Original Article
Conceptual Contribution of Globalization and Industrialization in Indian Art
वैश्वीकरण
और
औद्योगिकीकरण
का भारतीय कला
में वैचारिक
अवदान
प्रस्तावना
मूल
आलेख:‘वैश्वीकरण’
वह प्रक्रिया
हैं जिसके
माध्यम से
दुनिया के
विभिन्न
संस्कृति, रिवाज, तकनीक, विचार व
कलाओ का
आदान-प्रदान
होता हैं। जब
किसी देश की
कला पर अन्य
देशों की कला
का प्रभाव पड़ता
हैं जिससे
विभिन्न
संस्कृति का
समन्वय होता
दिखाई देता
हैं, उसे
ही ‘कला का
वैश्वीकरण’
कहा जाता हैं।
‘वैश्वीकरण’
शब्द के
निर्माण का
श्रेय
‘अर्थशास्त्री
थियोडोर
लेविड’
को दिया जाता
हैं, यह
माना जाता हैं
कि उन्होंने
अपने लेख
“बाजारों का
वैश्वीकरण (1983) में इसका
इस्तेमाल
किया”। Kumari (n.d.)
वैश्वीकरण
ने ही विश्व
को नवीन चेतना
प्रदान की
जिससे कलाओ को
अभिव्यक्ति
करने व उसे
विभिन्न
आयामों के साथ
प्रदर्शित
करने का अवसर
प्रदान किया
हैं। “ दि
ह्यूमन
डेवलमेंन्ट
रिपोर्ट ने
माना हैं की
वैश्वीकरण ने
दुनिया भर के
लोगों के लिए
रचनात्मकता
के सभी द्वार
खोल दिए हैं, विचार और
ज्ञान दूर-दूर
तक पहुच गए”। Sharma (2017) कला
के संदर्भ में
कह सकते हैं
कि सृजन के
नवीन द्वार
खुले जिससे
नवीन कला की
अभिव्यक्ति
का आरंभ होता
हैं।
‘औद्योगीकरण’
किसी समाज को
कृषि
अर्थव्यवस्था
से औद्योगिक
अर्थव्यवस्था
में बदलना।
दूसरे शब्दों
में
औद्योगीकरण
का अर्थ हैं
कि एक समाज को
दूसरे समाज
में बदलाव
जिसमे मशीनों
का प्रयोग
करके बड़े
पैमाने पर
उत्पादन
करना। ‘औद्योगीकरण
वह प्रक्रिया
हैं जो
परंपरगत समाज को
एक आधुनिक
समाज में
बदलती हैं
जिसमे मशीन, पूंजी, श्रम, और अन्य
साधनों का
केन्द्रीकरण
होता हैं’। Robert and Keli (2025) -
ए.र.देसाई
डॉ.
वासुदेव शरण
अग्रवाल के
अनुसार- “कला
किसी विचार या
कल्पना को
दृश्य रूप
देती हैं। कला
का यही रहस्य
हैं कि उसमे
लोक संस्कृति
परंपरा की
व्याख्या
होती हैं।
भारतीय कला
तत्व के अनुसार
कला भावों का
पृथ्वी पर
अवतार हैं”। Robert and Keli (2025)
लेखक के कहने
का अर्थ हैं
कि कला हमारे अदृश्य
मनोभावों को
कला दृश्य रूप
प्रदान करती
हैं जो हमारी
संस्कृति
परंपरा को
परिलक्षित
करती हैं।
उपर्युक्त
परिभाषा से हम
कह सकते हैं
औद्योगीकरण
के विकस में
भी पहले उसकी
कल्पना में गई
होगी फिर उसको
अभिव्यक्त्
करने हेतु
मशीन का
आविष्कार
किया गया होगा, अमूर्त को
मूर्त रूप
प्रदान किया
गया होगा। क्योंकि
विश्व में कला
ही कल्पना को
अभिव्यक्त
करने का
माध्यम रही
हैं। अतः मानव
सभ्यता का
विकास क्रम
हमे कलाओ के
माध्यम से ही
ज्ञात होता
हैं।
वैश्वीकरण और
औद्योगीकरण
ने हमारे जीवन
शैली को
आधुनिक रूप
दिया, जिसके
प्रमाण आज
देखने को
मिलते हैं।
वर्तमान समय
में इसका
प्रयोग
वैश्विक स्तर
पर व्यापक रूप
से हो रहा
हैं।
कला
के तकनीकी
विकास को
समझने हेतु
सुप्रसिद्ध
जर्मन
दार्शनिक
हीगेल ने लिखा
हैं कि ‘कला का
विकासक्रम
मानव
मस्तिष्क के
विकासक्रम का
प्रतीक हैं।
प्रारंभ में
कला
प्रतीकात्मक थी
जैसे प्राचीन
मिश्र की, विकसित
होते-होते
उसने
शास्त्रीय
स्वरूप ग्रहण
किया और आगे
चलकर वह
स्वच्छन्द
बनकर विचरण
करने लगी। आज
के कला
की कुछ ऐसी ही
स्थिति हैं, जो
पूर्ण
स्वच्छन्द हो
गई हैं। आधुनिक
कला के
विभिन्न
अभियान
कलाकारों के
तेजी से बदलते
हुए
दृष्टिकोण का
परिचय देते
हैं’। Bajpai (1980–1981)
परंपरागत
कलाओ के
माध्यम व
तकनीकों मे
बदलाव सभ्यता
के विकास के
साथ-साथ
औद्योगीकरण
का वैश्वीकरण
भी होना हैं।
भारतीय
कला को समझते
हुए भारत में सर्वप्रथम
चित्रकला का
प्रयोग
प्राचीन
ग्रंथ ‘ऋग्वेद’3 में
मिलता हैं। तो
वही
प्रागैतिहासिक
काल में
चित्रण के
प्रमाण हमे
गुफाओ में
उकेरे गए चित्रों
से होती हैं
जिसमे गेरू, खड़िया आदि
से शिलाखंडों
पर शिकार के
दृश्य बनाए गए
हैं। इनमें
प्रमुख रूप से
मनुष्य और वनपशुओ
को शिकार करते
हुए अंकित
किया गया हैं।
इसी क्रम में
‘अजंता’ की
गुफाओ में
चित्रकला,वास्तुकला
और मूर्तिकला
का संगम देखने
को मिलता हैं, जिसकी
तुलना पूरे
विश्व में
करना असंभव
हैं। इसमे
बुद्ध के जीवन
और जातक कथाओ
का चित्रण अनुपम
हैं।
प्रस्तुत
प्रमाण ही
भारतीय कला परंपरा
को प्रदर्शित
करती हैं।
विकासक्रम
में लघु
चित्रकला
परंपरा में
मुगल शैली में
भारतीय कला और
ईरानी कला के
समन्वय से
‘मुगल शैली’ का
विकास होता
हैं। जिसमे
प्रमुख रूप से
दरबारी चित्र, शबीह व
दृश्य चित्रण
हुआ। मुगल
शैली में राजा
हुमायुँ ने
ईरानी
चित्रकार
अब्दुसमद
शीराजी तथा
मीर सैयद अली
नामक
चित्रकार को
अपने साथ भारत
लाया था। इन
कलाकारों ने
भारतीय
विषयों व
लोगों के
चित्र बनाए और
मुगल शैली का
सूत्रपात
किया। अतः
मुगलकाल से ही
विदेशी
तत्वों का समावेश
प्रारंभ होता
दिखाई देता
हैं।
इस शैली के
पतन से नई
शैली के आगमन
ने भारतीय कला
में नवीन
परिवर्तन
