ShodhKosh: Journal of Visual and Performing Arts
ISSN (Online): 2582-7472

THE CONTRIBUTION OF GHULAM RASUL SANTOSH'S NEO-TANTRAISM TO THE DEVELOPMENT OF INDIAN CONTEMPORARY ART

The contribution of Ghulam Rasul Santosh's Neo-Tantraism to the development of Indian contemporary art

भारतीय समकालीन कला के विकास में गुलाम रसूल संतोष के नवतंत्र वाद का योगदान

Anupama Jain 1 Icon

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1 Research Scholar, Research Center, Maharani Lakshmi Bai Government Girls Postgraduate College, Devi Ahilya University, Kila Maidan, Indore, India

2 Research Director, Professor, Department of Painting, Research Center, Maharani Lakshmi Bai Government Girls Postgraduate College, Devi Ahilya University, Kila Maidan, Indore, India

 

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ABSTRACT

English: Tantra is a known ancient spiritual tradition. In this tradition, the practitioner do meditation to get Moksha. Originally it is an Indian tradition of meditation. This tradition is based on the emphasizes the union of the soul with the universal consciousness. Tantric art is not a simple decorative art. One can get spiritual strength through meditation.

Ghulam Rasool Santosh (G.R. Santosh) was an Indian painter and poet. He was an internationally famous artist. His work shows the Neo-Tantra art movement. He was much influenced by Kashmiri Shaiv Tantric philosophy.  He combined the Tantric philosophy with the modern Indian art and created his own new art language.  This art was not only spiritual but abstract too.

In his paintings, Tantra art is presented as a scientific and philosophical way to achieve the consciousness. For him Tantra is the symbol of the energy of the universe. Another distinctive feature of his paintings is the philosophy of Advaita Vedanta. According to the Vedanta philosophy, all existence of the world are interconnected. The roots of G.R. Santosh's Tantric art is Kashmiri Shaivism. It teaches us to feel real world as an expression of divine consciousness. According to the Advaita philosophy, Shiva is the symbol of cosmic consciousness and Shakti is the symbol of creative energy. This harmony between Shiv and Shakti is responsible to create the Srishti.

 The geometric forms and shapes are frequently used in his paintings. He has used dots, triangles, circles, and hexagons etc.  These geometric forms are the symbol of Shiva and Shakti. Shiva is the energies of Purusha (male) and Shakti is the Prakriti (female). It is based on purely Tantric iconography.

The use of bright and pure colours is remarkable in his paintings.  Using this technique, he tried to create a three-dimensional illusion on a flat surface canvas. Through his paintings artist tried to find out the balance in the life through meditation, yoga and Tantric practices.

It is Ghulam Rasool Santosh's greatest contribution, that he tried to combine the tradition of Kashmiri Shaivism with the language of modern abstract art. He also generated the spiritual depth in his paintings by using the combination of symbolic tradition and modern techniques of art. He established a new Tantric art tradition in Indian contemporary art. He also gave an independent and respected place to Indian Neo-Tantric art movement on the international art horizon.

 

Hindi: तंत्र आध्यात्मिक मार्ग की एक प्राचीन परंपरा है । प्राचीन समय में मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए इस परंपरा में साधक ध्यान करते थे। इस परंपरा में आत्मा का परमात्मा से मिलन पर जोर दिया जाता था। तंत्र कला सिर्फ एक सजावटी कला नहीं है, अपितु इससे आत्मिक ऊर्जा भी प्राप्त होती है।

गुलाम रसूल संतोष एक भारतीय चित्रकार और कवि थे। वह एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार थे। उनके चित्रण कार्यों में नवीन तंत्र वाद दिखाई देता है।वह कश्मीरी शैव तंत्र दर्शन से बहुत अधिक प्रभावित थे। उन्होंने तंत्र दर्शन और आधुनिक भारतीय कला का मेल कर ,अपनी एक नई कला भाषा बनाई। यह कला न सिर्फ आध्यात्मिक थी अपितु अमूर्तन कला भी थी ।

