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SUSTAINABLE ART DEVELOPMENT AND THE CONTEMPORARY PERSPECTIVE OF GENDER EQUALITY

Original Article

SUSTAINABLE ART DEVELOPMENT AND THE CONTEMPORARY PERSPECTIVE OF GENDER EQUALITY

सतत् कला का विकास एवं लैंगिक समानता का वर्तमान परिपेक्ष्य

 

Dharmendra Mewade 1*Icon

Description automatically generated, Dr. Alok Bhavsar 2

1 Research Scholar (Painting), India

2 Research Director, Professor Head, Department of Painting Government Hamidia Arts and Commerce College, Bhopal, Madhya Pradesh, India    

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ABSTRACT

English: In Indian society, women’s education has historically been viewed with neglect. If we consider ancient times, education was imparted in Gurukuls, and the right to receive education was reserved primarily for men (boys). There was no proper system of education for girls.

During the Buddhist period as well, women’s education continued to be overlooked. Education was provided mainly in Buddhist monasteries and viharas. Students were required to reside there, away from their homes, and serve their teachers while pursuing their studies. They were also responsible for arranging food and maintaining cleanliness. Due to such residential and rigorous systems, women were largely excluded from these institutions. Only women from affluent families could receive education at home while observing purdah, whereas women from lower social classes had no access to formal education.

Subsequently, with the advent of the Muslim period, little special attention was initially given to women’s education. During this era, education was provided in maktabs and madrasas. Young girls studied alongside boys in maktabs during the early years, but for further education, arrangements were typically made at home. Separate educational provisions existed mainly for women belonging to royal families, who received personalized instruction within palaces.

Despite restrictions, this period produced learned women such as Salima, Mumtaz, and Nur Jahan, who, even while living behind the purdah system, acquired education and left a lasting legacy in Indian history.

 

Hindi: हमारे भारतीय समाज में हमेशा से ही नारी शिक्षा को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता रहा है। अगर हम प्राचीन काल की बात करें तो उस समय शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी तथा शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल पुरुषों (लड़कों) को ही था। लड़कियों को शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसके पश्चात् बौद्ध कालीन युग में भी स्त्री शिक्षा की उपेक्षा की गई। उस समय में भी शिक्षा केवल बौद्ध मठों एवं विहारो में दी जाती थी। क्योंकि शिक्षा वहीं रहकर प्राप्त करनी होती थी तथा इसके लिये बच्चों को घर से दूर इन बौद्ध मठों एवं विहारो में निवास करते हुए अपने गुरूजनों की सेवा कर शिक्षा प्राप्त करनी होती थी। अपने तथा गुरूजनों के भोजन की व्यवस्था, साफ सफाई आदि सभी कार्य इन बच्चों को स्वयं ही करने होते थे। इसलिये इन मठों से स्त्री को दूर ही रखा गया, केवल बड़े घरों की महिला परदे में रहकर घर पर शिक्षा प्राप्त कर सकती थी किन्तु निम्न वर्ग की महिलाओं को शिक्षा प्राप्ति के लिये कोई व्यवस्था नहीं थी। इसके तुरन्त बाद मुस्लिम काल की शुरुआत हुई। मुस्लिम समाज में पहले स्त्री शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। इस काल में शिक्षा मकतब एवं मदरसों में दी जाती थी। इन मकतबों में छोटी लड़कियाँ लड़कों के साथ पढ़ती थी तथा इन्हें इसके बाद आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिये घर पर ही शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी। केवल राज घराने की महिलाओं के लिये अलग प्रबन्ध था। उन्हें राजमहलों में शिक्षा व्यक्तिगत रुप से दी जाती थी। इस युग में सलीमा, मुमताज, नरू जहाँ आदि विदुषी महिलाएँ हुई जिन्होंने पर्दे के पीछे शिक्षा प्राप्त करके भी भारतीय जगत में अपना नाम अमर व अजर कर दिया।

 

Keywords: Indian Society, Women’s Education, Indian History, भारतीय समाज, महिला शिक्षा, भारतीय इतिहास

 


