प्रस्तर
अभिलेखों के
अवलोकन से भी
शैव मत का
ज्ञान
प्राप्त होता
है। वाक्पति
राजदेव द्वितीय
के समय की
ज्ञात ताम्र
पट्टिका जो
गिरिजा व
श्रीकण्ड
महादेव की
स्तुति से
प्रारंभ होती
है। Mittal (1979)
परमारराजा
उदयादित्य
कालीन उदयपुर
प्रशस्ति
जिसमे राजा
भोज द्वारा
मालवा
क्षेत्र में शैव
मंदिर
केदारेश्वेर, रामेश्वेर, सोमनाथ, सुंदिर
(मुंडीर), कालानल व
रूद्र के लिए
भूमिदान का
वर्णन मिलता
हैं। Mittal (1979) जयसिंहदेव
के समय का
मान्धाता
ताम्रपत्राभिलेख
जो शिव भक्ति
आराधना से
आरम्भ है।
जिसमे जयसिंहदेव
द्वारा
भवानीपति की
आराधना का उल्लेख
है। Hultzsch (1979)
उदयादित्य
के द्वारा
उदयपुर नगर
में नीलकंठेश्वर
महादेव मंदिर
का निर्माण
कराया गया। यहाँ
से कई शिलालेख
भी मिले है
जिनमे शिव
स्तुति व इस
मंदिर के
निर्माण
कार्यो का
वर्णन है। यह
भी स्पष्ट
होता की यह
भूमिजा शैली
का उत्कृष्ट
उदाहरण है। Mittal (1979)
आगे
के विस्तार
में परमार
शासक नरवर्मन
जिनके द्वारा
नीलकंठ
महादेव की
स्तुति का
वर्णन देवास
से प्राप्त
ताम्रपट्टिका
लेख से होता है।
इसके बाद
लक्ष्मिवर्मनदेव, जयसिंह
द्वितीय और
जयसिंह तृतीय
के समय के भी शिव
मंदिर से
सम्बन्धि लेख
प्राप्त हुए
है। Vyas (1994)
इन
सभी लेखो में
मंदिरो के
वर्णन मात्र
से इस परमार
वंश के शैव
धर्म में रूचि
और गहन जुडाव की
ओर ध्यान
आकर्षित होता
है।
परमार कालीन आरंभिक प्रतिमाओं का कलात्मक विवरण
परमारकालीन
शैव
प्रतिमाओं की
आरंभिक कलाकृतियाँ
गुप्त वंश, प्रतिहार
वंश, कलचुरी
के समय की कला
से प्रभावित
दिखाई देती है।
जिसमे गुप्तो
की धर्म के
प्रति आस्था, प्रतिमाओ
के मुख पर
दिखती
सौम्यता और
सहजता तथा
प्रतिहारो की
कला में
सौन्दर्य के
प्रति आये
बदलाओ को
ग्रहण करा है।
यहाँ शिव के
सौम्य और
रूद्र दोनों
ही रूप का
अंकन दिखाई
देता है।
सौम्य स्वरूप
में शिव को
योगी, ध्यानमग्न, पद्मासन
में विराजित, उमा-
महेश्वेर, सदाशिव, कल्याणसुन्दरम
और रूद्र रूप
में भैरव, शिव तांडव, त्रिपुरान्तक, अंधकासुर
आदि रूप का
शिल्पांकन
हुआ देखते है।
यहाँ कई जगह
नटराज की भी
प्रतिमा का
अंकन मिलता
है।
आरंभिक
प्रतिमाओं के
मुखाकृति
अंडाकार, धनुषाकार
ललाट, पतली
पट्टी के समान
भौंहे, धनुषाकार
नयन, शुक
नासिका, कम्बुग्रीवा, विकसित
स्कंध, वक्षस्थल, पतला
कटीभाग, पतले और
मांसलयुक्त
हाथ और पैर
आदि लक्षण दिखाई
देते है।
इसमें कैश
विन्यास जो
भारतीय कला में
आरम्भ से ही
पुष्पों, मणियो और
स्वर्ण
आभूषणो आदि से