उनके चित्रों में तंत्र कला एक विशेष प्रकार का दर्शन और आत्मिक सजगता को प्रदर्शित करती हैं । उनके लिए तंत्र ऊर्जा का स्रोत था। अद्वैतवाद दर्शन के अनुसार संसार के समस्त अस्तित्व परस्पर अंतर्संबंध रखते हैं। संतोष की तांत्रिक कला का मूल कश्मीरी शैववाद है। यह हमें सिखाता है कि वास्तविकता में दिखाई देने वाला जगत, एक दिव्य शक्ति का प्रकटन मात्र है। अद्वैतवाद के दर्शन के अनुसार शिव ब्रह्मांड का प्रतीक है और शक्ति सृजनता का प्रतीक है। शिव और शक्ति के बीच का तालमेल ही इस सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है।

जी. आर. संतोष ने अपने चित्रों में बहुधा ज्यामितीय आकारों का प्रयोग किया है। उन्होंने बिंदी , वृत्त ,त्रिकोण और षट्कोण आदि का प्रयोग किया है। ये ज्यामितीय आकार शिव और शक्ति का प्रतीक हैं । तांत्रिक दर्शन के अनुसार शिव -पुरुष और शक्ति - स्त्री ऊर्जा का प्रतीक है।

उनके चित्रों में शुद्ध चमकीले रंगों का प्रयोग दर्शनीय है। इस तकनीक से उन्होंने अपने कैनवास पर त्रिआयामी प्रभाव उत्पन्न किया है। अपने चित्रों के माध्यम से कलाकार ने ध्यान, योग और तंत्र अभ्यास द्वारा जीवन में संतुलन पाने का प्रयास किया है ।

 जी. आर. संतोष का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने कश्मीरी शैव तंत्र और आधुनिक भारतीय कला का मेल किया। उन्होंने अपने चित्रों में आध्यात्मिक गहराई को भी उत्पन्न किया। प्रतीकात्मक परंपरा और आधुनिक तकनीक के मेल से उन्होंने भारतीय समकालीन कला में तंत्र कला का एक नवीन कला वाद स्थापित किया। उन्होंने वैश्विक कला क्षितिज पर भारतीय नवीन तांत्रिक कला को एक सम्मानजनक स्थान दिलाया।

 

Received 10 January 2026

Accepted 18 April 2026

Published 22 April 2026

Corresponding Author

Anupama Jain, jainarts09@gmail.com  

DOI 10.29121/shodhkosh.v7.i5s.2026.7402  

Funding: This research received no specific grant from any funding agency in the public, commercial, or not-for-profit sectors.

Copyright: © 2026 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.

With the license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download, reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work must be properly attributed to its author.

 

Keywords: Neo-Tantrism, Neo-Tantric Art, Kashmiri Shaivism, contemporary Indian Art, Philosophy of Advaita Vedanta, नव तंत्र वाद, नव तंत्रवादी कला, कश्मीरी शैव वाद, समकालीन भारतीय कला, अद्वैतवाद दर्शन   

 


1.  प्रस्तावना

तंत्र, भारत में उत्पन्न एक प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा पर आधारित एक गहरा और बहुआयामी दर्शन है । तंत्र आध्यात्मिक ज्ञान की खोज का एक ऐसा तरीका है, जिसमें अभ्यासकर्ता एक विशिष्ट शैली पर आधारित चित्र पर  ध्यान केंद्रित करता है और इसके साथ साथ विभिन्न अनुष्ठान करता है, ताकि उसे मोक्ष प्राप्ति हो सके। तंत्र विद्या के अनुसार ध्यान द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा का मिलन सार्वभौमिक चेतना के साथ करने में सक्षम होता है। इसी विचारधारा का अनुसरण करते हुए, कलाकार इस रहस्यमय यात्रा को चित्रित करने के लिए प्रायः प्रतीकात्मक, काल्पनिक और ज्यामितीय रूपों का उपयोग करता है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि तांत्रिक कला केवल सजावट की वस्तु नहीं है, अपितु यह ध्यान और आध्यात्मिक जागृति के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है। यह कला अभ्यासकर्ताओं को चेतना की उच्च अवस्थाओं की ओर जाने का मार्गदर्शन करती है।

