Original Article
The Kamadhenu Series: From the Perspective of Gogi Saroj Pal
कामधेनु
श्रृंखला:
गोगी सरोज पाल
के परिप्रेक्ष
मे
प्रस्तावना
चित्रकला
का इतिहास
उतना ही
पुराना कहा
जाता है, जितना मानव
का इतिहास।
मानव ने जिस
समय प्रकृति
की गोद में
नेत्रोन्मीलन
किया उस समय
से ही उसने
निर्माण के
तारतत्म्य से
अपने जीवन को
सुखी तथा
समृद्ध बनाने
की चेष्टा की
और इस निर्माण
के फलस्वरूप
उसने ऐसी
कृतियों का
सृजन किया जो
उसके जीवन को
सुखद और
सुचारू बना
सके। इस समय
से मनुष्य की
ललित भावना भी
जाग उठी और उसने
अपनी इस मूक
भावनाओं को
अनगढ़ पत्थरों
के यंत्रों के
द्वारा तथा
तूलिका की
टेढ़ी मेढ़ी रेखा
कृतियों के
रूप में
गुफाओं और
चट्टानों की भित्तियों
पर अंकित
किया। उसके
जीवन की कोमलतम
भावनायें तथा
संघर्षमय
जीवन की सजीव
झांकियां आदि
मानव की कला
कृतियों के रूप
में आज भी
सुरक्षित है।
कला
मानव की
चिरसंगिनी है, मनुष्य के
विकास से ही
कला का विकास
हुआ है। मानव
समाज का
प्राणी है तो
कला समाज की
रीढ़ है। कला
इस विराट
विश्व की
सर्जना शक्ति
होने के कारण
सृष्टि के
समस्त पदार्थ
में व्याप्त
है। वह अनंत
रूप है और
उसके इन अनंत
रूपों की अभिव्यक्ति
एवं
निष्पत्ति का
आधार कलाकार
है।

आज के
आधुनिक युग
में भी ऐसे
बहुत से
कलाकार है, जिनकी
कलाकृतियां
कला जगत की
अमूल्य निधि
के रूप में
हमारे समक्ष
उपस्थित है
जिसमें से एक अमृता
शेरगिल है
जिन्होंने
लगातार
महिलाओं की
स्थिति को
अपने चित्रों
के द्वारा
प्रस्तुत
किया है। राजा
रवि वर्मा
इन्होंने भी
अपनी कला के
द्वारा नारी
सौंदर्य के
विविध आयामों को
प्रस्तुत
किया है।
जिसमें
शकुंतला, भिक्षुणी, सीता हरण
मेनका आदि
महिलाओं को
दर्शाया है। इन्हीं
कलाकारों में
से एक है
सर्वाधिक
प्रतिभावान
कलाकार गोगी
सरोज पाल
जिन्होंने
अपनी कला
प्रतिभा के
द्वारा
भारतीय चित्रकला
में विशिष्ट
भूमिका निभाई
है। गोगी सरोज
पाल जो आधुनिक
भारतीय कला
में पहली
नारीवादी महिला
चित्रकार के
रूप में भी
जानी जाती
हैं। जिन्होंने
लगातार
महिलाओं की
स्थिति एवं जीवन
को अपनी
कलाकृतियों
के माध्यम से
प्रस्तुत
किया है।
उन्होंने
महिलाओं का
जीवन उनकी इच्छाएं
मजबूरियां
एवं स्त्री की
जटिलताओं को अपने
चित्रों के
द्वारा
दर्शाया है।
आपका जन्म 3 अक्टूबर
सन् 1945
में उत्तर
प्रदेश के
छोटे से कस्बे
नियोली में
हुआ था। आपको
बचपन से ही
कला में अधिक
रुचि थी इसी
लिए आपने अपने
विचार एवं
उत्सुकताओं
को व्यक्त
करने के लिए
कला को अपना
माध्यम चुना।
वेद नायर उनके
बारे में
बताते हुए की