अलंकृत किये जाते
थे। यहाँ शिव
व उमा के
स्वरुप में
कैशो को मुकुट
के समान बनाया
गया है।
क्योकि शिव वन
के स्वामी और
योगी है। वही
शिवा जो शिव
जी की भार्या
है,
प्रकृति
और शिव की
योगिनी रूप
में वर्णित
है। यहाँ उमा
का स्वरुप
ब्रह्मचारिणी
भी है। जिसमे
वे एक तपस्विनी
की भांति
दिखाई देती
है। परमारकाल
के आरम्भ में
प्रतिमाओं के
कैशविन्यास
गुप्तकला की ही
भांति
दक्षिणावर्त
या कुंचित
शैली में भारीपन
लिए स्कंध तक
आते बनाये गए
है। और कैशो
की संरचना
ज्यादा
लम्बवत न होकर
दबी या बैठी
सी बनाई जाती
थी।
आभूषणो
को देखे तो
प्रारंभ में
इनका उपयोग प्रतिमाओ
में केवल
प्रतीक रूप
में ही था।
जिनमे एकावली, कुण्डल, केयूर, हस्तकंघन, कटीआभूषण, पायल आदि
का अंकन होता
था। जिनकी
बनावट साधारण
व कम सी दिखती
है।
प्रतिमाओं
के वस्त्रो की
बनावट उस
राज्य या समय
की संस्कृति
और सभ्यता को
प्रदर्शित
करती है।
परमार काल में
पारदर्शी
वस्त्रो का
अंकन हुआ है।
उमा के
वस्त्रो में
कुंचक और धोती
या साड़ी सी
बनावट दिखती
है वही शिव
प्रतिमा में अर्धवस्त्र
संग पट्टिका
दिखाई देती
है। इन वस्त्रो
की सलवट अधिक
दिखाई नही
देती पर फिर
भी कहीं - कहीं
सूक्ष्म रेखा
द्वारा अंकन
हुआ है।
प्रतिमाओ
में आयुधो का
अंकन
साहित्यिक
ग्रंथो में
दिए गए वर्णन
के अनुसार ही
मिलता है। शिव
जो संहार और
सृजन के रूप
में जाने जाते
है। उन्हें
मुख्य रूप से
त्रिशूल, दंड, कमण्डलु, डमरू, सर्प, धनुष, तलवार -
भाला, मातुंगीफल, लकुट लिए
बताया गया है।
साथ ही वरद और
अभय मुद्रा भी
दृष्टव्य
होती है।
आयुध
पुरुषो या
व्यंतर
देवताओ का
अंकन प्रारंभिक
परमार समय में
कम दिखता है
परन्तु मुख्य रूप
से नंदी का
शिल्पांकन कई
प्रतिमाओ में
वाहन रूप में
हुआ है। नंदी
जी जो शिव
गणों में श्रेष्ठ, शिव जी के
प्रिय सेवक और
बलयुक्त माने
गए है। प्राचीन
काल से ही
इन्हें
नन्दीश्वर, नंदिकेश्वर, नंदी, वृषभ आदि
नामो से जाना
जाता है तथा
इनका अंकन शिव
के साथ ही
होता है। जहाँ
शिव मंदिरों
का निर्माण
हुआ वही नंदी
की भी
स्वतंत्र
प्रतिमा शिवलिंग
के सामने
स्थापित की गई
है और मानवकृत
प्रतिमाओ में
नंदी को
प्रमुख रूप से
वरेश्वर शिव, उमा - महेश, हर - गौरी, वृषवाहन
शिव, अनुग्रह
प्रतिमाओं
में बनाया गया
है। आरम्भ में
इस काल की कला
में नंदी को
भरी भरकम, बलवान
शारीरिक
बनावट, मस्तक
पर मणि या
रत्नों की
माला पहने, ग्रीवा
में माला व
साधारण घंटी
धारण करे बैठी
या चलायमान
मुद्रा में
शिल्पांकित
करा है। कुछ