गुलाम रसूल संतोष ( गुलाम रसूल डार) को जी. आर. संतोष के नाम से भी जाना जाता है। वह एक अग्रणी भारतीय चित्रकार और कवि थे, जिन्होंने नव-तंत्र कला आंदोलन में अपनी सक्रिय एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जी. आर. संतोष का जन्म श्रीनगर, कश्मीर में हुआ था। भारतीय पौराणिक कथाओं और अस्तित्व के रहस्यमयी आयामों ने उन्हें बहुत प्रेरित किया था। उन्होंने अपना जीवन नव-तंत्रवादी कलाकृतियां बनाने में समर्पित कर दिया था। भारतीय समकालीन चित्रकला जगत में उनके चित्रण कार्य अपने जटिल पैटर्न, जीवंत रंगों और गहरे प्रतीकात्मक अर्थों के लिए प्रसिद्ध हैं।

भारतीय समकालीन कला में नवतंत्रवाद (छमव ज्ंदजतं) के विकास में गुलाम रसूल संतोष को एक अग्रणी और मार्गदर्शक कलाकार माना जाता है। उनकी साधना पूर्ण एवं ज्यामितीय प्रधान रचनाएँ इस धारा की पहचान बन गईं। उन्होंने तांत्रिक दर्शन, विशेषतः कश्मीर शैववाद, को आधुनिक कला की अमूर्त भाषा के साथ जोड़कर भारतीय आधुनिक कला को एक विशिष्ट आध्यात्मिक अमूर्त दिशा प्रदान करने में अपना अमूल्य योगदान दिया ।

 

2.  विवरण

जी. आर. संतोष ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में, अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए विभिन्न नौकरियाँ कीं। उन्होंने साइनबोर्ड पेंट करने का कार्य, रेशम बुनकर का काम करना और दीवारों की रंगाई करने जैसे कई काम किए। कलाकार के रूप में अपनी कलात्मक यात्रा की शुरुआत उन्होंने कश्मीर के कलाकार दीनानाथ रैना से कला शिक्षा प्राप्ति से की। दीनानाथ रैना के मार्गदर्शन में उन्होंने जलरंगों द्वारा परिदृश्य चित्रण करना आरंभ किया। बाद में एस. एच. रजा की सिफारिश पर उन्होंने एम.एस. यूनिवर्सिटी, बड़ौदा में प्रवेश लिया और विख्यात कलाकार एन. एस. बेंद्रे के निर्देशन में कला का औपचारिक प्रशिक्षण लिया। बड़ौदा में कला प्रशिक्षण के दौरान, उनके शुरूआती कार्यों में पश्चिमी कला आंदोलनों, विशेष रूप से घनवाद का प्रभाव दिखता था। इन चित्रों में कलाकार ने अभिव्यंजक तूलिका घातों और जीवंत रंगों का प्रयोग किया था।

1964 में अमरनाथ गुफा की तीर्थयात्रा के दौरान उनके विचारों में एक नया मोड़ आया। वह कश्मीर शैववाद की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने कश्मीर शैववाद के दर्शन एवं दार्शनिकों (अभिनवगुप्त आदि) का गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन ने उनके भीतर आध्यात्मिक परिवर्तन उत्पन्न किया, जिसके बाद उन्होंने कश्मीरी शैवतांत्रिक दर्शन को ही अपनी कला का केंद्र बना लिया ।

