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A STUDY OF HUMAN VALUES EMBEDDED IN THE SHRIMAD BHAGAVAD GITA AND YOGA SUTRAS

Original Article

A STUDY OF HUMAN VALUES ​​EMBEDDED IN THE SHRIMAD BHAGAVAD GITA AND YOGA SUTRAS

श्रीमद्भगवद्गीता एवं योग सूत्र में नीहित मानवीय मूल्यों का विश्लेषणात्मक अध्ययन

 

Mamta Pant 1*Icon

Description automatically generated, Rajesh Kumar Kaswan 2

1 Research Scholar, Nirvan University, Jaipur, India

2 Professor, Nirvan University, Jaipur, India

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ABSTRACT

English: This research paper is a study of the human values ​​embedded in two great texts of Indian philosophy: Patanjali's Yoga Sutras and the Shrimad Bhagavad Gita. In the present times, along with material progress, human values ​​are diminishing. The decline of these values ​​has become a global concern. The main objective of this research paper is to explore how the Yamas and Niyamas described in Patanjali's Yoga Sutras and the Gita reveal the moral foundation of an individual. It examines how the mind can be purified through the Yoga Sutras. Similarly, the principles of 'Nishkama Karma' (selfless action) and 'Sthita Prajna' (a person of steady wisdom) in the Gita inspire balanced behavior in society. While Yoga strengthens inner discipline, the Gita paves the way for equality. The integration of these two should form the basis of the modern education system and character building, leading to a higher and more divine life for the individual.

 

Hindi: प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय दर्शन के दो महान ग्रन्थों पतंजलि योग सूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता में निहित मानवीय मूल्यों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन है। वर्तमान समय में भौतिक प्रगति के साथ-साथ मानवीय मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। इन मूल्यों का ह्रास एक वैश्विक चिन्ता का विषय बना हुआ है। इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य यह है कि कैसे पतंजलि योगसूत्र एवं गीता में वर्णित यम-नियम व्यक्ति के नैतिक आधार का सुदृढ़ करते हैं। किस प्रकार योगसूत्र में चित्त को शुद्ध किया जा सकता है। वहीं गीता के ‘निष्काम कर्म’ एवं ’स्थित प्रज्ञ’ जैसे सिद्धान्त उसे समाज में संतुलित व्यवहार करने की प्रेरणा देते है। योग से जहाँ आन्तरिक अनुशासन को बल मिलता है। वहीं गीता समता का मार्ग दिखाती है। इन दोनों का समन्वय आधुनिक शिक्षा प्रणाली और चरित्र निर्माण का आधार होना चाहिए जिससे व्यक्ति जीवन उच्च और दिव्य बनता है।

 

Keywords: Human Values, Ashtanga Yoga, Nishkama Karma, Sthita Prajna, Yamas and Niyamas, Chitta Prasada मानवीय मूल्य, अष्टांग योग, निष्काम कर्म, स्थित प्रज्ञ, यम नियम, चित्त प्रसादन

 


प्रस्तावना

योगसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता दोनों ग्रन्थ भारतीय दर्शन के एक ऐसे स्तम्भ है। जो न केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते है। बल्कि मानव के मानवीय मूल्यों की एक सुदृढ़ नींव भी रखते हैं। योगसूत्र जहाँ मनोवैज्ञानिक, व्यवहारिक अनुशासनबद्ध दृष्टिकोण अपनाता है वहीं गीता में कर्मों में कुशलता, व्यवहारिकता एवं भावनात्मक संतुलन पर बल मिलता है। इन दोनों ग्रन्थों चरित्र निर्माण एवं समाज में सांमजस्य स्थापित करते है। ये मानव को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊचाइयों तक ले जाने का कार्य प्रशस्त करते है। योग सूत्र में चित्त शुद्धि पर बल दिया गया है। वही गीता जीवन के रणक्षेत्र में कर्तव्य और नैतिकता का बोध कराती है।

 

पातंजल योग सूत्र परिचय

महर्षि पतंजलि द्वारा रचित ‘योगसूत्र’ योग दर्शन का मूल ग्रन्थ है। पातंजल योगसूत्र की रचना लगभग ईसा पूर्व के आस-पास मानी गयी है। यह ग्रन्थ वैज्ञानिक और सूत्रबद्ध शैली में लिखा गया है। इस ग्रन्थ में कुल 195 सूत्र हैं। यह 4 पादों (अध्यायों) में विभाजित है।

