Original Article
FORESTS AND TRIBAL MEDICINES
जंगल एवं
जनजातीय
औषधिया
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1 Assistant Professor, Shri
Guru Tegh Bahadur Khalsa College Nagpur Road, Jabalpur, India |
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ABSTRACT |
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English: When human beings first appeared on Earth, their lives were entirely dependent on forests. They lived within forest environments, and roots, fruits, and leaves obtained from forests formed their food. Large leaves were used to cover the body. Messages were sent from one place to another using natural materials, and forest-based medicines were widely used. Since ancient times, tribal communities have maintained a close and interdependent relationship with forests. Nearly seven crore tribal people in the country — about seventy percent of whom live within or near forests — have traditionally depended on forest resources and forest land. Because of their close association with forests, tribal communities possess deep knowledge of trees and plants and are well acquainted with the medicinal uses of forest herbs. Hindi: मनुष्य
का जब धरती पर
प्रार्दुभाव
हुआ था, तब
मानव जीवन
पूर्णतः वनो
पर ही निर्भर
था। वह वनों
में ही निवास
करता था।
वनों से
प्राप्त कन्दमूल,
फल,
पत्ते
उनका आहार
हुआ करते थे।
तन ढकने के
लिए बड़ी-बड़ी
पत्तियों का
सहारा लिया
करते थे। एक स्थान
से दूसरे
स्थान पर
संदेश भेजने
के लिए भोज
पत्रों का
प्रयोग होता
था, और वन
औषधियों का
उपयोग करते
थे। आदिकाल
से आदिवासियों
का सहजीवी
सम्बंध रहा
हैं। Keywords: Forests, Tribal Communities, Environment, वन, जनजातीय
समुदाय,
पर्यावरण |
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प्रस्तावना
मनुष्य
का जब धरती पर
प्रार्दुभाव
हुआ था, तब मानव जीवन
पूर्णतः वनो
पर ही निर्भर
था। वह वनों
में ही निवास
करता था। वनों
से प्राप्त कन्दमूल, फल, पत्ते उनका
आहार हुआ करते
थे। तन ढकने
के लिए बड़ी-बड़ी
पत्तियों का
सहारा लिया
करते थे। एक स्थान
से दूसरे
स्थान पर
संदेश भेजने
के लिए भोज
पत्रों का
प्रयोग होता
था,
और वन
औषधियों का उपयोग
करते थे। आदिकाल
से
आदिवासियों
का सहजीवी
सम्बंध रहा
हैं।
देश
के लगभग सात
करोड आदिवासी
जिनमे से 70 प्रतिशत
वन के भीतर या
उसके आसपास
रहते है उनका
वन संसाधनों
और वनभूमि पर
अधिकार रहा
है। वनों के
भीतर रहने के
कारण वृक्षों
