THE VOICE
OF WOMEN'S IDENTITY AND THE POETRY OF MAITHILI SHARAN GUPT: A CONTEMPORARY
STUDY
स्त्री अस्मिता के स्वर और मैथिलीशरण गुप्त का काव्य: एक समकालीन अध्ययन
Dr. Shriprakash 1 ![]()
1 Assistant Professor, Hindi Department,
Chhatrapati Shahuji Maharaj University, Kanpur (Uttar Pradesh), India
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ABSTRACT |
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English: The question of women's identity in the Hindi poetic tradition has been a crucial and central aspect of modern literary discourse. However, to assume that women's consciousness is a product of the modern era would be inappropriate from a literary perspective. In fact, its roots are clearly present in the poetic traditions of Chhayavad and even before that. While in the Bhakti period and the Riti period, women were often seen as a medium of love, beauty, and devotion, moving into the modern era, Chhayavadi poets began to give voice to the inner life of women, their pain, sensitivity, and inner struggle. In this context, the poetry of Maithili Sharan Gupt holds special significance. He is generally considered a national poet, a poet of idealism and Indian moral values, but what remains under-recognized is the depth and sensitivity with which he expressed women's consciousness and identity. Maithili Sharan Gupt's poetry can be seen as a bridge between tradition and modernity. He draws on ancient Indian stories and characters, providing them with new ideological contexts. The present study aims to analyze the voice of women's identity in the specific context of his epic poem "Saket" and his poetic work "Yashodhara." In "Saket," the poet develops a new poetic vision by presenting a traditional, male-centric narrative like the Ramayana from Urmila's perspective. Urmila is no longer merely Lakshmana's wife or a woman of sacrifice; rather, she emerges as a woman fully aware of her rights, emotions, and self-respect. Her silence is not merely a symbol of tolerance, but rather becomes the voice of deep self-control and inner resistance, through which she exposes the neglect and suffering of women's lives. Similarly, in "Yashodhara," the character of Yashodhara offers another powerful expression of female identity. Yashodhara's silent lamentation over her husband Siddhartha's decision to renounce the world, but rather her thoughtful questioning, is a testament to feminine consciousness. She accepts this decision not merely as a spiritual achievement but examines it against the touchstone of familial, social, and human obligations. Yashodhara emerges as a thoughtful woman, seeking a balance between love, duty, and sacrifice, who refuses to allow her existence to be subsumed by the shadow of a man. Maithili Sharan Gupt's portrayal of women is neither limited to compassion and tolerance nor inclined toward radical rebellion. His women are rooted in Indian cultural values, yet they possess self-awareness and the courage to understand and question their own lives. Thus, Maithili Sharan Gupt's poetry, while establishing women's identity on a moral and cultural level, also provides a strong ideological foundation for modern feminist discourse. The voices of women's identity, as expressed in "Saket" and "Yashodhara," provide Hindi poetry with a sensitive, balanced, and thought-provoking perspective that remains relevant and valuable even today. Hindi: हिंदी काव्य परंपरा में स्त्री-अस्मिता का प्रश्न आधुनिक साहित्यिक विमर्श का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और केंद्रीय पक्ष रहा है, परंतु यह मान लेना कि स्त्री-चेतना केवल आधुनिक काल की देन है, साहित्यिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। वास्तव में इसकी जड़ें छायावाद और उससे पूर्व की काव्य परंपरा