 वस्तुतः कश्मीरी शैववाद हिंदू तंत्र परंपरा का एक प्रमुख अद्वैतवादी दर्शन है, जो 9वीं शताब्दी के आसपास कश्मीर में विकसित हुआ था। यह शिव को परम चेतना मानता है और संसार को उसकी अभिव्यक्ति के रूप में देखता है । वसुगुप्त को इस कश्मीरी शैववाद का संस्थापक माना जाता है। लोकश्रुति के अनुसार वसुगुप्त को शिवसूत्र स्वप्न में प्राप्त हुए थे। अभिनवगुप्त ने ‘तंत्रालोक’ और अन्य ग्रंथों द्वारा इसी विचारधारा को और अधिक विस्तार दिया। कश्मीरी शैववाद , शंकराचार्य के अद्वैत से भिन्न है ,क्योंकि यह शंकराचार्य के अद्वैत की भांति संसार को भ्रम नहीं मानता, बल्कि संसार को शिव की स्पंद (कम्पन) मानता है। इस दर्शन का मूल सिद्धांत त्रिका (शिव, शक्ति, नर) पर आधारित है, जहाँ व्यक्तिगत आत्मा शिव के साथ अभिन्न है। यहां साधक प्रतिभिज्ञा (पुनरानुभूति) के माध्यम से अपनी दिव्यता को पहचानता है। कश्मीरी शैववाद कर्मकांडों के बजाय  ध्यान, योग और तंत्र पर अधिक जोर देता है।

 कश्मीरी शैववाद के गहन अध्ययन के पश्चात उन्होंने पारंपरिक आकृतियों और घनवादी परिदृश्यों को रचना बंद कर दिया। परंपरागत चित्रण से हटकर , उन्होंने अपनी स्वयं की विशिष्ट ’नवतंत्र’ कला भाषा विकसित की और जीवन पर्यन्त इसी शैली में कार्य करते रहे।

‘‘गुलाम रसूल सन्तोष की कला सैयद हैदर रजा से प्रेरित रही है। 1960 के दशक में जलरंग माध्यम में चित्रित दृश्य चित्र घनवादी प्रवृत्ति से प्रभावित रहे। 1980 के दशक में आपने अपने जन्म-प्रदेश कश्मीर की श्वेत हिमाच्छादित पहाड़ों की चोटियों के अमूर्त दृश्य चित्र तैल रंगों में बनाये। आपने कुछ व्यक्ति-चित्र भी अर्द्ध विश्लेषणात्मक घनवादी शैली में चित्रित किये। इस समय आप अपनी भारतीयता की जड़ों से आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी विषयवस्तु की ओर अग्रसर हुए। अन्त में गुलाम रसूल ने अपने बिम्ब को ‘मिथुन’ की धारणा में खोजा। पुरुष व नारी के संयोग को आध्यात्मिक धारणा के रूप में अपने सृजन से जोड़ने का प्रयास किया। यह गुलाम रसूल की कला में शैलीगत नवीन परिवर्तन था जिसमें तान्त्रिक कला का समावेश हुआ। यह तान्त्रिक परम्परा आपकी कला में मृत्यु पर्यन्त दो दशकों तक चलती रही।’’ Chaturvedi (2013)

संतोष के चित्र अपने जीवंत रंगों और स्पष्ट रेखाओं के लिए उल्लेखनीय हैं।ये चित्र आध्यात्मिक ऊर्जा और कामुकता की भावना व्यक्त करते हैं। उन्होंने चित्रों में रंगों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है , जैसे कि ‘लाल’ रंग द्वारा उन्होंने शक्ति और पवित्र अग्नि को दर्शाया है, चित्र में ‘हरा’ रंग जीवंतता एवं प्रसन्नता का प्रतीक है, ‘सफेद’ रंग का प्रयोग शांति और पवित्रता को दर्शाने हेतु किया है और ‘नीले’ रंग द्वारा चित्रों में ब्रह्मांड की विशालता और अनंत गहराई को दिखाया गया है।