की विशेषताओं
से आदिवासी
भली भाँति
परिचित है और
इन वन औषधियों
का उपयोग भी खूब
जानते हैं।
वृक्ष
प्रकृति की
ऐसी अनुपम देन
है,
जिसके
क्षय व छरण से
सम्पूर्ण
प्राणी जगत पर
संकट के बादल
मंडरा सकते
है। अब तक
वनों की जो अनदेखी
एवं उपेक्षा
हुई हैं। उसका
दुष्परिणाम
यह हुआ है कि, कई अमूल्य
वनस्पतियाँ
लुप्त हो गई
है तथा पर्यावरण
का ऐसा संकट
पैदा हुआ है
कि मानव जाति शुद्ध
जल ही नही शुद्ध
वायु से भी
वंचित हो रही
है।
इन वन
औषधियों में
मारक गुण कम
लेकिन शोधक
गुण अधिक पाए
जाते हैं। ये
रोगों को
दबाती नहीं
हैं, वरन्
उन्हें जड़ से
समाप्त करती
हैं। ये शारीरिक
एवं मानसिक
दोनों प्रकार
के रोगों में
सहायक होती
हैं। इनका कोई
वैज्ञानिक
आधार नहीं है, लेकिन फिर
भी ये जनजातीय
सांस्कृतिक
व्यवस्था के
अभिन्न अंग
बने हुए हैं।
यह पद्धति
मौखिक परंपरा
द्वारा एक
पीढ़ी से दूसरी
पीढ़ी तक चलती
रहती है।
चिकित्सा
मानव तथा समाज
के वरीष्ठ सदस्य
समाजीकरण
प्रक्रिया के
माध्यम से
पेड़-पौधों के
औषधीय गुणों
तथा जड़ी-बूटी
से बनाए जाने
वाली दवाओं के
संबंध में ज्ञान
की जानकारी
समाज के
सदस्यों को
देते हैं।
जनजातीय
समाज में
जड़ी-बूटियों
से उपचार में
कुछ नियमों का
पालन करना
पड़ता है, उन्हें
उखाड़ने, तोड़ने, कूटने, पीसने तथा
दवा बनाने से
संबंधित कुछ
नियम होते
हैं। जड़ी-बूटी
को उखाड़कर, काटकर या
छीलकर लाते
वक्त
विशेषज्ञ को
अपने तन एवं
मन को शुद्ध
करना पड़ता है।
विशेष विधि द्वारा
पूजा करके या
आमंत्रित
करके उन्हें
घर लाया जाता
है। प्रायः
शनिवार या
मंगलवार की शाम
को जंगल में
जाकर इच्छित
जड़ी-बूटी को
निमंत्रण
दिया जाता है।
निमंत्रण
देते समय
कतिपय मंत्रोच्चारण
एवं अनुष्ठान
करना पड़ता है।
रविवार या
बुधवार को
सूर्योदय
होने से पूर्व
उसे उखाड़कर या
काटकर लाया
जाता है। घर
लाते समय उसे
लोगों की नजर
से बचाया जाता
है तथा ईश्वर
से प्रार्थना
की जाती है कि
उसके प्रयोग से
रोगी का तन
एवं मन स्वस्थ
हो जाये। इसे
स्थानीय भाषा
में ‘जड़ी
जगाना’ कहा
जाता है।
कुछ
जड़ी-बूटी
कच्चे माल के
रूप में खायी
जाते हैं। कुछ
जड़ी-बूटी से
चूर्ण, गोली, काढ़ा, लेप, मलहम
इत्यादि
तैयार कर
प्रयोग में
लाया जाता है।
अब तो
जड़ी-बूटियों
का प्रयोग
श्रृंगार प्रसाधन
के रूप में भी
किया जाता है।
जड़ी-बूटी सेवन
करते समय भोजन
संबंधी
निषेधों का
पालन भी अनिवार्य
होता है।
जड़ी-बूटी लेते
समय कतिपय भोज्य
पदार्थों से
परहेज करना
पड़ता है।
पेड़-पौधों के
विभिन्न
भागों के गुण
भी अलग-अलग
होते हैं। दवा
के लिए पत्ती, फल, फूल, जड़, तना, छाल इत्यादि
का प्रयोग
किया जाता है।
इस संबंध में
कुछ उदाहरण
नीचे दिए गए
हैं।
‘चिकित्सा