प्रस्तावना

हमारे भारतीय समाज में हमेशा से ही नारी शिक्षा को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता रहा है। अगर हम प्राचीन काल की बात करें तो उस समय शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी तथा शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल पुरुषों (लड़कों) को ही था। लड़कियों को शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसके पश्चात् बौद्ध कालीन युग में भी स्त्री शिक्षा की उपेक्षा की गई। उस समय में भी शिक्षा केवल बौद्ध मठों एवं विहारो में दी जाती थी। क्योंकि शिक्षा वहीं रहकर प्राप्त करनी होती थी तथा इसके लिये बच्चों को घर से दूर इन बौद्ध मठों एवं विहारो में निवास करते हुए अपने गुरूजनों की सेवा कर शिक्षा प्राप्त करनी होती थी। अपने तथा गुरूजनों के भोजन की व्यवस्था, साफ सफाई आदि सभी कार्य इन बच्चों को स्वयं ही करने होते थे। इसलिये इन मठों से स्त्री को दूर ही रखा गया, केवल बड़े घरों की महिला परदे में रहकर घर पर शिक्षा प्राप्त कर सकती थी किन्तु निम्न वर्ग की महिलाओं को शिक्षा प्राप्ति के लिये कोई व्यवस्था नहीं थी। इसके तुरन्त बाद मुस्लिम काल की शुरुआत हुई। मुस्लिम समाज में पहले स्त्री शिक्षा पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। इस काल में शिक्षा मकतब एवं मदरसों में दी जाती थी। इन मकतबों में छोटी लड़कियाँ लड़कों के साथ पढ़ती थी तथा इन्हें इसके बाद आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिये घर पर ही शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी। केवल राज घराने की महिलाओं के लिये अलग प्रबन्ध था। उन्हें राजमहलों में शिक्षा व्यक्तिगत रुप से दी जाती थी। इस युग में सलीमा, मुमताज, नरू जहाँ आदि विदुषी महिलाएँ हुई जिन्होंने पर्दे के पीछे शिक्षा प्राप्त करके भी भारतीय जगत में अपना नाम अमर व अजर कर दिया।¹

भारतीय संस्कृति में स्त्री व पुरुष दोनों को एक गाड़ी के दो पहियों की तरह माना गया है। दोनों पहिए साथ-साथ और बराबर चलेंगे तभी जीवन रूपी गाड़ी भली प्रकार अग्रसर हो सकती है। इसी दृष्टि से स्त्री को पुरुष की अर्द्धांगिनी कहा गया है।²

कला, मानव अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है, जो समाज की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को समृद्ध करता है। इस रचनात्मक जगत में सदियों से महिला और पुरुष दोनों ने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, अपनी अद्वितीय प्रतिभा और दृष्टिकोण से कला के विभिन्न रूपों को आकार दिया है। हालांकि, समय के साथ इन दोनों लिंगों की भागीदारी और उनके योगदान को देखने का नजरिया बदलता रहा है।

ऐतिहासिक रूप से देखें तो कला के क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व अधिक रहा है। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर पुनर्जागरण काल तक, अधिकांश प्रसिद्ध कलाकार पुरुष ही हुए। इसका मुख्य कारण सामाजिक संरचनाएं थीं, जिनमें महिलाओं को अक्सर शिक्षा और पेशेवर अवसरों से वंचित रखा जाता था। कला को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था और महिलाओं के लिए इसे एक शौक या घरेलू गतिविधि तक सीमित कर दिया गया था। फिर भी, इतिहास में ऐसी कई साहसी महिलाएं हुईं जिन्होंने इन बंधनों को तोड़कर अपनी कला का प्रदर्शन किया और अपनी पहचान बनाई।

धीरे-धीरे, सामाजिक बदलावों और नारीवादी आंदोलनों के परिणामस्वरूप, कला के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने लगी। बीसवीं सदी में कई महिला कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और कला इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान दर्ज कराया। उन्होंने न केवल चित्रकला और मूर्तिकला जैसे पारंपरिक कला रूपों में उत्कृष्टता हासिल की, बल्कि फोटोग्राफी, प्रदर्शन कला और डिजिटल कला जैसे नए माध्यमों में भी अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया। महिलाओं ने अपने अद्वितीय अनुभवों, भावनाओं और सामाजिक दृष्टिकोणों को अपनी कला के माध्यम से व्यक्त किया, जिससे कला जगत और अधिक विविधतापूर्ण और समृद्ध हुआ।

