Granthaalayah
PREMCHAND'S NARRATIVE VISION: AN OVERVIEW

PREMCHAND'S NARRATIVE VISION: AN OVERVIEW

प्रेमचन्द की कथा दृष्टिः एक अवलोकन

 

Dr. Sanjay Kumar Singh 1

 

1 Assistant Professor, Hindi Department, P.K. Rai Memorial College, Dhanbad, India

 

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ABSTRACT

English: No other storyteller in Hindi, or indeed in any Indian language, has influenced the Indian people with the same depth and intimacy as Munshi Premchand. In this respect, he can only be compared to the great poet Goswami Tulsidas of the Bhakti period. Premchand's personality and life were extremely ordinary. Premchand is the name of an ordinary-looking, quintessential Indian man of extraordinary talent, who, through his writings, captivated the hearts and minds of the people of the country. The peculiarity of his life was that there was nothing particularly special about it. His life was synonymous with pain – the pain of slavery, the pain of the country's bondage, the pain of poverty, the pain of living without support, the pain of family misfortunes – in short, he lived a life of pain and suffering. When Premchand entered the field of writing, on one hand, the magical novels of Babu Devakinandan Khatri were all the rage in Hindi literature, while on the other hand, the romantic and detective novels of Kishorilal Goswami and Gopalram Gahmari held sway. It was a unique romantic world of kings and queens, princes and princesses, tricksters and shape-shifters, magical cellars and caves, wealth, union and separation, and the ebb and flow of emotions, which had captivated not only Hindi readers but also readers of other languages. Premchand was also influenced by this. He could have amassed immense wealth and fame by following this path. But outside this magical world, there was also a world of real, living human beings, where slavery, exploitation, hunger, poverty, illiteracy, untouchability, caste discrimination, and social evils flourished in all their glory. He voluntarily embraced this reality and struggled throughout his life to eradicate it. In the words of Dr. Nagendra, "He also worked to elevate Hindi fiction from the level of mere 'entertainment' and connect it meaningfully with life."

 

Hindi: हिन्दी के ही नहीं भारतीय भाषा के किसी भी कथाकार ने भारतीय जनता को उतनी गहराई-आत्मीयता से प्रभावित नहीं किया जितनी गहराई से मुंशी प्रेमचन्द ने किया। इस दृष्टि से उनकी तुलना केवल भक्तिकाल के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास से ही की जा सकती है। प्रेमचन्द का व्यक्तित्व और जीवन अत्यन्त सामान्य था। प्रेमचन्द एक असाधारण प्रतिभा के धनी साधारण से दिखने वाले एक ठेठ हिन्दुस्तानी का नाम है, जो अपनी रचनाओं के कारण देश की जनता के दिलो-दिमाग पर छा गये। उनकी जिन्दगी की ख़ासियत यही थी कि उसमें ख़ासियत जैसी कोई चीज नहीं थी। उनका जीवन दर्द का पर्याय था- गुलामी का दर्द, देश की जकड़न का दर्द, गरीबी का दर्द, बेसहारा जीने का दर्द, पारिवारिक विपत्तियों का दर्द अर्थात् कुल मिलाकर उन्होंने दर्द और व्यथा का जीवन जिया था। प्रेमचन्द जिस समय लेखन के क्षेत्र में आये उस समय हिन्दी में एक ओर बाबू देवकीनंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों की धूम मची हुई थी तो दूसरी तरफ किशोरीलाल गोस्वामी और गोपालराम गहमरी के रोमानी-जासूसी उपन्यासों का बोलबाला था। यह राजाओं-महाराजाओं, राजकुमारों-राजकुमारियों, ऐयारों-बहुरुपियों, तिलस्मी तहखानों एवं खोहों का धन, मिलन-विरह और उसमें डूबने उतरने की एक अनोखी रोमानी दुनिया थी, जिसने हिन्दी पाठकों को ही नहीं अन्य भाषा-भाषियों के पाठकों को भी अपने आकर्षण में बाँध रखा था। प्रेमचन्द जी के ऊपर भी इसका प्रभाव था। वे चाहते तो इस रास्ते पर चलकर अपार धन और शोहरत बटोर सकते थे। किन्तु इस तिलस्म से बाहर जीते-जागते इंसानों की भी एक दुनियाँ थी, जिसमें  गुलामी, शोषण, भूख, गरीबी, अशिक्षा, छूआछूत, जाति-पाति का भेद, कुरीतियों आदि की फसल अपने पूर्ण वैभव के साथ लहलहा रही थी। इस यथार्थ कों उन्होंने स्वेच्छा से वरण किया और आजीवन इसके सफाये के लिए संघर्षरत रहे। डा0 नगेन्द्र के शब्दों में ‘‘उन्होंने हिंदी-कथा साहित्य को ‘मंनोरंजन’ के स्तर से उठकर जीवन के साथ सार्थक रूप में जोड़ने का काम भी किया।’’

