Original Article
VARIOUS DIMENSIONS OF WOMEN'S EXPLOITATION IN MAITREYI PUSHPA'S NOVELS
मैत्रेयी
पुष्पा के
उपन्यासों
में नारी शोषण
के विविध आयाम
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Archita Guru 1* 1 Research Scholar, Ph.D.
Hindi, Kalinga University, Raipur, Chhattisgarh, India |
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ABSTRACT |
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English: The status of women in Indian society has always been a matter of concern. In ancient times, women were considered divine, but with the passage of time, their status gradually deteriorated. In a patriarchal society, the interests of men are considered paramount, and women are merely seen as a means of fulfilling men's desires. Today, a woman, regardless of her caste, religion, or community, has to face oppression and exploitation by men. Women who are victims of sexual harassment, rape, social ostracism, abduction, murder, and economic and mental exploitation never receive justice in society; instead, they become targets of criticism from influential people in society. According to Vrinda Karat, "A woman, regardless of her class, caste, or religion, has to endure exploitation. Her labor is not considered labor; she has to endure everything from insufficient food to sexual exploitation". Kadambini Even before India's independence, the government enacted numerous laws to improve the status of women, and social reformers made tireless efforts to protect women's dignity. The Indian government passed the Special Marriage Act in 1994, the Marriage Act (Sharda Act) in 1995, and a law for the abolition of dowry in 1961 against atrocities and exploitation of women, but the exploitation and atrocities against women have not decreased. Maitreyi Pushpa has depicted the miserable and exploited condition of women at the hands of men in her novels. Hindi: भारतीय
समाज में
नारी की
स्थिति
हमेशा ही चिंताजनक
रही है
प्राचीन समय
में नारी को
देवी तुल्य
समझा जाता था
परंतु समय के
साथ-साथ नारी
की स्थिति
धीरे-धीरे
हैं होती चली
गई पुरुष प्रधान
समाज में
पुरुषों के
हितों को
सर्वोपरि समझा
जाता है और
नारी को केवल
इच्छा
पूर्ति का माध्यम
माना गया। आज
नई किसी भी
जाति धर्म या संप्रदाय
की हो उसे
पुरुषों के
अत्याचार का
शोषण होना
पड़ता है यौन
शोषण, बलात्कार,सामाजिक
बहिष्कार,अपहरण,
हत्या
आर्थिक और
मानसिक शोषण
का शिकार हुई
नारी को समाज
में न्याय
कभी नहीं
मिलता, बल्कि
समाज के
बड़े-बड़े
लोगों की
उलाहनाओं का
शिकार होना
पड़ता है। वृंदा
कारान्त के
अनुसार-
“स्त्री चाहे
जिस वर्ग और
जाति धर्म से