महिलाओं की स्थिति पर ध्यान केन्द्रित करते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी ने लिखा है कि, किसी भी देश की उन्नति का पता उस देश की महिलाओं की उन्नति से लगाया जा सकता है। शिक्षा वह आयाम है जो महिलाओं का सर्वाग्रीण विकास करता है शिक्षा महिला महिला एवं विकास को जोडने वाली महत्वपूर्ण कडी है। यह तथ्य प्रमाणिक रूप से सही है कि यदि एक महिला को शिक्षित किया जाए तो वह पूरे परिवार को शिक्षित बनाती है।³

हमारे स्वतन्त्रता संग्राम के नेताओं ने देश की उन्नति एवं विकास को जारी रखने के लिये शिक्षा के महत्व को समझ लिया था। साथ ही उन्होंने स्त्री शिक्षा के महत्व को भी समझा। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान नारी शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये। सन् 1947 तक भारत में स्त्री शिक्षा की संस्थाएं 28196 थी और पढ़ने वाली बालिकाओं की संख्या 42,97,785 थी। इस प्रकार स्त्रियों की शिक्षा में काफी सुधार किये गये तथा उन्हें समानता का अधिकार प्रदान करते हुए पुरुषों के समान शिक्षा प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ। स्त्रियों को ललित कलाओं की शिक्षा भी दी जाने लगी थी। इस समय कला शिक्षा के लिये कोई शिक्षा संस्थान नहीं थे। स्त्रियाँ सामान्य शिक्षा संस्थानों में कला को सामान्य विषय के रूप में पढ़ती थी। परन्तु जैसे-जैसे समय में परिवर्तन आया कला के विभिन्न शिक्षा संस्थानों की स्थापना की जाने लगी। अब स्त्रियों को कला शिक्षा के लिये नवीन मार्ग मिलने प्रारम्भ हो गये। भारत में महिलायें कला शिक्षा प्राप्त कर अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिये आगे आने लगी। भारत में महिला कलाकारों के विषय में अगर बात की जाये तो इसका प्रस्फुटन लोक कला के साथ ही प्रारम्भ हो जाता है। लोककला को केवल महिलाओं की कला माना जाता है, क्योंकि लोककला का संबंध संस्कारों, उत्सवों, अनुष्ठानों आदि से होता है तथा महिलाएँ इन संस्कार अनुष्ठानों व उत्सवों को श्रृद्धापूर्वक करते हुए लोक चित्रों का निर्माण करती है।

भारत के सभी प्रांतों में ग्रामीण महिलाओं ने अपने अनोखे ढंग से सहज सुलभ माध्यमों से लोक कला को निरंतर गतिमय बनाये रखा। यद्यपि इसमें कई बार पुरुषों की भी भागीदारी बनी रही है। 

अनुष्‍ठानों व उत्सव का श्रृद्धापूर्वक करते हुए लोक चित्रों का निमाण करती है। आधुनिक युग में महिला कलाकारों ने न केवल स्त्रियों को नयी पहचान दिलायी है।

आधुनिक युग में महिलाओं की कला के क्षेत्र में भागीदारी काफी प्रभावशाली ढंग से बढ़ी है। प्रारम्भ में केवल कुछ ही महिला कलाकारों को जाना जाता था। इनमें पारा एवं स्वर्ण कुमारी का नाम प्रमुख है। इन दोनों कलाकारों ने न केवल अपने को अपितु सम्पूर्ण नारी जाति को सम्मान दिलाया। आज तक नारी को घर की चार दीवारी के अन्दर काम करने की मशीन समझा जाता था उन्हें कोई जाने या उनसे कोई परिचित हो ऐसा दूर दूर तक नहीं था। परन्तु धीरे-धीरे कला के माध्यम से महिलाओं ने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया। यह एक ऐसी लहर थी जो एक बार उठी तो रूकने का नाम नहीं लिया। ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के श्री सिंगोर कान्स्टान्टिनों आगस्तों ने सन् 1822 में बम्बई में स्कूल ऑफ आर्ट फॉर लेडीज के नाम से ब्रिटिश महिलाओं के लिये एक स्कूल आरम्भ किया। इस स्कूल में भारतीय महिलाओं के लिये दरवाजे बन्द थे।