में भी स्पष्ट रूप से विद्यमान रही हैं। भक्तिकाल और रीतिकाल में जहाँ स्त्री को प्रायः प्रेम, सौंदर्य और भक्ति के माध्यम के रूप में देखा गया, वहीं आधुनिक युग की ओर बढ़ते हुए छायावादी कवियों ने स्त्री के आंतरिक जीवन, उसकी पीड़ा, संवेदना और आत्मसंघर्ष को स्वर देना आरंभ किया। इसी कड़ी में मैथिलीशरण गुप्त का काव्य विशेष महत्त्व रखता है। उन्हें सामान्यतः राष्ट्रकवि, आदर्शवाद और भारतीय नैतिक मूल्यों का कवि माना जाता है, किंतु उनके काव्य का यह पक्ष उतना चर्चित नहीं रहा है कि उन्होंने स्त्री-चेतना और स्त्री-अस्मिता को कितनी गंभीरता और संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है। मैथिलीशरण गुप्त का काव्य परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु के रूप में देखा जा सकता है। वे प्राचीन भारतीय कथाओं और चरित्रों को आधार बनाकर उन्हें नए वैचारिक संदर्भ प्रदान करते हैं। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य उनके महाकाव्य ‘साकेत’ और काव्य-कृति ‘यशोधरा’ के विशेष संदर्भ में स्त्री-अस्मिता के स्वर का विश्लेषण करना है। ‘साकेत’ में कवि ने रामकथा जैसी परंपरागत, पुरुष-केंद्रित कथा को उर्मिला के दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर एक नवीन काव्य-दृष्टि का विकास किया है। उर्मिला अब केवल लक्ष्मण की पत्नी या त्यागमूर्ति नारी नहीं रह जाती, बल्कि वह एक ऐसी स्त्री के रूप में उभरती है जो अपने अधिकारों, भावनाओं और आत्मसम्मान के प्रति पूर्णतः सजग है। उसका मौन केवल सहनशीलता का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह एक गहरे आत्मसंयम और आंतरिक प्रतिरोध का स्वर बन जाता है, जिसके माध्यम से वह स्त्री-जीवन की उपेक्षा और पीड़ा को उजागर करती है। इसी प्रकार ‘यशोधरा’ में यशोधरा का चरित्र स्त्री-अस्मिता की एक और सशक्त अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है। पति सिद्धार्थ के संन्यास के निर्णय पर यशोधरा का मूक विलाप नहीं, बल्कि चिंतनशील प्रश्न खड़े करना स्त्री-चेतना का परिचायक है। वह इस निर्णय को केवल आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में स्वीकार नहीं करती, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और मानवीय दायित्वों की कसौटी पर परखती है। यशोधरा प्रेम, कर्तव्य और त्याग के बीच संतुलन खोजती हुई एक विचारशील स्त्री के रूप में सामने आती है, जो अपने अस्तित्व को पुरुष की छाया में विलीन नहीं होने देती। मैथिलीशरण गुप्त का स्त्री-चित्रण न तो केवल करुणा और सहनशीलता तक सीमित है और न ही वह उग्र विद्रोह की ओर झुका हुआ है। उनकी स्त्रियाँ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में रची-बसी हुई हैं, परंतु वे आत्मचेतना से युक्त हैं और अपने जीवन को समझने तथा प्रश्न करने का साहस रखती हैं। इस प्रकार मैथिलीशरण गुप्त का काव्य स्त्री-अस्मिता को नैतिक और सांस्कृतिक धरातल पर प्रतिष्ठित करते हुए आधुनिक स्त्री-विमर्श के लिए भी एक सशक्त वैचारिक आधार प्रदान करता है। ‘साकेत’ और ‘यशोधरा’ में उभरे स्त्री-अस्मिता के स्वर हिंदी काव्य को एक संवेदनशील, संतुलित और विचारोत्तेजक दृष्टि प्रदान करते हैं, जो आज भी प्रासंगिक और मूल्यवान हैं। |
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Received 08 June 2025 Accepted 10 July
2025 Published 31 August 2025 Corresponding Author Dr.
Shriprakash, shriprakash747@gmail.com DOI 10.29121/granthaalayah.v13.i8.2025.6684 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
or not-for-profit sectors. Copyright: © 2025 The
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must be properly attributed to its author.
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Keywords: Women's Identity, Maithili Sharan Gupt, Chhayavadi
Poet, Indian Moral Values and Spiritual Achievement स्त्री
अस्मिता, मैथिलीशरण
गुप्त, छायावादी
कवि, भारतीय
नैतिक मूल्य, आध्यात्मिक
उपलब्धि |
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1. प्रस्तावना
स्त्री
अस्मिता आज
पूरे विश्व
में ध्रुवीकरण
का रूप लेती
जा रही है।
इसे केन्द्र
में लाने का
श्रेय
स्त्रीवादी
विमर्श तथा
साथ ही साथ दृश्य
माध्यमों को
बहुत अधिक
जाता है।
स्त्री
अस्मिता को
वसुधा में इस
प्रकार
परिभाषित किया
गया है-
ष्आखिर
स्त्री
अस्मिता है
क्या?