होता हैं क्योंकि
ईस्ट इंडिया
कंपनी की
स्थापना होने से
भारतीय
कलाकारों को
प्रोत्साहन
मिला जिससे
‘कंपनी शैली’
का विकास होता
हैं। इस शैली
के चित्रकारों
ने विदेशी जल
रंग एवं कागज
का प्रयोग
प्रारंभ
किया। इन
कलाकारों से
अंग्रेज अधिकारी
चित्रण
करवाते और
विदेश भेजा
करते। यह
आवा-जही से ही
भारतीय कला
में धीरे-धीरे
नवीनता का
प्रवेश होता
हैं, साथ
ही वैश्विक
स्तर पर
औद्योगिक
विकास होता हैं, क्योंकि
अब भारतीय व
विदेशी
कलाकारों ने
मिलकर नई शैली
विकसित की और
नए-नए
माध्यमों का
प्रयोग किया।
भारतीय
कलाकार
द्वारा
तकनीकी विकास
और नई शैली
विकसित करने
का श्रेय राजा
रवि वर्मा को
जाता हैं।
इन्होंने
पश्चिमी कला
विषयों को
नकार कर
भारतीय
पौराणिक और
धार्मिक आख्यानों
और चरित्रों
चित्रण
विदेशी तैल
माध्यम में
प्रयोग किया।
भारतीय कला को
आधुनिक बनाने
का श्रेय
‘राजा रवि
वर्मा’ को भी
दिया जाता हैं।
क्योंकि
‘अस्मिता के
संकट के इस
मोड़ पर राजा
रवि वर्मा ने
अपने विपुल
सृजन के साथ
प्रादुर्भाव
किया, बड़ी
संख्या में
उन्होंने
पेंटिंग्स, ड्राइग्स,जल रंग
चित्र और
ओलियोग्राफ
बनाए थे’। Mago (2012) उनकी सृजन
शैली तथा
तकनीक
पश्चिमी शैली
में थी जबकि
चित्रण का
विषय भारतीय
था। पश्चिमी
शैली वह शैली
हैं, जहां
सर्वप्रथम
मानवीरूप का
यथार्थ
चित्रण (भौतिक
सौदर्य), तैल रंग में
सर्वप्रथम
हुआ। आधुनिक
भारतीय कला
में
सर्वप्रथम यह
पहल राजा रवि
वर्मा ने की
जिसका चरम हमे
‘बंगाल शैली’
में देखने को
मिलता हैं।
तकनीकी
विकास के
संदर्भ में
वैश्विक
आधुनिक कला
आंदोलनों के
समान ही भारत
में भी आधुनिक
कला आंदोलन का
सूत्रपात हुआ
जो ‘बंगाल कला
आंदोलन’ के
नाम से
विख्यात हैं।
भारत में एक
मात्र आधुनिक
कला आंदोलन था
जो भारतीय
लोगों में भी स्वदेशी
की भावना का
संचार किया।
यह आंदोलन ब्रिटिश
कला समीक्षक
इ.बी. हैवेल के
सहयोग से अवनीन्द्रनाथ
टैगोर द्वारा
स्थापना की
गई। ‘भारतीय
कला के इतिहास
में बंगाल
शैली का महत्व
मध्य युगीन
राजपूत, मुगल तथा
पहाड़ी शैली की
तरह ही हैं
क्योंकि उसके
साथ एक
विशिष्ट कला
दर्शन और
विश्व कला की तत्कालीन
प्रवृत्तियों
का विनमय होता
हैं, इसलिए
उसे भारतीय
कला की एक
विशिष्ट कला
पद्धति का
महत्व हासिल
हैं’। Joshi (2023)
उपर्युक्त
विवरण से
ज्ञात होता है
कि भारतीय कला
में
पाश्चात्य
विषयों और
तकनीकों के
चित्रण के
विरुद्ध
प्राचीन कला
परंपरा को
देखा और उसमे
नवीन तकनीकी
माध्यमों का
प्रयोग कर बंगाल
शैली को
वैश्विक
चेतना प्रदान
की। जब इन परंपरा
के बंधनों से
निकलकर कला का
स्वतंत्र होकर
अभिव्यक्त
हुई तो
समकालीन कला
कहलाई। कलाकार
ने एक देश से
दूसरे देश
जाना शुरू
किया और उन
विचार विनिमय
को तत्कालीन
परिस्थियों के
अनुसार गढा तो
कला में
समकालीन
आधुनिकता का प्रवेश
हुआ हैं। इसका
उदाहरण हमें
भारतीय मूल की
कलाकार ‘अमृता
शेरगिल’5 की कृतियों में
देखने को
मिलता हैं।
जिनका
पालन-पोषण व
शिक्षा विदेश
में हुई
किन्तु इनका
मन भारत में
ही रमा रहा।
इनकी शिक्षा
पेरिस में हुई
और पॉल गोगिन
की तिहाती जीवन की
विषयों से प्रभावित
होकर, इन्होंने
भी भारत में
आकर यहाँ के
वातावरण और लोगों
से रहन-सहन और
विषाद को
चित्रण का
विषय बनाया
जिसमे प्रमुख
रूप से भारतीय
लोगों को बनाया, जैसे-
गणेश पूजा, हल्दी
पिसती औरते, सिख गायक
आदि विषयों को
धूमिल वर्ण
विधान रंगों
के साथ
प्रयुक्त
किया। यह पहली
महिला कलाकार
थी जिन्होंने
विदेश में
शिक्षा लेकर
भारत में नई
शैली का
सूत्रपात
किया जो आज भी
विश्व में
हमारे लिए
प्रेरणा दायक
हैं। अतः भारत
में भी
संस्कृति,परंपरा,नवीनता की
अभिव्यक्ति
का विकासक्रम
हैं जो निम्न
रूपों में
दृष्टिगत
होती हैं-
वैश्वीकरण
और
औद्योगीकरण
का भारतीय कला
में प्रभाव
औद्योगीकरण
ने पूरे विश्व
को मशीनीकरण
की दुनिया में
ढ़ालने का काम
किया हैं तो
वही वैश्वीकरण
ने भी इस
डिजिटल
दुनिया को
नवीन रूपों के
साथ
अभिव्यक्त
करने का अवसर
दिया। आज का
दौर कला की
दुनिया में
नवीनीकरण का
हैं जो
औद्योगीकरण
और वैश्वीकरण
का परिणाम ही
हैं। भारत में
18वी शती
में ईस्ट
इंडिया कंपनी
व्यापार करने
के उद्देश्य
से आई थी, किन्तु
धीरे-धीरे
पूरे भारत में
अपना आधिपत्य
बना लेती हैं।
भारत में
कुटीर उद्योग
व भारतीय कला
परंपरा में
मशीनीयुग का
प्रादुर्भाव होता
हैं जिससे
भारत में
तकनीकी विकास
का प्रारंभ
होता हैं। कला
के संदर्भ में
देखेंगे तो
पायेगे कि
भारतीय कला
परंपरा में
वैश्विक
विषयों का
प्रवेश होता
हैं जो कला नए
रूप में
अभिव्यक्त
किया जाने
लगा। इस
तकनीकी विकास
को निम्न
बिन्दुओ के माध्यम
से समझने का
प्रयास
करेंगे-
शिल्प
से उद्योग की
ओर परिवर्तन
औद्योगीकरण
का विकास
सर्वप्रथम 18वी
शताब्दी में
इग्लैंड में
प्रारंभ हुआ।
‘सर रिचर्ड
आर्कराइट’ ने 1769 में ‘वाटर
फ्रेम’14 मशीन का