“यह बात है उस
लड़की कि जो
अपने मन से
कलाकार बनना
चाहती थी” 1 आप
कलाकार बनने
के लिए अपने
घर से निकल
पड़ी दुनिया का
अन्वेषण करने
के लिए आप
वनस्थली गई, लखनऊ एवं
दिल्ली भी आई, आपकी
मुलाकात गोगी
से दिल्ली में
हुई, एक
जज्बे व जुनून
वाली बच्ची, लड़की व
महिला मैंने
जिंदगी में
पहली बार देखी, मैंने
उसके साथ बहुत
समय बिताया, उम्र
ज्यादा होने
की वजह से मैं
उसके साथ बिताये
हुए पल आप
लोगों को
ज्यादा खुलकर
नहीं बता सकता
क्योंकि
याददाश्त भी
एक याद जैसी
होती है। मैंने
उसके साथ बहुत
समय बिताया हम
दोनों ने बहुत
काम साथ में
किये। हम
अलग-अलग जगहों
पर गए, और
बहुत लोगों से
मिले-जुले।
इन्होंने
किसी एक
माध्यम में
सीमित न रहकर
विभिन्न
माध्यमों में
कार्य किया है
जिनमें गौचे, तैल, सिरेमिक, ग्राफिक, मूर्ति
कला एवं
फोटोग्राफी
शामिल है।

गोगी सरोज पाल के नारीवादी विषय
आपके
काम करने का
विषय हमेशा से
ही नारीवादी रहा
है और जिस तरह
उन्होंने
अपने मन की
मान के आर्टिस्ट
की दुनिया में
कदम बढ़ाया एक
लड़की होकर, उससे
उन्होंने तय
कर लिया था कि
वह अपनी एवं औरतों
के लिए देश
में एक अनोखी
जगह बनाना
चाहती हैं।
आपके सभी काम
के विषय औरतों
के ऊपर ही हैं।
शुरुआती समय
में उनके काम
बहुत
एब्स्ट्रेक्ट
थे। फिर
धीरे-धीरे
उनके काम में
बदलाव हुए।
उन्होंने न
जाने कितनी
सीरीज के ऊपर
काम किया है, उनकी यह
एक खासियत थी
कि जब वह एक
विषय पर काम करती
थी तो उसकी एक
सीरीज तैयार
करती थी और एक
सीरीज में वह
कम से कम 30 से 40 काम
करती थी उनकी
काफी सारी
सीरीज है
अलग-अलग विषयों
पर जो इस
प्रकार हैं।
·
ऑल
दीज फ्लावर आर
फॉर यू
जिसमें
उन्होंने
स्त्रियों को
फूलों के साथ सेलिब्रेट
एवं जश्न
मनाते हुए
दर्शाया हैं और
उनका मानना यह
है कि फूलों
की जो खुशबू
है एक पूर्ण
विश्वास
(पॉजिटिविटी)
है। फूलों के
अलग-अलग रंग
हैं वैसे ही
स्त्रीत्व है
जो जीवन में
अलग-अलग
अवस्था पर
फूलों की तरह
ही काम करती है।
·
बीइंग
अ वुमन
इस सीरीज में
उन्होंने यह
दर्शाने का
प्रयत्न किया
है कि आप जैसे
हो वैसे ही
रहो किसी के
लिए आप खुद को
बदल नहीं
सकते। वह अपने
काम में बहुत
से प्रेरणा
स्रोतों को
देखकर काम
करती थी। प्राकृतिक
वस्तुएं आपको
बहुत उत्साह
देती हैं जैसे
फूल उसके
बदलते चरण
आसमान व उसके
बदलते रंग पशु
पक्षी, मौसम
और हिंदू
पौराणिक कथा
आदि।
·
स्वयंब्रम
इस श्रृंखला
में वह
स्त्रीत्व के
अधिकारों को
दिखाना चाहती
हैं जैसे
हिंदू
पौराणिक कथाओं
में
स्वयंब्रम
होता था इसमें
यह आजादी है
कि स्त्री
अपने
जीवनसाथी को
खुद चुन सकती