मानव’ (दवाई के
जानकार)
जड़ी-बूटियों के
संग्रह तथा
भंडारण करते
हैं। भंडारण
के लिए इसे
धूप या छाया
में सुखाया
जाता है। इन
औषधियों को
हवा बंद
डिब्बो में
बंद कर रखा
जाता है।
औषधीय पौधों
का वर्णन नीचे
दिया जा रहा
है।
1)
अर्जुन
(टर्मिनेलिया
अर्जुन): यह एक
विशाल
सदाबहार
वृक्ष होता
है। इसे कुकुम
या नदी सरजा
भी कहा जाता
है। यह नदी, नाले तथा
तालाब किनारे
अधिक पाया
जाता है। इसके
छाल को गुड़
में मिला करके
औटकर
प्रतिदिन खाली
पेट सुबह पीने
से हृदय रोग
की बीमारी ठीक
होती है। ज्वर, हड्डी
टूटने तथा
अंदरूनी चोट
में भी इसकी
छाल लाभदायक
होती है।
2)
अड्सा
(एडेटोडावासिक): इसकी
पत्ती एवं जड़
का प्रयोग
औषधि के रूप
में किया जाता
है। इसके सेवन
से दमा-खाँसी
जैसी बीमारी
ठीक होती है।
इसकी पत्ती का
चूर्ण या जड़ को
पीसकर गोली
बनाई जाती है।
इसे गोल मिर्च
के साथ खाया
जाता है।
3)
अशोक
(सराका
इंडिका): अशोक
वृक्ष की छाल
को सुखाकर
औषधि के रूप
में प्रयोग
किया जाता है।
यह मासिक धर्म
के समय अत्यधिक
लाभदायक होती
है। इसकी छाल
को जलाकर राख
को तेल में
मिलाकर जले
हुए स्थान पर
लगाने से जला
हुआ घाव ठीक
हो जाता है।
4)
अमलतास
(कास्सिआ
फिस्टुला): इसकी
जड़ एवं फल
औषधि के रूप
में लाभदायक
होते हैं।
इसकी पत्ती
तथा फल रेचक
और कब्ज के
पुराने
रोगियों के
लिए उपयोगी
हैं। यह टी. बी.
की बीमारी में
उपयोगी है।
इसकी जड़ को
दूध में
उबालकर पोने
से टी. बी. ठीक
होती है।
5)
अश्वगंधा
(वीदानिया
सेम्नीफेरा): इसकी
जड़ औषधि के
काम में आती
है। इसकी जड़
क्षय, दुर्बलता
तथा गठिया रोग
में उपयोगी
होता है। इसका
फल पाचन
संबंधी तथा
जिगर के
विकारों में उपयोगी
होता है।
6)
आंवला
(एंबालिका
आफिसिनालिस)
आंवला के फल, फूल, जड़, छाल
सभी में कुछ न
कुछ औषधीय गुण
होते हैं। त्रिफला
में पड़ने वाले
तीन फलों में
एक आंवला भी
है। यह रेचक
होता है। इसके
सेवन करने से
जिगर, उदर, बवासिर
तथा नेत्र रोग
में लाभ होता
है। इसमें विटामिन
सी प्रचुर
मात्रा में
पाया जाता है।
7)
अमर
बेल
(कर-कुटारिफ्लेक्सा): इसके
पौधा से लेप
तैयार करके
चोट या मोच
में लगाया
जाता है। इसके
काढ़ा से मसूड़े
का दर्द ठीक
होता है। इसका
काढ़ा बालों को
पोषक तत्व
प्रदान करते
हैं।
8)
आसन
(टर्मिनेलिया
टोमेनटोसा): आसन के
ताजे कोमल
पत्ते से
तैयार लेई
उल्टी तथा
दस्त में
लाभदायक होते
हैं। इसकी छाल
का चूर्ण गर्म
पानी के साथ
सेवन करने से
कै-दस्त ठीक होता
है। इसकी जली
हुई छाल से
तैयार तेल का
मलहम लगाने से
कान रोग ठीक
होता है। यह
खुजली में
लाभदायक होता
है।
9)
अकवन
(कैलोट्रोपिस
गिगांटीआ): इसकी जड़
की छाल हाथी
पांव रोग में
लाभदायक होती
है। इसकी जड़