पेटेट कराया, जिससे तेज
गति से कपड़े
उद्योग के
निर्माण हो सका।
वाट स्टीम
इंजन, आंतरिक
दहन इंजन आदि
मशीनों के
आविष्कार ने उद्योगों
के उत्पादकता
के विकास में
वृद्धि की। इन
मशीनों के
विकसित रूप को
देखकर
कलाकारों को
चित्रण हेतु
उद्वेलित
किया होगा
जिसका परिणाम
विश्व में
परिलक्षित
हैं।
औद्योगिक क्रांति
के
परिणामस्वरूप
व विश्व युद्ध
की क्रांतिकारी
विचारधारा ने
ही कला
आंदोलनों में
नवीन प्रवृत्तियों
का विकास किया, जिसमे
विज्ञान और
प्रौद्योगिक
विकास का महत्वपूर्ण
योगदान रहा।
विश्व कला
आंदोलनों के रूप
में विकसित
इटली में
आधुनिक कला
आंदोलनों के
रूप में
‘भविष्यवाद’
का उदय होता
हैं जो औद्योगिकरण
के मशीन की
गाति से
प्रभावित
होकर नवीन कला
का सृजन किया।
तो वही प्रथम
विश्व युद्ध
की
प्रतिक्रिया
में उत्पन्न
‘दादावाद’ भी बनी
बनाई कला को
नया नाम देकर
अभिव्यक्त
करना मुख्य
प्रयोजन रहा।
इन बदलते
स्वरूपों और
वैश्वीकरण ने
भारत में भी
औद्योगिक
विकास 18वी शती में
दृष्टिगत
होने लगता
हैं। भारत में
इसका प्रारंभ
ईस्ट इंडिया
कम्पनी के
आगमन व विदेशी
कलाकारों के आने
से होता हैं।
दूसरी ओर
भारतीयों
द्वारा विदेशों
में शिक्षा
प्राप्त करना
और विज्ञान व
स्वतंत्रता
संघर्ष पर
पुस्तकों की
रचना करना भी
मुख्य कारण
रहा।
वैश्वीकरण ने
भारतीय कला
में
औद्योगीकरण
का विकास किया
हैं जिसके प्रमाण
‘कंपनी शैली’
में दिखाई
देता हैं।
शैली के विकास
से पूर्व कला
के चित्रण में
हस्त निर्मित
कागज व खनिज
रंगो का
प्रचलन था
लेकिन मशीन से
बने विदेशी
कागज और जल
रंगों का
प्रयोग सर्वप्रथम
प्रारंभ होता
हैं। वैश्विक
विषय परिवर्तन
में नवाबो के
व्यक्ति
चित्र तथा जनसाधारण
लोगों का
चित्रण
सर्वप्रथम
कंपनी शैली
में देखने को
मिलता हैं।
भारत
में आए विदेशी
कलाकारों को
यहाँ के राजाओ
ने संरक्षण
एवं सम्मान
दिया। विदेशी
चित्रकारों
द्वारा
चित्रित
व्यक्ति
चित्रों के उदाहरण
प्राप्त होते
हैं। ‘ओजीयन्स
हम्फ्री नामक
विदेशी
चित्रकार जो
सन् 1786
में 17
अगस्त से 24 अक्टूबर
तक बनारस में
रहे और महीप
नारायण सिंह
तथा कई
प्रतिष्ठित
हिन्दू तथा
मुस्लिम व्यक्तियों
के चित्र बनाए
थे’। Maurya (2003) विदेशी
कलाकार
द्वारा
भारतीय लोगों
के चित्रण
करने में
वैश्विकता की
झलक देखने को
मिलती ही हैं
साथ ही प्रमुख
माध्यम के रूप
में तैलय रंगो
का प्रयोग भी
प्रथम बार
होता हैं। अतः
हम कह सकते
हैं कि हस्त
निर्मित
उद्योग के
प्रयोग की जगह
यूरोप से लाए
गए तकनीकी
माध्यमों ने ले
लिया।
इसी
क्रम में
उद्योग के रूप
में विकसित
‘भारत में
सर्वप्रथम
ईसाई
मिशनरियों
द्वारा 1556 में ईसाई
धार्मिक
ग्रंथों के
प्रकाशन के
लिए मुद्रण
मशीन स्थापित
की गई’। Singh (2018) इस मशीन से
मुद्रित
प्रथम पुस्तक
‘कोंनक्लुलोस
औटरस कोइसस’
को माना जाता
हैं। इसी क्रम
में राजा रवि
वर्मा ने भी
सर्वप्रथम ‘1894 में
लिथोप्रेस’ की
स्थापना की, जिसके
माध्यम से
अनेकों सेट
प्राप्त कर
उसे आम-जन में
लोक प्रिय
बनाया। पूर्व
में बताए गए राष्ट्रीय
आंदोलन ‘बंगाल
स्कूल’ में
पारंपरिक
विषयों को
नवीन रूपों व
तकनीकी के साथ
व्यक्त किया।
इसका
प्रत्यक्ष
उदाहरण
अवनीन्द्रनाथ
टैगोर द्वारा
बनाया गया
‘भारत माता’
चित्र हैं जो
जापानी तकनीक
वाश शैली में
चित्रित हैं।
यह वैश्विक
कला आंदोलन ही
नवीन
स्वरूपों के
साथ विकसित
होकर आगे चलकर
नए-नए रूपों
को लेकर
तकनीकी
प्रयोग ने
कलाकार को
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
बाजार में रखा
जाने लगा। उपर्युक्त
तथ्यो से पता
चलता है कि
कैसे कला में
भी हस्त
शिल्पों की
जगह तकनीक
माध्यम से निर्मित
कागज, रंग, मुद्रण
मशीन आदि का
प्रयोग
प्रारंभ होता
हैं।
पारंपरिक
कला में नवीनीकरण
औद्योगिकीकरण
ने भारतीय कला
परंपरा और
संस्कृति पर
गहरा प्रभाव
डाला हैं।
भारत में उद्योग, मशीन और
तकनीक का
विकास व अन्य
देशों से
संपर्क ने
पारंपरिक
कलाओ में भी
नवीनता का
प्रवेश होता
दिखाई देता
हैं।
वैश्वीकरण ने
ही पारंपरिक
कलाओ में
विचारों और
विभिन्न
संस्कृति का समन्वय
किया हैं-
पारंपरिक
कला का
आधुनिकीकरण: भारतीय
पारंपरिक कला
को आधुनिक
तकनीक व माध्यम
का प्रयोग कर
उसे
अभिव्यक्त
किया। जैसे मधुबनी
कला, पटट्
चित्र, कलमकारी, वर्ली आदि
लोक कलाओ को
आधुनिक
परिदृश्य को
लेकर
अभिव्यक्त
किया जाने
लगा। जैसा कि
बताया गया हैं, ‘कलाकार की
जीवन ऊर्जा ही
अपने सृजन को
कोई रूपकार
देती थी और
उसकी प्रेरणा
व आंतरिक सृजन
शक्ति
रूपकारों तथा
आयतन को ठोस
स्वरूप
प्रदान करती
थी’। Mago (2012) लेखक के कहने
का अर्थ हैं
कि पारंपरिक
कलाओ के
प्रेरणाश्रोत
आंतरिक
अनुभूति ही
रही किन्तु
मूलभूत
तकनीकी
परिवर्तन ने
कला को अभिव्यक्त
करने का
माध्यम बदला
हैं। इसका
उदाहरण हमें
पारंपरिक कला
में ग्रामीण
घरों में भूमि
या दीवार को
गोबर, पेड़