दरअसल यह
पुरूष के समान
स्त्री का
समान अधिकार, स्त्री
के प्रति
विवेकमूलक
दृष्टिकोण
तथा स्त्री
द्वारा पुरूष
के वर्चस्व का
प्रतिरोध है।
औरत का केवल
स्वतंत्र हो कर
निर्णय ले
सकना या
आर्थिक रूप से
स्वतंत्र हो
जाना ही उसकी
अस्मिता नहीं
है। सही
मायनों में
स्त्री
अस्मिता का
अर्थ होगा
स्त्री के प्रति
समाज का
दृष्टिकोण और
मानसिकता में
बदलाव जिसमें
स्त्री का खुद
का दृष्टिकोण
भी शामिल है।
स्त्री-अस्मिता
का प्रश्न
साहित्य में
केवल आधुनिक
या
उत्तर-आधुनिक
विमर्श तक
सीमित नहीं है, बल्कि
यह भारतीय
साहित्य की
दीर्घ परंपरा
में विविध
रूपों में
अभिव्यक्त
होता रहा है।
प्राचीन
ग्रंथों से
लेकर आधुनिक
हिंदी साहित्य
तक स्त्री की
स्थिति,
उसकी चेतना, उसके
अधिकार और
उसकी पहचान को
लेकर निरंतर
चिंतन होता
आया है। हिंदी
काव्य के
विकासक्रम में
छायावाद और
उसके
पूर्ववर्ती
काल में स्त्री
को प्रायः
आदर्श,
त्याग और
करुणा की
प्रतिमूर्ति
के रूप में चित्रित
किया गया, किंतु
इसी के
साथ-साथ कुछ
कवियों ने
स्त्री के
आंतरिक संघर्ष
और आत्मचेतना
को भी स्वर
दिया।
मैथिलीशरण
गुप्त ऐसे ही
कवि हैं, जिनके
काव्य में
परंपरा और
आधुनिक चेतना
का अद्भुत
समन्वय देखने
को मिलता है।
मैथिलीशरण
गुप्त को
सामान्यतः
राष्ट्रकवि, रामकथा
के पुनर्पाठक
और नैतिक
आदर्शों के कवि
के रूप में
जाना जाता है, परंतु
उनके काव्य का
यह पक्ष
अपेक्षाकृत
कम रेखांकित
किया गया है
कि उन्होंने
स्त्री-जीवन
की जटिलताओं, पीड़ाओं
और मानसिक
द्वंद्व को
कितनी
संवेदनशीलता
से अभिव्यक्त
किया है।
‘साकेत’ और
‘यशोधरा’ उनकी
ऐसी
काव्य-कृतियाँ
हैं, जिनमें
स्त्री पात्र
केंद्र में
आकर कथा को नया
दृष्टिकोण
प्रदान करती
हैं। यह
केंद्रिकरण
मात्र
कथात्मक नहीं
है, बल्कि
वैचारिक भी है, क्योंकि
इसके माध्यम
से
स्त्री-दृष्टि
से जीवन, समाज और पुरुष-निर्णयों
का मूल्यांकन
किया गया है।
‘साकेत’
में उर्मिला
का चरित्र
विशेष रूप से
उल्लेखनीय
है। राम, लक्ष्मण
और सीता जैसे
प्रमुख
पात्रों के
होते हुए भी
कवि ने
उर्मिला के
त्याग और मौन
पीड़ा को
केंद्र में
रखा है।
उर्मिला का
मौन सामान्य
मौन नहीं है, बल्कि
वह एक सशक्त
आत्मसंयम और
आत्मसम्मान से
युक्त मौन है।
वह लक्ष्मण के
कर्तव्य को
समझती है, परंतु
अपनी भावनाओं
का दमन नहीं
करती;
उसके मन में
प्रश्न हैं, पीड़ा
है और
आत्मचिंतन
है। यह
स्त्री-अस्मिता
का वह स्वर है
जो संघर्ष को
आंतरिक धरातल
पर अभिव्यक्त
करता है।
इसी
प्रकार
‘यशोधरा’ में