हैं तो दुनिया
में यह आजादी
क्यों नहीं
है। स्त्री की
विभिन्न
अवस्थाओं को
अपने अपनी
कलाकृति के विषयों
द्वारा
अलग-अलग तरह
से दुनिया के
सामने
प्रस्तुत
किया है। आपने
अपनी
कलाकृतियों में
स्त्री को गाय
के रूप में, पक्षी के
रूप में, हिंदू
पौराणिक
कथाओं की सभी
देवियों के
रूप में
दर्शाया है।
·
हट
योगिनी
इस श्रृंखला
में उन्होंने
देवियों के नव
रूपों को
दर्शाया है और
यह दर्शाने का
प्रयास किया
है कि स्त्री
खुद में ही एक
विशिष्ट रूप
है जिसे किसी
के सहारे की
जरूरत नहीं है
वह कुछ भी कर
सकती हैं
अकेले ही अपने
दम पर। जैसे
देवियों के
वाहन अलग-अलग
पशु व पक्षी
होते हैं इस
श्रृंखला में
उन्होंने
स्त्री को शेर
के ऊपर दर्शाया
है कि औरत खुद
एक शेर है।
·
नाटी
बिनोदिनी
यह श्रृंखला
कलाकार के लिए
एक स्मृति एवं
एक अकल्पनिक
रूप था। जिसे
वह अपनी दादी
जी को समर्पित
करना चाहती थी
और उन्होंने
किया भी। नाटी
बिनोदिनी
इसमें एक
नायिका के रूप
को दर्शाया है।
जो कि कहीं भी
जाकर खुद को
नए माहौल में
ढल सके व खुद
के लिए कुछ कर
सके। इस सीरीज
में उन्होंने
स्त्री की
अंतर्मन की
दशा के बारे
में बताना
चाहती हैं
जैसे वह जब
सन् 1983
में दिल्ली
आयी एक
फ्रीलांस
आर्टिस्ट के
तौर पर और
यहां वह किसी
को नहीं जानती
थी उसके बावजूद
भी उन्होंने
हार ना मान कर
अपने मन के
अनुसार काम
किया व दोस्त
बने और एक
अपनी नई पहचान
बनाई।
·
होम
कमिंग
यह सीरीज
बहुत अलग
सीरीज रही है
उनके लिए जब वह
लाहौर स्फीति
में थी और नदी
किनारे बैठ के
जब वह आसमान
की तरफ देखी
थी सूरज ढलने
के समय तो उन्होंने
देखा कि आसमान
का रंग कैसे
बदल रहा है
धीरे-धीरे नील
से कैसे काला
होता है और इन
दोनों रंगों
के बीच न जाने
कितने रंग आ
जाते हैं और
रात तक आसमान
काला दिखाई
देता है और उस
ढलते सूरज के
समय सारे पशु
पक्षी मनुष्य
अपने पिंजरे
घोसला वह घर
वापस चलना
शुरू कर देते
हैं कुछ ऐसे
पशु, पक्षियों
व मनुष्य का
झुंड भी होता
था जो स्थानांतरगम, वह खुशी, व इंतजार
अपने-अपने घर
जाने का व
अपने परिवार, दोस्तों
से मिलने का
उस समय चल रहे
दिमाग में यह
ख्याल को वह
इस सीरीज में
व्यक्त कर रही
है।
·
किन्नारी
व किन्नारी
मंत्र
होम कमिंग
श्रृंखला से
ही किन्नारी
की श्रृंखला
का जन्म हुआ
है। इस सीरीज
में गोगी
व्यक्त करती
है कि वह सुबह 5-6 के बीच
अपनी खिड़की से
बाहर देखती है
तो वह चिड़ियों
की चहचहाहट
सुनती एवं
देखती है कि
वह सात सुरों
के राग को
चिड़िया कैसे
समझा रही है।
चिड़ियों के
पंख को आजादी
की तरह सराहना
है कि सबको
अपने जीवन में