उनके चित्रों की एक अन्य विशेषता पवित्र ज्यामितिक रूपाकारों का उपयोग है, जो अद्वैत (अद्वैतवाद) के दर्शन में गहराई से निहित है। अद्वैतवाद सभी अस्तित्वों की परस्पर संबद्धता पर जोर देता है। उनके नव-तांत्रिक कार्यों में शिव और शक्ति, पुरुष ( ब्रह्मांड )और स्त्री (प्रकृति) की ऊर्जाओं के मिलन को दर्शाया गया है। इसे दर्शाने के लिए, जी आर संतोष ने अपने चित्रों में तांत्रिक प्रतिमा विज्ञान के अनुसार बिंदु (डॉट्स), त्रिकोण, वृत्त (मंडल) और षट्भुज जैसे शक्तिशाली ज्यामितिक रूपों का प्रयोग किया है। साथ ही उनके चित्रों में अन्य भारतीय प्रतीकात्मक रूपों - कमल, वृत्त और सर्प ,त्रिकोण आदि से गहरा आध्यात्मिक भाव दर्शाया गया है। कमल (पवित्रता और आध्यात्मिक जागृति), वृत्त (जीवन और मृत्यु का शाश्वत चक्र), सर्प (कुंडलिनी ऊर्जा का जागरण), त्रिकोण (ब्रह्मांडीय शक्तियों का संतुलन) का प्रतीक हैं। ये सभी ज्यामितीय प्रतीक और रूप, ब्रह्मांडीय व्यवस्था और सभी अस्तित्वों की परस्पर संबद्धता का प्रतीक हैं। चित्रकार ने दर्शकों में आध्यात्मिक जागृति और ब्रह्मांडीय चेतना की भावना जगाने के लिए , इन तत्वों को बहुत सावधानी से चित्रों में व्यवस्थित किया है।

            चित्र 1

चित्र संख्या  1

शीर्षक - ‘अनटाइटल्ड’

चित्र सौजन्य: आई सी सी आर

 

यह बिना शीर्षक वाली पेंटिंग जी. आर. संतोष ने 1987 में कैनवास पर एक्रिलिक रंगों का इस्तेमाल करके बनाई थी। यह पुरुष और प्रकृति के बीच साझा संबंध की भावना को दर्शाती है। ‘पुरुष’ स्थान और समय से परे आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है ,जबकि ‘प्रकृति’ पदार्थ का प्रतिनिधित्व करती है, जो स्थान और समय में समाहित है। इसमें मन, शरीर और हमारे आस-पास का जगत शामिल है।

कलाकृति में ज्यामितीय आकारों द्वारा पुरुष और स्त्री रूपों को वर्णित किया गया है। यहां प्रकृति (पदार्थ) का संबंध लिंग से है जबकि पुरुष (आत्मा) लिंग से परे है। कलाकृति के केंद्र में एक काला अंडाकार आकार है, जो चमकदार स्फटिक त्रिकोणों से घिरा हुआ है। नीचे कोमल मांसल आकारों से बना कमल स्त्री तत्व की उपस्थिति का प्रतीक है। लयबद्ध तरीके से ज्यामितीय आकृतियों की पुनरावृत्ति, नीली-काली पृष्ठभूमि के विपरीत नारंगी और बैंगनी फूल के पास लगाया गया चमकीले पीले रंग जैसे पूरक रंगों का उपयोग सराहनीय है । चित्र में पूरक रंगों का इस कुशलता से प्रयोग किया गया है कि इससे चित्र में दिव्य प्रकाश उत्पन्न होने का आभास होता है । चित्र में दीप्तिमान रंगों से दिव्य प्रकाश उत्पन्न करना एक ऐसी कलात्मक विशेषता है, जो संतोष के सभी चित्रों में देखा जा सकता है। चित्रों में एक ही रंग के अलग-अलग शेड्स और टिंट्स एवं समीपवर्ती रंगों का उपयोग करके तानीय भिन्नता को हासिल किया गया है।

चित्र को देखने पर, रोशनी की चमकदार और हल्की किरणें दर्शकों का ध्यान खींचती हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो ‘प्रकाश’ प्रकृति के गर्भ से निकल कर पूरे पुरुष तत्व को रोशन कर रहा है। एक ओर काली अंडाकार आकृति नकारात्मकता को सोख रही है, तो दूसरी ओर प्रकृति प्रकाश और ऊर्जा का असीमित स्रोत प्रदान कर रही है, जो आशा और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह दृश्य संयोजन पूर्ण संतुलन और सामंजस्य को दर्शाता  है। संतुलन ही पूरे ब्रह्मांड का अंतिम लक्ष्य है, जिसे मनुष्य  ध्यान और योग साधना से प्राप्त कर सकता है। तत्वों और शरीर पर उनके प्रभाव को नियंत्रित करने से ही आत्मा की संतुष्टि प्राप्त की जा सकती है।