एवं पत्तियों
का लेप
माँसपेशियों
के दर्द में
लाभदायक होता
है। इसके फूल
का चूर्ण
खांसी, दमा
एवं अनपच को
ठीक करता है।
अकवन का दूध
पागल कुत्ता
के काटने पर
लाभदायक होता
है।
10) अरण्डी
(रिसिनस
कोंमुनिस): इसके बीज
के तेल में
औषधीय गुण
रहता है। लू
लगने पर इसका
तेल लाभदायक
होता है। इसका
तेल गर्भ
निरोधक का काम
करता है। इसकी
पत्ती को दही
के साथ लेने
से पीलिया रोग
ठीक होता है।
11) अनंतमूल
(हेमिडेमनस
इंडिकस): इसकी जड़ में
औषधीय गुण
रहते हैं। जड़
को सुखा कर के
चूर्ण तैयार
कर लिया जाता
है तथा ज्वर, त्वचा रोग, अनपच, भूख की
कमी, मूत्र
रोग, श्वेत
प्रदर तथा
गठिया रोग में
लाभदायक होता है।
12) इमली
(टमरिंडस
इंडिका): इमली का गूदा, बीज एवं
पत्तियों में
औषधीय गुण
होते हैं। इमली
फल का पेय
लू-ज्वर में
लाभ पहुंचाता
है। इस वृक्ष
की छाल पीसकर
एक्जिमा तथा
खुजली में लगाया
जाता है। इमली
की पत्तियों
का चूर्ण तथा
काला नमक खाने
से बदहजमी दूर
होती है। इमली
बीज के चूर्ण
सेवन करने से
श्वेत प्रदर
ठीक होता है।
इमली खाने से
भांग का नशा
ठीक हो जाता
है।
13) ईशरमूल/ईश्वरी
(अरिस
टोलोचिया
इंडिका): इसकी जड़ दांत
दर्द दूर करने
में सहायक
होती है। इसकी
जड़ एवं शाखाओं
के चूर्ण
पाचनक्रिया बढ़ाती
है,
मासिक
धर्म ठीक करती
है,
रक्तचाप
को नियंत्रण
में रखती है।
अधिक मात्रा
में लेने से
गर्भपात एवं
वमन हो जाता
है।
14) उड़हुल
(हिबिसकस रोसा
साइनेनसिस): इसकी कली
का लेई
प्रतिदिन
सुबह खाली पेट
में प्रयोग
करने से
दुर्बलता एवं
नपुंसकता दूर
हो जाती है।
इसकी छाल
मूत्र रोग में
लाभदायक होता
है। इसके सूखे
हुए फूल को
गुड़ के साथ
खाने से मासिक
धर्म ठीक रहता
है। इसके फूल
को चबाने से
मुंह के छालों
में आराम
मिलता है।
इसकी जड़ का काढ़ा
खांसी में
आरामदायक
होता है।
15) करंज
(पोनगामिया
पिनाटा): इसका दातून
पायरिया रोग
ठीक करता है।
इसका तेल चर्म
रोग में
उपयोगी होता
है। इसकी छाल
का चूर्ण सेवन
खूनी बवासीर
में उपयोगी
होता है।
16) कुनैन
(सिंकोना
ओफिसीनेलिस): इसकी छाल
का चूर्ण औषधि
के रूप में
व्यवहार होती
है। यह
विशेषकर
मलेरिया ज्वर
नाशक होता है।
इससे
निमोनिया, अमीबा
पेचिश और
नेत्ररोग में
लाभ मिलता है।
इससे निर्मित
मलहम, तेल
या घोल गठिया
दर्द में आराम
पहुंचाता है।
17) कालाबूटी: यह एक
प्रकार का कंद
होता है। इसके
साथ पाताल बूटी, तेजरोज, भोजराज और
कामराज की जड़
को मिलाकर
पीसा जाता है।
इसे खाली पेट
में खाने से
टी.बी. रोग ठीक
होता है।
18) खैनी/तंबाकू
(निकोटियाना
टेबेकम): खैनी, चूना
तथा करंज तेल
का प्रयोग घाव
को ठीक करने में
किया जाता है।
खैनी पत्ता को
तेल लगाकर गर्म
किया जाता है, तथा गांठ