संबंधित हो
उसे शोषण
सहना पड़ता
है उसका श्रम
श्रम नहीं
माना जाता
उसे कम भोजन
मिलने से
लेकर यौन
शोषण तक सहना
पड़ता है। “Kadambini भारत
में आजादी के
पूर्व ही
नारी की
स्थिति में
सुधार लाने
के लिए सरकार
द्वारा अनेक
कानून किए गए
समाज सुधार
को नहीं नारी
के सम्मान की रक्षा
हेतु अथक
प्रयास
किया। भारत
सरकार द्वारा
नारी
अत्याचार व
शोषण के
विरुद्ध 1994 में
विशेष विवाह
कानून, 1995
में विवाह
अधिनियम
शारदा एक्ट,
1961
में दहेज
उन्मूलन
हेतु कानून
पारित किया
गया, परंतु
नारी का शोषण
व अत्याचार
कम नहीं हुआ
मैत्रेयी
पुष्पा जी ने
अपने
उपन्यासों
में नारी की
दीन-हीन व
पुरुष वर्ग
द्वारा
शोषित होती नारी
की स्थिति को
अपने
उपन्यासों
में सम्मिलित
किया है। |
||
प्रस्तावना
भारतीय
संस्कृति व
परंपरा के
आधार पर नारी
को पुरुष की
अर्धांगिनी
माना जाता है
वह पुरुष के
सुख और दुख
में समान रूप
से भागीदार
होती है पति
के ऊपर कोई भी
विपत्ति आए तो
पत्नी अपने प्राणों
की चिंता भी
ना कर अपने
पति की रक्षा
करती है परंतु
पुरुषों ने
नारी के इस
प्रेम समर्पण
व निस्वार्थ
भावना को न
समझा
धीरे-धीरे वह
नारी को अपने
अधीन मानकर
उनका शोषण
क्या समाज के
द्वारा नारी
को एक वस्तु
माना गया हर
क्षेत्र चाहे
वह राजनीतिक
सामाजिक
आर्थिक धार्मिक
को नारी का
भरपूर शोषण
किया गया कहीं
वह पुरुषों से
आगे ना निकल
जाए इसलिए शिक्षा
से वंचित रखा
गया परंतु आज
एक नया बदलाव
आया है जिससे
नारियों में
अपने हक और
सम्मान के लिए
लड़ने और आगे
बढ़ाने की
इच्छा पैदा हुई।
मैत्रेयी
पुष्पा ने
अपने
उपन्यासों
में ऐसे ही
नारियों का
वर्णन और
चित्रण किया
जो अपने हक के
लिए लड़ती है
और समाज के
विरुद्ध जाकर
अपने
व्यक्तित्व व
अस्तित्व का
निर्माण करती
है।
भारतीय
जनतांत्रिक
व्यवस्था है
जहां स्त्री
और पुरुष को
समान अधिकार
प्राप्त है
किंतु आजादी
के उपरांत भी
शिक्षा के
अभाव के कारण
स्त्री अपने
अधिकारों के
ज्ञान से
वंचित रही। आज
वह पुरुषों की
भाति भारतीय
शिक्षा
प्राप्त कर
आर्थिक रूप से
आत्मनिर्भर
होती जा रही
है।
इस
प्रकार
मैत्रेयी जी
ने अपने
उपन्यासों में
अपने
अधिकारों के
लिए जूझती हुई
नारी का चित्रण
किया है जो कि
समाज के हर
कुप्रथा का
दमन करके अपने
अस्तित्व
निर्माण के
कार्य करती
हैं। वह अनपढ़
गवार होकर भी
अपने अधिकारों
का ज्ञान रखती
है।
नारी
को पुरुषों के
द्वारा अनेक
आयाम पर दबाया
गया, कभी
दहेज प्रथा,
अनमेल
विवाह, बलात्कार,
प्रेम
संबंध, धर्म
व रीति-
रिवाज, संतान
अभाव, संपत्ति
आदि समस्त रूप
से उसे
पुरुषों की
अधीनता मानने
के लिए विवश
किया जाता रहा
है।
नारी
शोषण के विविध
आयाम
1) दहेज
प्रथा :- भारतीय
समाज में दहेज
प्रथा एक बहुत
बड़ी कुप्रथा
है। जो कि
समाज की जड़ों
को बाधित करती
है पिता
द्वारा
पुत्री को
उसके विवाह पर
जो स्वेच्छा
से दिया जाता
है उसे उपहार
कहा जाता है व
जो कुछ वह
पक्ष के
द्वारा मांगा
जाता है उसे दहेज
कहा जाता है।
प्राचीन काल
में राजा महाराजा
द्वारा अपनी
पुत्री के
विवाह में