सब करने की
आजादी है जिसे
करने से लोगों
को सुकून
मिलता है। इसी
लिए सीरीज का
एक नाम और
जोड़ा गया
(विंगड बर्ड)।
·
किन्नरी
मंत्रास
यह सीरीज
किन्नरी के
बाद शुरू हुई
है जिसमें वह
एक किन्नरी
एवं
व्यक्तित्व
को सात सुरों
के धागों में
पिरोती है व
मंत्र की तरह
दर्शाती हैं
मानो जैसे
उन्हें मंत्र
जाप करना बहुत
अच्छा लगता
था। वह रोज
रात में व
सुबह उठकर
मंत्र जाप
करती थी। जैसे
जब में 100, 101, 108, 112 जैसे जाप
चलते रहते हैं
वैसे ही
उन्होंने इस सीरीज
में एक
व्यक्तित्व
के साथ दर्पण
प्रतिबिंब, प्रतिष्ठा
को दर्शाया।
·
फुलकारी
यह भी उनकी
बहुत प्रिय
सीरीज रही है
जिसमें उन्होंने
महिलाओं को
फुलकारी के
रूप में दर्शाया
है। जब घर की
सारी
स्त्रियां
अपनी बेटियों की
शादी में देने
के लिए
फुलकारी
बुनती थी। जिसके
द्वारा उनकी
पुत्रियों को
सुअवसर एवं उससे
जुड़ा प्यार व
यादों को
दर्शाता है।
उन्होंने इस
कलाकृति में
स्त्री के
शरीर पर फूलों
के कपड़े
फुलकारी की
तरह चित्रित
किया है।
·
काली
यह भी
उनकी एक प्रिय
सीरीज में से
एक है जिसमें
उन्होंने
देवियों के नव
रूपों को
दर्शाया हैं।
जिनमें मां
काली का रौद्र
रूप जो एक अलग
आत्मा, शक्ति, प्यार आदि
को दर्शाता
है। उसी तरह
इस सीरीज में
उन्होंने
अपने मन के
विचारों को
अपनी कलाकृति
एवं स्कल्पचर
के माध्यम से
दर्शाया है।
शेर के ऊपर
काली को
प्रस्तुत
करना अपने आप
में एक -ढ़
निश्चय, शक्ति, आदि को
दर्शाता है।
बहु शीर्ष एवं
पैरों के साथ
काली का वह
रौद्र रुप न
जाने एक साथ
कितने काम कर
सकते है और एक
ऐसे रूप को
बनाया जिसे
व्याख्यान की
कोई जरूरत
नहीं है। ऐसी
सीरीज को वह
आगे बढ़ना
चाहती थी।
आपने और भी कई
श्रृंखलाओं
पर काम किया
है जैसे
कामधेनु, फूड्स फॉर
थॉट, निर्भया, आनंदित
नायिका, ड्रीम बोट, महास्नान, मॉरीशस, सेल्फ
पोट्रेट, इंटरनल बर्ड, डांसिंग
हॉर्स, मंडी
स्टोरी व
स्टोरी टैलर, आग का
दरिया, मां
हिडंबा, मदर एंड
चाइल्ड आदि
सभी
श्रृंखलाओं
के काम ने दुनिया
में अलग-अलग
जगह व पहचान
बनाई है। इन्हीं
में से एक है
कामधेनु
श्रृंखला जो
देवताओं की
इच्छाएं
पूर्ण करती
है। उसी
प्रकार कलाकार
ने पौराणिक
गाय को ध्यान
में रखकर ही
आज के समकालीन
युग में गाय
एवं स्त्री को
एक नया रूप प्रदान
किया है ।जिस
तरह पौराणिक
गाय देवताओं
की सभी
मनोकामनाएं
पूर्ण करती थी
उसी प्रकार
महिलाएं भी
परिवार के सभी
सदस्यों की
इच्छाओं को
पूर्ण करती
है।
गोगी सरोज पाल की कामधेनु श्रृंखला
कलाकार
ने नारी समाज
का चित्रण बड़े
ही अनोखे ढंग
से किया है
उन्होंने
उसको आदर्श