 

Received 07 October 2022

Accepted 08 November 2022

Published 31 December 2022

DOI 10.29121/granthaalayah.v10.i12.2022.6581  

Funding: This research received no specific grant from any funding agency in the public, commercial, or not-for-profit sectors.

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Keywords: Premchand's Stories, An Overview, प्रेमचन्द की कथा दृष्टि, एक अवलोकन


1.   प्रस्तावना

हिन्दी के ही नहीं भारतीय भाषा के किसी भी कथाकार ने भारतीय जनता को उतनी गहराई-आत्मीयता से प्रभावित नहीं किया जितनी गहराई से मुंशी प्रेमचन्द ने किया। इस दृष्टि से उनकी तुलना केवल भक्तिकाल के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास से ही की जा सकती है। प्रेमचन्द का व्यक्तित्व और जीवन अत्यन्त सामान्य था। प्रेमचन्द एक असाधारण प्रतिभा के धनी साधारण से दिखने वाले एक ठेठ हिन्दुस्तानी का नाम है, जो अपनी रचनाओं के कारण देश की जनता के दिलो-दिमाग पर छा गये। उनकी जिन्दगी की ख़ासियत यही थी कि उसमें ख़ासियत जैसी कोई चीज नहीं थी। उनका जीवन दर्द का पर्याय था- गुलामी का दर्द, देश की जकड़न का दर्द, गरीबी का दर्द, बेसहारा जीने का दर्द, पारिवारिक विपत्तियों का दर्द अर्थात् कुल मिलाकर उन्होंने दर्द और व्यथा का जीवन जिया था। प्रेमचन्द जिस समय लेखन के क्षेत्र में आये उस समय हिन्दी में एक ओर बाबू देवकीनंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों की धूम मची हुई थी तो दूसरी तरफ किशोरीलाल गोस्वामी और गोपालराम गहमरी के रोमानी-जासूसी उपन्यासों का बोलबाला था। यह राजाओं-महाराजाओं, राजकुमारों-राजकुमारियों, ऐयारों-बहुरुपियों, तिलस्मी तहखानों एवं खोहों का धन, मिलन-विरह और उसमें डूबने उतरने की एक अनोखी रोमानी दुनिया थी, जिसने हिन्दी पाठकों को ही नहीं अन्य भाषा-भाषियों के पाठकों को भी अपने आकर्षण में बाँध रखा था। प्रेमचन्द जी के ऊपर भी इसका प्रभाव था। वे चाहते तो इस रास्ते पर चलकर अपार धन और शोहरत बटोर सकते थे। किन्तु इस तिलस्म से बाहर जीते-जागते इंसानों की भी एक दुनियाँ थी, जिसमें  गुलामी, शोषण, भूख, गरीबी, अशिक्षा, छूआछूत, जाति-पाति का भेद, कुरीतियों आदि की फसल अपने पूर्ण वैभव के साथ लहलहा रही थी। इस यथार्थ कों उन्होंने स्वेच्छा से वरण किया और आजीवन इसके सफाये के लिए संघर्षरत रहे। डा0 नगेन्द्र के शब्दों में ‘‘उन्होंने हिंदी-कथा साहित्य को ‘मंनोरंजन’ के स्तर से उठकर जीवन के साथ सार्थक रूप में जोड़ने का काम भी किया।’’Nagendra, and Hardayal (n.d.)