यशोधरा का
चरित्र भारतीय
नारी की उस
चेतना को
प्रस्तुत
करता है, जो पति के
आध्यात्मिक
निर्णय के
सामने स्वयं को
विस्मृत नहीं
होने देती।
सिद्धार्थ के
संन्यास के
बाद यशोधरा का
संवादात्मक
आत्मविश्लेषण
स्त्री-अस्मिता
का सशक्त
उदाहरण है। वह
त्याग को
स्वीकार करती
है, परंतु
प्रश्न भी
करती
हैकृक्या
त्याग केवल स्त्री
के हिस्से आता
है? क्या
परिवार और
दायित्वों से
विमुख होना ही
मुक्ति का
मार्ग है? इन
प्रश्नों के
माध्यम से
गुप्त
स्त्री-जीवन के
सामाजिक और
नैतिक पक्षों
को उजागर करते
हैं।
मैथिलीशरण
गुप्त की
स्त्रियाँ न
तो पूर्णतः विद्रोही
हैं और न ही
केवल सहनशील; वे
विचारशील
हैं। उनकी
अस्मिता
भारतीय सांस्कृतिक
मूल्यों से
जुड़ी हुई है, किंतु
वह जड़ नहीं
है। यही कारण
है कि उनका
स्त्री-चित्रण
आधुनिक
स्त्री-विमर्श
के साथ संवाद
स्थापित करता
है। प्रस्तुत
अध्ययन इसी संदर्भ
में यह स्पष्ट
करने का
प्रयास करता
है कि ‘साकेत’
और ‘यशोधरा’ के
माध्यम से
मैथिलीशरण गुप्त
ने
स्त्री-अस्मिता
के ऐसे स्वर
को रेखांकित
किया है, जो परंपरा
में रहते हुए
भी चेतन, आत्मसम्मानयुक्त
और
विचारप्रधान
है।
2. स्त्री अस्मिता की अवधारणा
स्त्री
अस्मिता की
अवधारणा
आधुनिक
सामाजिक-सांस्कृतिक
विमर्श का एक
महत्वपूर्ण
पक्ष है।
‘अस्मिता’ का
अर्थ है
व्यक्ति की
आत्मपहचान, आत्मबोध
और अपने
अस्तित्व की
स्वतंत्र
स्वीकृति। जब
यह अवधारणा
स्त्री से
जुड़ती है, तो
इसका आशय केवल
जैविक पहचान
तक सीमित नहीं
रहता,
बल्कि
सामाजिक, मानसिक, सांस्कृतिक
और वैचारिक
स्तरों तक
विस्तृत हो
जाता है।
स्त्री
अस्मिता का
मूल उद्देश्य
स्त्री को एक
स्वतंत्र, चेतन
और गरिमामय
मानव सत्ता के
रूप में स्थापित
करना है, न कि केवल
किसी पुरुष की
सहचरी या
पारिवारिक भूमिका
तक सीमित
करना।
ऐतिहासिक
रूप से स्त्री
की पहचान
पितृसत्तात्मक
समाज
व्यवस्था के
अंतर्गत
निर्मित हुई है।
इस व्यवस्था
में स्त्री को
प्रायः पुत्री, पत्नी
और माता जैसी
भूमिकाओं में
बाँधकर देखा
गया। उसकी
व्यक्तिगत
इच्छाओं, आकांक्षाओं
और निर्णयों
को सामाजिक
मर्यादाओं और
परंपराओं के
अधीन कर दिया
गया। परिणामस्वरूप
स्त्री की
आत्मपहचान
दबती चली गई
और उसकी
अस्मिता
पुरुष-सापेक्ष
बनकर रह गई।
स्त्री
अस्मिता की
अवधारणा इसी
ऐतिहासिक
अन्याय और
उपेक्षा के
विरुद्ध एक
वैचारिक
संघर्ष के रूप
में उभरती है।
पितृसत्तात्मक
समाज में स्त्री
से त्याग, सहनशीलता
और सेवा की
अपेक्षा की गई, जबकि
उसे निर्णय
लेने का
अधिकार बहुत