पत्तों के रस
आदि से लीप कर
उसके ऊपर गेरू, चावल, खड़िया आदि
से चित्र बनाए
जाते थे।
वर्तमान समय
में यह कला
घर-आगन तक
सीमित नहीं
रही बल्कि काशीदारी, खिलौने, नक्काशी, वस्त्रों
और भित्ति
चित्रों, पटट्
चित्रों में
भी इसका
प्रचलन हैं।
पट्ट चित्रों
में बिहार की
मधुबनी
पेंटिंग, दक्षिण भारत
की कलमकारी, ओडिसा के
पटट् चित्र
आदि की
अभिव्यक्तियाँ
परंपरागत रूप
कर साथ-साथ
आधुनिक
माध्यमों व तकनीकी
के साथ व्यक्त
होती दिखाई
देती हैं। पहली
बार आधुनिक
तकनीक का
प्रयोग करने
में जनजातीय
कलाकार ‘भूरी
बीई’ का नाम
उलेखनीय हैं।
ये अपने
समुदाय की
पहली महिला
कलाकार के रूप
में प्रसिद्ध
हैं। आधुनिक
तकनीक के रूप
में इन्होंने
पहली बार कागज
और कैनवास पर
चित्रकारी की।
साथ ही
चित्रों में
संस्कृति का
आदान-प्रदान
दिखाई देता
हैं।
|
चित्र
सं- 1
|
भूरी
बीई का
प्रसिद्ध ‘आधुनिक
जीवन में
सामंजस्य’ चित्र
सं- 1 नामक
चित्र में
कहानी को
सुंदरता के
साथ आधुनिक
औद्योगिक
तकनीकी
उपकरणों को
दर्शाया हैं।
हम देख सकते
हैं कि
पारंपरिक
अभिव्यक्ति
के बीच आधुनिक
उपकरण ‘कार’ को
बनाया गया
हैं। यह चित्र
संकेत करता
हैं कि आधुनिक
तकनीक का उपयोग, संयमित
रूप से और
प्रकृति के
प्रति संचेत
होकर प्रयोग व
उसकी रचना
करें तो वरदान
सिद्ध हो सकती
हैं। अतः हम
कह सकते है कि
पारंपरिक
कलाओ में नवीन
माध्यम का
प्रयोग कर
उसकी रचना
आंतरिक
अनुभूति के
साथ किया
गया।
स्थानीय
से वैश्विक
विषय
भारतीय
कला धार्मिक
और लोक
परम्पराओ से
जुड़ी हैं, जिससे वह
देवी-देवताओ,लोक कथाओ, मंदिर
मूर्तियों, लोक
चित्रकला आदि
परम्पराओ से
प्रेरित हैं। भारतीय
कला का
उद्देश्य ही
धार्मिक, आध्यात्मिक
और सामाजिक
संदेश देना
हैं। वैश्वीकरण
ने कला में
अभिव्यक्त
विषयों में
परिवर्तन किए
हैं। प्राचीन
भारतीय कला
धर्म प्रधान
विषय को ही
चित्रित किया
जाता था
किन्तु धीरे-धीरे
सभ्यता के
विकास ने इसके
विचारों को बदला।
इसको हम
प्रारम्भिक
स्वरूपों के
माध्यम से
समझने का
प्रयास करेगे-
प्राचीन
कला में देखते
हैं तो
आदिमानव ने
प्रकृति में
जो रूपों देखा, समझा और
अनुभव किया
होगा उसे आड़ी
तिरछी रेखाओ के
माध्यम से
व्यक्त किया।
सभ्यता के
विकास ने
विषयों के
परिवेश को
बदला, हर
युग में कला
नवीन दृष्टि
के साथ देखने
को मिलती हैं।
कालक्रम में
आगे बढ़ते हैं
तो मध्य काल
में धार्मिक
विषयों की
प्रधानता रही
हैं। जिसमे
बौद्ध, जैन
व ब्राह्मण
विषयों से
संबंधित कथाओ
का चित्रण
हुआ। जैसे
‘अजंता’, ‘बाघ’, ‘बादामी’, व
‘सितलवासल’
आदि गुफाओ में
इसका
प्रत्यक्ष उदाहरण
हैं। 17वी
शती में इन्ही
विषयों का
विस्तार होता
हैं जिनमे
नायिका भेद, राग माला, रसमंजरी, ऋतुसन्हार
पर ‘श्री
कृष्ण’ से
संबंधित
चित्रण का
विषय रहे।
भारतीय
विषयों में
मूलभूत परिवर्तन
मुगलों के
आगमन से होता
हैं जो ईरान
से आए थे।
‘अब्दुस्समद
के द्वारा
बनाए गए
चित्रों के
एलबम गुलशन
एलूक
गुजिस्ताँ
महल के पोथीखाना
तेहरान में आज
भी सुरक्षित
हैं’। Gupta (2005) इन कलाकारों
ने देशी व
विदेशी
तत्वों को
आत्मसात कर एक
नई शैली का
विकास किया जो
आज भी कला जगत
में प्रसिद्ध
हैं।
भारतीय
कला में
औद्योगीकरण
और वैश्विक
तकनीकी
माध्यम का
प्रयोग व विषय
का प्रवेश
ब्रिटिश
कलाकारों के
आने से
प्रारंभ होता
है। भारतीय
कला में
स्थानीय के
साथ वैश्विक
विषयों का प्रवेश
होता हैं।
विदेशी
कलाकारों ने
भारत में लोक
जीवन का
चित्रण
प्रारंभ
किया। जिसमे
सामाजिक व
दैनिक जीवन से
संबंधित
चित्रण सर्वप्रथम
होता हैं।
राजाओ और
विशेष
व्यक्ति के छवि
बनाने की
परंपरा मुगल
शैली में
विदमान थी किन्तु
कंपनी शैली
में
स्त्री-पुरुषो
की छवि के साथ
जन साधारण के
भी व्यक्ति
चित्र बनाए
जाने लगे।
जैसे- डाकुओ, वैश्याओ, संत साधुओ, फकीरों
आदि। इसका
उदाहरण ‘एक
चित्र में
महाराजा
ईश्वरी
नारायण सिंह
को शाही
वेशभूषा में
जदाऊदार पगड़ी
पहने हुए दाये
हाथ में
हुक्का नाल लिए
चित्रित हैं, जिनके
चेहरे पर
राजसी भाव
परिलक्षित
हैं’। Maurya (2003) समाजिक जीवन
में राजाओ की
दिन-चर्या को
राजसी ठाट-बाट
के साथ चित्रण
होता हैं जो
इस शैली की निजी
विशेषता हैं।
पूर्व
में बताए गए
कलाकार राजा
रवि वर्मा का
भी आधुनिक कला
में
उल्लेखनीय
योगदान था।
भारतीय कला
में तैलय रंग
को सर्वप्रथम
लोकप्रिय बनाया।
अपनी कला के
माध्यम से
वैश्विक स्तर
पर पहचान
बनाकर जन-जन
तक
प्रतिष्ठित
करने का काम किया।
तो वही नवीन
जागृति का
आरंभ ‘बंगाल
शैली’ से होता
है,
जिसे भारत
में आधुनिक
कला आंदोलन के
नाम से जाना
जाता हैं। यह
आंदोलन मुख्य
रूप से कला के
परंपरागत
विषयों का
चित्रण नवीन
तकनीकी के साथ
अभिव्यक्त करने
का काम किया।
जिसमे अजंता, राजपूत, मुगल, फारसी, जापानी, यूरोपीय
तथा स्थानीय
शैलियो के
मिश्रण से नई शैली
विकसित हुई।
इस शैली के
प्रणेता
‘अवनीन्द्रनाथ
टैगोर’ को