 संतोष ने तंत्र को “कामुक” या “रहस्यमय” रूढ़ियों से निकाला और कला रसिकों के समक्ष उसे ब्रह्मांड, चेतना और ऊर्जा के वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रारूप की तरह प्रस्तुत किया। उनकी कृतियों में यौन और अतिचेतन (sexual and transcendental) का संतुलित संगम दिखता है। संतोष की चित्रकारी में पुरुष‑प्रकृति ,शिव‑शक्ति की द्वैत ऊर्जा, लिंग‑योनि, बिंदु, यंत्र और मंडल जैसे तांत्रिक रूपक एक नवीन आधुनिक अमूर्त संरचना में रूपांतरित हो जाते हैं और एक ब्रह्मांडीय विन्यास की तरह दर्शक के सामने आते हैं।

उनकी अधिकांश रचनाएं कठोर सममिति और केंद्राभिमुख हैं । चित्रों में प्रकाशमान रंग‑क्षेत्र हैं , जिन्हें लाल, नीला, स्वर्ण, श्वेत आदि के प्रयोग से दर्शाया गया है। सूक्ष्म रेखांकन के माध्यम से चित्रों में “ध्यान‑आरेख” का  निर्माण किया गया है। इन चित्रों में रंग एवं रूपाकार  मात्र सजावटी अमूर्तन तत्व नहीं हैं ,बल्कि वो ध्यान और चित्त‑एकाग्रता का साधन भी बन जाते हैं।

जी. आर. संतोष के तांत्रिक चित्रण के मूल में कश्मीर शैववाद का दर्शन है, जो दृष्टिगोचर जगत् को दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है। यह अद्वैतवादी विश्वदृष्टि ब्रह्मांड को शिव (ब्रह्मांडीय चेतना) और शक्ति (रचनात्मक ऊर्जा) के परस्पर क्रिया के रूप में देखती है। जी. आर. संतोष की रचनाएँ अक्सर विरोधी शक्तियों -प्रकाश और अंधकार, पुरुष और स्त्री, स्थिर और गतिशील- के एकीकरण को दर्शाती हैं, जो द्वैत में एकता का तांत्रिक दर्शन दिखाती हैं। ज्यादातर चित्रों में केन्द्र में एक अमूर्त मानव -आकृति दिखाई देती है जो न तो स्पष्ट रूप से पुरुष है और न स्त्री, यह आकृति अर्धनारीश्वर या शिव-शक्ति संयोग का संकेत देती है, जो कश्मीरी शैव तंत्र की मूल अवधारणा के सर्वथा अनुरूप है। यह सांकेतिक केन्द्रीय आकृति अक्सर पद्मासन में बैठे योगी, समाधिस्थ साधक या दिव्य शक्ति रूपी स्त्री के रूप में दिखाई देती है, जो शास्त्रों में वर्णित तांत्रिक साधना और शक्ति-उपासना की ओर भी संकेत करती है। उनके कार्यों में ज्यामितीय सटीकता है, जो  ब्रह्मांड के गणितीय सामंजस्य को दिखाती है। दूसरी ओर चित्रों में उनकी जीवंत रंग योजना , अस्तित्व की स्पंदनशील ऊर्जा को दर्शाती है।

               चित्र 2

चित्र संख्या  2

शीर्षक - ‘पोट्रेट ऑफ ए देवी’

चित्र सौजन्य: सैफरन आर्ट

 