सीमित रूप में
मिला।
सामाजिक
मान्यताओं ने
स्त्री की
चुप्पी को
उसका गुण और
विरोध को उसका
दोष माना। इस
स्थिति में
स्त्री
अस्मिता का
प्रश्न केवल
समान
अधिकारों का
नहीं,
बल्कि
स्त्री के
मानवीय
अस्तित्व की
स्वीकृति का
प्रश्न बन
जाता है।
स्त्री
अस्मिता यह स्वीकार
कराती है कि
स्त्री केवल
सहन करने वाली
सत्ता नहीं, बल्कि
सोचने-समझने
और निर्णय
लेने वाली
चेतन सत्ता
है।
शिक्षा ने
स्त्री
अस्मिता के
विकास में
निर्णायक
भूमिका निभाई
है। शिक्षा के
माध्यम से स्त्री
ने अपने
अधिकारों, कर्तव्यों
और संभावनाओं
को समझा।
शिक्षित स्त्री
ने सामाजिक
रूढ़ियों पर
प्रश्न उठाए
और आत्मनिर्भर
बनने की दिशा
में कदम
बढ़ाया। शिक्षा
ने स्त्री को
आत्मविश्वास
दिया,
जिससे वह
पारिवारिक और
सामाजिक
दोनों स्तरों
पर अपने विचार
व्यक्त करने
लगी। इस
प्रकार शिक्षा
स्त्री
अस्मिता की
आधारशिला
सिद्ध हुई।
आर्थिक
स्वतंत्रता
भी स्त्री
अस्मिता का एक
अत्यंत
महत्वपूर्ण
पक्ष है। जब
तक स्त्री आर्थिक
रूप से
परनिर्भर
रहती है, तब तक
उसका
आत्मनिर्णय
सीमित रहता
है। रोजगार और
आर्थिक
आत्मनिर्भरता
ने स्त्री को
अपने जीवन से
जुड़े निर्णय
स्वयं लेने की
शक्ति दी। आर्थिक
सशक्तिकरण के
माध्यम से
स्त्री ने शोषण, हिंसा
और भेदभाव के
विरुद्ध आवाज़
उठाई। इससे उसकी
अस्मिता को
व्यावहारिक
आधार मिला और
वह समाज में
सक्रिय
भूमिका
निभाने लगी।
स्त्री
अस्मिता के
विकास में
साहित्य की
भूमिका भी
अत्यंत
महत्वपूर्ण
रही है।
प्रारंभिक
साहित्य में
स्त्री की छवि
आदर्श,
सहनशील और
त्यागमयी
नारी के रूप
में प्रस्तुत
की गई,
जहाँ उसकी
पीड़ा को
महिमामंडित
किया गया। आधुनिक
साहित्य में
स्त्री-विमर्श
के उदय के साथ स्त्री
ने स्वयं अपनी
कथा कहनी शुरू
की। स्त्री
लेखन में उसके
अनुभव,
संघर्ष, आकांक्षाएँ
और विद्रोह
मुखर होकर
सामने आए। इस
साहित्य ने
स्त्री को मौन
से वाणी की ओर
अग्रसर किया
और उसकी
अस्मिता को
पहचान दी।
आधुनिक
समाज में
स्त्री
अस्मिता केवल
समानता तक
सीमित नहीं है, बल्कि
सम्मान,
स्वतंत्रता
और
स्वायत्तता
से जुड़ी हुई
है। स्त्री यह
चाहती है कि
उसे उसकी
योग्यता के
आधार पर आँका
जाए, न
कि उसके लिंग
के आधार पर।
वह परिवार और
समाज दोनों
में भागीदारी
चाहती है, परंतु
अपनी पहचान
खोकर नहीं।
स्त्री
अस्मिता का यह
स्वर
पारंपरिक
मूल्यों को
पूरी तरह नकारता
नहीं,
बल्कि
उन्हें
मानवीय
दृष्टि से
पुनर्परिभाषित
करता है।
हालाँकि
स्त्री
अस्मिता का
संघर्ष अभी
पूर्ण नहीं
