A STUDY OF FAMILY ENVIRONMENT AND EMOTIONAL INTELLIGENCE IN SECONDARY LEVEL STUDENTS
माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों के पारिवारिक वातावरण एवं संवेगात्मक बुद्धि का अध्ययन
B. K. Gupta 1, Nandan Maurya 2
1 Professor and Head of Department,
Department of Education, Jawaharlal Nehru Memorial PG College, Barabanki, India
2 Research Scholar, Department of
Education, Jawaharlal Nehru Memorial PG College, Barabanki,
India
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ABSTRACT |
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English: The objective of this study was to study the family environment and emotional intelligence of secondary level students. A survey method was used for this study. A sample of 100 secondary level students from Ambedkar Nagar district, Uttar Pradesh was selected. The present study concluded that there is no significant difference between the family environment and emotional intelligence of secondary level students. Hindi: प्रस्तुत अध्ययन का उद्देष्य माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों के पारिवारिक वातावरण एवं संवेगात्मक बुद्धि का अध्ययन करना था। इस अध्ययन के लिए सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया। न्यादर्ष के लिए उत्तर प्रदेष के अम्बेडकरनगर जिले के माध्यमिक स्तर के 100 विद्यार्थियों का चयन न्यादर्ष के रूप में किया गया। प्रस्तुत अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों के पारिवारिक वातावरण एवं संवेगात्मक बुद्धि में कोई सार्थक अंतर नहीं है। |
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Received 09 May 2025 Accepted 12 June 2025 Published 31 July 2025 DOI 10.29121/granthaalayah.v13.i7.2025.6676 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
or not-for-profit sectors. Copyright: © 2025 The
Author(s). This work is licensed under a Creative Commons
Attribution 4.0 International License. With the
license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download,
reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work
must be properly attributed to its author.
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Keywords: Secondary Level, Family Environment, Emotional
Intelligence, माध्यमिक
स्तर, पारिवारिक
वातावरण, संवेगात्मक
बुद्धि |
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1. प्रस्तावना
शिक्षा का
उद्देश्य
प्रत्येक
व्यक्ति की पूर्ण
क्षमताओं का