1)     समाधि पाद: योग के स्वरूप चित्त वृत्तियाँ, चित्त वृत्ति निरोधोपाय, अभ्यास वैराग्य एवं चित्त प्रसादन के उपाय।

2)     साधन पाद: योग प्राप्ति के साधनों का वर्णन किया गया है। जिसके क्रिया योग विधियाँ और अष्टांग योग (यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार) के प्रथम पाँच अंगों का वर्णन।

3)     विभूतिपाद: अष्टांग योग के अंतरंग साधन धारणा, ध्यान, समाधि का वर्णन किया गया है एवं योग से प्राप्त विभूतियों, सिद्धियों का वर्णन किया गया है।

4)     कैवल्य पाद: कैवल्य, मोक्ष की स्थिति। पातंजल योगसूत्र का मुख्य उद्देश्य चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करना इसके लिए अष्टांग योग के माध्यम से व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक रूपान्तरण करना।

 

श्रीमद्भगवद्गीता परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता महर्षि वेद व्यास रचित महाकाव्य ‘महाभारत’ के भीष्म पर्व से लिया गया है। इसमें कुरूक्षेत्र के युद्ध में योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है।

संरचना- इस ग्रन्थ में 18 अध्याय और 700 श्लोक है। इसमें कर्म, भक्ति, ज्ञानयोग का सुन्दर समन्वय है। इन तीनों के माध्यम से जीवन को उत्कृष्ट बनाया जा सकता है। इसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है।

कर्मयोग (अध्याय 6) अध्याय इन अध्यायों में कर्म योग की प्रधानता है।

भक्तियोग (अध्याय 7-12) इन अध्यायों में भक्ति समर्मण और उपासना का वर्णन किया।

ज्ञानयोग (अध्याय 13-18) इन अध्यायों में विवेक और आत्मज्ञान, आत्म संयम का वर्णन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश है कर्म करो, फल की ईच्छा त्याग दो, संसार में रहते हुए, अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए आध्यात्मिकता की प्राप्ति आत्मज्ञान की प्राप्ति करना कर्म, भक्ति, ज्ञान के समन्वय व्यक्तित्व का रूपान्तरण करना तथा इसके साथ से सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति करना।

योग सूत्र में वर्णित यम नियम- नैतिक जीवन का आधार

अंहिसा- अहिंसा का वर्णन पातंजल योगसूत्र में 2/35 में इस प्रकार किया गया है।

‘‘अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः’’।।

(पा0यो0सू0 3/35)

अर्थात जब साधक मन, वचन कर्म से अहिंसा में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके निकट रहने वाले हिंसक से हिंसक जीव, वैर भाव से रहित हो जाते हैं। यह भाव आज के समय में ‘शान्ति निर्माण’ (Peace building) के सिद्धान्तों का मूल है।

सत्य- मन वचन कर्म की एकरूपता सत्य है। सत्य के फल का वर्णन पा0यो0सू0 में इस प्रकार किया गया है।

‘‘सत्य प्रतिष्ठांया क्रियाफलाश्रयत्वम्।।’’

(पा0यो0सू0 2/36)

अर्थात् जब योगी (साधक) सत्य का पालन मन, वचन कर्म से करता है तब उसकी वाणी में अमोघ शक्ति आ जाती है, यह सामाजिक विश्वास और सत्य निष्ठा (Integrity) का आधार है।

अस्तेय- अस्तेय की प्रतिष्ठा का फल पा0यो0सू0 में इस प्रकार बताया गया है।

‘‘अस्तेय प्रतिष्ठांया सर्वरत्नोपस्थानम्’’

(पा0यो0सू0 3/37)

जब साधक में लालता समाप्त हो जाती है। उसे समस्त रत्नों की जानकारी हो जाती है। अर्थात दैवीय गुण उसे प्राप्त होते हैं।

कभी किसी के धन का लालच या लोभ न करे। इस श्रुति वाक्य के आधार पर स्पष्ट होता है। हाथों की चोरी तो दूर वेदों में योगसूत्र में परायेधन के प्रति लालची वृत्ति का निषेध है।

ब्रहमचर्य: वेदों मे भी ब्रहमचर्य का वर्णन मिलता है कि ब्रहमचारी, सर्वप्रेरक, सर्वशक्तिमान परमात्मा के गुण प्रकार करके संसार में ज्ञान और वृद्धिकारक गुणों को बढ़ाकर सब का मोक्ष सुख का अधिकारी बनाता है।