प्रतिमाओं
में नंदी जी
के अग्र और
पश्च पैर के
बीच में
भृंगीऋषि की
सभंग या
त्रिभंग या फिर
नृत्यरत
प्रतिमा बनाई
गई है। कुछ
जगह बैठी प्रतिमाओं
में आगे के
पैरो के समीप
लड्डू या मिष्ठान
की थाली या
पात्र लिए
छोटे आकर की
एक प्रतिमा
बनाई जाती थी।
आगे
के क्रम में
शिव
प्रतिमाओं के
परिकर में ज्यादा
मूर्तियों का
अंकन नही है
परन्तु कई जगह
पर विष्णु जी
और ब्रह्मा जी
की पद्मासन
मुद्रा में
छोटी आकर की
प्रतिमायें
बनाई गई है। (प्रत्यक्ष)
आरंभिक
काल की
परमारकला की
कुछ
प्रतिमाओं की विशेषताओ
का रेखांकन
|
रेखाचित्र
1
|
|
रेखाचित्र 1 आयुध, नंदी और
सिंह आकृति |
|
रेखाचित्र
2
|
|
रेखाचित्र 2 आभूषण |
|
रेखाचित्र
3
|
|
रेखाचित्र 3 मुखाकृति
और जटामुकुट |
परमार कालीन बाद के समय की प्रतिमाओं का कलात्मक विवरण
परमारकालीन
11वी - 12वी शताब्दी
की प्रतिमाओं
की शैली में
बदलाव एक नवीन
रूप में दिखाई
देता है। यहाँ
प्रतिमाओं की
बनावट
विस्तृत
अलंकरण और
विशिष्ट
धार्मिक
आस्था को
दर्शाती है।
जो सौन्दर्य
की दृष्टी से
विशिष्ट
स्थान को रखती
हैं। यहाँ
सूक्ष्म
आभूषण और कहीं
जगह इन्हें
आयताकार
पट्टियों के
रूप में भी
उकेरा गया है।
प्रतिमाओं
में कैश
विन्यास की
बात की जाये
तो इनमे पहले
की अपेक्षा
भारीपन हट कर
जटाजूट को लम्बवत
बनाया गया है।
यहाँ कैशो को
मणि, रत्न
से सज्जित करा
गया है। शिव
के रोद्र रूप में
जटामुकुट को
मुंडो की माला
से युक्त तथा
उमा - महेश
प्रतिमाओं
में जटामुकुट
किसी राज्य के
राजा - रानी के
कैशो की भांति
रत्नों से सुसज्जित
करा गया है।
यहाँ रत्नों
में त्रिशूल आकृति
भी दिखाई देती
है।
आभूषणो
को सौंदर्य की
दृष्टि से इस
समय में
अत्यधिक
सूक्ष्म व
नक्काशी
युक्त प्रतिमाओं
में धारण करे
बनाया गया है।
जहाँ गल्वलयक, वक्षसूत्र, स्तनसूत्र, कटिबंध, केयूर, कंगन, कर्ण
कुण्डल, पाद आभूषण
प्रमुख है।
इनमे
पत्तियों या
कमलाकृतियाँ
प्रमुख है।
साथ ही केयूर
की भी संरचना
में जटिलता
दिखाई देती
है। यहाँ कुछ
प्रतिमाओं के
पाद आभूषण में
‘कडी’ का भी
अंकन हुआ है। 11वी से 12वी
शताब्दी की
प्रतिमाओं
में आभूषण
उभार लिए उत्कीर्ण
किये गए है
वही कुछ
प्रतिमाओं
में उन्हें
उभरी पट्टिका
पर रेखाओं
द्वारा बताया गया
है। यह शिल्प
कला की
विशेषता
स्थानीय
वातावरण या
शिल्पकारो की
नवीन और सरल
कला का रूप कह
सकते है।
वस्त्रो
की बनावट बाद
की कला में
पूर्णरूप से आभूषणो
की अधिकता में
परिवर्तित हो
गई। परमारकालीन
आरंभिक
प्रतिमाओं के
अनुसार ही इस