विकास करना
है। यह मनुष्य
की बौद्धिक
क्षमताओं के
पूर्ण विकास
का प्रयास करती
है। शिक्षा
समाज की
मूलभूत
आवश्यकता है, जो
किसी भी
राष्ट्र की
सामाजिक-आर्थिक
स्थिति को
सुधारने, उस
देश,
उस राज्य
और शहर को
समृद्ध बनाने
और मानवीय गरिमा, स्वाभिमान
और
सार्वभौमिक
भाईचारे की
भावना को
बढ़ाने में
महत्वपूर्ण
भूमिका निभा
सकती है।
मनुष्य एक
सामाजिक
प्राणी है।
सभ्य समाज में
जीवित रहने के
लिए उसे
नियंत्रित
व्यवहार की
आवश्यकता
होती है।
शिक्षा की
प्रक्रिया के
माध्यम से ही
व्यक्ति सदव्यव्हार
करना सीखता
है। शिक्षा
मनुष्य के
सर्वांगीण विकास
में एक
शक्तिशाली
उपकरण है।
शिक्षा के माध्यम
से व्यक्ति
में
प्रगतिशील
मूल्यों का
विकास होता है
जो एक नए समाज
के निर्माण
में मदद करता
है। शिक्षा
व्यक्ति की
मूल प्रवृत्तियों
को नियंत्रित, संशोधित
और परिष्कृत
करके मानव की
जन्मजात शक्तियों
के विकास में
मदद करती है
ताकि मानव का
सर्वांगीण
विकास हो सके।
शिक्षा
व्यक्ति के
सर्वांगीण
विकास के
साथ-साथ समाज की
सर्वांगीण
प्रगति और
सभ्यता की
बहुमुखी प्रगति
की आधारशिला
है। शिक्षा के
माध्यम से ही
लोगों में सही
दृष्टिकोण की
भावना जागृत
होती है। यह
मानव बुद्धि, शक्ति
और दक्षता को
बढ़ाती है।
सामाजिक
कर्तव्यों को
ईमानदारी से
निभाना प्रत्येक
व्यक्ति का
अंतिम
उद्देश्य
माना जाता है।
जीवन की
वास्तविकता
को समझने में
शिक्षा
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाती है।
भारतीय ऋषियों
ने इसी पर
ध्यान
केन्द्रित
करते हुए
शिक्षा को
सभ्य समाज की
आधारशिला
माना है और
शिक्षा का
स्थान अन्य
किसी भी चीज़ो
से ऊँचा बताया
है। यह माना
गया है कि
शिक्षा मनुष्य
को
व्यावहारिक कर्तव्यों
का पाठ पढा़
ने में और सफल
नागरिक बनाने
में सक्षम है। इसके माध्यम
से व्यक्ति का
सर्वांगीण
विकास संभव है, अर्थात
शारीरिक, मानसिक
और
आध्यात्मिक।
शिक्षा के
माध्यम से ही
प्राचीन
संस्कृति के
संरक्षण और
प्रसार में
मदद मिलती है।
शिक्षा ज्ञान
का वह अमूल्य
अस्त्र है जो
अभिव्यक्ति
का सशक्त
माध्यम है। जिससे
सभ्यताओं का
निर्माण होता
है,
संस्कृतियाँ
पनपती है और
इतिहास लिखा
जाता है।
शिक्षा दर्शन
है और
सामाजिक
परिवर्तन का
सबसे प्रभावी
माध्यम है, इसलिए
शिक्षा को
विकास के एक
पैमाने के रूप
में पहचाना
जाता है। यदि
किसी समाज को
प्रगति के पथ
पर आगे बढ़ना
है तो शिक्षा
को ही माध्यम
बनाना होगा।
शिक्षा एक
सामाजिक
प्रक्रिया
है। इसलिए, यह
एक लघु समाज
है। यह समाज
की जरूरतों, मूल्यों
और
आकांक्षाओं
को दर्शाता
है। शिक्षा वह
माध्यम है जिसके
द्वारा
व्यक्ति अपने
जीवन में, समाज
में
व्यक्तित्व
की नींव रखता
है।
2. अध्ययन की आवष्यकता
वर्तमान
समय में
विद्यार्थियों
से जुड़ी इतनी
समस्याएं है जिनके
प्रश्न है कि
वे भविष्य वर्तमान