ब्रिटिश शासन काल में ही कलकत्ता में सन् 1879 में युवा महिला कलाकारों की एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी गृहणी सुनयना देवी को लोक कला के लिये सेलीब्रेटी स्टेटस दिया गया उस समय भी ऐसी कई महिला चित्रकार हुई जिनकी कलाकृति एवं चित्रण कार्य ने उन्हें राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई। प्रतिमा टैगोर, लीला मेहता, सविता टैगोर, सुशीला, व सुकुमारी देवी आदि ऐसी ही महिला चित्रकार हैं। धीरे-धीरे भारत में कला स्कूलों की स्थापना ने महिला चित्रकारों को कला के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाने के सुअवसर प्रदान किये। 19वीं शताब्दी में कला के क्षेत्र में विशेष क्रान्ति उठी। इस क्रान्ति के फलस्वरूप मद्रास कलकत्ता लाहौर मुम्बई आदि कई स्थानों पर कला विद्यालय स्थापित किये गये। इन विद्यालयों में कलाकार अपनी योग्यतानुसार विषय में प्रवेश लेकर अपनी प्रतिभा में निखार ला सकते थे। सन् 1950 के आस-पास इन विद्यालयों में महिला कलाकारों का एक बहुत बड़ा वर्ग विकसित हो गया था। इन महिला कलाकारों ने इन विद्यालयों से शिक्षा ग्रहण कर कला के क्षेत्र में एक विशेष क्रान्ति ला दी। अब चारों ओर इसी का बोल बाला हो गया। भारतीय समाज में महिलाओं को एक पहचान मिली। वह अब घर से बाहर की दुनिया में उड़ान भरने लगी। इन कला रूपी पंखों ने इन महिला कलाकारों को आकाश में उड़ान की एक चाह प्रदान की।

सुनयना देवी

 

सन् 1970 के दशक में महिला चित्रकारों की कला में कुछ परिवर्तन आया। अब इनमें आत्म जागृति का उदय हुआ। सन् 1986 में ललित कला एकादमी, त्रिवेणी कला संगम नई दिल्ली, भारत सरकार के मानवाधिकार एवं विकास मंत्रालय, शिक्षा एवं सांस्कृतिक मंत्रालय, वूमेन वेलफेयर मंत्रालय एवं राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, नई दिल्ली के संयुक्त प्रयासों से भारतीय महिला कलाकार शीर्षक से देश की प्रमुख महिला कलाकारों की संयुक्त कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। निश्चित ही देश में महिला कलाकारों की यह प्रथम विशाल प्रदर्शनी थी, जिसमें देश की अनेक महिला कलाकारों को एक मंच प्रदान किया गया। इस प्रदर्शनी में 43 महिला कलाकारों की 73 कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया था।

आज हमारे देश में ऐसी बहुत सी महिला कलाकार हैं जिनकी कलाकृतियों ने हमारे भारतीय समाज में महिलाओं को विशेष दर्जा दिलाया है। आज महिलायें टैक्सटाइल डिजाइनिंग, प्रिन्ट मैकिंग, इन्टीरियर (Interior Designing) डिजाइनिंग, क्ले मॉडलिंग, फैशन डिजाइनिंग व ज्वैलरी डिजाइनिंग में अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर रही हैं। इन क्षेत्रों में आगे आयी महिलाओं ने भारत ही नहीं, विदेशों में भी महारथ हासिल किया। आज महिलाओं को नई पहचान व नई राह मिली हैं। आज भारत में ऐसी बहुत ही महिला चित्रकार है जिनकी कलाकृतियाँ कला जगत की अमूल्य निधि के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। बीसवीं सदी की पहली प्रसिद्ध महिला कलाकार टैगोर परिवार की सदस्य थी, जिनका नाम सुनयना देवी था। भारत में लगभग स्‍वतंत्रता पूर्व के सन्दर्भ टैगोर के परिवार में अपने भाइयों के साथ अपनी चित्रकला को रखने का धैर्य दिखाया था सुनयना देवी ने।

कई भारतीय महिला चित्रकारों ने भारतीय समस्याओं से संबंधित विषयों के आधार पर अनेक चित्रों की रचना की है। इसके अतिरिक्त कुछ महिला चित्रकार अपनी चित्र प्रदर्शनियों से अर्जित धन राशि का योगदान देश की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ाने तथा समाज के हित के लिए योगदान करती हैं। सन् 1960 के दशक में महिलाओं ने बड़ी संख्या में कला के क्षेत्र में प्रवेश करना प्रारम्भ किया।