माना जाता हैं
जो वैश्विक
स्तर पर
कलाकार के रूप
में प्रसिद्ध
थे। इनके
प्रमुख
शिष्यों में
नंदलाल बोस, असित
कुमार हल्दार, क्षितीन्द्रनाथ
मजुमदार, शैलेन्द्रनाथ
डे आदि
कलाकारों ने इस कला
आंदोलन को
प्रसारित कर
राष्ट्रीय
पहचान दिलाने
का काम किया।
इसी
संदर्भ में
भारतीय कला
में नवीनीकरण
के साथ आधुनिक
बनाने में
‘गगनेन्द्रनाथ
टैगोर’ का महत्वपूर्ण
योगदान दिया।
इन्होंने कला
के सृजन में
बंगाल शैली से
भिन्न काम
किया जिनमे पाश्चात्य
कला आंदोलन
घनवाद और
प्रभाववाद से प्रभावित
होकर चित्रण
किया जो
तकनीकी विकास में
नई दिशा में
प्रयोगरत
कार्य था।
गगनेन्द्रनाथ
टैगोर की
कृतियों में
रेखा चित्र, पौराणिक
और
आख्यानात्मक
चित्रण
भुदृश्य तथा
छाया-प्रकाश
के माध्यम से
अमूर्त, घनवादी तथा
प्रभाववादी
चित्रों को
चित्रित किया।
|
चित्र
सं- 2
|
|
|
प्रस्तुत
चित्र
सं- 2 ‘टेम्पल
क्यूबस्टिक’
हैं जों घनवाद
से प्रेरित
होकर बनाया
गया हैं। इन
नवीन
पद्धतियों का
प्रयोग करने
वाले पहले
भारतीय
कलाकार के रूप
में जाने जाते
हैं। स्थानीय
से वैश्विक
विचारधारा को
आत्मसात कर
उसे नवीन
जागृति के साथ
अभिव्ययक्त
करने में
‘रवीन्द्रनाथ
टैगोर’ का नाम
उल्लेखनीय
हैं। कवि, कथाकार, नाटककार
और चिंतक रूप
में वैश्विक
प्रसिद्धि
पाने वाले
अंतरराष्ट्रीय
कलाकार के रूप
में जाने जाते
थे। 70वे
दशक में कला
सृजन का
प्रारंभ कर
उसे वैश्विक
विचारधारा को
आधुनिकता के
साथ
अभिव्यक्त किया।
‘सन् 1930
उनकी
कलाकृतिया
फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीट्जरलैंड, सोवियत
संघ और
अमेरिका में
प्रदर्शित
हुई थी और
इन्हे बहुत
प्रशंसा भी
मिली थी। कला
विद्दों ने
इनकी तुलना
‘पॉल कली और
केन्डिस्की
जैसे श्रेष्ठ
कलाकारों से
की हैं। इसका
आधार यह भी
हैं कि
उन्होंने
आधुनिक कला का
गहरा अध्ययन
किया था और
वैश्विक कला
में आ रहे
परिवर्तनों
को नजदीक से
देखा था’। Joshi (2023) अतः कलाकार
ने पश्चिमी
कला से
प्रेरणा लेकर
नवीन विषयों
के सृजन करके
एक नवीन कला
को अभिव्यक्त
किया जो आगे
की कला के लिए
प्रेरणाश्रोत
रही। अतः हम
कह सकते कि
भारतीय कला
में अन्य देशों
के संपर्क से
यहाँ के विषय
में भी मूलभूत
परिवर्तन
हुए।
तकनीकी
नवाचार
कला
में तकनीकी
नवाचार
प्राचीन काल
से ही दिखाई
देता हैं जब
आदिमानव ने
पत्थरों की
खुदाई कर
औजारों का
निर्माण किया
और प्राकृतिक
खनिज व
वनस्पतियों
रंगों का
प्रयोग
चित्रण हेतु किया।
वही सिंधु
घाटी सभ्यता
में मोहर के
निर्माण में
तांबा, कास्य, धातु की
खोज व मिट्टी
का प्रयोग कर
निर्माण किया।
मूर्ति कला
में मोम ढलाई
विधि का आरंभ
इसी सभ्यता
में होता हैं।
सिंधु घाटी
सभ्यता एक नगर
नियोजित
सभ्यता थी। यह
सभ्यता का
अन्य देशों से
व्यापारिक
संबंध होने के
कारण कलाओ का
भी
आदान-प्रदान
हुआ जिससे कला
में भी
वैश्विकता के
साथ नवीनता का
समावेश होता
हैं।
मोहनजोदड़ों
से प्राप्त
‘नर्तकी की
मूर्ति’ इसका
प्रत्यक्ष
प्रमाण हैं।
इसी
क्रम में आगे
वैश्विक कला
में आज भी
नवीनता का
समावेश ‘अजंता
गुफा’ में
देखने को
मिलता हैं।
चित्रों और
मूर्तिशिल्पों
में सौन्दर्य
के साथ
चमत्कारिक
पॉलिश को
देखते हैं जो
हजारों
वर्षों के बाद
भी अपनी
नवीनता का
परिचय देते
हैं। तो वही
मध्य काल में
लघु चित्र
परंपरा में
बारीक ब्रश से
रंगाकन और
प्राकृतिक
रंगों की नई
तकनीक
दृष्टिगत
होती हैं।
मुगल शैली में
कलाकार ईरान
से भारत आए और
यहाँ के
रहन-सहन को
अपनाकर नई कला
शैली को विश्व
में प्रदर्शित
किया। इसी के
समांतर
राजस्थानी और
पहाड़ी शैली की
कला परंपरा
विश्व
प्रसिद्ध हैं।
औद्योगिक युग
के परिणाम
स्वरूप मशीनी
युग ने आधुनिक
भारत को नई
दिशा में
देखने का अवसर
दिया। इन
क्रांतिकारी
परिवर्तनों
ने संमर्ग
भारत में
परिवर्तन का
दौर ला दिया।
अब हस्त
शिल्पों की
जगह मशीनों ने
ले लिया।
‘कर्नल ताड़, कनिघम, ग्रीफिथ्स, राजेन्द्र
लाल मिश्र व
जेम्स
फर्गुसन के
कला व
पुरातत्व
संबंधी
प्रकाशनों ने 19वी सदी के
उतरार्द्ध
में भारतीय
संस्कृति के प्रति
देशी-विदेशी
विद्वानों
में रुचि पैदा
की’। Agarwal (2000) इन प्रमुख
विद्वानों ने
भारतीय
संस्कृति से प्रभावित
होकर प्रमुख
ऐतिहासिक
स्थलों की खोज
कर रुचि पैदा
की।
|
चित्र
सं-3 |
|
चित्र
सं-4
|
|
चित्र सं - 4 |
|
|
वैश्विकता
के संदर्भ में
भारतीय व
यूरोपीय चित्रकारों
ने मिलकर
भारतीय लोग व
विदेशियों के
व्यक्ति
चित्र बनाए।
जिसका उदाहरण
आधुनिक
माध्यम जल रंग
में प्राप्त
होते हैं।
‘हेमीट टकर
डल्ट’ Maurya (2003), चित्र
सं- 3 का व्यक्ति
चित्र हैं जो
बेसकोट पहने
कुर्सी पर
बैठा हैं।
भारतीय
चित्रकार ने
विदेशी चेहरे
को बहुत ही
सुंदरता के
साथ दर्शाया
हैं। दुसरा
चित्र
‘अंग्रेज
शिकारी’ Maurya (2003), चित्र
सं - 4 का हैं जो
मचान के अंदर
खड़ा हैं। इस
चित्र में प्राकृतिक