काल में
वस्त्रो की
सल्वटनों को
बारीक़ रेखाओ
द्वारा ही
बताया गया है।
परन्तु इन
अधिक आभूषणो की
बनावट से
वस्त्रो पर
ध्यान
केन्द्रित ही
नही होता
बल्कि
प्रत्येक
प्रतिमाओं
में बने भिन्न
- भिन्न आभूषण
संरचना जो
बहुत ही
सुन्दर और
महीन नक्काशी
युक्त है, ध्यान को
केन्द्रित
करते है। यह
उस समय के सौन्दर्य
के प्रति
जनमानस और
कलाकार की
भावना का भी
प्रतीक रूप है
या यह कह सकते
है की उस समय
की आर्थिक समृद्धि
को बताने का
भी माध्यम है।
यहाँ
आयुधो की बात
की जाये तो
इन्हें भी
अलंकरणो से
युक्त अंकित
करा गया है।
शिव
प्रतिमाओं के
आयुधो के अंकन
में अंतर नही
है परन्तु
पहले से अधिक
सज्जित करे गए
है। इनमे
विशेष रूप से मोती
की माला का
अंकन सज्जा
हेतु किया गया
है।
परिवर्तनो
में शिव के
वाहन या सेवक
का स्वरुप भी
प्रमुख है।
प्रतिमा में
भारी सुडोलपन
अधिक आया और
अलंकरण से
युक्त
नंदिश्वर
दृष्टव्य होते
है। सुन्दर
माला, हार
के साथ
घंटीयुक्त
माला तथा
मस्तक पर भी
सुन्दर
नक्काशीदार
आभूषण बनाये
गए है। पैरो
में कड़े तथा
पीठ पर झूल
(परिधान) को भी
सुन्दर अलंकरण
के साथ
शिल्पांकित
किया गया है।
प्रतिमाओं
के परिकर में
विषय
सम्बन्धी
आकृतियों की
अधिकता है।
इनमे गणेश, कार्तिकेय, भृंगीऋषि, विष्णु, ब्रह्मा, गंघर्वो
और शिव गणों
को अंकित करा
है। यह सभी आकृतियाँ
छोटे आकर में
मुख्य
प्रतिमा के
भांति ही
लावण्य युक्त
बनी है।
बाद
की प्रतिमाओं
के निर्माण का
वर्ष परमार वंश
के पतन का रहा
है इस कारण भी
पूर्व की कला
को ही
संरक्षित या
समानता लिए
बनाया गया है
नवीन रूप केवल
राजा भोज के
समय के
शिल्पकार्यो
में दिखलाई
देता है। जो
इस काल की
शिल्पकला को
एक नई दिशा और
रूप प्रदान
करता है। (प्रत्यक्ष)
परमारकालीन
बाद के वर्षो
में आये
परिवर्तनो का
रेखांकन
|
रेखाचित्र
4 |
|
रेखाचित्र 4 आयुध और
नंदी आकृति |
|
रेखाचित्र
5
|
|
रेखाचित्र 5 जटामुकुट |
रेखाचित्र
6
|
|
|
रेखाचित्र 6 आभूषण |
परमारकालीन शैव प्रतिमाओं का मालवा के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन पर प्रभाव
परमार
वंश जो 9वी से 13वी
शताब्दी तक
मालवा
क्षेत्र पर
प्रमुख सत्ता
के रूप में
रहा है। यह
वंश शैव धर्म
का अनुयायी
था। यहाँ शैव
स्थापत्यो का
निर्माण होना
जन मानस की
धार्मिक
भावना को
व्यक्त करने
का माध्यम व
साधन बना।
देखा जाये तो, मालवा
भूमि प्राचीन
काल से ही
शैवमय रही है।
उज्जैन जो
परमारवंश की
राजधानी भी
रहा है यहाँ महाकाल
मंदिर जो 12
ज्योतिर्लिंगों