अर्थ 11/5/23

ब्रहमचर्य के पालन से साधक वेद ज्ञान को धारण करने में समर्थ होता है तथा समस्त दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत हो जाता है। यह शक्ति उन्हें शारीरिक, वाचिक तथा मानसिक सब प्रकार से सशक्त बनाती है।

अपरिग्रह: संचयवृत्ति का त्याग। महर्षि पतंजलि ने संचयवृत्ति के त्याग के रूप में आसक्ति का त्याग बताया है। अत्यधिक आसक्ति और संग्रह की प्रवृत्ति मानवीय मूल्यों को नष्ट कर देती है।

नियम- महर्षि पतंजलि ने यम के साथ नियमों के पालन भी आवश्यक बताये हैं क्योंकि  नियमों के द्वारा साधक के जीवन का विशेष नियमन होता है। साधक के लिए यम नियम सामाजिक तथा व्यैक्तिक उपलब्धियाँ है।

योगसूत्र के यम नियम नवीन साधक को योग का मार्ग प्रशस्त करता है। इन नियमों का साधक जितना पालन करता है। उतना ही उसे लाभ मिल जाता है। यम की तरह इनमें पूर्ण प्रतिष्ठा की शर्त नही रखी है। नियम के अन्तर्गत सर्वप्रथम है

शौच: शौच शब्द का अर्थ है पवित्रता साधना के क्षेत्र में पवित्रता की महती आवश्यकता है। पवित्रता के लिए प्रार्थना चारों वेदों में मिलती है। महर्षि पतंजलि ने शौच के फल बताये हैं। बाह्य शुद्धि का फल

‘‘शौचात्स्वाड़ग्जुगुप्सा परैरसंसर्गः।।

(पा0यो0सू0 2/40)

अर्थात बाह्य शुद्धि के पालन से अपने शरीर में अपवित्र बुद्धि होकर उसमें आसक्ति नही रहती है। बाह्य शुद्धि स्नान आदि तथा अर्थशुचि का महत्वपूर्ण स्थान है। अर्थात अन्न-धन संग्रह करने के लिए छल, कपट, सत्य-असत्य, भय, अन्याय आदि साधनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

आन्तरिक शुद्धि का फल- आन्तरिक शुद्धि का फल बताते हुए कहते है कि आन्तरिक शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि हो जाती है। चित्त एकाग्र, मन में प्रसन्नता, इन्द्रिया वश में हो जाती है तथा आत्मसाक्षात्कार की योग्यता आ जाती है।

संतोष- पा0यो0सू0 में संतोष के फल का वर्णन इस प्रकार से है

‘‘संतोषादनुत्तम सुख लाभः’’

(पा0यो0सू0 2/42)

अर्थात संतोष से चाह रहित होने पर जो संतुष्टि का भाव रहता है। वह अनन्त सुख है उसकी बराबरी इसका कोई सांसारिक सुख नही कर सकता है। इसके पालन से उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण बढ़ रहे मानसिक तनाव को कम किया जा सकता है।

तप- विपरीत परिस्थितियों में द्वन्दो को सहन (SelfDiscipline) करने की क्षमता विकसित करना। तप के फल का वर्णन करने हुए कहा है-

‘‘कायेन्द्रियसिद्विर शुद्धिक्षयान्तपसः।।

(पा0यो0सू0 2/43)

तप के अभ्यास से अशुद्धियों का श्रय हो जाता है। साधक का शरीर स्वस्थ, हल्का और स्वच्छ हो जाता है। मानसिक अशुद्धियाँ समाप्त होकर अनेकों सिद्धियाँ प्राप्त होती है।

स्वाध्याय (Self Study)-  स्वाध्याय दो अर्थों में है।

ग्रन्थों का अध्ययन - सद्ग्रन्थों का अध्ययन करना ऐसी पुस्तकों का अध्ययन करना जो सत्य का बोध करती हंै।

आत्मविश्लेषण- स्वयं के विचारों और कार्यों का निरन्तर निरीक्षण करना, स्वयं का विश्लेषण करना कि हम सही मार्ग पर है कि नहीं।

फल- स्वाध्याय के अभ्यास से ईष्ट देवता (आदर्श) का साक्षात्कार हो जाता है एवं अभिलषित कार्य की सिद्धि होती है।