पर बांध दिया
जाता है। इससे
गठिया रोग में
आराम मिलता
है। इसके डंठल
को सरसों तेल में
पकाकर कान में
डालने से कान
दर्द ठीक होता
है। तंबाकू की
राख और नारियल
तेल से
खाज-खुजली ठीक
किया जाता है।
19) खपरा साग
(ट्रिआंथेमा
पोरटुलाकासटुम):
इसकी
पत्तियां
दवाई के रूप
में काम आती
हैं। यह मूत्र
रोग एवं जलोदर
में उपयोगों
होता है। जिगर
और गुर्दे रोग
में भी यह
लाभप्रद होता
है। यह
गर्भाशय की
बीमारी में
लाभ पहुंचाता
है। इसका
उपयोग काला
ज्वर ठीक करने
में भी किया
जाता है।
20) गम्हार
(ग्मेलिना
अरबोरिया): इसकी
पत्ती का रस
सांप काटने, बिच्छू
काटने, कृमि
नाश करने तथा
सुजाक में
लाभदायक होता
है। पेशाब
रुकने की
स्थिति में
इसका प्रयोग
विशेष
लाभकारी होता
है।
21) ग्वारपाठा
(एलोएमीरा): इसका
प्रयोग यकृत
की बीमारी ठीक
करने के लिए किया
जाता है। इसकी
पत्तियों को
पीसकर लगातार
एक माह तक
पीने से यकृत
की बीमारी ठीक
हो जाती है।
22) गिलोय
(टिनोस्पोरा
कार्डिलिया): यह पित्त
दूर करता है।
गर्भवती
महिला के स्वास्थ्य
को ठीक करता
है,
पेचिश एवं
अतिसार में
लाभदायक होता
है। इसके बीज
को वमन कराने
के लिए प्रयोग
में लाया जाता
है।
23) गांजा
(केनेविस
सेटिवा): इसकी
पत्तियों का
चूर्ण
भूखवर्द्धक
के रूप में
व्यवहार किया
जाता है। इसका
सेवन नशा हेतु
भी किया जाता
है।
24) गेंदा फूल
(टेगेटस
इरेक्टा): कटे हुए
स्थान पर या
घाव पर इसकी
पत्तियों को पीसकर
लगाया जाता
है। इससे घाव
ठीक हो जाता
है।
25) गुंजपेड़
(एबरस
प्रीकेटोरियस):
इसका
प्रयोग बेहोश
रोगी को होश
में लाने के
लिए किया जाता
है। इसके बीज
को रोगी के
गले में लटकाने
तथा एक बीज को
चटा देने से
रोगी होश में आ
जाता है।
26) घोड़बच
(एकोरस
केलेमस): इसके प्रकंद
को सूखाकर दवा
के रूप में
व्यवहार किया
जाता है। इससे
गैस्ट्रिक
दूर किया जाता
है,
भूख बढ़ाई
जाती है, दमा, पेचिश
एवं अतिसार
में लाभदायक
होता है, यह कृमिनाशक
होता है। इसका
प्रयोग
मानसिक रोग
में भी होता
है।
27) घुमासाग: यह कैंसर, एड्स एवं
टी.बी. की दवा
है।
28) चिरचिरी
(एकेरेंथस
एसपेरा): इसकी जड़ का
प्रयोग औषधि
के रूप में
किया जाता है।
दांत दर्द में
इसकी जड़ का रस
लाभदायक होता
है। यह पेट
दर्द एवं
बवासीर में भी
लाभप्रद होता
है। मलेरिया
बुखार में भी
यह लाभदायक
होता है।
29) चकोड़ साग
(केसिया टोरा): चकोड़ साग
तथा कुरथी दाल
के सेवन से
पेट का पथरी
रोग ठीक होता
है। चकोड़ की
जड़ को योनि
मार्ग पर रखने
से शीघ्र
प्रसव हो जाता
है।
30) चरई गोड़वा
(भीटेक्स पेड़न
कुलेरिस): इसकी जड़ को
पानी में
उबालकर पीड़ित
व्यक्ति को
देने से हृदय
रोग ठीक होता
है। इसकी छाल
को सर्पदंश के
स्थान पर
रगड़ने से लाभ