 प्रेमचन्द हिन्दी के पहले कथाकार है जिन्होंने सामंती तथा अभिजात्य मानसिकता को तार-तार करते हुए सड़क के साधारण आदमी अर्थात् दबे, कुचले, शोषित, पीड़ित आमजन को कथानायक का गौरव प्रदान किया और हिन्दी साहित्य में यथार्थ की एक नयी परम्परा की बुनियाद रखी। प्रेमचन्द गाँधी और माक्र्स से सर्वाधिक प्रभावित थे। महात्मा गाँधी जी और कार्ल माक्र्स दोनों का लक्ष्य एक है- शोषण मुक्त समाज। दोनों के रास्ते अलग-अलग थे- एक हृदय परिवर्तन में विश्वास करता है दूसरा यह मानता है कि पूँजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता है, बल्कि इसे क्रान्ति के द्वारा ही बदला जा सकता है। अपनी वैचारिक चेतना को स्पष्ट करते हुए प्रेमचन्द ने कहा था ‘मैं गाँधीवादी नहीं हूँ फिर भी गाँधी जी के चेंज ऑफ़ हार्ट (हृदय परिवर्तन) पर विश्वास रखता हूँ। मैं कम्युनिस्ट हूँ किन्तु मेरा कम्युनिज्म केवल यह है कि हमारे देश में जमींदार, सेठ आदि जो कृषकों के शोषक हैं, न रहें।’ उनके ऊपर गाँधी जी का प्रभाव उनकी प्रारंभिक कहानियों एवं उपन्यासों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है इसीलिए इनका समापन प्रायः आदर्शवाद की भूमि पर होता है। ‘रंगभूमि’ उपन्यास का नायक सूरदास जो गाँधीवादी आस्था का अनन्य प्रतिरूप है अपनी सारी कोशिशों, आदर्शो, संघर्षो के पश्चात भी अपनी जमीन हार जाता है और अंत में काल के गाल में समा जाता है तो प्रेमचन्द की आस्था गाँधी से डगमगा जाती है। उनकी अंतिम रचनाओं जैसे-‘पूस की रात’, ‘कफन’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘सद्गति’, ‘दूध का दाम’, ‘मुक्तिमार्ग’ जैसी कहानियों एवं महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ में गाँधीवादी आस्था यथार्थ की शिला से टकराकर चूर-चूर हो जाती है। अपने जीवन के आखरी समय में उन्होंने खुलेआम एलान किया कि मनुष्य समाज दो टुकडों में बॅटा है जिसमें बड़ा हिस्सा मरने-खपने वालों का है और एक बहुत छोटा हिस्सा ऐश-आराम उड़ाने वालों का। यहीं वे महाजनी एवं पूॅजीवादी सभ्यता को उखाड़कर समाजवाद की हिमायत करते हैं। सन् 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में उन्होंने समाजवाद की परिकल्पना को हमारे सामने रखा। किन्तु कभी किसी भी संघर्ष से न पराजित होने वाला वह व्यक्तित्व काल के क्रूर पंजों से बच नहीं पाता है। उनका समाजवाद का स्वप्न न उस समय साकार हुआ न अब। आज समाजवाद नेताओं का महज खिलौना बन गया है जहाँ वे इसका प्रयोग अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए करते रहते हैं। आजादी का स्वप्न करोड़ों भारतीयों की तरह प्रेमचन्द ने भी देखा। किन्तु जिस आजादी की परिकल्पना उन्होंने की थी क्या वह आजादी हमें मिली? ‘आहुति’ नामक कहानी में उन्होंने लिखा है ‘‘कम से कम मेरे लिए तो स्वराज का यह मतलब नहीं है कि जान की जगह गोविन्द बैठ जाए।’’Premchand (n.d.) उनके लिए आजादी का मतलब था सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, सामंती-पूँजीवादी शोषण चक्र से साधारण जनता की मुक्ति और उसके लिए एक बेहतर जीवन। किसान, औरत और अछूत जो समाज का सर्वाधिक शोषित तबका है उस पर हो रहे अन्याय अत्याचार की समाप्ति। धार्मिक पंडा-पुरोहितवाद, मुल्ला-मौलवीवाद का अंत। नौकरशाही के जुल्मों का खात्मा, कोर्ट-कचहरी के दमनकारी हथकंडों की समाप्ति। 1947 की आजादी और प्रेमचन्द की अपनी परिकल्पना की आजादी से कोई सम्बन्ध नहीं है। बल्कि स्थिति बद से बदतर ही हुई है। प्रेमचन्द के कथा साहित्य में आई समस्यायंे तत्कालीन भारत के समाज की राष्ट्रव्यापी समस्यायें हैं, जो भारतीय संस्कृति की उपज रही हैं। समस्याओं का उद्घाटन इस बात का सबूत है कि प्रेमचन्द का अन्तरतम् समाजव्यापी इन विकृतियों के शिकार मध्यम एवं निम्न वर्ग की पीड़ा एव घुटन से स्वयं कितना अभिभूत था। चाहे वह किसान-मजदूर की समस्या हो या स्त्री-पुरुष की या व्यक्ति-परिवार की या समाज-राष्ट्र की समस्या हो प्रत्येक स्तर पर वह उसके रेशे-रेशे को उद्घाटित कर देते थे जो भारतीय समाज को घुन की तरह चाट रहे थे। इन समस्याओं से टकराहट के प्रथम पायदान पर उन्होंने इसके समाधान हेतु आदर्शवाद का रास्ता चुना। पर चिंता ज्यों-ज्यों गहरी होती जाती, समस्यायें विकट रूप से सामने आने लगती है तो समाधानों से अलग हटकर वे केवल समस्याओं की गंभीरता एवं यथार्थता को प्रमुखता देते हैं साथ ही मध्यम एवं निम्नवर्ग के दैन्य और अवसाद को अंकित करते हुए एवं चारित्रिक पतन की पराकाष्ठा की ओर संकेत कर चुप हो जाते है। उनके कथा साहित्य का यह गांभीर्य ‘गोदान’ जैसे उपन्यासों एवं ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘सद्गति’,‘सवा सेर गेहूँ जैसी कहानियों में देखा जा सकता है।