आज भारतीय कला स्कूलों में लगभग आधे से ज्यादा मात्रा में महिलाएँ हैं। भारत में क्यूरेटर, लेखक, गैलरी मालिकों में बहुमत आज महिलाएँ हैं। महिला कलाकारों में अंजलि इलामेमन, अर्पणा कौर, मीरा मुखर्जी, अमृता शेरगिल, गोगी सरोज पाल, जयअप्पा स्वामी, देवयानी कृष्ण, माधवी पारेख, नलिनी मलिनी, अर्पिता सिंह, मृणालिनी मुखर्जी, अनुपम सूद, जय श्री चक्रवर्ती व नीलिमा शेख आदि ऐसे नाम हैं जिन्होंने कला के क्षेत्र में विशेष ख्याति अर्जित की व कला जगत में एक विशेष स्थान बना लिया हैं। नारी के विषय में कहा भी गया है-

श्यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्त तत्र देवताः,

अर्थात् जहाँ नारी की पूजा की जाती है वहाँ देवता निवास करते हैं। इस प्रकार नारी की तुलना देवता से की गई है।

साहित्य समाज का दर्पण है, तो कला और संस्कृति उसकी हृदयगति। अपने आदर्श सामाजिक और जीवन मूल्यों से जुड़ी भारतीय कलाएँ अपनी आध्यात्मिक गहराइयों के कारण दुनिया भर में सराही जाती रही हैं। आरंभ से ही कला और संस्कृति के विकास में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

हमारे देश की महिलाओं ने कई कलाओं में दक्षता प्राप्त की और समाज सुधार के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किए। अपने गाँव, नगर, प्रदेश से निकल कर वे राष्ट्रीय स्तर पर पहुँची। कुछ महिलाओं ने तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत आदर एवं सम्मान पाया। तो आइए इन महिलाओं की उपलब्धियों को जानें और गर्व महसूस करें। भारत सरकार ने इन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, भारत रत्न आदि सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया। लता मंगेशकर, एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, प्रभा अत्रे ऐसे कुछ नाम हैं जिसमें आज हम पिछले पाँच वर्षों में जिन महिलाओं को भारत सरकार ने पद्म सम्मान दिए हैं और जिनके बारे में जानकर हम सबको गर्व महसूस होता है ऐसे कुछ कलाकारों के नाम इस प्रकार हैं।

गोदावरी दत्त, चित्रकारी (बिहार), भूरी बाई, चित्रकला (मध्यप्रदेश), प्रभा अत्रे, संगीत (महाराष्ट्र), दुलारी बाई, चित्रकला (मिथिला),(बिहार), लैंगपोकलाकपस सुबदनी देवी, बुनाइ (मणिपूर), लौरेमबम बिनो देवी, कला (मणिपूर), दुर्गा बाई व्याम, कला ( मध्यप्रदेष), उषा बारले, संगीत (छत्तीसगढ़), सुभद्रा देवी, कला (बिहार), रानी मचैया, नृत्य (कर्नाटक), शांति परमार, कला (मध्यप्रदेश), कृष्णा पटेल, कला (उड़िसा), के.सी. रूनरमे सांगी,कला (मिजोरम), निहुनुओ सोरही, कला (नागालैंड), कूमी नारिमन वाडिया, कला (महाराष्ट्र), वाणी जयराम, संगीत (तमिलनायडू), सुमन कल्याणपुर, संगीत (महाराष्ट्र), जोधैय्या बाई बैगा, चित्रकला (मध्यप्रदेश), हेमप्रभा सूतिया, बुनाई (असम), प्रीतिकना गोस्वामी, कढ़ाई कला (पश्चिम बंगाल)। कला के क्षेत्र में अनेक महिला कलाकारों ने भारत की पावन भूमि को समृद्ध बनाया है।

सबसे पहले जो नाम चित्रकला के क्षेत्र में ध्यान आता है वह दवे यानी कृष्णा का है।    सन् 1918 इंदौर में जन्मी और यहीं से कला शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने प्रदेश की पहली महिला चित्रकार होने का गौरव प्राप्त किया। उन्होंने प्रिंट-मेकिंग में महत्वपूर्ण काम तो किया ही, केलीग्राफी में बहुत-सा काम किया और काफी काम सिरेमिक में भी किया। एक समय ऐसा भी आया जब देश के तीन महत्वपूर्ण प्रिंट-मेकर में उनका नाम लिया जाता था। सोमनाथ होर, कंवल कृष्ण और देवयानी कृष्णा। कृष्णा जी ने जब काम शुरु किया तब इस क्षेत्र में महिलाओं का दखल लगभग नहीं था और उन्‍होंने अनेक धर्मों के पुराने धार्मिक प्रतीकों के साथ नयी तकनीक को मिलाकर बहुत ही खूबसूरत ढंग से स्त्री कलाकार के देखने को रेखांकित किया।