दृश्यों को
बारीकी से
अंकित किया गया
हैं। अतः हम
कह सकते हैं
कि औद्योगिक
तकनीकी विकास
के माध्यम को
अपनाकर
भारतीयों ने
नवीन शैली को
विकसित किया
और विदेशियो
ने भारत के
दृश्यों और
व्यक्ति
चित्रों को
बड़े ही सहजता
के साथ बनाया
। जहां हमे
तकनीकी
वैश्वीकता का
समन्वय देखने
को मिलता हैं।
छपाई
कला: विश्व
में
सर्वप्रथम 105ई. में चीन
में तस अयी
लुन द्वारा
कागज का आविष्कार
किया गया था। Singh (2018) भारत
में कागज का
परिचय 13वी शती ई. में
उत्तरी भारत
में तुर्कों
के आक्रमण के
पश्चात हुआ।
भारत में
तड़पत्रों, पटट् आदि
के स्थान पर
कागज का
प्रयोग
प्रारंभ हुआ।
मशीनी मुद्रण
का प्रारंभ 1556 में होता
हैं। 06
कमब 1556
में
पुर्तगालियों
द्वारा प्रथम
मुद्रण प्रेस
पुराने गोवा
के ‘सेंट पकल
कॉलेज’ में
स्थापित की गई
थी। इस मशीन
से मुद्रित
प्रथम पुस्तक
‘कोंकलूसोस
आउटर्स कोइसस’
को माना जाता
हैं। 17वी
शताब्दी से 18वी शती के
अंत तक मद्रास
एवं बॉम्बे
में मुद्रण का
तेजी से विकास
होता हैं।
भारत में
पुर्तगालियों
द्वारा
स्थापित मशीन
मुद्रण
प्रारंभ तो
किया लेकिन
ब्रिटिश ईस्ट
इंडिया
कम्पनी के
आगमन से
विदेशी चित्रकार
और छापाकर
भारत आए और
धातु की
प्लेटों द्वारा
चित्रों और
पुस्तकों के
मुद्रण
प्रारम्भ
किए। 1780
में एक
अंग्रेज
‘जेम्स अगस्त
हिक्की’ ने
अपने कार्यलय
राधा बाजार
कलकत्ता से
प्रथम समाचार
पत्र ‘हिक्की
बंगाल गजट’ Singh (2018) का प्रकाशन
किया। इन
महत्वपूर्ण
मशीनो के विकास
ने पूरे भारत
में परिवर्तन
किए जिसमे देश
के विभिन्न
शहरों में
शिक्षा
पद्धति नए
माध्यम से
विकसित हुई।
विदेशी
प्रभाव के
कारण लिथोग्राफी, इनग्रेविस, वुडकुट
माध्यमों में
चित्र छपने व
व्यापारिक
स्तर पर बनने
लगे थे।
विदेशी इन
प्रिंटों से
प्रभावित
होकर राजा रवि
वर्मा ने भी 1894 में
मुंबई में
अपने चित्रों
के प्रिंटस
बनाने के लिए
‘राजा रवि
वर्मा फाइन
आर्ट्स
लिथोग्राफी
प्रेस’ से
मुद्रित
करवाया जिससे
आम लोग तक कला
का
प्रचार-प्रसार
होता हैं। इस
प्रेस के माध्यम
से भारतीय देवी-देवताओ
और राष्ट्रीय
नेताओ व
योद्धाओ के चित्रों
के लिथो
प्रिन्ट से
छापा जाने
लगा। 20वी
शती के
प्रारंभ में
गगनेन्द्रनाथ
टैगोर ने भी
लिथोग्राफी
में अपनी
भावनाओ की
अभिव्यक्ति
व्यंग्य
चित्रों के
माध्यम से की।
इस समय भारत
में बड़े-बड़े
होर्डिंग पर
विज्ञापन
डिजाइन को
चित्रित किया
जाने लगा। 20 वी शती के
अंतिम
दर्शकों में
कंप्यूटर
द्वारा
टाइपोग्राफी
एवं ग्राफिक
डिजाइन में
काम किया जाने
लगा जो
वर्तमान तक
जारी हैं।
फोटोग्राफी:
आद्योगिक
विकास के
महत्वपूर्ण
तकनीकी माध्यमों
में
फोटोग्राफी
की
महत्वपूर्ण
भूमिका रही
हैं। ‘लुई
डागुएर और
विलियम हेनरी
फॉक्स टैल्बोट
ने
प्रारम्भिक
फोटो ग्राफिक
प्रक्रियाओ
का बीड़ा
उठाया’। Study Guide (n.d.) शुरुआत में
फोटोग्राफी
का प्रयोग
सामाजिक परिस्थितियों
और शहरी विकास
के दृश्यों को
कैद करने हेतु
किया गया।
फोटोग्राफी
दृश्य सम्प्रेषण
को नए आयाम
दिए। विज्ञान
और तकनीकी विकास
के प्रभाव कला
एवं डिजाइन पर
भी पड़ा जिससे
चित्रकारों
और डिजाइनरो
को नए माध्यम
मिले। इन
माध्यमों से
टाइपराइटर, लाइन
ब्लॉक, हाफ
टोन, रंगीन
मुद्रण, रंगीन
फोटोग्राफी, एनीमेशन
आदि को
प्रेरणा देने
का कार्य
किया।
भारत
में इसका
प्रयोग
कलकत्ता, मद्रास, बंबई जैसे
ब्रिटिश
प्रशासित
शहरों में
हुआ। ब्रिटिश
अधिकारी और
कलाकार भारत
के दृश्य, स्थापत्य
और लोगों की
तस्वीरे ली। 19 अगस्त 1839 को पेरिस
में फ्रेंच
अकेडमी ऑफ
साइसेज की एक बैठक
में एक नई
फोटोग्राफी
विधि
डगेरियोटाइप
प्रक्रिया का
आविष्कार
किया। इसी
वर्ष भारत में
बॉम्बे
टाइम्स ने
डगेरियोटाइप
कैमरे के आगमन
पर लेख
प्रकाशित
हुआ। 19वी
शती में भारत
में
फोटोग्राफिक
का संमान्तर
विकास हुआ
जिसमे भारत की
संस्कृति, लोगों और
परिदृश्यों
के अध्ययन
दस्तावेजीकरण
और कैमरे की
महत्वपूर्ण
भूमिका को
स्पष्ट करता
हैं। ‘1880 के
दशक में
कछवाहा
साम्राज्य की
पूर्व शाही राजधानी
जयपुर शहर में
स्थापित
स्टूडियो इसका
प्रत्यक्ष
उदाहरण हैं’। Singh (2018)
डिजिटल
आर्ट: भारतीय
कला में
डिजिटल आर्ट
प्रारंभ
वैश्वीकरण और
तकनीकी
प्रगति के साथ
होता हैं।
‘डिजिटल आर्ट
असल में
कंप्यूटर
आधारित
(एल्रिगोथामिक
फ्रेक्टल्स)
या उससे
प्राप्त
स्त्रोत (स्कैन, फोटोग्राफ, ग्राफिक
टेबलेट, ग्राफिक
सॉफ्टवेयर) पर
निर्भर होती
हैं’। Bhatt (n.d.) डिजिटल
तकनीक में
पारंपरिक
तकनीक जैसे
ड्रॉइंग, पेंटिंग और
मिश्रित
माध्यमों को
नई तकनीक और डिजिटल
माध्यम का
प्रयोग
विभिन्न
टूल्स के माध्यम
से करते हैं।
इन डिजिटल टूल
के माध्यम से
कलाकार
ड्रॉइंग, पेंटिंग, ग्राफिक
डिजाइन, इलेस्ट्रेशन, विज्ञापन, फोटोग्राफ, मुद्रण, कार्टून
मेकिंग, एनिमेशन आदि
का कलात्मक
रूप से सृजन
करते हैं।
यहाँ तक की नई
तकनीक