और भूत तीनों
को संवार भी
सकते है और
बिगाड़ भी सकते
है । बालकों
की
समस्याओं
के निदान के
लिए शोध की
आवश्यकता होती
है। प्रस्तुत
शोध में
विद्यार्थियों
के पारिवारिक
वातावरण का
उनकी
संवेगात्मक
बुद्धि पर
पड़ने वाले
प्रभाव को
देखकर उनके मन
में व्याप्त
सामाजिक भय को
दूर करने का
प्रयास किया
जाएगा।
पारिवारिक
वातावरण से संवेगात्मक
बुद्धि का
विकास कर
उन्हें सामाजिक
भय के
अतिरिक्त
व्यक्तित्व
के सर्वांगीण
विकास की
भावना
उत्पन्न होगी
जिससे वह भविष्य
में देश के
सच्चे कंधार
बन पाएंगे और
आगे आने वाली
समस्याओं को
स्वयं हल कर
पाएंगे।
आज हमारे
देश में
पारिवारिक
वातावरण को
शिक्षा में
अति
महत्वपूर्ण
स्थान
प्राप्त है।
अतः
पारिवारिक
वातावरण की
संपूर्ण
प्रभावों को
हम
विद्यार्थियों
के जीवन पर
देखते है ।
चाहे वह
प्रभाव
सामाजिक हो, सांस्कृतिक
हो,
संवेगात्मक
हो,
भावात्मक
हो पारिवारिक
वातावरण का
प्रभाव बालकों
की शैक्षिक
विकास की
दृष्टि से भी
महत्वपूर्ण
हो जाता है।
अध्ययन
अत्यंत
महत्वपूर्ण
हो जाता है और
पारिवारिक
वातावरण से
किस प्रकार
संवेगात्मक
बुद्धि
प्रभावित
होती है, जो
हमें अच्छे
बुरे का ज्ञान
कराती है और
यह ज्ञान
सामाजिक भय से
मुक्ति
दिलाने में हमारी
सहायता करता
है। इन सभी
प्रश्नों के
हल हम इस शोध में
ढूंढने की
कोशिश
करेंगे।
वर्तमान
परिस्थितियों
में शोधकर्ता
के मन में
जिज्ञासा
उत्पन्न हुई
कि पारिवारिक
वातावरण का
प्रभाव
बालकों की
संवेगात्मक
बुद्धि पर
भिन्न-भिन्न
पड़ता है।
3. संबंधित साहित्य का अध्ययन
1) Chauhan (2022) ने
उच्च
माध्यमिक
स्तर के
विद्ययार्थियो
की संवेगात्मक
बुद्धि पर
उनके एकल/संयुक्त
परिवार का, उनकी
आयु के
सन्दर्भ में
पड़ने वाले
प्रभाव का किया।
अध्ययन में यह
पाया गया है
कि उच्च
माध्यमिक
स्तर के विद्यार्थियों
की उनके एकल/संयुक्त
परिवार का
उनकी आयु पर
सार्थक प्रभाव
पडता है ।
2) Francesca (2022) ने
स्कूली संदर्भो
में किशोर
सामाजिक भय और
सामाजिक भय विकार की
व्यापकता का
अध्ययन किया।
निष्कर्ष में
प्राप्त हुआ
कि कुल
न्यादर्ष में
से
26 प्रतिषत में उच्च
किशोर
सामाजिक भय और
सामाजिक भय
विकार पाया
गया। सामाजिक
भय विकार वाले
किशोरों में, 12.9 प्रतिषत
मनोवैज्ञानिक
सलाह प्राप्त
कर रहे थे, 12.1 प्रतिषत ने
सलाह से इनकार
कर दिया।
लड़कों की
तुलना में
लड़कियों में
अधिक सामाजिक
भय पाया जाता
है अर्थात्
लड़कों और
लड़कियों में
सामाजिक भय के
संदर्भ में
सार्थक अंतर
पाया गया।
3) Gurjar (2022) ने
उच्च
प्राथमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
की सृजनात्मकता
पर उनके पारिवारिक
वातावरण के
प्रभाव का
अध्ययन किया।
निष्कर्ष के
रूप में कहा
जा सकता है कि उच्च
प्राथमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