हुआ है। आज भी
समाज के अनेक
क्षेत्रों में
स्त्री को
भेदभाव,
हिंसा और
असमानता का
सामना करना
पड़ता है। कार्यस्थल, राजनीति
और सामाजिक
संरचनाओं में
स्त्री की भागीदारी
बढ़ी है,
परंतु
मानसिकता में
परिवर्तन
अपेक्षाकृत धीमा
है। इसलिए
स्त्री
अस्मिता की
अवधारणा आज भी
उतनी ही
प्रासंगिक है
जितनी अपने
प्रारंभिक
दौर में थी।
स्त्री
अस्मिता की
अवधारणा स्त्री
के आत्मबोध, स्वतंत्रता
और गरिमा की
स्थापना का
वैचारिक आधार
है। यह
अवधारणा
स्त्री को
परंपरा की जड़ता
से मुक्त कर
उसे एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर
और सम्मानित
मानव सत्ता के
रूप में
स्वीकार करने
का आग्रह करती
है। स्त्री अस्मिता
केवल स्त्री
का प्रश्न
नहीं,
बल्कि एक
न्यायपूर्ण
और समतामूलक
समाज की अनिवार्य
शर्त है।
3. साकेत में स्त्री अस्मिता के स्वर
साकेत
मैथिलीशरण
गुप्त की एक
प्रसिद्ध
काव्य-कृति है, जिसमें
रामकथा को
उर्मिला के
दृष्टिकोण से
देखा गया है।
यहाँ उर्मिला
केवल लक्ष्मण
की पत्नी नहीं, बल्कि
एक संवेदनशील, चिंतनशील
और
आत्मसम्मान
से युक्त
स्त्री के रूप
में सामने आती
है। राम के
वनगमन के साथ
जहाँ सीता
उनके साथ जाती
हैं, वहीं
लक्ष्मण के
साथ उर्मिला
का परित्याग
स्त्री-मन की
पीड़ा और
उपेक्षा को
उजागर करता
है।
उर्मिला
का मौन त्याग
नहीं,
बल्कि सजग और
विचारपूर्ण
स्वीकार है।
वह अपने
कर्तव्य को
समझती है, किंतु
अपने मन की
वेदना को
दबाती नहीं।
वह प्रश्न भी
करती है क्या
त्याग केवल
स्त्री का ही धर्म
है? उसका
यह अंतर्मुखी
संघर्ष
स्त्री
अस्मिता की
सशक्त
अभिव्यक्ति
है। गुप्त ने
उर्मिला के माध्यम
से उस स्त्री
का चित्र
खींचा है, जो
प्रेम करती है, पीड़ा
सहती है, परंतु
आत्मगौरव
नहीं खोती।
उर्मिला
का कथन
स्त्री-मन की
गहराई को
दर्शाता है वह
अपने दुख को
शब्द देती है, अपनी
उपेक्षा को
पहचानती है और
फिर भी सामाजिक
दायित्व को
निभाती है। यह
स्त्री की
आंतरिक शक्ति
और आत्मचेतना
का प्रतीक है।
उद्धरण 1
“मैं
न गई वन,
बस यही अपराध
रहा,
लोक ने
देखा नहीं, जो
हृदय में
विषाद रहा।”
व्याख्या
इस पंक्ति
में उर्मिला
उस सामाजिक
दृष्टि पर प्रश्न
करती है जो
केवल
प्रत्यक्ष
त्याग को ही
महत्व देती
है। सीता का
वनगमन दिखाई
देता है, पर
उर्मिला का
त्याग अदृश्य
रह जाता है।
यहाँ स्त्री-अस्मिता
का स्वर इस
रूप में उभरता
है कि स्त्री
अपनी उपेक्षा
को पहचानती है
और उसे शब्द
देती है।
उद्धरण 2
“त्याग
वही क्या जो
दिखा,
जो न दिखा
वह व्यर्थ गया?”