इसके बाद की कड़ी में बी. प्रभा का नाम रेखांकित करने योग्य है। सन् 1931 में मध्य प्रान्त और बरार की राजधानी नागपुर में जन्मी प्रभा जी का नाम चित्रकला के क्षेत्र में हुसैन के बाद सबसे ज्यादा प्रसिद्ध था। बी. विठ्ठल से शादी होने के बाद वे मुंबई रहने लगी थी। अमृता शेरगिल के बाद भारतीय विषयों पर चित्र बनाने का जिम्मा आप ही ने पूरा किया। 1935 में जन्मी उज्जैन की शिवकुमारी जोशी वह महत्वपूर्ण नाम है जिन्होंने चित्रकला के क्षेत्र में मध्यप्रदेश को गौरवान्वित किया। प्रख्यात पुरातत्ववेक्ता पद्मश्री वाकणकर जी की उज्जैन में स्थापित चित्रकला शाला कला भवन ने कई प्रतिभाओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उनमे शिवकुमारी जोशी का नाम अग्रणी है। शिवकुमारी जी ने कला की अनेक विधाओं में दक्षता हासिल की जैसे संयोजन, व्यक्ति चित्रण, दृश्य चित्रण, अलंकरण, स्थिर चित्रण, नेचर स्टडी, रेखांकन, कोलाज आदि।

तथापि सबसे ज्यादा इनकी रुचि संयोजन, दृश्य-चित्रण एवं नेचर स्टडी में रही है। संयोजन अधिकांश वॉश और टेम्परा में बनाये। शिवकुमारी वॉश तकनीक की भी सिद्धहस्त कलाकार थीं। कालिदास साहित्य, ग्रामीण जीवन एवं लोकोत्सव इनके प्रिय विषय रहे। कालिदास साहित्य के नायिकाओं एवं मेघदूत की यक्षणियों का लावण्यपूर्ण चित्रण उन्हें अग्रिम पंक्ति के चित्रकारों में लाकर खड़ा कर देता है।

मध्यप्रदेश राज्य गठन के पूर्व और बाद में भी कला एवं संस्कृति की प्रश्रय देने वाली कई संस्थानों का जन्म हो चुका था जैसे ललित कला संस्थान, इंदौर। होलकर महाराजा के सहयोग से (1927), लक्ष्मी कला-भवन, धार (राजमाता के सहयोग से 1938 मे) भारतीय कला भवन (1953) भारतीय कला भवन ललित कला महाविद्यालय (1954), ललित कला संस्थान, जबलपुर (1961), भारतीय कला भवन आदि। इन ललित कला कैदी से निकली प्रतिभाएं सूचे की रश्मियों की भांति चारों और फैल रही थी, दुर्भाग्यवश यहाँ तक महिलाओं की पहुँच नहीं थी। यद्यपि ललित कला। सस्थान, ग्वालियर की छात्रा डॉ. राजुलभंडारी एवं श्रीमती पुष्पाकाले का जिक्र अवश्य आता है। डॉ. राजुल भंडारी ने चित्रकला के अलावा मूर्तिकला को भी अपनाया और उसी विधा में स्थापित हुई। बाद में वह संस्थान की प्राचार्य भी बनी।

वर्तमान में सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाडी श्री राहुल द्रविड की माँ के नाम से पहचानी जाने वाली श्रीमती पुष्पा काले का जन्म इंदौर में 23 जनवरी 1941 की श्री बालकृष्ण श्रीधर काले एवं श्रीमती मनोरमा काले के परिवार में सबसे छोटी संतान के रूप में हुआ था। उनके पिता मनोवैज्ञानिक व मनोरमा काले गृहिणी थी। पुष्पा जी महारानी लक्ष्मीबाई गर्ल्स कॉलेज, इंदौर में चित्रकला विभाग की प्रथम व्याख्याता के तौर पर नियुक्त हुई थी। वर्ष 1967 में निजी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत श्री एस.वी. द्वरिष्ट से विवाह के उपरान्त वह बैगलूरू आ गई। लगभग 40 सोलो प्रदर्शनियो में हिस्सा ले चुकी पुष्पा जी बंगलौर के श्वास्तुकला विभाग में व्याख्याता के पद के पद पर काम करने लगी और और उनका परिवार वहीं बस गया।