घोड़े, हाथी, सोने,
हीरे
जवाहरात, दास
-दासियां आदि
अनेक उपहार
दिए जाते थे।
यह एक
कन्यादान के
समय दिया गया
उपहार था जो
की एक रिवाज
मात्र था।
परंतु बाद में
यह एक को प्रथा
के रूप में
अपना
अस्तित्व
बनाने लगी। आज
की कन्या
सुंदर, सुशिक्षित
होने पर भी वह
दहेज के अभाव
में उसे योग्य
वर नहीं मिल
पाता है
यद्यपि इन
दहेज निषेध
कानून 1961 के आधार
पर दहेज प्रथा
पर रोक लगाया
गया है परंतु
आज भी यह
समस्या पाई जा
रही है मध्यम
वर्गीय
परिवार में
कन्या के जन्म
को पाप समझा
जाने लगा बेटी
के जन्म होते
ही माता-पिता
को उसके दहेज
की चिंता होने
लगती थी
मैत्रेयी
पुष्पा द्वारा
लिखित
उपन्यास
‘बेतवा बहती
रही’ की नायिका
उर्वशी के
माता-पिता को
गरीब होने के
कारण अपनी
बेटी के विवाह
की चिंता सीने
के पत्थर के
समान भारी
लादा गया भार
था। “उर्वशी
के विवाह को
वजन उसके सीने
में भारी
पत्थर सा लादा
था। उसके जन्म
से ही वह ऋणी
होने की
अनुभूति से दबे
थे। दहेज का
ख्याल आते ही
कंगाली और
दरिद्र की खाई
में जा गिरते।
मन गहरे तल
में डूब जाता।
“Maitreyi Pushpa
इस
कुप्रथा ने
अनेक सामाजिक
समस्या को
जन्म दिया
जैसे-अनमोल
विवाह, विजातिय
विवाह, विधवा
विवाह, स्त्री
मात्र
गर्भधारिणी,
नारी शोषण
आदि अनेक
प्रकार के
नारी के
अस्तित्व को
बाधा
पहुंचाने
वाले
समस्याओं का
जन्म हुआ।
2) पारिवारिक
शोषण :-
परिवार समाज
का एक अभिनव
है भारतीय
समाज की प्रकृति
प्रारंभ से ही
पितृ
सत्तात्मक
व्यवस्था रही
है। जहां
पुरुष वर्ग को
प्रधानता और स्त्री
वर्ग को
अधीनता में
रखा जाता है।
पारिवारिक
मूल्य वह
नियमों के
आधार पर
नारियों को बेड़ियों
में जकड़ना यह
पितृ
सत्तात्मक
व्यवस्था का
प्रमुख
उद्देश्य था।
इस व्यवस्था
के लिए
मैत्रेयी
पुष्पा जी का
विचार था कि
“परिवार समाज
की अत्यंत
महत्वपूर्ण
इकाई है. वह
इसलिए की मर्द
की मुखिया
गिरी के लिए
ऐसा पहला
सिंहासन है
जिस पर आसीन
होते ही उसकी
ताजपोशी को मान्यता
मिलती है और
उसका कमजोर
होने या गिरना
समाज के पहले
खंभे का गिरना
है जो किसी तरह
बर्दाश्त
नहीं किया
जाता। यदि ऐसा
होता है तो इस
कला की गिरने
का जिम्मेदार
स्त्री को माना
जाता है। Maitreyi
Pushpa
स्त्री
को पराया घर
की मानकर
शिक्षा से
वंचित रखा
जाता था मैटर
पुष्पा के
उपन्यास
‘कस्तूरी कुंडल
बसै’ में
कस्तूरी को
पढ़ाई की बड़ी
लालसा थी,
परंतु उसे
पढ़ाई से
कोसों दूर रखा
जाता था, जिससे वह
यह सोचती थी
कि लड़की होकर
जिंदा हूं यही
काफी है गुनाह
बेगुनाह की
मनीषा को अपने
भाई की पढ़ाई
में कोई
रुकावट ना हो,
इसलिए उसे
स्कूल भेजा
जाता था वह
अपने भाई को 4 किलोमीटर
तक उसका बस्ता
भी तंग कर
लेकर जाती थी
उसे बरसात में
भाई के सिर पर
छाता लेकर चलना
पड़ता था
लेकिन वह अपने
पढ़ाई से
वंचित न रहना
पड़े इसलिए
उसे यह सब
करना पड़ता
था।
इस
प्रकार लड़की
को घर की
प्रतिष्ठा
मान मर्यादा
बिकाऊ माल की
तरह समझना वह
शोषण करना
समझा गया।
3) आर्थिक
शोषण :-
मानव एक
संवेदनशील
प्राणी है आज
की उपभोक्तावादी
संस्कृति ने
