Granthaalayah
FOLK LITERATURE: THE TRUE MIRROR OF SOCIETY

Original Article

FOLK LITERATURE: THE TRUE MIRROR OF SOCIETY

लोक-साहित्य: समाज का सच्चा दर्पण

 

Dr. Abdul Wahid 1*

1 Assistant Professor, Urdu Government Maharani Lakshmibai Girls Postgraduate College, Kila Bhavan, Indore, India

 

CrossMark

ABSTRACT

English: Folk literature is counted among the fine arts, and the fine arts have always been a subject of deep interest in human society. Since ancient times, much has been written about artistic forms such as sculpture, painting, dance, and music; however, folk literature has often remained neglected. Folk songs did not receive the place within the fine arts that they truly deserved.

 

Hindi: लोक-साहित्य का शुमार फनून-ए-लतीफा में होता हैं फनून-ए-लतीफा सदैव से मानव समाज की दिलचस्पी का विषय रहे हैं। सांस्कृतिक संग तराशी, चित्रकला, नृत्य और संगीत जैसे कला रूपों पर प्राचीन काल से बहुत कुछ लिखा जाता रहा है, किंतु लोक साहित्य हमेशा उदासीनता का शिकार रहा। लोकगीतों को फनून-ए-लतीफा में जो स्थान मिलना चाहिए था। वह कभी नहीं मिल पाया।

 

Keywords: Folk Literature, Fine Arts, Folk Songs लोक साहित्य, ललित कलाएँ, लोक गीत

 


प्रस्तावना

लोक-साहित्य का शुमार फनून-ए-लतीफा में होता हैं फनून-ए-लतीफा सदैव से मानव समाज की दिलचस्पी का विषय रहे हैं। सांस्कृतिक संग तराशी, चित्रकला, नृत्य और संगीत जैसे कला रूपों पर प्राचीन काल से बहुत कुछ लिखा जाता रहा है, किंतु लोक साहित्य हमेशा उदासीनता का शिकार रहा। लोकगीतों को फनून-ए-लतीफा में जो स्थान मिलना चाहिए था। वह कभी नहीं मिल पाया।

लोक साहित्य जिसमें गीत, कहावतें, कहानियाँ और लोकोक्तियाँ शामिल हैं एक ओर हमारे भावनाओं और एहसासों की सच्ची अभिव्यक्ति करता है, वहीं दूसरी ओर यह हमारी तहजीब, तमद्दुन, रीति रिवाज और सामाजिक जीवन का दर्पण भी है। लोक साहित्य का केंद्र हमारा समाज और समुदाय होता है। इसलिए इस के वास्तविक अर्थों और भावों को समझने के लिए अपने समाज की सच्चाई को जानना अत्यंत आवश्यक है। समाज की वास्तविकता से अनभिज्ञ रहकर हम लोक साहित्य की आत्मा तक नहीं पहुँच सकते। आज लोकगीत हमारे साहित्य का अभिन्न अंग बन चुके हैं। इनमें हम किसी भी कबीले या कौम की सांस्कृतिक तस्वीर देख सकते हैं। लोकगीत कारों ने सादगी, संजीदगी और दिलकशी के माध्यम से इन्हें सुंदर कथाओं का रूप दे दिया है। इस संसार के कोने-कोने में लोक साहित्य का अनमोल खजाना बिखरा पड़ा है। इसके अध्ययन से मनोविज्ञान और समाज शास्त्र को समझना सरल हो गया है। यही कारण है कि लोक साहित्य को विश्व साहित्य की ‘माँ’ का दर्जा दिया गया है। लोक साहित्य को एक ऐतिहासिक शाखा कहना भी उचित होगा, क्योंकि इसमें सदियों पुराना हमारा इतिहास सुरक्षित है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे बुजुर्गों से होता हुआ हम तक पहुँचा है।

 