वर्ष 1982 में भोपाल में भारत अवन की स्थापना के बाद मध्यप्रदेश के कला जगत में अनोखी हलचल शुरू हुई। चित्रकला कैनवास के अलावा विभिन्न विधाओं में आकार लेने लगी। कार्यशालाओं में देश के बड़े-बड़े कलाकार शामिल होते लगे प्राकृतिक सौंदर्य, उन्नत स्टूडियों के साथ-साथ दिग्गज कलाकारों के मार्गदर्शन ने देश भर का ध्यान आकृष्ट किया। सबसे बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि अब महिलाएं भी चित्रकला से बढ़ चढ़कर स्वयं को आजमाने लगी थी। ऐतिहासिक बदलाव के उस कालक्रम में ही भारत अवन से शोभा धारे, सीमा घुरैया और जया विवेक जैसी चित्रकार जुड़ीं। इन्हें भारत भवन से जुडने वाली महिला चित्रकारों की पहली पीढ़ी कहा आ सकता है। तब भारत भवन से जुड़ने वाले कलाकारों में छात्र और प्रशिक्षकों के अलावा वे कलाकार भी थे जो किराए पर स्टूडियो लेकर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे थे। शोभा घारे इसी तरीके से भारत भवन से जुड़ी थी। वे जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई से प्रशिक्षण लेकर लौटी थी एवं अम्लांकन के लिए जिस मशीन की जरूरत उन्हें थी वह यही उपलब्ध थी। देश के प्रमुख प्रदर्शनियों में हिस्सा लेते हुए यह देश के अग्रिम पंक्ति के चित्रकारों में शुमार होने लगी। वर्तमान में वे भोपाल में निवास कर रही है एवं अभी भी सक्रिय हैं।

ग्वालियर की मूल निवासी सीमा धुरैया का जन्म 1964 में हुआ था। उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय से ही चित्रकला में स्नातका और स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। उसके बाद भोपाल आकर वे भारत भवन से जुड़ गई, जहां उन्हें कई अनुभवी कला गुरुओं से मार्गदर्शन का अवसर प्राप्त हुआ। प्रतिभा संपन्न सीमा घुरैया मध्यप्रदेश की उन चुनिंदा कलाकारों में से हैं जिन्होंने अपने जीवन में कलाकर्म के अलावा कुछ भी नहीं किया।

इसी श्रेणी में विशाखा आप्टे का नाम भी उल्लेखनीय है, इनकी कृतियाँ देश के प्रमुख कला दीर्घाओं के अलावा विदेशों में भी सराही गई। इन्हीं की समकालीन अपर्णा अनिल ने भी कला जगत में राष्ट्रीय स्तर पर सोलो एवं समूह की प्रदर्शनियों में सम्मिलित हुई और अपनी अलग पहचान बनाई। इसके अलावा ग्वालियर फाइन आर्ट कॉलेज की श्रीमती अपर्णा अनिल को प्राचार्य का कार्यभार कुछ समय के लिए दिया गया और अपनी सृजनात्मकता व अनुभव को विद्यार्थियों के साथ साझा करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। आज वह वर्तमान में सरोजनी नायडू कॉलेज, भोपाल में विभागाध्यक्ष (चित्रकला) के पद पर पदस्थ हैं। शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, भोपाल की श्रीमती मंजूषा गांगुली कोलाज के क्षेत्र में दक्षता हासिल करने वाली एकमात्र महिला चित्रकार है। अर्पिता रेड्डी ने केरल की मंदिरों की पारंपरिक चित्र शैली को आधुनिक स्वरूप देते हुए पहचान दी है। भोपाल की मधु शुक्ला ने श्वेत-श्याम ड्रॉइंग में अमूर्त से अपनी काम की शुरुआत की और उसके बाद वे पेंटिंग की दुनिया में प्रवेश कर गई। भोपाल की ही संजू जैन ने अमूर्त शैली में उल्लेखनीय कार्य किया है। 2014 तकमहिला चित्रकारों का एक अच्छा खासा कुनबा तैयार हो गया, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। ग्वालियर की सीमा कदम ड्रॉइंग एवं पेंटिंग दोनों में काम कर रही है। इंदौर की मीरा गुप्ता ने राजस्थान की साज कला को अपनाते हुए मिनिएचर में अपनी जगह बनाई है। इसी तरह भोपाल की ही प्रीति भटनागर ने भी राजस्थानी मिनिएचर पेंटिंग में विशिष्टता हासिल की है। अश्विनी विधाते एकमात्र ऐसी कलाकार हैं, जो फोटो से पेंटिंग बनाती हैं। इसी कड़ी में भोपाल की आरती पालीवाल, वीणा जैन, रुपीन्दर कौर, शुआ भट्टी, सुनीता शर्मा, रेखा भटनागर, विदुषी भटनागर, क्षमा कुलश्रेष्ठ, सुश्री फयजा, प्रीति खरे, सिमरन सिद्धू, गायत्री गौड़, वीणा एवं मधु शर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है।