माध्यमों का
प्रयोग कला
स्कूल और
यूनिवर्सिटी
में नई शैली
या न्यू मीडिया
में भी अध्ययन
करते व करवाते
हैं और इन माध्यमों
के कई
ग्रॅजुऐट
डिग्री भी
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर दिए जा
रहे हैं।
भारत
में डिजिटल
तकनीक का आगमन
20 वी शती के
अंत में होता
हैं। प्रारंभ
में डिजिटल
कला के उपयोग
में उच्च्
लागत और
उपकरणों की
सीमित
उपलब्धता के
कारण उपयोग
में कमी रही, लेकिन
प्रौद्योगिकी
विकास और पहुच
में आसानी
होंने से
धीरे- धीरे
भारत में भी
इसका प्रचलन
बढ़ने लगता
हैं। विज्ञान
और तकनीकी
विकास ने विश्व
को उद्वेलित
किया तो भारत
भी इसे प्रभावित
होता हैं।
‘भारत में
डिजिटल कला का
प्रथम उदाहरण
अप्रैल 1972 में ‘नगमा’ नई
दिल्ली में और
बाद में उसी
वर्ष जहांगीर आर्ट
गैलेरी में
आयोजित की गई प्रदर्शनी
थी,
जिसमे
व्हिटनी के
डिजिटल
एनिमेशन
कार्यों के
अलावा 150 से अधिक
कलाकृतिया नई
दिल्ली शो का
हिस्सा थी, जिनमे कुछ
आग्रणी
कंप्यूटर
ग्राफिक्स
कलाकारों
द्वारा किए गए
कार्य शामिल
थे’। Bhatt (n.d.) भारतीय कला
में यह प्रथम
प्रयास ही देश
में डिजिटल
कला की पहुच
को वैश्विकता
मिली जो आगे की
कला को
प्रेरणा दी।
आज के समय में
तकनीकी प्रचुरता
ने डिजिटल
उपकरण ही
मुख्य माध्यम
के रूप में
प्रयोग हो रहा
हैं। आधुनिक
समय में कलाकार
इसके प्रयोग
के बिना
समकालीन नहीं
कहा जा सकता
हैं।
समकालीन
कला के नवीन
आयाम
समकालीन
कला वह कला
हैं जो 20 वी शती के
उत्तराद्ध से
विकसित होकर वर्तमान
तक गतिशील
हैं। भारतीय
कला में पश्चिमी
परंपरा के
विरुद्ध
आधुनिक कला
आंदोलन का सूत्रपात
होता हैं। जब
बंगाल शैली के
कलाकारो ने
भारतीय
प्राचीन
परंपरा का
अध्ययन कर उसे
आधुनिक रूपों
व माध्यमों के
साथ
अभिव्यक्त किया।
इन्ही
परंपरगत
मूल्यों को
त्याग कर नए
माध्यमों और
रूपों की रचना
करने वाले
कलाकारों को
समकालीन कला
के अंतर्गत
रखा गया। अतः
हम कह सकते
हैं कि कला के
सृजन में
परंपरागत
बंधनों से
मुक्त होकर
नवीन सोच व
वर्तमान
परिदृश्य को
लेकर सृजित कला
को समकालीन
कहा गया।
समकालीन
कला में पॉप
आर्ट, संस्थापन
कला, विडिओ
आर्ट, कंप्यूटर
आर्ट, मिश्रित
माध्यम आदि
रूपों में
प्रदर्शन होता
है। इसका
उदाहरण
दादावाद से
प्रेरित
मार्शल ड्यूश
ने प्रत्यवाद
को अपना कर
किसी भी वस्तु
को नाम देकर
उसे कला के
रूप में
प्रदर्शित किया।
इन्ही आधुनिक
कला तत्वों से
आज के समय व परिवेश
को लेकर
प्रयोगों में
कला समकालीन
होती हैं। 20वी
शताब्दी में
पश्चिमी कला
परिदृश्य में
रचनावाद, भविष्यवाद, सूक्ष्मवाद, किरणवाद, सर्वोच्चयवाद
आदि
प्रमुख कला
आंदोलनों ने
नवीन
प्रवृत्तियों
को जन्म दिया
जो तीव्र गति
से कलात्मक
विचारों को
अभिव्यक्त
किया। इन नवीन
पद्धतियो ने
ही कला के
सृजन में नई
शैली को
वैश्विकता
प्रदान की। इस
विकास ने ही
कैनवास, कागज, पटट्
आदि का
स्थानन्तरण
नवीन
माध्यमों ने
ले लिया।
वैश्वीकरण
और
औद्योगीकरण
से नवीन
विचारों को
आत्मसात कर
उसे
अभिव्यक्त
करने का विविध
आयाम प्रदान
किए। ‘इस समय
बदलती
परिस्थितियों
नए
संग्रहायलों
क्यूरेटरों, आर्ट
गैलेरी तथा
खोज (दिल्ली 1997), ओपन सर्कल
(मुंबई 1998) जैसे नवीन
संस्थानों व
ऑक्सन हाउस
आदि ने इन्हे
अत्यधिक
प्रोत्साहित
किया’। Mago (2012) विश्व
व्यापी होने
वाले
कार्यक्रमों
के आयोजन, प्रदर्शनियों, बिनाले, त्रैवार्षिक
भारत आदि ने
भारतीय
कलाकारों को
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर कला
को समझने और
उसे अभिव्यक्त
करने के लिए
वैश्विक मंच
दिया।
नवीन
कला माध्यमों
में संस्थापन
कला के प्रारम्भिक
उदाहरण पूर्व
में बताए गए
दादावादी कलाकार
मार्शल ड्यूश
की कृति
‘फव्वारा’
शीर्षक से
प्रदर्शित
मूत्रपात पर
दृष्टिगोचर
होते हैं। इस
कृति ने ही
कलाकारों को
नए विचार को प्रमुख
स्थान देकर
वस्तुयों को
नए तरीके से
स्थापित करना
प्रारंभ किया
जिसे
‘संस्थापन
कला’ कहा गया।
भारत में इसका
प्रमाण
संस्थापन कलाकार
विवान सुंदरम
के कृतियों
में देखने को
मिलता हैं।
|
चित्र
सं- 5 |
|
|
‘1992 में
विवान सुंदरम
ने किरण नादार
संग्रहालय में
‘रिवर स्कैपरू
ए रिवर कैरिज
इट्स पास्ट’ चित्र
सं- 5 शीर्षक से
एक संस्थापन
का निर्माण
किया तथा चित्र
व मूर्ति के
भेद को समाप्त
कर एक नवीन मीडिया
की स्थापना
की’। Mal and Jain (2024) इन नवीन
प्रयोगों के
प्रारंभ ने ही
आगे के कलाकारों
को
प्रोत्साहित
किया। इसके
प्रमुख कलाकारों
में सुबोध
गुप्ता, नवजोत
अल्ताफ, नलिनी मलिनी
आदि प्रमुख
कलाकार हैं जो
राष्ट्रीय और
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर नवीन
प्रवृत्तियों
का संयोजन कर
रहे हैं।
नवीन
माध्यम के रूप
में न्यू आर्ट
मीडिया ने भी
कला के
क्षेत्र में
महत्वपूर्ण
योगदान दिया
हैं।
कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर
एवं इंटरनेट
के आगमन ने
समकालीन कला
में एक नवीन
कलात्मक
तत्वों की खोज
कर विकसित
करने का काम
किया।
‘कंप्यूटर
रंगों के इस्तेमाल
से बनाए गए
चित्रों ने
कला जगत के
लिए नई संभावनाए
पैदा की हैं’। Mal and Jain (2024) इन नवीन
प्रवृत्तियों
के माध्यम से
कला का रूप आज
रचनात्मकता
के साथ
देखने को
मिलते हैं। तो
वही समकालीन
कलाकार
‘शिल्पा
गुप्ता’ हैं
जो साउन्ड,विडिओ,फोटोग्राफी
परफॉरमेंस
आदि माध्यमों
द्वारा धर्म
और रक्षात्मक
मुद्दों के
विषयों को खोज
कर उसे जागृत
करती हैं।
इन्होंने
पारंपरगत माध्यम
के बजाए नवीन
कलात्मक
अभ्यासों
बहुआयामी
संम्प्रेष्णों
के संबंधों को
खोजा।
|
चित्र
सं-
6 |
‘देयर इज
नो
एक्सप्लोंजिस
इन दिस (2007) एक अंतः
संवादी
संस्थापन
हैं’। Mahawar (2020) इस चित्र
सं- 6 मे लंदन की
गलियों का
फोटोग्राफ
प्रयोग किया गया
जहां दर्शकों
को एक बैग ले
जाने को कहा
जिस पर लिखा
था- there is no explosive in this, यह कार्य
लेखकीय
क्षेत्रों
तथा भय व
हिंसा के वैश्विक
संदर्भों पर
सवाल खड़ा करता
हैं’। Mahawar (2020) ये भारत की
पहली वेब
केंद्रित
कलाकार मानी
जाती हैं।
विभिन्न
देशों की कला
शैलियो के एक
साथ जुडने के
कारण कला का
आज वृहद
स्वरूप सामने आता
हैं जो तकनीकी
वैज्ञानिक
प्रगति के साथ
निरंतर
गतिशील हैं।
अब कलाकार
पारंपरिक
रंगों, कागज, कैनवास, पट्ट आदि
माध्यमों के
बजाए नवीन
तकनीक जैसे- कंप्यूटर
ग्राफिक्स, 3D
प्रिंटिंग, AI आधारित
कला, डिजिटल
पेंटिंग आदि
विभिन्न
माध्यमों को
वैश्विक मंच
पर विचरण करती
हैं। कलाकार
भी तकनीकी और
सामाजिक से
जुड़कर नई
डिगिटल कला को
रचते हैं।
निष्कर्ष
शोध
शीर्षक
‘वैश्वीकरण और
औद्योगीकीकरण
का भारतीय कला
में वैचारिक
अवदान’ पर
आधारित हैं। जिसमे
भारतीय कला को
समझते हुए
वैश्वीकरण और औद्योगीकरण
के तकनीकी
विकास पर
चर्चा की गई हैं।
शोध पत्र में
बताया गया हैं
कि कैसे पारंपरिक
कलाओ में
तकनीकी
परिवर्तन हुए
और कलाकारों
ने उन
चुनौतियों को
अपनाकर
नवीनता के साथ
अभिव्यक्त
किया।
वैश्वीकरण ने
ही भारतीय कला
को नई दिशा दी
तो वही
औद्योगिक
मशीनों ने नए
माध्यम
प्रदान किए।
भारत में इसका
विकास ब्रिटिश
अधिकारी, कलाकार आदि
के आगमन से
होता दिखाई
देता हैं जब
इंग्लैंड के
कलाकार भारत के
विभिन्न
स्थानों का
चित्रण और
कंपनी शैली का
विकास करते
हैं जिसमे
व्यक्ति
चित्र, सामान्य
जीवन के चित्र
आदि जल व तैल
रंगों में
सर्वप्रथम
प्रयोग करते
हैं। यह
औद्योगिक विकास
के साथ
वैश्विकता का
भी प्रवेश
देखने को मिलता
हैं। यह
औद्योगिक
विकास ही कला
में वैश्वीकता
के साथ
प्रभावित
होती हैं।
इसका उदाहरण
अंग्रेजी
कलाकार टर्नर
ने औद्योगिक
विकास के
मशीनों को
चित्रित किया
तो वही भारतीय
कलाकार भी
विदेशियों के
चित्र व उनकी
वेशभूषा, वस्तुयों को
चित्रित
किया। राजा
रवि वर्मा ने
भी पाश्चात्य
तकनीकी
माध्यम से
भारतीय पौराणीक
चित्रों को
उजागर किया और
लिथोग्राफी
प्रेस ने इनके
चित्रों को हर
जन तक
पहुचाया।
पाश्चात्य
तकनीकी ने तो
भारतीय
कलाकारों ने
अपनाया ही
लेकिन इसके
विषय को
नकारते हुए
‘बंगाल शैली’
आधुनिक कला
आंदोलन का
सूत्रपात
हुआ। जिसमे पारंपरिक
शास्त्रीय
कलाओ को नवीन
तकनीकी के साथ
अभिव्यक्त
किया।
भारतीय
कला में
औद्योगिक
परिवर्तन में
प्रमुख
उद्योगों का
विकास होता
हैं जो हस्त
शिल्प की जगह
मशीने से
उत्पादन कम
लागत व कम समय
में उपलब्ध हो
गया। भारतीय
कला में
वैश्वीकरण के परिणाम
स्वरूप
पारंपरिक
कलाओ, लोक
कलाये, आधुनिक
कला में नए-नए
विषय और
माध्यमों का प्रवेश
दिखाई देता
हैं। जैसे-
कंपनी शैली
में नए विषय
का प्रवेश, बंगाल
शैली में
तत्कालीन
परिस्थितियों
को लेकर
जापानी वाश
पद्धति व
इंग्लैंड से
बना कागज का
प्रयोग किया।
आधुनिक कला
आंदोलनों ने
ही वैश्विक
स्तर पर कला
को प्रभावित
किया तो वही कुछ
कलाकारों ने
बंगाल शैली से
हटकर काम किया
जिससे कला
नवीन तकनीक और
नए विषय के
साथ व्यक्त
कला को
समकालीन कहा
जाने लगा।
रवीन्द्रनाथ टैगोर
व
गगनेन्द्रनाथ
टैगोर इसके
प्रत्यक्ष
उदाहरण हैं।
फोटोग्राफी
के विकास ने
भी भारतीय कला
को यथार्थता व
सौंदर्यता को
अभिव्यक्त
किया जाने
लगा। समकालीन
कला में नए
माध्यम के रूप
में डिजिटल
आर्ट, विडिओ
आर्ट, कंप्यूटर
आर्ट, संस्थापन
कला आदि कला
को वैश्विक
विषयों के साथ
अभिव्यक्त
करना
कलाकारों का
प्रमुख लक्ष्य
रहा होगा
जिसका वृहद
रूप हमारे
सामने दृष्टिगत
हैं। अतः हम
कह सकते हैं
कि कला जो
मानव विकास को
अभिव्यक्त
करती रही हैं
उसी तरह वैश्वीकरण
और औद्योगिक
मशीन के विकास
भी कला के माध्यम
से दिखाई देता
हैं। यह
तकनीकी विकास
प्रारंभ से
लेकर वर्तमान
तक देखने को
मिलता हैं। कला
में
अभिव्यक्त
रूप ही भारतीय
कला के विकास
का सूचक हैं
जो हमारे
सामने
दृष्टिगत
हैं।
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