उनका कथा-साहित्य वास्तव में एक ऐसा दर्पण है, जिसमें तत्कालीन समाज की प्रत्येक गतिविधि, क्रिया-कलाप, शोषण, परम्पराएँ, विषमताएँ, धार्मिक रूढ़िया-अंधविश्वास अत्यन्त सजीवता के साथ चित्रित हुए हैं। उनका कथा-साहित्य मानव जीवन की समस्याओं और संवेदनाओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि उनमें मानवेतर सृष्टि भी है। ग्रामीण जीवन के अनन्य सहचर गाय-बैलों के साथ-साथ कुत्ते से लेकर कौए तक को उनके साहित्य में उचित स्थान प्राप्त हुआ है। इनके कथा-साहित्य में एक तरफ गाँवों में ग्रामीणों के सरल आमोद, ढोल, मंजीरें की झनकारों और फाग-भजन आदि गीतों के साथ स्त्रियों के विवाद और जादू-टोने की कथाएं हैं तो दूसरी तरफ नगरों में मिलों का धुँआ है, श्रमिकों का संघर्षमय एवं आनंदमय जीवन है, उच्च वर्ग की मोटर-बग्घियों तथा आमोद-प्रमोद के वर्णन हैं। इसके साथ ही भारतीय कृषकों की ज्वलन्त समस्याओं जैसे- कर्ज, अंधविश्वास, गरीबी, अशिक्षा, रूढ़िया एवं अभावग्रस्त लोगों की दैनन्दिन चुनौतियों को उजागर कर प्रेमचन्द कथा-साहित्य को एक नया आयाम दिया है।