‘ पोट्रेट ऑफ ए देवी’ शीर्षक का यह चित्र 1984 में ऐक्रेलिक माध्यम में बनाया गया था। चित्र में प्रकृति को दिखाया गया है, जो स्थूल जगत को दर्शाती है। इस चित्र में चमकीले रंगों का सुंदर तालमेल है । त्रिकोण जैसे ज्यामितिक आकारों की पुनरावृत्ति से कलाकार ने सममितिक संरचना बनाई है। त्रिकोण अलग-अलग परतों का आभास देते हैं। केंद्र में बर्ना ऊध्वगामी  बड़ा त्रिकोण अंतरिक्ष की तीन दिशाओं, मूल त्रिकोण, को दर्शाता है। चित्र में ऊपर, बीच में और नीचे के भाग में नीले रंग के साथ चमकदार सफेद रंग मिलाकर दिव्य प्रकाश अर्थात ज्ञान की उपस्थिति दिखाई गई है। लाल रंग शक्ति का प्रतीक है। केंद्र में स्थित त्रिकोण के पाशर्व भाग में एक अमूर्त आकृति ध्यान की मुद्रा में पद्मासन में बैठी है। ऊपर की ओर, त्रिकोणीय आकृतियों से एक खिले हुए पुष्प जैसी संरचना का निर्माण हो गया है, जो मानव मस्तिष्क या ध्यान योग के अनुसार सहस्रार चक्र की याद दिलाता है। ये परतें आत्म शुद्धिकरण की प्रक्रिया का प्रतीक हैं, जो धीरे-धीरे मनुष्य को ज्ञान की ओर ले जाती हैं।

रचना में तत्वों र्का ऊध्वाधर संरेखण, ज्ञान और आध्यात्मिकता के स्तर के उत्थान का संकेत देता है। प्रकाश की उपस्थिति को दर्शाने के लिए चमकीले रंगों का इस्तेमाल करना जी. आर. संतोष का अद्वितीय प्रयोग है। रंगों का यह प्रयोग सपाट चित्रतल पर त्रिआयामी दृष्टि भ्रम उत्पन्न करता है। इस चित्र के माध्यम से कलाकार ने ध्यान, योग एवं तांत्रिक प्रथाओं के माध्यम से जीवन का अंतिम लक्ष्य ‘संतुलन प्राप्त करना’ दर्शाया है।

‘‘चित्र का तल सपाट होते हुए भी एक प्रकार की तरलता का अनुभव होता है । कैनवास पर एक विस्तृत क्षेत्र की अनुभूति होती है जिनमें से अमूर्त जैसे कुछ रूप प्रकट होते हैं ‌। ये रूप प्रकाश और अंधकार की क्रीड़ा तथा रंगों के द्वारा सम्मोहक प्रभाव उत्पन्न करते हैं और चित्र में एक गंभीर रहस्य की अनुभूति होती है जिसका विश्लेषण करना कठिन है मानो मन के किसी  ज्वालामुखी में से वृत्त, त्रिभुज, आयत, अर्द्धवृत्त तथा अन्य अनेक ज्यामितीय रूप निकल कर बाहर आ रहे हों और किसी अज्ञात स्रोत से आने वाले प्रकाश में चमक रहे हों।’’ Aggarwal (2009)

              चित्र 3

चित्र संख्या  3

शीर्षक - ‘अनटाइटल्ड’

चित्र सौजन्य: सैफरन आर्ट

 

यह चित्र उन्होंने अपनी मृत्यु से एक साल पहले सन् 1996 में बनाया था ।  इस चित्र में पृष्ठभूमि के रंगों के चुनाव में बदलाव देखा जा सकता है। काले या गहरे रंग के बजाय चित्र में मुख्य रूप से नारंगी और नीले रंग का प्रयोग है, जो चित्र में एक ताजगी भरा उल्लासमय माहौल दर्शाता है। चित्र को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे आसमान से शक्ति बरस रही है और पुरुष (आत्मा) का शुद्धिकरण कर रही है। प्रकृति - पदार्थ शांति से ब्रह्मांड में संतुलन बना रही है। चित्र में पूर्ण संतुष्टि की भावना आच्छादित है। पूर्व के चित्रों में  कलाकार ने तत्वों का संयोजन अधिकांशतः क्षितिजीय किया है, लेकिन इस चित्र में यह संयोजर्न ऊध्वगामी है।  इस चित्र में छिपी हुई क्षैतिज रेखाएं भी हैं, जो संतुष्टि का संकेत देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सभी इच्छाएं शांत हो गई हैं। ऐसी संतोष पूर्ण शांति, जो पूरे मनोयोग से योग साधना करने पर ही प्राप्त की जा सकती है ।