की सृजनात्मकता
पर उनके
पारिवारिक
वातावरण के प्रभाव
का अध्ययन में
सार्थक अंतर
पाया गया है।
4) Nagarjuna (2022) ने
बागलकोट के
चयनित हाई
स्कूल के
छात्रों में
सामाजिक भय विकार और इसके
निर्धारकों
की व्यापकता
का आकलन करने
के लिए अध्ययन
किया। निष्कर्षो
से पता चला कि
किशोरों की
सामाजिक भय
विकारों और
उनके चयनित सामाजिक-जनसांख्यिकीय
चर जैसे मासिक
आय के बीच एक
सार्थक संबंध
पाया गया
किशोरों के
बीच
मनोवैज्ञानिक
भलाई और
अकादमिक
प्रदर्शन के
बीच एक
सकारात्मक
सहसंबंध पाया
गया। किशोरों
में सामाजिक
भय विकारों के
स्तर पर इसके
निर्धारकों
के प्रभाव के
संबंध में
शिक्षण
कार्यक्रमों की
प्रभावशीलता
का किशोरों के
स्वास्थ्य पर सकारात्मक
प्रभाव पड़ा, जो
सांख्यिकीय
रूप से भी
महत्वपूर्ण
थे।
4. अध्ययन के उद्देश्य
1) माध्यमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
के पारिवारिक
वातावरण का
अध्ययन करना।
2) माध्यमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
की संवेगात्मक
बुद्धि का
अध्ययन करना।
5. अध्ययन की परिकल्पनाएँ
1) माध्यमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
के पारिवारिक
वातावरण में
सार्थक अंतर
नहीं पाया
जाता है।
2) माध्यमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
की संवेगात्मक
बुद्धि में
सार्थक अंतर
नहीं पाया
जाता है।
शोध विधि
प्रस्तुत
शोध में
सर्वेक्षण
विधि का
प्रयोग किया
गया है।
6. न्यादर्ष
प्रस्तुत
अध्ययन में
उत्तर प्रदेष
के अम्बेडकरनगर
जिले के
माध्यमिक
स्तर के 100
विद्यार्थियों
का चयन
न्यादर्ष के
रूप में किया
गया है।
7. उपकरण
प्रस्तुत
अध्ययन में
मानकीकृत
उपकरण का प्रयोग
किया गया है-
·
पारिवारिक
वातावरण
मापनी -बीना
षाह द्वारा निर्मित
·
संवेगात्मक
बुद्धि
परीक्षण -हेदे, पेठे
और धर द्वारा
निर्मित
प्रदत्तों
के विश्लेषण
के लिए
प्रयुक्त सांख्यिकी
·
मध्यमान
·
प्रमाप
विचलन
·
क्रांतिक
अनुपात
8. आंकड़ों की व्याख्या एवं विष्लेषण
षून्य
परिकल्पना 1 - माध्यमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
के पारिवारिक
वातावरण में
सार्थक अंतर
नहीं पाया
जाता है।
तालिका 1
|
तालिका
1 माध्यमिक
स्तर के
छात्र एवं
छात्राओं के
पारिवारिक
वातावरण में
अंतर |
|||||
|
समूह |
संख्या |
मध्यमान |
प्रमाप
विचलन |
सीआर
मान |
परिणाम |
|
छात्र |
50 |
140.14 |
11.55 |
0.81 |
0.05 सार्थकता |
|
छात्राएँ |
50 |
142.27 |
14.63 |
|
स्तर
पर स्वीकृत |
|
कि =(छ1छ2.2), कि = (5050.2)
= 98 सार्थकता
स्तर 0.05 पर
टी का मान = 1.97 |
|||||
व्याख्या
एवं विष्लेषण
तालिका
संख्या 1
माध्यमिक
स्तर के छात्र
एवं छात्राओं
के पारिवारिक
वातावरण में
अंतर को
प्रस्तुत
करती है।
तालिकाके
अवलोकन से
ज्ञात होता है
कि माध्यमिक