रूप में चित्रित
करने का भी
प्रयत्न किया
है। महिलाओं की
वेशभूषा और
श्रृंगार
साधना से यह
अनुमान लगाया
जा सकता है कि
उसका क्या
महत्व है वह
देवी है, राजवंशीय
राजकुमारी है, या कोई
दासी है।
कलाकार ने
शारीरिक
सौंदर्य पर
ध्यान न देकर
उसके आन्तरिक
सौंदर्य पर
अधिक ध्यान
केंद्रित
किया है।
इसी
विचारधारा से
संबंधित
कलाकार हैं
गोगी सरोज पाल
जिन्होंने एक
महिला होने के
नाते सबसे
पहले महिलाओं
की इच्छा पर
अपनी विचार
प्रस्तुत किए
हैं कि आप
इच्छा की
वस्तु हैं और
फिर भी
निश्चित रूप
से आपकी भी
अपनी इच्छाएं
हैं। इस
प्रकार आप
चित्र में
वास्तु और
विषय दोनों है।
गोगी सरोज पाल
ने सन् 1989 में महिलाओं
के बारे में
पौराणिक
कल्पनाओं पर
आधारित
चित्रों की एक
नई श्रृंखला
शुरू की उनकी
पहली छवि
कामधेनु की है
जो सभी सपनों
एवं इच्छाओं
को पूरा करने
के लिए पूजी
जाने वाली पौराणिक
इच्छा पूर्ति
करने वाली गाय
है। संसार में
उपहार एवं दान
देने की यह
भूमिका सहयोग
से महिलाओं को
सौंप गई है।
अतः कामधेनु
सबसे उपयुक्त
प्रतीक बन
जाती है। एक
कलाकार एवं एक
महिला होने के
नाते गोगी
सरोज
व्यंगात्मक
हास्य के साथ
रहती हैं।
कामधेनु के
बारे में लोग
कहते हैं वह
बहुत अच्छी है
वह आपकी सभी
इच्छाओं को पूरा
कर सकते हैं
यह दिलचस्प है
कि किसी ने
कभी यह नहीं
पूछा कि
कामधेनु
स्वयं क्या
चाहती है अगर
वह चाहती है
तो उसकी अपनी
इच्छाएं कैसे
पूरी हो सकती
है। आंधी
स्त्री और आधी
गाय दूधिया जी
का यह मनमोहन
संयोजन बिना
कपड़ों के उसकी
कामुकता को और
उभरता है।

फिर
भी क्योंकि
उसके हाथ और
पैर पर अल्ता
के सौंदर्य
प्रसाधन से
लाल रंग में
रंगे हैं। वह
दर्शकों को
मोहित करने के
लिए तैयार एक
स्त्री का
आकर्षण
प्राप्त करती
है। यह छवि और
गोगी सरोज पाल
की किन्नरी, पौराणिक
पक्षी स्त्री
पर आधारित
श्रृंखला है
यह निर्लज्ज
जीव स्त्री
एवं पुरुष
दोनों हैं जो
शब्द और असभ्य
संकोची और
उद्दंड के बीच
निरंतर
रूपांतरित
होते रहते
हैं। इच्छा
करने वाले और
वांछनीय
महिलाओं के
मूल उद्देश्य
को नष्ट करते
हैं। गोगी
सरोज पाल
भारतीय
समकालीन कला
की एक
प्रसिद्ध
कलाकार हैं
जिनकी कृतियों
में नारी
शक्ति स्त्री
देव और
पौराणिक, सांस्कृतिक
एवं सामाजिक
पहचान गहराई
से दिखाई देती
है। यह चित्र
भी उनके उसी
-ष्टिकोण का हिस्सा
है।

1)
कामधेनु
गोगी
सरोज पाल
अक्सर अपने
कार्यों में
स्त्री को
केवल सजावट के
रूप में नहीं
दिखातीं, बल्कि उसे एक
आध्यात्मिक, सृजनात्मक
तथा पालन-पोषण
करने वाली
शक्ति के रूप
में प्रस्तुत
करती हैं। इस
चित्र में स्त्री