  जी. आर. संतोष एक लेखक और कवि भी थे। उनके लेखन में तांत्रिक दर्शन की इस गूढ़ परंपरा की समझ को देखा जा सकता है, जिसने उनकी कला रचना में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया । उनके नव-तांत्रिक चित्रण ने ज्यामितीय अमूर्तता को आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के गहन माध्यम में बदल दिया। आधुनिक कला को प्राचीन ज्ञान परंपराओं के साथ जोड़कर, उन्होंने भारतीय कला के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जो नवीन और सांस्कृतिक दोनों रूप से प्रामाणिक था।कश्मीरी शैववाद की केन्द्रीय धारणाएँ - समस्त अस्तित्व का एकत्व, शिव-शक्ति की अभेदता, आन्तरिक साधना और चेतना का विस्तार - उनकी रचनाओं में मुख्य दार्शनिक आधार के रूप में उपस्थित रहती हैं। इस तरह उनके चित्र ध्यान-स्थल (मेडिटेटिव स्पेस) और साधना-उपकरण दोनों की तरह कार्य करते हैं।

 

3.  निष्कर्ष

वास्तव में गुलाम रसूल संतोष के तांत्रिक चित्र ऐसे जीवंत चित्रण हैं जहाँ कला, आध्यात्मिकता और दर्शन परस्पर घुल-मिल जाते हैं। उनके चित्र अपनी सटीक ज्यामिति और चमकदार रंगों के माध्यम से, कलाकार की गहन अनुभूति की झलक प्रदान करते हैं। यद्यपि तंत्र कला के रूपाकार यथार्थ जगत से परे हैं, तथापि रूपों की सावधानीपूर्वक व्यवस्था , दीप्तिमान रंगों , संयत रेखाओं और सममितिक संरचनाओं के माध्यम से कलाकार दर्शक को कश्मीरी शैववाद की ध्यान-प्रधान परम्परा से जोड़कर ,आध्यात्मिक अनुभव के क्षेत्र में ले जाता है।

संतोष ने अपनी कला यात्रा की शुरुआत में पश्चिमी आधुनिक कलाकारों और पश्चिमी कला जगत में प्रचलित  भिन्न भिन्न आधुनिक कला वादों ,यथा- घनवाद, अभिव्यंजनावाद आदि से  अमूर्तन कला भाषा सीखी , किंतु फिर  उन्होंने कश्मीरी शैव तंत्र की नितांत भारतीय दार्शनिक परम्परा को अपनाया और पश्चिमी अमूर्तन शैली के साथ भारतीय दार्शनिक तंत्र परंपरा को मिलाकर एक विशिष्ट नव-तांत्रिक शैली का विकास किया। जिसके परिणाम स्वरूप उनके चित्रों में आधुनिक अमूर्तन, तांत्रिक यंत्र, शिव-शक्ति और ध्यान , सभी एक साथ दिखाई देते हैं। एक ही चित्र दृश्य में इन सभी को समाहित करने के कारण उनके चित्र कश्मीरी शैव तंत्रवाद का साक्षात् रूप बन जाते हैं।

संतोष के कार्यों ने यह दिखाया कि भारतीय कलाकार पश्चिमी अमूर्तन की सतही औपचारिकता से आगे बढ़कर देशी तांत्रिक प्रतीकों के आधार पर एक नवीन आत्मसिद्ध, दार्शनिक और आध्यात्मिक आधुनिकता गढ़ सकते हैं। गुलाम रसूल संतोष का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने कश्मीर शैव तंत्र की आध्यात्मिक गहराई, भारतीय प्रतीक‑परंपरा और आधुनिक अमूर्त भाषा को मिलाकर नवतंत्रवाद को भारतीय समकालीन कला की एक स्वतंत्र, दार्शनिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित धारा के रूप में स्थापित किया।।

 

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