स्तर के
छात्रों के
पारिवारिक
वातावरण का
मध्यमान 140.14 तथा मानक
विचलन 11.55 है। दूसरी ओर
माध्यमिक
स्तर की
छात्राओं के पारिवारिक
वातावरण का
मध्यमान 142.27 तथा मानक
विचलन 14.63 है। प्राप्त
मध्यमानों और
प्रमापविचलन
की सहायता से
क्रांतिक
अनुपातकी
गणना करने पर
क्रांतिक
अनुपातका मान 0.87
प्राप्त हुआ।
स्वतंत्रता
के अंष 98 पर 0.05 सार्थकता
स्तर के लिए
सारणी मान 1.97
है। क्रांतिक
अनुपातका
परिकलित मान
सारणी के मान
से कम है। अतः
शून्य
परिकल्पना
स्वीकृत होती
है। निष्कर्षतः
यह कहा जा
सकता है कि
माध्यमिक
स्तर के छात्र
एवं छात्राओं
के पारिवारिक
वातावरण में सार्थक
अंतर नहीं
पाया जाता है।
षून्य
परिकल्पना 2 - माध्यमिक
स्तर के
विद्यार्थियों
की संवेगात्मक
बुद्धि में
सार्थक अंतर
नहीं पाया
जाता है।
तालिका 2
|
तालिका 2 माध्यमिक
स्तर के
छात्र एवं
छात्राओं के
संवेगात्मक
बुद्धि में
अंतर |
|||||
|
समूह |
संख्या |
मध्यमान |
प्रमाप
विचलन |
सीआर
मान |
परिणाम |
|
छात्र |
50 |
128.68 |
12.87 |
0.76 |
0.05 सार्थकता |
|
छात्राएँ |
50 |
130.55 |
11.78 |
|
स्तर
पर स्वीकृत |
|
कि = (छ1छ2.2), कि = (5050.2)
= 98 सार्थकता
स्तर 0.05 पर
टी का मान = 1.97 |
|||||
व्याख्या
एवं विष्लेषण
तालिका
संख्या 2
माध्यमिक
स्तर के छात्र
एवं छात्राओं
के संवेगात्मक
बुद्धि में
अंतर को
प्रस्तुत
करती है।
तालिकाके
अवलोकन से
ज्ञात होता है
कि माध्यमिक
स्तर के
छात्रों के
संवेगात्मक
बुद्धि का
मध्यमान 128.68 तथा मानक
विचलन 12.87 है। दूसरी ओर
माध्यमिक
स्तर की
छात्राओं के संवेगात्मक
बुद्धि का
मध्यमान 130.55 तथा मानक
विचलन 11.78 है। प्राप्त
मध्यमानों और
प्रमाप विचलन
की सहायता से
क्रांतिक
अनुपातकी
गणना करने पर
क्रांतिक
अनुपातका मान 0.76
प्राप्त हुआ।
स्वतंत्रता
के अंष 98 पर 0.05 सार्थकता
स्तर के लिए
सारणी मान 1.97
है। क्रांतिक
अनुपातका
परिकलित मान
सारणी के मान
से कम है। अतः शून्य
परिकल्पना
स्वीकृत होती
है। निष्कर्षतः
यह कहा जा
सकता है कि
माध्यमिक
स्तर के छात्र
एवं छात्राओं
के
संवेगात्मक
बुद्धि में सार्थक
अंतर नहीं
पाया जाता है।
9. समग्र परिणाम
प्रस्तुत
अध्ययन के
अंतर्गत
माध्यमिक
स्तर के छात्र
एवं छात्राओं
के पारिवारिक
वातावरण तथा
संवेगात्मक
बुद्धि में
अंतर का
सांख्यिकीय
विश्लेषण
किया गया।
प्राप्त
परिणामों के
समग्र अवलोकन
से यह स्पष्ट
होता है कि
दोनों ही चर
पारिवारिक
वातावरण तथा
संवेगात्मक बुद्धि
में लिंग के
आधार पर कोई
सार्थक अंतर
नहीं पाया
गया।
पारिवारिक
वातावरण के
संदर्भ में
छात्रों एवं
छात्राओं के
मध्यमान एवं
मानक विचलन
में अल्प अंतर
पाया गया, किंतु
परिकलित
क्रांतिक
अनुपात का मान
सारणी मान से
कम होने के
कारण शून्य
परिकल्पना
स्वीकृत हुई।
इसी प्रकार
संवेगात्मक