और गाय का
सम्मिलन कोई
साधारण
कल्पना नहीं
है,
बल्कि यह
कलाकार
द्वारा
स्त्री को
कामधेनु के
रूप में देखने
का एक
-ष्टिकोण है।
कामधेनु भारतीय
पौराणिक
कथाओं में
इच्छा-पूर्ति
करने वाली
दिव्य गाय है।
वह न केवल
मातृत्व के
द्वारा जीवन
को जन्म देती
है,
बल्कि
अपनी ऊर्जा और
शक्ति से समाज
एवं संस्कृति
का भी पालन
करती है।
चित्र के ऊपरी
हिस्से में दो
छोटे चेहरे
हैं जिनके कान
या पंख पत्तों
जैसे प्रतीत
होते हैं। चित्र
की पृष्ठभूमि
गहरे नीले रंग
की है, जिसमें
छोटे-छोटे
बिंदु तारों
के समान दृष्टिगत
हैं। जो आकाश
और अनंत
ब्रह्मांड का
आभास प्रतीत
कराता है।
चित्र में
रंगों का चयन
भी अर्थपूर्ण
है। पीला रंग
जीवन और
समृद्धि को
दर्शाता है और
वहीं लाल रंग
शक्ति और
नारीत्व का प्रतीक
है,
जबकि नीला
रंग अनंतता और
दिव्यता को
व्यक्त करता
है। यह
पेंटिंग नारी
को केवल एक
शारीरिक रूप
में नहीं, बल्कि
प्रकृति और
सृष्टि की मूल
शक्ति के रूप में
प्रस्तुत करती
है। इसमें
मातृत्व, पालन-पोषण, कामना और
रहस्यमय
दिव्यता का
गहरा संदेश
छिपा है। यह
चित्र नारी और
प्रकृति के
अटूट संबंध, कामधेनु
की पौराणिकता
और नारी-शक्ति
की महानता को
एक साथ
दर्शाता है।

2)
कामधेनु
इस कृति
में कलाकार ने
नारी एवं गाय
के एक अनोखे
और
प्रतीकात्मक
रूप को
प्रस्तुत
किया हैं। इस
चित्र में
प्रदर्शित
आकृति का ऊपरी
हिस्सा
स्त्री का है
जबकि निचला
हिस्सा गाय का
है। जो कलाकार
की “कामधेनु”
श्रृंखला का
हिस्सा है, इसमें
नारी को
“कामधेनु”
प्रतीक के रूप
में चित्रित
किया हैं।
स्त्री के
चेहरे पर
आत्मविश्वास
और मोहकता है, वह अपने
हाथ पर आल्ता
लगाए हुए है
जो शक्ति, व नारीत्व
का प्रतीक है।
जिसके चेहरे
पर लाल होंठ, बड़ी आँखें
एवं गहरी
रेखाएँ उसकी
नारीत्व को और
उभारती हैं।
चित्र में
पीले रंग की
पृष्ठभूमि जो
ऊर्जा, जीवन
एवं
उज्ज्वलता को
प्रकट कर रही
है। यह रंग
केवल सजावट के
लिए नहीं है, बल्कि यह
नारी को
प्रकाश और
जीवन-स्रोत के
रूप में
दर्शाता है।
कलाकार का
उद्देश्य
केवल स्त्री
के शरीर को
दिखाना नहीं
है,
बल्कि
उसके अन्दर
छिपी
जीवनदायिनी
शक्ति एवं
पौराणिक
महत्व को
उजागर करना
है। कामधेनु की
तरह स्त्री भी
जीवन व
समृद्धि का
आधार है।

3)
कामधेनु
यह
कलाकृति
प्रसिद्ध
भारतीय
कलाकार गोगी
सरोज पाल
द्वारा
निर्मित की गई
कामधेनु
श्रृंखला है।
कामधेनु शब्द
उस प्राचीन
कथा से आया है
जिसमें
देवताओं व
असुरों ने
समुद्र मंथन
करके उपहार
प्राप्त किए
थे जिनमें एक
इच्छा पूर्ति
करने वाली गाय
भी शामिल थी।
इस कलाकृति
में एक स्त्री