होता है। पिसे
हुए छाल को
सांप काटे हुए
व्यक्ति को
पिलाया जाता
है। इसे
सिमजंगा भी
कहा जाता है।
इसके चूर्ण को
दिन में
तीन-चार बार
सेवन करने से
मलेरिया रोग
ठीक होता है।
31) चिलबिलिया
(होलोटेलिया
इंटेगरिफोलिया): इसकी
पत्तियों का
रस सफेद दाग
मिटाने में
सहायक होता
है। इसकी
पत्ती का रस
दिनाय में भी
लाभदायक होता
है। इसकी छाल
से सिरदर्द
ठीक हो जाता
है।
32) जंगली
प्याज
(ऊरजिनिया
इंडिका): यह हृदय रोग, खांसी, श्वासनली
की सूजन, मूत्र
विचेरक में
लाभप्रद होता
है। इससे बने मलहम
फोड़ों तथा जले
जख्मों में
लगाए जाते हैं।
33) टमाटर
(लायकों
परसिकम
स्कूलेंटम): इसकी
पत्तियों को
पीसकर लगाने
से फोड़ा फुंसी
ठीक होता है।
टमाटर के फल
को काला नमक
के साथ खाने
से पेट का
कीड़ा मर जाता
है।
34) धतुरा
(धतुरा
फेस्टुओसा): धतुरा के
पत्ता को तेल
लगाकर तथा आग
पर सेंक करके
प्रयोग करने
से अंडवृद्धि
तथा गठिया रोग
में आराम
मिलता है।
धतुरा के रस
का प्रयोग जूं
को खत्म करता
है।
35) धवई
(उड़फौडिया
फुटीकोसा): धवई फूल
का व्यवहार
टी.बी. तथा
पाचन की
बीमारी में
लाभदायक होता
है।
36) नीम
(एजेडिराक्टा
इंडिका): नीम का पत्ता, ताड़ी, छाल तथा
तेल का
व्यवहार दवा
के रूप में
होता है। नीम
की कोमल
पत्तियां
सुबह खाली पेट
खाने से
पेटकृमि का
नाश होता है, घाव ठीक
होता है तथा
मधुमेह में
फायदा होता है।
37) नागफनी
(ओपुनसिया
पाइलोक्लेड): इसका
मलहम चर्म रोग
में लाभदायक
होता है। इसका
रस कान दर्द
में लाभ
पहुंचाता है।
38) पत्थर
चट्टा
(ब्रायोफाइलम
पीनेटम): इसकी
पत्तियों का
रस पीने से
पेट की पत्थरी
गल जाती है।
इसका रस
डायरिया में
भी लाभदायक होता
है।
39) पलास
(व्यूटिया
मोनोस्परमा): इसकी छाल
का रस पेचिश
में लाभदायक
होता है। इसकी
छाल को पीसकर
टूटे हुए भाग
पर लगाने से
हड्डी जुड़
जाती है। इसका
गोंद खांसी
ठीक करता है।
इसे खांसी के
वक्त गले पर
मालिश किया
जाता है। इसके
फूल का शरबत
मिश्री के साथ
पीने से रुका
हुआ पेशाब
निकलता है।
40) पेचकी
(कोलोकेसिया
एसकुलांटा): इसके कंद
को पीसकर तथा
महुआ तेल मैं
पकाकर लगाने
से हड्डी
टूटने पर दवा
के रूप में
प्रयोग किया
जाता है। यह
चोट लगने से
उत्पन्न सूजन
को भी ठीक
करता है।
41) पीपर
(पीपर लंगम): इसके फल
को पीसकर
चूर्ण बना
लिया जाता है।
चूर्ण को
मिश्री या मधु
के साथ खाने
से बवासीर ठीक
होता है। यह
अनपच, कफ, सर्दी, खांसी
इत्यादि में
लाभदायक होता
है।
42) पुतरी
(क्रोटोन
राक्स बरघी): इसका दूध
आंख रोग एवं
मोतिया बिंद
को दूर करने
में सहायक
होता है।
43) पाताल
बूटी:
इसके कंद को
तेजराज, भोगराज एवं
कामराज की जड़
के साथ पीसकर
खाली पेट में
लगातार सेवन
करने से टी.बी.