बुद्धि के
संदर्भ में भी
छात्र एवं
छात्राओं के
मध्यमानों
में मामूली अंतर
होने के
बावजूद
सांख्यिकीय
दृष्टि से यह अंतर
सार्थक नहीं
पाया गया।
अतः समग्र
रूप से यह
निष्कर्ष
निकाला जा
सकता है कि
माध्यमिक
स्तर पर
अध्ययनरत
छात्र एवं
छात्राओं का
पारिवारिक
वातावरण तथा
संवेगात्मक
बुद्धि लगभग
समान स्तर की
है तथा इन दोनों
चरों पर लिंग
का कोई
महत्वपूर्ण
प्रभाव नहीं
पड़ता। यह
परिणाम यह
संकेत करता है
कि वर्तमान
सामाजिक एवं
शैक्षिक
परिवेश में
छात्र एवं
छात्राएँ
समान
पारिवारिक
अनुभव प्राप्त
कर रहे है , जिसके
परिणामस्वरूप
उनकी
संवेगात्मक
बुद्धि का
विकास भी समान
रूप से हो रहा
है।
10. निहितार्थ
प्रस्तुत
अध्ययन के
निष्कर्ष यह
संकेत करते है
कि
माध्यमिक
स्तर के छात्र
एवं छात्राओं
के
पारिवारिक
वातावरण तथा
संवेगात्मक
बुद्धि में
लिंग के आधार
पर कोई सार्थक
अंतर नहीं पाया
गया। इसका
प्रमुख
निहितार्थ यह
है कि वर्तमान
सामाजिक एवं
पारिवारिक
परिवेश में दोनों ही वर्गों
को लगभग समान
भावनात्मक
सहयोग,
पारिवारिक
अनुभव तथा
विकास के अवसर
प्राप्त हो
रहे है । यह
स्थिति
शैक्षिक
दृष्टि से
सकारात्मक मानी
जा सकती है, क्योंकि
समान
पारिवारिक
वातावरण और
संवेगात्मक
बुद्धि
विद्यार्थियों
के संतुलित
व्यक्तित्व
विकास में
सहायक होती
है। साथ ही, यह
अध्ययन
शिक्षकों एवं
विद्यालय
प्रशासन को यह
संकेत देता है
कि
शिक्षण-अधिगम
प्रक्रिया
में लिंग के
आधार पर भेद
किए बिना समान
भावनात्मक
एवं शैक्षिक
समर्थन
प्रदान किया
जाना चाहिए।
इसके
अतिरिक्त, यह
निष्कर्ष
शैक्षिक
योजनाकारों
को ऐसे कार्यक्रमों
के निर्माण
हेतु प्रेरित
करता है, जो
सभी
विद्यार्थियों
में
संवेगात्मक
बुद्धि के
समुचित विकास
को
प्रोत्साहित
करें।
11. सुझाव
प्रस्तुत
अध्ययन के निष्कर्षो
के आधार पर
निम्नलिखित
सुझाव दिए जा
सकते है ।
विद्यालय स्तर
पर ऐसे
कार्यक्रम
एवं
गतिविधियाँ
आयोजित की
जानी चाहिए, जो
विद्यार्थियों
की
संवेगात्मक
बुद्धि के विकास
में सहायक हों, जैसे
जीवन कौशल
प्रशिक्षण, परामर्श
सत्र एवं समूह
गतिविधियाँ।
अभिभावकों को
भी यह सुझाव
दिया जाता है
कि वे घर के वातावरण
को सकारात्मक, सहयोगात्मक
एवं
भावनात्मक
रूप से
सुरक्षित बनाए
रखें,
जिससे
विद्यार्थियों
का
सर्वांगीण
विकास हो सके।
शिक्षकों को
चाहिए कि वे
छात्रों एवं
छात्राओं
दोनों के साथ
समान
संवेदनशीलता
एवं
सहयोगात्मक
दृष्टिकोण
अपनाएँ।
भविष्य के शोधकर्ताओं
के लिए यह
सुझाव दिया जा
सकता है कि वे
पारिवारिक
वातावरण एवं
संवेगात्मक
बुद्धि का
अध्ययन अन्य
चरों
जैसे
शैक्षिक
उपलब्धि, अध्ययन
आदते
या मानसिक
स्वास्थ्य के
साथ भी करे तथा
बड़े एवं विविध
नमूनों पर शोध
करके अधिक
व्यापक निष्कर्ष
प्रस्तुत
करें।
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