ईश्वर प्राणधान- पातंजल योग में निर्दिष्ट योगांगो में नियम दूसरे स्थान पर है और नियम के अन्तिम अंग है ईश्वर प्राणिधान से यही भाव लक्षित होता है कि जब तक साधक अहिंसा, सत्य आदि यम तथा शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय आदि नियमों का पालन नहीं कर लेता है तब तक उसे ईश्वरीय कृपा प्राप्त नहीं होती है। ईश्वर प्राणिधान का फल का वर्णन इस प्रकार है-

‘समाधिसिद्धिश्वर प्राणिधानात्’।।

(पा0यो0सू0 2/45)

ईश्वर की शरणागति से योगसाधना में आने वाले विघ्नों का नाश होकर शीघ्र प्राप्त हो जाती है। अहंकार का नाश हो जाता है।

 

उद्देश्य

1)     गीता और योगसूत्र में वर्णित प्रमुख मानवीय मूल्यों की पहचान।

2)     दोनों ग्रथों के मूल्य-तत्वों का तुलनात्मक विश्लेषण।

3)     समकालीन समाज मे इन मूल्यों की उपादेयता की परीक्षा।

4)     मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक परिपे्रक्ष्य में मानवीय मूल्यों का पुनर्पाठ।

 

 

 

साहित्य समीक्षा

आचार्य (2018) का ग्रंथ ‘‘भगवद्गीता का मूल्य-दर्शन एक विश्लेषणात्मक अध्ययन‘‘‘ गीता में प्रतिपादित नैतिक, आध्यात्मिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रकृति, संरचना और आधुनिक संदर्भ में उनकी उपयोगिता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक ने गीता के विभियन्न अध्यायों -विशेषकर कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और अध्याय 16 (दैवी और असुरी सम्पदाएँ) को मूल्य-चिंतन के आधार-ग्रंथ के रूप में व्याख्यायित किया है। पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गीता के मूल संदेश निष्काम कर्म, समत्व, कर्तव्यनिष्ठा, धर्म, सत्य, अहिंसा और आत्मबोध जैसे मूल्यों का व्यवस्थित अध्ययन करना है। आचार्य का यह तर्क विशेष उल्लेखनीय है कि गीता के मूल्य केवल धार्मिक या आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मानव -र्केिन्द्रत, सार्वभौमिक तथा सामाजिक-नैतिक जीवन के आधार के रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गं्रथ में यह भी प्रतिपदित किया गया है कि गीता की शिक्षाएँ व्यक्ति को मानसिक संतुलन, भावनात्मक स्थिरता और नैतिक निर्णय-क्षमता प्रदान करती है। लेखक विभिन्न उदाहरणों द्वारा यह स्पष्ट करते है कि समत्वयोग और निष्काम कर्मयोग जैसे मूल्य न केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए बल्कि सामाजिक समरसता और सामूहिक कल्याण के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

कापड़ी (2018) का यह शोध लेख भगवद्गीता के दो प्रमुख आयामों-आत्मज्ञान और कर्तव्यबोध का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। शोध में गीता के ज्ञानयोग एवं कर्मयोग से जुड़े प्रमुख श्लोकों का चयन कर यह दर्शाया गया है कि आत्मज्ञान व्यक्ति को अपने वास्तविक स्परूप, ध्यातव्य उद्देश्यों एवं नैतिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक करता है, जबकि कर्तव्यबोध जीवन के व्यावहारिक क्षेत्र में संतुलन एवं निष्पक्षता बनाये रखने का मार्ग प्रशस्त करता है। कापड़ी का निष्कर्ष यह है कि आत्मज्ञन और कर्तव्यबोध एक-दूसरे के पूरक है आत्मज्ञान आतंरिक चेतना को विकसित करता है और कर्तव्यबोध उस चेतना को सामाजिक उपयोगिता की दिशा देता है। लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि आधुनिक युग के नैतिक-संकटों का समाधान गीता में वर्णित इसी अखंड जोड़ में नीहित है। यह अध्ययन गीता के दार्शनिक और क्रियात्मक मूल्यों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को समझने में महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होता है।

खन्ना (2021) का यह अध्ययन पतंजलि योगसूत्र में वर्णित यम और नियम के मानवीय तथा मनोवैज्ञानिक महत्व का विश्लेषण विवेचन प्रस्तुत करता है। लेखक का तर्क है कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे यम तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान जैसे नियम न केवल आध्यात्मिक साधना के तत्व है बल्कि मनोवैज्ञानिक संतुलन, व्यक्तित्व विकास और आत्म-नियंत्रण के लिए भी अत्यंत प्रभावी है। खन्ना के अनुसार यम, नियम व्यक्ति के व्यवहार, भावनाओं और संज्ञानात्मक संरचना को विनियमित करते है, जिससे तनाव-प्रबंधन, भावनात्मक स्थिरता और सामाजिक व्यवहार में सामंजस्य स्थापित होता है। शोध यह भी दर्शाता है कि आधुनिक मनोविज्ञान के सिद्धान्त जैसे Cognitive Discipline, Self-Regulation, Emotional Intelligenced यम-नियम के सिद्धातों के बहुत निकट है। इसलिए योगसूत्र का मूल्य-विधान आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य और Value Education के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