की बीमारी ठीक
हो जाती है।
44) पृश्नी
पर्णी
(यूरेरिया
पिटक):
इसके बीज के
चूर्ण को तेल
के साथ तथा
बकरी दूध के
साथ मिलाकर
मालिश करने से
वात रोग ठीक
हो जाता है।
इसका प्रयोग
हड्डी जोड़ने
के लिए किया जाता
है। इसके जड़
की छाल का
काढ़ा टूटन एवं
सूजन में
लाभदायक होता
है।
45) परही: इसकी
पत्तियों को
आग में सेंककर
बवासीर में लगाने
से लाभ मिलता
है।
46) बेल (एग्ल
मार्मेलस): इसका फल
हृदय रोग में
लाभदायक होता
है। इसका शरबत
लू लगने, कै-दस्त होने, अनपच होने, भूख नहीं
लगने तथा पेट
की अन्य
बीमारियों
में लाभदायक
होता है। इसकी
कोमल
पत्तियां
खाने से पेट
की बीमारी ठीक
होती है। इसका
बीज का चूर्ण
कब्जनाशक
होता है। इसकी
जड़ एवं
पत्तियों में
एंटिबायोटिक
तत्व पाए जाते
हैं।
47) बबूल
(एकेशिया
एरेबिका): इसका फल चीनी
के साथ खाने
से कमजोरी दूर
होती है। इसका
दातून दांत
रोग को ठीक
करता है। इसकी
छाल हड्डी
टूटन तथा सूजन
के लिए
लाभप्रद होती
है। इसके गोंद
को घी में
भुंजकर खाने
से सूखी खांसी
तथा वीर्य की
दुर्बलता में
लाभ पहुंचता
है।
48) बहेड़ा
(टर्मिनेलिया
बेलीरीका): इसका
चूर्ण कृमि
रोग, मुख
रोग, पेट
रोग, सर्दी-खांसी, कब्ज
इत्यादि को
दूर करने में
सहायक होता
है।
49) बेर
(जिजिफस
माउरिटिआना): बेर का
चूर्ण श्वेत
प्रदर में लाभ
पहुंचाता है।
दूध के साथ
इसके चूर्ण को
खाने से
निर्बलना दूर
होती है।
कुत्ता काटने
पर इसकी जड़ का
काढ़ा लाभ
पहुंचाता है।
इसकी
पत्तियों का
लेप ज्वर को
उतारने में
सहायक होता
है।
50) बबला
कंदा: इससे
निर्मित लेई
का मालिश करना
लकवा रोग में लाभपहुंचाता
है। इसके साथ
महाकाल कंदा
भी मिलाया
जाता है।
51) भेलवा
(सिमिकारापस
एनाकार्डियम):-
यह कैंसर एवं
गठिया वात रोग
में लाभ
पहुंचाता है।
इसका चूर्ण
दूध के साथ
दवा के रूप
में खाया जाता
है। इसके बीज
का तेल गठिया
रोग में
लाभदायक होता
है।
52) महुआ
(मधुका
ब्यूटीरेसिका): महुआ का
पत्ता आग पर
सेंक कर सूजन
पर बांधने से
लाभ पहुंचता
है। सूखा हुआ
महुआ फूल, मंगरैला
तथा अजवायन को
मिलाकर पोटली
बनाया जाता है
तथा इससे
सेंकने से
सूजन, गठिया, वात तथा
दर्द में
लाभपहुंचता
है। महुंआ फूल
खांसी तथा
श्वास नली
सूजन में
लाभकारी होता
है। महुआ बीज
का तेल दर्द, निमोनिया, खांसी
इत्यादि में
लाभदायक होता
है। इसकी छाल
का रस
सर्दी-खांसी
में लाभ
पहुंचाता है।
53) मेहंदी
(लावसोनिया
इनरमीस): इसकी
पत्तियों का
रस मूत्र
मार्ग की जलन
को ठीक करता
है। यह पीलिया
बीमारी में भी
लाभदायक होता
है। इसकी
पत्ती पीसकर
लगाने से रूसी
ठीक होती है
तथा बाल के
सौंदर्य में
निखार ला देता
है।
54) सर्पगंधा
(राउलफिया