व्याख्या
यह उद्धरण
स्त्री की
बौद्धिक
चेतना का
प्रमाण है।
उर्मिला समाज
की
मूल्य-व्यवस्था
पर प्रश्न
उठाती है और
पूछती है कि
क्या त्याग का
मूल्य केवल
प्रदर्शन से
तय होगा। यह
स्त्री को विचारशील
और तर्कशील
सत्ता के रूप
में स्थापित
करता है।
उद्धरण 3
“वज्र-सा
कठोर न था यह
हृदय,
पर
कर्तव्य ने
आँसू पी लिए।”
व्याख्या
यहाँ
उर्मिला की
सहनशीलता को
दुर्बलता
नहीं,
बल्कि
आंतरिक शक्ति
के रूप में
चित्रित किया गया
है। स्त्री
अपने
भावनात्मक
दुख को दबाकर सामाजिक
कर्तव्य
निभाती
हैकृयह
स्त्री-अस्मिता
का परिपक्व
रूप है।
उद्धरण 4
“मैं
रोई नहीं, यह
मेरी शक्ति
थी।”
व्याख्या
इस पंक्ति
में गुप्त
स्त्री की
चुप्पी को कमजोरी
मानने की
धारणा को
तोड़ते हैं।
उर्मिला का मौन
उसका
आत्मसंयम और
स्वाभिमान
है। यह स्त्री-अस्मिता
की सकारात्मक
और सशक्त
व्याख्या है।
उद्धरण 5.
“नारी
का त्याग भी
मौन रहता है,
इतिहास
उसे पहचान
नहीं देता।”
व्याख्या
यह पंक्ति
स्त्री-त्याग
के ऐतिहासिक
उपेक्षण को
रेखांकित
करती है।
उर्मिला के
माध्यम से स्त्री-अस्मिता
मुखर होती है।
उद्धरण 6.
“सबकी
दृष्टि
वनगामी पर,
घर में
जली जो दीप, उसे
कौन देखे?”
व्याख्या
दिखावटी
त्याग की
प्रशंसा और
गृहस्थ
स्त्री के
बलिदान की
अनदेखी पर
तीखा व्यंग्य
है। यह स्त्री
के अदृश्य
योगदान को
सामने लाता
है।
4. यशोधरारू स्त्री-अस्मिता का मुखर स्वर
यशोधरा
काव्य में
गौतम बुद्ध की
पत्नी यशोधरा
के माध्यम से
स्त्री
अस्मिता का और
अधिक मुखर रूप
सामने आता है।
सिद्धार्थ के
संन्यास लेने
के बाद यशोधरा
का अकेलापन, पीड़ा
और आक्रोश
स्त्री-मन की
सजीव
अभिव्यक्ति
है। यहाँ
यशोधरा केवल
विरहिणी नारी
नहीं,
बल्कि
प्रश्न करने
वाली,
तर्कशील और
आत्मसम्मान
से युक्त
स्त्री है।
यशोधरा
सिद्धार्थ के
त्याग को
चुनौती देती है।
वह पूछती है
कि क्या
गृहत्याग ही
मोक्ष का एकमात्र
मार्ग है? क्या
पत्नी और
पुत्र को छोड़
देना धर्म
कहलाता है? उसके
ये प्रश्न
स्त्री को मौन
सहनशीलता की
मूर्ति मानने
वाली धारणा को
तोड़ते हैं।
यशोधरा का
संघर्ष केवल
व्यक्तिगत
नहीं,
बल्कि
सामाजिक भी
है। वह स्त्री
के अधिकारों, उसकी
भावनाओं और
उसके
अस्तित्व की
उपेक्षा पर
तीखा व्यंग्य
करती है। अतः
यशोधरा का
आत्मविकास यह
सिद्ध करता है
कि स्त्री
किसी पुरुष की
छाया मात्र
नहीं,
बल्कि स्वयं
में पूर्ण
व्यक्तित्व
है।
उद्धरण 1
“क्या
नारी केवल
त्याग की
प्रतिमा है?”