में से एक है
जहाँ शिव पूजा
का अपना अधिक
महत्त्व है।
वहाँ के
राजवंश के द्वारा
अपनी प्रजा के
धार्मिक
अनुष्ठानो की
पूर्ति व
प्राचीन
महत्त्व को
विद्यमान
करने हेतु इन
शिवालयो का
निर्माण करा होगा।
शिव के लिंग
स्वरुप में
सगुण व
निर्गुण दोनों
रूपों को
अभिव्यक्त
करा गया है।
वहीं मानवाकृति
में उमा - महेश
रूप जो गृहस्थ
जीवन व पारिवारिक
मूल्यों की और
ध्यान
आकर्षित करता
है। यहाँ
अर्धनारीश्वर
स्वरुप पुरुष
और स्त्री
तत्वो के
समन्वय और
समानता को
दर्शाता है।
तथा नारी के
दार्शनिक और
सांस्कृतिक
महत्त्व को
दर्शाता है।
रोद्र स्वरुप
का अंकन संहारक
और भय या
शक्ति के रूप
में दिखाई
देता है। प्रतिमाओं
का निर्माण
मंदिरों की
सौन्दर्यता
तथा भव्यता को
बताने के साथ
मंदिर में
मुख्य व बाह्य
दोनों जगह
होता था। यहाँ
प्रतिमाये
ग्रंथो में
लिखित कथन व
ज्ञान को जन
-जन तक पहुँचा
कर धार्मिक
शिक्षा के
केंद्र के रूप
में भी उभरी
जान पड़ती है।
जिनसे
पौराणिक कथाओ
का ज्ञान
प्राप्त होता
है। शैव
प्रतिमाओं के
पूजन में
परंपरा के
निरंतर चलने
से संस्कृति के
जुडाव का भी
महत्त्व
दिखता है। साथ
ही इन प्रतिमाओं
के भव्य
निर्माण से इस
काल के आर्थिक
स्तर का भी
ज्ञान होता
है। अतः शैव
प्रतिमाये केवल
इस समय के
नरेशो की
आस्था का
स्वरुप नही बलकी
उस राज्य की
प्रजा की
धार्मिक
भावना उनकी
संस्कृति व
प्रगति की
यात्रा को
कहने वाली कला
भी है।
निष्कर्ष
शोध
पत्र में विषय
अवलोकन
उपरांत यह पता
चलता है, की किसी
राजवंश के
राजा का धर्म
से जुडाव कला को
प्रभावित
करता है।
शोधपत्र
शीर्षक के अध्ययन
में परमार
नरेशो के
अभिलेख में
शैव धर्म के
प्रति उनकी
आस्था और
जुडाव का कारण
ही इस क्षेत्र
में शैव
मंदिरों की
अधिकता को
दर्शाता है।
तथा इनकी रूचि
होने से इस
क्षेत्र की
प्रतिमाओं के
स्वरुपो और
शैली में अंतर
आता है। जो
अन्य राजवंशो
की कला से इसे
भिन्न बनाते
है। जहाँ
प्रतिमाओ का
आरंभिक रूप इस
राजवंश की नीव
के अस्थाई
होने और
संघर्षो को
बताता है। जिनमे
पूर्व राजवंश
कालीन कला का
समावेश दिखाई
देता है।
परन्तु
परमारों के स्थाई
शासन के हो
जाने से
प्रतिमाओं
में नवीन शैली
का
प्रादुर्भाव
दिखाई देता
है। इनमे आध्यात्मिक
भावो की
अभिव्यक्ति, क्षेत्रीय
रीती-रिवाज और
पौराणिक कथाओ
के अंकन का
समन्वय शिल्प
शास्त्रीय
मापदंडो के अधीन
प्राप्त होता
है। जहाँ
अलंकृत सज्जा
की प्रधानता
दिखाई देती
है।
REFERENCES
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