लोकगीत केवल व्यक्तिगत जीवन की भावनाओं तक सीमित नही हैं, बल्कि वे सामूहिक जीवन के सूक्ष्म सूत्रों को भी खोलते हैं। शादी-ब्याह की रस्मों में गाए जाने वाले गीतों में रिश्तेदारों, मित्रों और आस-पास के सभी लोगों का जिक्र मिलता है। अनेक ऐसे गीत भी हैं जो किसी विशेष समाज में व्याप्त बुराइयों को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करते हैं और स्त्रियों के भावनाओं व एहसासों को करुणा के साथ उजागर करते हैं।

लोकगीतों में केवल आंतरिक भावनाओं का ही संकेत नहीं होता, बल्कि बाहरी जीवन से जुड़ी वस्तुएँ जैसे वस्त्र, आभूषण, तरह-तरह के व्यंजन और हथियार भी इनमें प्रतिबिंबित होती हैं। लोकगीत कब अस्तित्व में आए, इस का सटीक अनुमान लगाना कठिन है, किंतु इनमें वर्णित वस्त्रों, आभूषणों, हथियारों और अन्य वस्तुओं के नाम उस युग की ओर संकेत अवश्य करते हैं , जिसमें ये गीत रचे गए। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध पंक्ति -

 

सौतन रेल मेरे पिया को ले भाग गई ”

 

इस बात की ओर इशारा करती है कि यह गीत अंग्रेजी शासनकाल में गढ़ा गया होगा, क्योंकि रेल का अस्तित्व उससे पहले नहीं था।

लोकगीतों की भाषा कोई शास्त्रीय या साहित्यिक भाषा नहीं होती, बल्कि वह सामान्य ग्रामीण जीवन से उपजी सहज भाषा होती हैं, जिस पर स्थानीय बोली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। गीतों की भाषा और शैली की एक विशेषता यह भी है कि जो शब्द आम लोगों की जबान पर होते हैं, वही शब्द गीतों में अधिक प्रयोग किए जाते हैं, जैसे -

 

मारूँगा बे मारूँगा, जा दिल्ली पुकारूँगा

दिल्ली है नौ काले कोस, वहाँ पड़ी डलम की चोट”

 

इस गीत में प्रयुक्त “काले कोस ” मुहावरा सर्वसाधारण के लिए सहज और बोधगम्य है।

लोकगीतों की भाषा अत्यंत सरल और स्वाभाविक होती है। इनमें उपमाओं कों और अलंकारों का प्रयोग नहीं के बराबर होता है। लोकगीत कार अपने उद्दे्श्य और अपने दर्द को व्यक्त करने के लिए बनावट और दिखावे से बचते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि अधिकांश लोकगीत कारों को भाषा पर उतनी पकड़ नहीं होती कि वे शिल्पगत अलंकारों का सहारा ले सके और यही उनकी सहजता और मौलिकता की सबसे बड़ी पहचान है।

लोकगीतों के विषय सामान्य जन-जीवन से लिए गए होते हैं जैसे मुस्कराते फूल, नाचते मोर, शरीर को भिगो देने वाली बारिश, पति का वियोग, सास - बहू के झगड़े और सखियों से छेड़छाड़। ऐसे विषयों पर असंख्यगीत लगभग हर भाषा और हर क्षेत्र में मिल जाते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि लोकसाहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक स्मृति का अमूल्य भंडार है। इसके संरक्षण और अध्ययन से न केवल हमारी भाषाएँ समृद्ध होंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ी रहेंगी। लोकसाहित्य को उसका उचित स्थान दिलाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

  

REFERENCES

Folk Songs of Uttar Pradesh - Azhar Ali Farooqui

Urdu Folk Songs of Kokan and Mumbai - Dr. Memuna Dalvi

Translation Source: ChatGPT (Open AI) January 2026

     

 

 

 

 

Creative Commons Licence This work is licensed under a: Creative Commons Attribution 4.0 International License

© Granthaalayah 2014-2026. All Rights Reserved.