खन्ना (2021) का लेख भगवद्गीता में प्रतिपादित समत्व-योग की आधुनिक युग में उपयोगिता पर केन्द्रित है। लेखक का कहना है कि समत्व-जिसमें राग-द्वेष से रहित संतुलित मानसिक अवस्थ, सफलता-असफलता में समानता और परिस्थितिजन्य संतुलन की क्षमता शामिल है आज के तनावपूर्ण  प्रतिस्पर्धात्मक और मूल्य-संकटग्रस्त समाज में अत्यंत प्रासंगिक है। नंदा बताता है कि समत्व योग व्यक्ति में निर्णय क्षमता, आत्मनियंत्रण, भावनात्मक संतुलन और पेशेगत ईमानदारी को विकसित करता है। यह मूल्य न केवल व्यक्तिगत जीवन में शांति लाते है, बल्कि सामाजिक समरसता, नैतिक नेतृत्व और व्यावसायिक नैतिकता के लिए भी महत्वपूर्ण है। अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि समत्व-योग आधुनिक मूल्य-विचलन और मनोवैज्ञानिक अशांति के मध्य एक व्यावहारिक समाधान प्रदान करता है।

पांडेय (2019) की पुस्तक पतंजलि योगसूत्रों का गहन एवं व्यवस्थित व्याख्यात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। लेखक ने प्रत्येक सूत्र के दार्शनिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक आयामों को परंपरागत भाष्यों तथा आधुनिक व्याख्याओं की सहायता से स्पष्ट किया है। पुस्तक का मुख्य योगदान यह है कि यह योगदर्शन के मूलभूत अंगकृचित्तवार्त्ति, क्लीष, अष्टांग योग , समाधि, ध्यान और विवेक ख्यातिकृषकों मानवीयमूल्यों मूल्यों की दृष्टि से समझने का प्रयास करती है। पुस्तक में यह बताया गया है कि योगसूत्र केवल साधना-ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, नैतिक मूल्यों, सामाजिक दायित्व एवं मानसिक शुद्धि का व्यापक ढाँचा प्रस्तुत करते है।

 

शोध पद्धति

यह अध्ययन गुणात्मक एवं विश्लेषणात्मक पर आधारित है।

प्राथमिक स्रोतः  श्रीमद्भगवद्गीता , पतंजलि योगसूत्र।

द्वितीयक स्रोतः टीकाएँ, भाष्य, दार्शनिक ग्रंथ, शोध-पत्र, पुस्तकों आदि का अध्ययन।

तुलनात्मक एवं Hermeneutical पद्धति का प्रयोग।

 

श्रीमद्भगवद्गीता में नीहित मानवीय मूल्य

गीता का मूल संदेश निष्काम कर्म, समत्व, भक्ति, ज्ञान और आत्मानुशासन पर आधारित है। निम्नलिखित मानवीय मूल्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है -

·        स्थित प्रज्ञ - गीता के अनुसार - एक आर्दश मनुष्य वह है जिसकी बुद्धि स्थिर हो गयी है। और जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है तथा अपनी आत्मा में संतुष्ट रहता है। वही सच्चा ज्ञानी है।

        इसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में इस प्रकार किया गया है।

        ‘‘प्रजहाति यादा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।

        आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते।। (गीता 2/55)

 

श्रीकृष्ण कहते है- अर्थात  हे अर्जुन कि जब मनुष्य जिस काल में उसके मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग कर देता है। और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है। उस काल में वह मनुष्य स्थित प्रज्ञ कहलाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में यह मूल्य आत्म संयम और इन्द्रिय निग्रह की शिक्षा देता है।

·        कर्तव्यनिष्ठा - श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग का संदेश देती है। अपने कर्तव्य कर्म करो और फल ईच्छा का त्याग कर दो।

गीता में कहा है -

        ‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन‘‘ (गीता 2/47)