समाज की भूख
को और अधिक
बढ़ा दिया है
अधिक से अधिक
पैसे कमाने की
लालसा ने मानव
के मूल्यों का
राज हो गया है
यह उपभोक्तावादी
संस्कृति
पूंजीवादी
अर्थव्यवस्था
की ही देना
पूंजीवादी
अर्थव्यवस्था
ने समाज में
मानव मूल्य को
बहुत
प्रभावित
किया है अधिक
धनोपाजर्न की
प्रकृति
व्यक्ति को
भ्रष्ट मार्ग
पर ले गई
संपत्ति के
लिए संबंधों
को नकारा जाने
लगा भौतिक सुख
समृद्धि में
मानव संबंधों
की पहचान केवल
आर्थिक
स्थितियों के
अनुरूप होती
जा रही है
आर्थिक दबाव
के कारण क्षण
का शिकार सबसे
अधिक महिला
वर्ग पर पड़ा
विधवा नारी
कामकाजी नारी
संपत्ति से
अलग करने वाली
नारी के विषय
में मैत्री
पुष्पा जी ने
अपने उपन्यास
में सजीव
चित्रण
प्रस्तुत
किया है।
विधवा
नारी को अपने
परिवार में एक
भर के रूप में
समझा जाता है
वह अपने पति
की मृत्यु के
पश्चात विधवा
का जीवन
व्यतीत करती
है ईंधन नामक
उपन्यास की
नायिका
मंदाकिनी की
मां अपने पति
की मृत्यु के
बाद रतन यादव
के साथ भाग
जाती है रतन
यादव जायदाद
की लालच में
प्रेम के
सहारे मंदा की
दादी ‘बऊ’ पर
मुकदमा करके
सारी जमीन
जायदाद प्रेम
के नाम कर
लेता है वह
धोखे से अपने
नाम पर कर कर
प्रेम को एक
बूढ़े को बेच
देता है।
समाज
में कामकाज की
जिम्मेदारी
पुरुष वर्ग पर
होती है परंतु
जब नारी
द्वारा
कामकाज करना चाहा
तो उसको अपने
मेहनत के
पैसों पर कोई
अधिकार न था
वह बाहर काम
करती वह अपनी
तनख्वाह अपने घर
वालों को देना
पड़ता था।
सुप्रीम
कोर्ट ने पिता
की संपत्ति पर
पुत्री का भी
अधिकार दिया
है परंतु
पुरुष प्रधान
समाज इस नियम
को नहीं मानना
चाहता आज
भाई-बहन का रिश्ता
इस संपत्ति के
कारण ही खराब
होता जा रहा
है गुना बेल
गुना की कामों
की हत्या उसके
भाई ने सिर्फ
संपत्ति के
कारण कर दी “
विमल ने कामों
के खून से ही
तिलक खींच
अपने माथे पर
होंठ पीछे हुए
थे लेकिन
चेहरा विजय का
रूप था। “
आज
पूरे समाज में
नई आर्थिक रूप
से सक्षम है उसे
अपनी
आत्मनिर्भरता
के लिए किसी
के सहारे की
आवश्यकता
नहीं है नई
अपनी पूरी
जिंदगी में सेवा,
समर्पण,
प्रेम व
कर्तव्यपालन
को महत्व देती
है परंतु पुरुष
वर्ग द्वारा
उसे ही वह
आधार वह
सम्मान आज भी
नहीं दिया
जाता जिसकी वह
हकदार होती
है।
4) धार्मिक
शोषण :-
भारतीय समाज
में धर्म को
अत्यधिक
महत्व दिया गया
है धर्म के
आधार पर ही
समाज का ढांचा
तैयार किया
गया है हमारे
धार्मिक
परंपराएं वह
रीति रिवाज की
नारी शोषण में
अहम भूमिका
है। राज किशोर
जी ने कहा है -
“भारतीय
स्त्री की
गुलामी की
अदृश्य
जंजीरें
पुरुष, पूंजी और
धर्म के हाथों
में है। “
हमारा
धार्मिक
साहित्य
एकांकी रहा है
यह पुरुषों के
हित के
दृष्टिकोण से
बना है स्त्री
के पुरुषों के
हित के लिए
धर्म पूजा पाठ
व्रत उपवास
करना बताया
गया पति की
मृत्यु के
पश्चात इसकी
चिता में
स्वयं को ही
भस्म करना
सौभाग्य समझा
जाता था ऐसी
सती नारी को
समझ में बहुत
सम्मान दिया
जाता मैत्री
पुष्पा के
उपन्यास आंगन
पाखी के
नायिका भवन
मोहिनी के पति
की आकस्मिक
मृत्यु होने