प्रेमचन्द ने अपने कथा-साहित्य में नारी को भी गरिमामय स्थान दिया है। उनके पूर्व के कथा-साहित्य में नारी एक ओर जहाँ ऐश्वर्य के मायाजाल में फँसी हुई विलासिता की वस्तु बनी थी वहीं दूसरी ओर दबी कुचली एवं शोषित भी थी। प्रेमचन्द ने नारी को इस स्थिति से उबारते हुए उसका अंकन यथार्थ के धरातल पर किया। नारी के संघर्षमय जीवन का चित्रण करते हुए उन्होंने उसकी अनेकोन्मुखी समस्याओं का भी चित्रण किया है। इसके साथ ही उन्होंने नारी को उसके अधिकारों से अवगत कराया एवं उसमें आत्मविश्वास जाग्रत करने का सराहनीय कार्य किया। नारी संबंधी उनके विचार को ‘गोदान’ के मेहता के कथन से स्पष्टतयाः समझा जा सकता है-‘‘स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान है, शांतिसंपन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है।’’Premchand (n.d.)

प्रेमचन्द ने अपने कथा-साहित्य में ऐसे अनेक पात्रों की सृष्टि की है जिसके माध्यम से हम अपने समाज की जटिल संरचना को समझ सकते हैं और चेतना पर पडने वाले दबावों को महसूस कर सकते हैं। ‘कफन’ के घीसू-माधव, ‘पूस की रात’ का ठिठुरता हलकू, जन्म से मरण तक अतृप्त ‘गोदान’ का होरी, संघर्ष की पराकाष्ठा और व्यवस्था से लड़ता हुआ ‘रंगभूमि’ का सूरदास और ऐसे अनगिनत पात्र- धनिया, सिलिया, गोबर, जालपा, निर्मला, सुमन, रमानाथ की धड़कनों के माध्यम से प्रेमचन्द इस समाज की यथार्थ स्थिति को विषमताओं को एवं संघर्षों को परत दर परत उघाड़ कर रख देते हैं। अपने पात्रों के माध्यम से प्रेमचन्द ने जिस सत्य का, दुःख-दर्द का उद्घाटन किया है वह साम्प्रतिक संदर्भ में भी उतना ही खरा उतरता है।

प्रेमचन्द युग प्रवत्र्तक महामानव थे। शोषित, पीड़ित, दलित, नारी एवं उपेक्षित वर्ग का जितना सजीव चित्रण उनके कथा साहित्य में हुआ है वह न केवल हिंदी साहित्य में वरन् विश्व साहित्य की अमूल्य निधि है। इनका कथा साहित्य मानवीय मूल्यों का अक्षय भंडार है। उन्होंने अपने कथा-साहित्य के माध्यम से पाठकों को एक नयी धरती और नये आकाश का दर्शन कराया है। ग्रामीण जीवन को जिस सहृदयता के साथ अंकित कर उसे महत्त्व दिया है वह कथा-साहित्य में पहली बार हुआ। डॉ0 त्रिभुवन सिंह के शब्दों में कह सकते हैं-‘‘उन्होंने अपनी लेखनी द्वारा हिंदी-कथा साहित्य को गंभीर साहित्य के रूप में न केवल प्रतिष्ठित ही किया, बल्कि अपनी अद्भुत शैली द्वारा हिंदी कथा के पाठकों की रुचियों का संस्कार कर असंख्य हिंदी पाठकों का निर्माण भी किया।’’Singh and Singh (n.d.) प्रेमचन्द की परम्परा के अनेक कथाकार तो उभरकर सामने आये किन्तु उनमें वह प्रतिभा, खरी प्रतिबद्धता, लोकप्रियता और जनमानस को उद्वेलित करने की क्षमता का अभाव परिलक्षित होता है। हमें आज भी प्रेमचन्द जैसे युग द्रष्टा, मनीषी-कथाकार का इंतजार है।

 

संदर्भ

Nagendra, and Hardayal (Eds.). (n.d.). History of Hindi Literature (हिंदी साहित्य का इतिहास)., p. 559.

Premchand. (n.d.). Premchand’s Complete Stories (प्रेमचंद की संपूर्ण कहानियाँ). Lokbharati Prakashan, p. 334.

Premchand. (n.d.). Godan (गोदान)., p. 150.

Singh, T., and Singh, V. B. (Eds.). (n.d.). Literary Essays (साहित्यिक निबंध)., p. 105.

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