डॉ. अपर्णा अनिल

 

डॉ. मंजूषा गांगुली

 

अर्पिता रेड्डी

 

एकता शर्मा

 

डॉ. सुप्रिया अंबर

 

वर्तमान समय में इंदौर से मोनिका सेठ, प्रीति मान, शबनम शाह, मोनिका सोलंकी, ज्योति सिंह, अपर्णा बिदासरिया, गुंजन लड्ढा, समिधा पालीवाल, दिव्यांशी पंवार, स्वर्णिमा रिचारिया, ग्वालियर से एकता शर्मा, इंदू राव, वन्दना कुमारी और जबलपुर से शुभी जैन, रजनी भोसले, भीता श्रीवास्तव, सुप्रिया अम्बर, आदि अनेक महिला कलाकारों ने देश-विदेश में लगातार प्रदर्शनी की और अपनी जगह बनाई। उल्लेखनीय है कि इन सभी कलाकारों ने कैनवास पर पेंटिंग के अलावा चित्रकला की अलग-अलग विधाओं में खुद को आजमाया और दक्षता हासिल की। इन प्रतिभाओं की उपस्थिति भविष्य के प्रति आश्वस्त करती हैं।

 

निष्कर्ष

समग्र समान और सतत् विकास के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण जरूरी है। महिला सशक्तीकरण केवल राष्ट्र का लक्ष्य नहीं है। बल्कि वैश्विक एजेंडा भी है। अवसर और अनुकूल माहौल मिलने पर महिलाओं ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलताएं हासिल की है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें बिना किसी बाधा के अनुकूल अवसर उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है ताकि समाज के फायदे के लिए उनकी क्षमता का बेहतर इस्तेमाल हो सके। पारास बहार लान में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इन्द्राणी ने ही कुचिपुड़ी नृत्य को सर्वप्रथम विदेश में प्रदर्शित किया।

वस्तुतः ललित कला के विकास में सृजनात्मक प्रतिभा की धनि महिलाओं ने यह प्रमाणित कर दिया कि नारी केवल अबला और दासी नहीं है अपितु आत्म तत्वों को पहचानने वाली बौद्धिक क्षमता से युक्त महिला है। वह किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है। अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते है कि महिलाओं का कलाओं के क्षेत्र में योगदान बहुमूल्य है।

इस प्रकार निष्कर्षतः आज हमारे देश में ही नहीं, विदेशों में भी नारी को सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा है। नारी में अपने आत्मबल व रचना क्षमता के बल पर अपनी एक अलग पहचान बना ली है। आज महिलाएँ पर्दे से बाहर आकर पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं। वह बुद्धि, योग्यता आदि किसी में भी पुरूष से कम नहीं है और यह हमारी भारतीय महिला चित्रकारों ने साबित कर दिया है।

इन महिला चित्रकारों से प्रेरित व प्रभावित होकर आज न जाने कितनी महिलाएँ इस क्षेत्र में आगे आयी हैं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने मौलिक अधिकारों को जाना तथा इसको दबाने वाले के खिलाफ आवाज बुलन्द की है।  

 

REFERENCES

Bhatnagar, S. K., and Sanjay. (2002–2003). Development of Education in India (भारत में शिक्षा का विकास). Surya Publications, 510.

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