पर उसके
ससुराल वालों
के द्वारा
उसको सती होने
के लिए विवश
किया जा रहा
था। “ सती सती
का जाप चल रहा
है पति चला
गया उसको जाना
होगा अब पति
का सर गोद में
लेकर चिता में
बैठे जेठ जी
दाग द आज की
लपटों के बीच
मौत की ओर
जाती हुई लोग
उसे देख जिंदा
जल जाना ही
उसकी नियति
है। “ यह भवन के
जेठ जी के
द्वारा किया
गया षड्यंत्र
था वह अपने
भाई की संपत्ति
को हड़पना
चाहता था
किंतु भवन
पंडित जी और चंद्र
की सहायता से
इस षड्यंत्र
से बचकर भाग जाती
है।
पति
के द्वारा
संतान न होने
पर पत्नी को
किसी अन्य से
संतान पैदा
करने के लिए
विवश करना पति
की लंबी उम्र
वह अच्छे
स्वास्थ्य के
लिए व्रत
उपवास पर पूजा
पाठ करना
पुत्र
प्राप्ति के
लिए यज्ञ हवन
और अनुष्ठान
करना इस तरह
से धर्म के
नाम पर
नारियों का
शोषण समाज के
द्वारा किया
जाता रहा है।
फरिश्ते-निकले
उपन्यास में
सब्बी अनमेल
विवाह के कारण
वह अपने से
संबंध बनाकर
संतान नहीं
प्राप्त करना
चाहती थी
जिसके लिए
अनेक किया क्यों
अनुष्ठान किए
गए उसके ऊपर
अनेक दबाव बनाए
गए पुरुष वर्ग
नारी के
सम्मान और हित
को हमेशा से
अनदेखा करता
आया है।
निष्कर्ष
मैत्रेयी
पुष्पा ने
अपने
उपन्यासों
में नारी की
उभरती छवि व
मानव समाज
द्वारा उनका
उन्मूलन किया
जाना, वह नारी
का शोषण व
उसके प्रति
अन्याय को
अत्यधिक
गहराई से उभरा
है। नारी की
स्थिति
प्रत्येक
क्षेत्र में
दीनता पूर्ण
रही है। वह
अपने स्वयं के
अधिकारों व
सम्मान के लिए
लड़ती हुई दिखाई
गई है
मैत्रेयी जी
का मानना है
कि नारी जब तक
आत्मनिर्भर
नहीं होगी,
वह अपने
अधिकारों के
प्रति सजग
नहीं हो पाएगी
वह स्वयं के
अधिकारों के
लिए कभी खड़े
नहीं हो
पाएगी। इस
प्रकार से वह
स्वाधीन होकर
भी सदैव
पराधीन ही
रहेगी पुष्पा
जी की नारियां
अपने
अधिकारों और
सम्मान को
प्राप्त करने
के लिए
संघर्षरत
दिखाई गई है
शिक्षा
प्राप्त करने
के कारण समाज
में प्रचलित
को प्रथाओं
जैसे दहेज
प्रथा सती
प्रथा जाति
प्रथा उन मेल
विवाह आदि सभी
का विरोध करती
है।
इस
प्रकार से
मैत्रेयी
पुष्पा जी ने
अपने उपन्यासों
में नारी जीवन
के प्रत्येक
क्षेत्र की
दृष्टि से
चित्रण किया
है वह क्षण से
मुक्ति
प्राप्त करने
हेतु संघर्ष
का भी वर्णन
किया है
मैत्री
पुष्पा के
उपन्यासों
में नारियों अपने
स्वत्व व
संघर्ष के लिए
तत्पर होकर एक
नए परिवर्तन
को जन्म देंगे
मैत्री
पुष्पा जी ने नारी
के अस्तित्व
संघर्ष के
साथ-साथ
मनुष्य वह
समाज के जीवन
संघर्ष का
बहुत ही रोचक
व सुंदर ढंग
से चित्रण
किया है।
संदर्भ
Amar Jyoti, Feminist
Perspective in the Novels of Women Novelists
Maitreyi Pushpa - 'Agan Pakhi'
Maitreyi Pushpa - 'Angels Emerged'
Maitreyi
Pushpa - 'Betwa Kept Flowing'
Maitreyi Pushpa - 'Guilty
or Innocent'
Maitreyi Pushpa - 'Jhoola
Nat'
Maitreyi Pushpa - 'Kasturi Kundal Basai'
Maitreyi
Pushpa - 'Listen, Malik, Listen'
Raj Kishore (ed.) - 'A Place for Women'
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