सरपेनटिना): इसके बीज
पेट दर्द, सर्पदंश
तथा बिच्छू
डंक की दवा
होते हैं। इसकी
जड़ मलेरिया को
दूर करता है।
इसका चूर्ण
शक्तिदायक
तथा यौवनदायक
के रूप में
व्यवहार किया जाता
है।
55) संजीवन
बूटी
(लाइकोपोडियम
कलभेटम):- इसके
सेवन से
रतौंधी तथा
चक्कर की
बीमारी ठीक
होती है। कान
दर्द एवं दांत
दर्द में भी
इसका प्रयोग
किया जाता है।
बहुमूत्र की
भी यह अचूक
दवा है। संधिवात
में संजीवनी
तेल की मालिश
लाभदायक होती
है।
उपरोक्त
जडीबूटी को हम
अंगुलियों पर
गिन सकते है, पर ऐसी
हजारो
जड़िबूटियाँ
है जिनके बारे
में हमे पूरी
जानकारी नही
है
सिर्फ
चिकित्सा
मानव या
वरिष्ठ सदस्य
को ही इसकी
जानकारी है।
इन
जडीबूटियों
के अतिरिक्त
कतिपय जंगली जानवरों
के मास,चर्बी, तेल, हड्डी, दाँत, नाखून, इत्यादि
का प्रयोग
जनजातीय
समाजों में
दवा के रूप
मेंकिया जाता
है। यथा
1)
भौरी
कीड़ाः यह
तालाब या नदी
तट पर तैरने
वाला छोटा
आकार का कीड़ा
होता है। इसके
गुड़ के साथ
खाने से गिर्गी
की बीमारी ठीक
होती हैं।
2)
केंचुआः यह गीली
मिट्टी या खेत
में पाया जाता
है। इसे भी
गुड़ के साथ
खाने मिर्गी
की बीमारी में
लाभ पहुँचता
है।
3)
कबूतरः कबूतर का
माँस खाना
पथरी बीमारी
में लाभदायक माना
जाता है।
4)
कुत्ताः कुत्ते
का मास टी. बी.
रोगियों के
लिये लाभप्रद
होता है।
5)
वनमुर्गीः वनमुर्गी
का मास सर्दी, खासी, जुखाम मंे
लाभकारी होता
है।
6)
चमगादड़ः इसको
खाने से
रतोंदी की
बीमारी ठीक
होती है। दमा
एवं खासी में
इसका मास
लाभदायक होता
है।
7)
साँप
का तेलः सोनबहरी (कोढ़)
में लाभदायक
होता है।
8)
रेश्म
का कीड़ाः रेश्म का
कीड़ा खिलाले
से मूर्गी का
रोग ठीक होता
है।
9)
साहिल
(सेही):
इसकी
अतडी का मास
दमा पीड़ितों
के लिये
लाभदायक होता
है।
10) सियार का
खूनः
सियार का खून
अपरस की
बीमारी को ठीक
करता है।
11) हिरण
सींगः
हिरण की सींग
को पत्थर पर
घिस कर लगाने
से बावासीर की
बीमारी ठीक
होती है।
12) हाथी
दाँतः
हाथी दाँत को
घिसकर
बावासीर में
लगाने से रोग
ठीक होता है।
जनजातियों
का वन औषधियों
के संम्बंध
में ज्ञान
जंगल के साथ
उनके सदियों
के अनुभव पर
आधारित है। जो
पीढ़ी दर पीढ़ी
हस्तांरित
होती है। यह उनका
देशज ज्ञान
है। इस दिशा
में अधिक से
अधिक
वैज्ञानिक
अनुसंधान
करने की
अवश्यकता है
ताकी
जनजातियों के
वन औषधि
संम्बंधी
देशज ज्ञान को
वैज्ञानिक
आधार प्रदान
किया जा सके।
उन्हें
बौद्विक
सम्पदा का
अधिकार भी
प्राप्त हो सके।
REFERENCES
Madhya Pradesh Sandesh, May 2006
Sahitya Manjari, June-July 2011
Madhyauttari Kala Sangam, 2011
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