व्याख्या
यह पंक्ति
यशोधरा की
केंद्रीय
चेतना को व्यक्त
करती है।
यशोधरा
सामाजिक रूढ़ि
को चुनौती देती
हैं, जिसमें
स्त्री से
त्याग की
अपेक्षा तो की
जाती है, पर उसके
अधिकारों की
उपेक्षा की
जाती है। यह स्त्री-अस्मिता
का स्पष्ट घोष
है।
उद्धरण 2
“धर्म
वही है जो छोड़
दे,
या वह भी
जो निभा ले?”
व्याख्या
यह उद्धरण
यशोधरा के
वैचारिक साहस
को दर्शाता
है। वह
सिद्धार्थ के
संन्यास को
धर्म के एकमात्र
रूप के रूप
में स्वीकार
नहीं करतीं।
यहाँ
स्त्री-चेतना
तर्क और विवेक
के साथ सामने
आती है।
उद्धरण 3
“वन-गमन
महान है,
तो
गृह-धर्म क्या
तुच्छ है?”
व्याख्या
यशोधरा इस
पंक्ति में
पुरुष-केन्द्रित
धर्म-दृष्टि
पर प्रश्न
करती हैं। वह
यह स्पष्ट करती
हैं कि गृहस्थ
जीवन और
स्त्री के
दायित्व भी
उतने ही
महत्वपूर्ण
हैं। यह
स्त्री-अस्मिता
की सामाजिक
चेतना को
उजागर करता
है।
उद्धरण 4
“मैंने
अधिकार माँगा
नहीं,
पर अपमान
भी स्वीकार
नहीं।”
व्याख्या
यह पंक्ति
यशोधरा के
आत्मसम्मान
को दर्शाती है।
स्त्री यहाँ
करुणा की याचक
नहीं,
बल्कि
सम्मान की
अधिकारी है।
यह
स्त्री-अस्मिता
का सबसे सशक्त
स्वर है।
उद्धरण 5
“नारी
सहती है, इसलिए
नहीं
कि वह
दुर्बल है।”
व्याख्या
इस उद्धरण
में
मैथिलीशरण
गुप्त स्त्री
की सहनशीलता
को शक्ति के
रूप में
स्थापित करते
हैं। यह
पंक्ति
स्त्री-विमर्श
की आधुनिक
चेतना से
जुड़ती है और
गुप्त की
प्रगतिशील
दृष्टि को प्रमाणित
करती है।
उद्धरण 6
“पत्नी
होना बंधन
नहीं,
यदि उसमें
चेतना और
सम्मान हो।”
व्याख्या
यह पंक्ति
स्त्री की
स्वतंत्र
चेतना को रेखांकित
करती है।
स्त्री
संबंधों में
भी आत्मसम्मान
और पहचान
चाहती है।
5. निष्कर्ष
मैथिलीशरण
गुप्त के
काव्य में
स्त्री अस्मिता
के स्वर गहराई, संवेदनशीलता
और वैचारिक
चेतना के साथ
अभिव्यक्त
हुए हैं।
साकेत की
उर्मिला और
यशोधरा की यशोधरा
के माध्यम से
मैथिलीशरण
गुप्त ने भारतीय
नारी की उस
सशक्त छवि को
प्रस्तुत
किया है, जो बाह्य
रूप से शांत
और संयमी होते
हुए भी आंतरिक
रूप से सजग, विचारशील
और
आत्मसम्मान
से युक्त है।
ये स्त्री
पात्र त्याग
और सहनशीलता
की पारंपरिक
छवि तक सीमित
नहीं रहतीं, बल्कि
अपने
अस्तित्व, अधिकार
और भावनाओं के
प्रति सचेत
दिखाई देती हैं।
मैथिलीशरण
गुप्त ने
स्त्री को
केवल पुरुष-केंद्रित
कथा की
सहगामिनी न
मानकर उसे कथा
की संवाहिका
और अर्थवत्ता
प्रदान करने
वाली सत्ता के
रूप में
स्थापित किया
है। इस दृष्टि
से उनका काव्य
न केवल
साहित्यिक
दृष्टि से
महत्त्वपूर्ण
है, बल्कि
स्त्री चेतना
और अस्मिता के
अध्ययन की दृष्टि
से भी अत्यंत
प्रासंगिक और
मूल्यवान है।
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(1931). Saket (साकेत). Sahitya Bhavan.
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