        यह श्लोक कर्तव्य कर्म की शिक्षा देता है और कर्तव्य पालन में निष्ठावान रहने तथा फल की ईच्छा से मुक्त रहनेे का संदेश देता है। यह मूल्य अपने कार्य को पूरी तत्परता के साथ करने की प्रेरणा देता है। ईमानदारी एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने की प्रेरणा देता है।

·        समत्वं- श्रीमद्भगवद्गीता में समत्व की शिक्षा दी गयी है, कि व्यक्ति को हर परिस्थिति में मनःस्थिति को सम बनाए रखना चाहिए।

गीता में कहा है -

        ‘‘समत्वं योग उच्यतेः‘‘ ।। (गीता 2/48)

        अर्थात समत्व का मूल्य मनुष्य को हर परिस्थितियों, जय-पराजय, लाभ-हाँनि, निंदा-स्तुति, सुख-दुख में समान रहने की प्रेरणा देता ळै। जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।

·        अहिंसा, सत्य, कर्तापन के अभिमान का त्याग- श्रीमद्भगवद्गीता में 16 वें अध्याय में दैवीय सम्पदा से सम्पन्न पुरूषों का वर्णन करते हुए शास्त्रों में वर्णित करणीय कर्मो (अर्थात जो करने योग्य है) का वर्णन किया गया है। तथा आसुरी सम्पदा से सम्पन्न पुरूषों का वर्णन करते हुए अकरणीय कर्म (अर्थात् जो शास्त्रों में निषिद्ध हैं) कहा है, कि जो मानव के करने योग्य कर्म हैं उन्हें करना चाहिए। इन मूल्यों को अपने जीनवन में उतारना चाहिए। इन मूल्यों को अपने जीवन मेें उतारना चाहिए  वे मूल्य सत्य, अहिंसा, अक्रोध, कर्मो में कर्तापनर के अभिमान का त्याग चित्त की चंचलता का अभाव, आसक्ति का अभाव, भय का अभाव, अतःकरण की निर्मलता, ध्यानयोग का दृढ़ अभ्यास, ईश्वर प्रणिधान है।

·        आत्मनियंत्रण, आत्मज्ञान एवं आत्मबोध - श्रीमद्भगवद्गीता में आत्म नियंत्रण, आत्मज्ञन एवं आत्मबोध का वर्णन मुख्य रूप से अध्याय 2 (सांख्ययोग), और अध्याय 6 (आत्मसंयमयोग) में किया गया है।

‘‘अजोनित्यः शश्रतोऽयं पुराणो।

न हन्यते हन्यमाने शरीरे‘‘।। (गीता 2/20)

        अर्थात् यह ‘आत्मा के अमर स्वरूप से यह बताया गया है कि यह आत्मा अजर अमर है, क्योंकि यह अजन्मा है, नित्य है सनातन है। शरीर के समाप्त होने पर भी यह भी यह समाप्त नही होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में अध्याय 6 (आत्मसंयमयोग) में मन को नियंत्रित करने, इन्द्रियों को वश में काने और आत्मा (स्वयं) के वास्तविक स्वरूप को समझने पर जोर दिया गया है।

गीता में 6 वे अध्याय में कहा है -

·        ‘‘तं विद्याद्दुःख संयोग वियोगं योगं सञिज्ञितम्‘‘।। (गीता 6/23)

अर्थात् जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है योग है । और उस योग को धर्म और उत्साहपूर्वक करना चाहिए। द्ढ़ संकल्प के साथ करना कर्तव्यकर्म है।

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित मूल्य जो व्यक्ति को आंतरिक शांति, मानवता और सामाजिक सद्भाव की ओर ले जाते हैं शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य एवं परमार्थ का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गीता में वर्णित निष्काम कर्म, समत्व, स्थित प्रज्ञ, अहिंसा, सत्य, त्याग, अपरिग्रह, लोकसंग्रह, विनम्रता जैसे मूल्य आज के युग में भी उतने ही प्रासंगिक है जितने हजारों साल पहले थे। ये मूल्य व्यक्तित्व का रूपान्तरण, और समाज में सकारात्मक योगदान देने की प्रेरणा देते है।

अध्ययन से स्पष्ट होता है कि योगसूत्र और गीता एक-दूसरे के पूरक है। जहाँ योगसूत्र यम, नियम द्वारा व्यक्ति के भीतर एक नैतिक धरातल तैयार करता है। औरर गीता उस नैतिकता का समाज के हित में क्रियान्वित करने की प्रेरणा देती है।    

 

 

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