आकृति को हरे
व नीले रंग
में चित्रित
किया है जिसे
एक पीले रंग
की पृष्ठभूमि
पर बैठी
अवस्था में
दर्शाया गया
है। आकृति के
होंठ लाल रंग
से युक्त हैं
एवं आल्ता से
ढके हाथ, पैर उसके
आभूषण होने की
स्थिति को
दर्शाते हैं
चित्र में
कलाकार ने
अपनी कला में स्त्री
और गाय के इस
अनोखे रूप को
कामधेनु कहां
है। जो हिंदू
पौराणिक
कथाओं में एक
पवित्र गाय
हैं, जिसे
इच्छाओं को
पूरा करने
वाली गाय के
रूप में भी
जाना जाता
हैं।
जिसे सन् 1989 और 1998 के बीच
निर्मित किया
गया था।
जिसमें एक ऐसी
स्त्री को
दर्शाया है
जिसके ऊपर का
धड़ मानव है और
नीचे का आधा
धड़ कुछ गाय के
समान प्रतीत
होता है।

4)
कामधेनु
कलाकार
ने कामधेनु
श्रृंखला में
कई चित्र निर्मित
किए है जिनमें
से एक कृति यह
भी है जिसमें
आधी स्त्री
एवं आदि गाय
दोनों रूपों
को कामधेनु
गाय के समान
चित्रांकित
किया है।
उन्होंने
पीली
पृष्ठभूमि पर
सफेद रंग की
आकृति बनाई है
जिसके हाथ और
पैर पर लाल
रंग से युक्त
है। चित्र में
बनी आकृति ने
दोनों हाथ सिर
के ऊपर रखे है
मानो जैसे वह
नीचे की ओर
सिर झुकाए मुस्कुरा
रही हो रही
हो। यह कृति
भी उनकी इसी
विचार धारा से
संबंधित हैं।

5)
कामधेनु
इस
चित्र में भी
कामधेनु के
रूप को ही
दर्शाया है
चित्र की
पृष्ठभूमि
गहरे नीले रंग
की है जिसमें
श्वेत रंग के
माध्यम से आधी
स्त्री एवं आधी
गाय को
कामधेनु रूप
में दर्शाया
है। चित्र में
कामधेनु की
छवि सिर को
कंधे पर झुकाए
हुए सामने की
ओर निहारती
प्रतीत होती
है। छबिया कामुकता
की एक नई
शब्दावली का
हिस्सा बनती
है।
आधुनिक युग में प्रासंगिकता
गोगी
सरोज पाल को
आधुनिक
भारतीय कला की
पहली ‘नारीवादी’
महिला
चित्रकारों
में से एक है।
आपकी
कलाकृतियों
में चित्रित
महिला
आकृतियाँ सशक्त
और
आत्मनिर्भर
है। जिनमें
रंगीन और विचारोत्तेजक
कृतियाँ
शर्मीली
नायिकाओं के रूपकों
से आगे बढ़कर
एक अधिक सशक्त
स्त्री रूप की
ओर बढ़ती हैं।
कलाकार के
अनुसार
स्वतंत्र होने
के लिए, एक महिला को
पहले खुद को
स्वतंत्र
महसूस करना होगा।
जिसका
इस्तेमाल
कलाकार ने
अपने विलक्षण
व्यक्तित्व
और अपनी कला, दोनों को
समझाने के लिए
किया है। आपने
इस कलाकृति के
माध्यम से
भारतीय समाज
में नारी की
स्थिति, भूमिका, पीड़ा एवं
उनकी शक्ति को
एक साथ
दर्शाने का
प्रयास किया
है। कलाकार का
यह -ष्टिकोण
पारंपरिक धार्मिक
प्रतीकों को
आधुनिक
नारीवादी
चेतना से
जोड़ता है।
कलाकार ने
स्त्री और पशु
रूप को एक
नवीन रूप
प्रदान किया
है।
ACKNOWLEDGMENTS
None.
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